सुखद है कि अलग-अलग पत्रिाकाओं और समयों में पढ़ी गईं उनकी प्रिय कहानियों का संग्रह 'उलटबांसी' नाम से बाजार में उपलब्ध है। अब वे एक साथ इन कहानियों को पढ़ सकते हैं और इनकी गुणवत्ता पर विचार भी कर सकते हैं। ऐसा करते हुए इन कहानियों की कुछ सीमाएँ भी जरूर पकड़ में आएँगी। यहाँ इस विश्लेषण में कविता की सभी कहानियों की व्याख्या का अवकाश नहीं है। वह अभीष्ट भी नहीं है। यहाँ कविता की कहानी कला या यूँ कहें कि उनकी कहानी गढ़ने की प्रक्रिया पर भी थोड़ी बहुत बातचीत की जाएगी। मसलन कविता जब 'उलटबांसी' जैसी कहानी लिखती हैं तो कहानी और पठनीयता का ''ास कम होता है या कहें कि न के बराबर होता है लेकिन जब वे कहानी 'लौटते हुए' लिखती हैं तब तमाम कोशिशों के बावजूद कहानी भटकती है। 'स्त्राी अस्मिता' पर कुछ कारगर बातचीत के बावजूद यह कहानी सादगी से भरी लेकिन साहसी कथानक वाली कहानी 'उलटबांसी' के सामने कमजोर हो जाती है। यह तुलना इसलिए भी प्रासंगिक है, क्योंकि हम रचनाकारों को ;चाहे वे किसी भी विधा में लिखते होंद्ध यह समझना चाहिए कि हम शिल्पगत प्रयोगों से रचना में प्राण नहीं डाल सकते। शरीर पर वस्त्रा तभी सुशोभित होता है जब मनुष्य जीवित और स्वस्थ हो अन्यथा बिजूखा भी सौन्दर्य का प्रतिमान बन जाएगा। ये बातें यहाँ इसलिए आवश्यक हैं क्योंकि कविता समर्थ कहानीकार हैं और उनसे बहुत सारी उल्लेखनीय कहानियों की उम्मीद है।
कविता की कहानियों में यदा-कदा ही स्त्राी-मुक्ति की बातें नारे की शक्ल में आती हैं। अधिकांश बार वे कथानक में इस तरह द्घुली रहती हैं जैसे दाल में नमक। कहानी किसी भी पृष्ठभूमि की हो, कविता धीरे से स्त्राी अस्मिता का एक प्रश्न उसमें समाहित कर देती हैं। पूरी कलात्मकता के साथ। बाजार की माँग देखकर नहीं, समय की आवश्यकता को समझते हुए। कविता की कहानियाँ एक ओर पारिवारिक मूल्यों की रक्षा करती हैं तो दूसरी ओर पारिवारिक मूल्यों में समाई असंवेदनशीलता और भय को चुनौती भी देती हैं। इस संग्रह की शीर्षक कहानी इस दृष्टि से चर्चा के योग्य है। यदि आप कहानी का अंतिम हिस्सा पहले न पढ़ लें तो अंत के बारे में कल्पना भी नहीं कर सकते। कहानी माँ के स्वास्थ्य और भाइयों-भौजाइयों के विषय में चल रही है। दूर बैठी बेटी तमाम आशंकाओं से द्घिरी है। अचानक पफोन करके उसे बुलाया जाता है। ऐसे में एक अदृश्य भय किसी को भी जकड़ लेगा लेकिन द्घर पहुँचकर जो होता है, वह तो बेटी ने भी नहीं सोचा था। यही कहानी-कला है। एक साधारण विषय को असाधारण में बदलने की कला। दरअसल कहानी भी यहीं अंत में है। विधवा माँ, जो अब बिल्कुल अकेली है, अपने विवाह का निर्णय ले चुकी है। इस अर्थ में यह पवन करण की कविता से आगे की बात है। वहाँ माँ प्रेम कर रही है पर बेटी से छिपकर। लेकिन यहाँ सीधे विवाह का निर्णय लिया गया है। हालांकि यह दो विधाओं में बात कहने का पफकऱ् है। कविता और कहानी का मि८ााज अलग-अलग होता है। एक जैसी दिखतीं ये दोनों रचनाएँ अपनी पूर्णता में एक जैसी नहीं हैं। वैसे दोनों का प्रभाव गहरा है।
चूंकि कहानी में विस्तार में जाने का अवकाश होता है, इसलिए कविता माँ की मनोरचना के साथ ही पूरे परिवार के स्त्राी-पुरुष चरित्राों की मनोरचना पर टिप्पणी करती हुई आगे बढ़ती हैं। बच्चों को माँ के सुख से अधिक चिंता अपनी कथित बदनामी की है। बहुएँ भी एक स्त्राी के रूप में अपनी सास के अकेलेपन की व्याख्या नहीं कर पातीं। पूरे परिवार में इस स्त्राी को द्घर की सबसे छोटी बेटियाँ ही समझती हैं। महत्वपूर्ण है कि इसमें से एक तीसरी पीढ़ी की प्रतिनिधि है। तीसरी पीढ़ी की इस किशोरी का दादी को समर्थन देना एक नए निहितार्थ की ओर संकेत करता है। यह पूरी कहानी बेहद कसी हुई है। एक भी संवाद या दृश्य अनावश्यक नहीं लगता। एक बेटे के आंशिक समर्थन का चित्राण भी कहानी की विश्वसनीयता में विस्तार ही करता है। यानी कि यह कहानी एकांगी दृष्टिकोण वाली रचना नहीं है। यह कहानी पुरुष सत्तात्मकता के विरु( तो है लेकिन पुरुष मात्रा को खलपात्रा में नहीं बदल देती। दरअसल ये बारीक चीजें ही रचनाकार का भविष्य भी बताती हैं। पाठक यह देख सकते हैं कि इस कहानीकार को कहानी में गहरे उतरने की कला आती है और वह इसके लिए उद्यम करती हुई न८ार आती है। वह कहानी को यथासंभव बीच में छोड़कर नहीं भागती बल्कि उसे यथ्ाायोग्य अंत तक ले जाने की कोशिश करती है। यानी कि यह कथाकार अपनी कहानी के लिए कोई आसान या चमत्कारी रास्ता चुनने के विरु( है। 'बिन्दी री बिन्दी', 'जिरह : एक प्रेमकथा', 'आशिया-ना' और 'यह डर क्यूँ लगता है' जैसी कहानियाँ इस बात का प्रमाण हैं।
कविता के पास जहाँ एक ओर काव्यात्मक और कल्पनाशक्ति से भरी हुई भाषा है तो वहीं दूसरी ओर यथार्थ को स्वर देने वाली भाषा भी है। कई बार तो एक ही कहानी में भाषा के इन सभी रूपों से साक्षात्कार हो जाता है। यहाँ यह कहना आवश्यक है कि यह बात कहने या सुनने में जितनी आसान लगती है, उतनी होती नहीं। कथ्य के अनुरूप भाषा की खोज में कोई लेखक/लेखिका बहुत-भटकता/भटकती है। कविता की कहानियों में प्रयुक्त भाषा के कुछ उदाहरण देखने लायक हैं-
'पर्स में माँ की दी चाभियाँ खन-खनकर मेरे सवाल का उत्तर दे रही हैं... माँ ने आखिर मुझे यह चाभियाँ क्यों दीं? क्या समझ लिया था माँ ने सबकुछ... पिफर भी...? तो क्या मुझे लौटना होगा माँ की उस कोठरी तक, माँ के उसी अकेलेपन के पास? तो क्या चाँद और सूरज की तरह मैंने और माँ ने अपनी-अपनी भूमिकाएँ आपस में बदल ली थीं?'' ;पृष्ठ २१द्ध
''उसे याद है, पड़ोस की पंडितानी चाची की बड़ी-सी टिकुली उसे कितनी पसंद थी। उसका मन होता उसकी अम्मी भी सिर पर वैसी ही चाँद-तारों-सी चमकती बिन्दी लगाए। अम्मी से जब भी उसने जिद की वे या तो जवाब में गुर्रायीं या उस पर बिपफर पड़ीं। अम्मी को बिन्दी के नाम से ही अदावत थी- ''ये बिन्दयाँ-उन्दियाँ, सिन्दूर-उन्दूर हमें जेब नहीं देता, हमारे मजहब का चलन ही नहीं। मैं काहे को लगाऊँ यह सब, हमें तो सूरमा-काजल ही भाता है। और देख आयशा तू भी न लगाया कर ये बिन्दियाँ-उन्दियाँ।'' बचपन में अम्मी उसके सिन्दूर या चन्दन के टीके को पानी से पोंछ डालती। वही टीका जिसे पंडितानी चाची की कितनी खुशामद, कितने छोटे-बड़े टहल के बाद कहीं लगवा पाती थी।''
''नैना के मन में एक गहरी टीस थी, एक हूक-सी। इने-गिने दिन जिंदगी के और पूरे पाँच बरस इतने बेमानी? वे बरस, जिंदगी के वे अनमोल बरस बस यूँ ही बेनाम-से गुजर गये? इतने बेनाम से कि कोरी स्लेट पर लिखी तहरीर की तरह उसके मिट जाने या मिटा देने से भी उस पर या उसके अपनों पर इसकी कोई प्रतिक्रिया नहीं जगती, न ही कोई पफर्क पड़ता है।'' ;पृष्ठ ६३द्ध
''कुछ अपना, बिल्कुल अपना रचने का अहसास औरत के मन में रचता है एक द्घर। द्घर एक सपना है औरतों की नींद में बचपन से सुगबुगाता, डग भरता, ढहता, टूट जाता।'' ;
''रैन बसेरे द्घर नहीं होते, अलग-अलग मंजिलों, अलग-अलग रुचियों वाले लोगों का जमावड़ा और शरणस्थली हो सकते हैं। ये मंजिलें ये रुचियाँ जब भी टकराती हैं रैनबसेरे से अलग-अलग दिशाओं में कई राहें पफूटती हैं। अपने कमरे के दरवाजे पर लगा हुआ वह कागज जिस पर उसने सपना टाँक रखा था, को नोचती हुई वह सोचती रही। हाँ, उसने इस द्घर को सपने जैसा ही संवारा था। लेकिन भले ही वह इसे अपना विश्रान्तिस्थल माने बैठी थी, पर था तो यह एक रैन बसेरा ही। सपने टूटने के लिए ही होते हैं... उसकी आँखों में आँसू जगमगाए... दीदी क्या ठीक ही सोचती थी... कोई द्घर कहीं नहीं होता... बस एक धुँधला-सा एहसास होता है द्घर, जिसे औरतें अपने कलेजे से चिपकाए यहाँ-वहाँ डोलती पिफरती हैं।'' कहा जा सकता है कि कविता के इस संग्रह की कहानियाँ पाठकों के मन-मस्तिष्क पर गहरा असर डालेंगी। इसमें संदेह की कोई गुंजाइश नहीं है। आवरण टिप्पणी में ठीक कहा गया है-''ये कहानियाँ आधुनिकता और परंपरा के 'जिरह' से उपजी ऐसी उलटवासियाँ हैं जो न सिपर्फ पुरानी रूढ़ियों को चुनौती देती हैं, उनके बरक्स आधुनिक युग बोध का एक नया समाजशास्त्रा भी रचती है।''
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