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'बहन जी, रिक्शा अब आगे नहीं जाएगो।'
'काहे...?
बजरिया से हाट की ओर मुड़ते ही मनिहारों की दुकानों से पहले, एकाएक लगी ब्रेक के साथ ही रिक्शेवाला सड़क पर उतरकर खड़ा हो गया था।... सामने टूटे टायर, ड्रम, स्टूल, कुर्सियों के टुकड़े, बाँस और कीकर की टहनियों से बनी बाड़ में से धुआँ उठता देख, केशर स्वतः ही अपना प्रश्न वापस लेती रिक्शे से कूद पड़ी थी। म्यूनिसिपैलिटी वालों को कोसती, जिनकी लेतलाली के चलते बस्ती में तीन दिन से नल-बिजली गायब है। उसने जल्दी से अपने ब्लाउज में खोंसे काले पर्स से पाँच का सिक्का निकालकर रिक्शे वाले को दे दिया और तीन रुपये उससे वापस लेकर आगे बढ़ी, पीछे कापफी लंबा जाम लग चुका था।. |
'बहन जी, रिक्शा अब आगे नहीं जाएगो।'
'काहे...?
बजरिया से हाट की ओर मुड़ते ही मनिहारों की दुकानों से पहले, एकाएक लगी ब्रेक के साथ ही रिक्शेवाला सड़क पर उतरकर खड़ा हो गया था।... सामने टूटे टायर, ड्रम, स्टूल, कुर्सियों के टुकड़े, बाँस और कीकर की टहनियों से बनी बाड़ में से धुआँ उठता देख, केशर स्वतः ही अपना प्रश्न वापस लेती रिक्शे से कूद पड़ी थी। म्यूनिसिपैलिटी वालों को कोसती, जिनकी लेतलाली के चलते बस्ती में तीन दिन से नल-बिजली गायब है। उसने जल्दी से अपने ब्लाउज में खोंसे काले पर्स से पाँच का सिक्का निकालकर रिक्शे वाले को दे दिया और तीन रुपये उससे वापस लेकर आगे बढ़ी, पीछे कापफी लंबा जाम लग चुका था।
आगे जलते टायरों से उठती छिछराँध से बचने के लिए उसने साड़ी के पल्लू से सिर ढाँककर नाक मूँद ली, दाँये हाथ से सड़क रोकने के लिए नाली के छज्जे पर रखे बाँस और टहनियाँ ऊपर-नीचे करके उस पार हो गई। आसपास नारेबाजी और हो-हल्ला मचाते लोग-'हे बहनजी! हे बहन जी!' कहते रह गए थे।
पीछे वाहनों का शोर और आगे भीड़ की चिल्ल-पौं व उठते धुएँ की दुर्गन्ध के बीच उसका दम द्घुट उठा था। जरा देर सुस्ताने की गरज से उसके पाँव हाट की ओर न मुड़कर दस कदम आगे आँषि मंदिर की ओर उठ गए थे। मंदिर का द्वार खुला था। वह सीढ़ियों पर जाकर बैठ गई, चहारदीवारी के अंदर खड़े पीपल की हवा सुखद लग उठी थी। वैसे भी आज वह बहुत थक गई थी। ड्यूटी पर पहुँचते ही नर्सिंग होम में गाँव से दो केस आ गए थे, जिनमें एक की डिलेवरी तो ऑपरेशन से करनी पड़ी थी। नर्सों ने ऑपरेशन थियेटर में इधर-उधर दौड़ा-दौड़ा कर, आज उसे कुछ ज्यादा ही तंग कर लिया था। ऊपर से पिछले और नए आए मरीजों की देखभाल के बीच, जरा सा अनसुना होने पर स्टापफ हैड शर्मा मैडम का दृष्टांत-'तुम जो भी हो, जैसी भी हो बनी रहो, लेकिन यहाँ हमेशा अलर्ट रहो...?' ऊपर से यह जाम, उसका सर भन्ना उठा था।
एकाएक मन में आया कि द्घर पर बहू बाट जोह रही होगी, कपूत कल से गाँव गए हैं। पता नहीं लौटे होंगे कि नहीं...। सब्जी भी ले जानी है। ...उसे झटका सा लगा, सीढ़ियों पर बैठे-बैठे अचानक आँख लग गई थी। मरी जुबैदा भी पूरे डेढ़ द्घंटे देर से आयी थी। आते ही कहने लगी- आज जुमेरात थी न, वली बाबा की मजार पर गईं थी... लेट हो गए, कल से जल्दी आया करूँगी... मुआ रिक्शा बी नहीं मिला, पैदल चले आ रहे हैं...। उसकी नाइट ड्यूटी में अक्सर यही होता है। कोई मंदिर चला गया था। कोई म८ाार। किसी को मुहल्ले में डिलीवरी मिल गई थी। तो किसी के यहाँ गमी। उसे द्घर पहुँचते-पहुँचते दस-ग्यारह बज ही जाते हैं। जहाँ नहाया-धोया, खाया-पिया, एक बज गया। उस पर कोई परिचित या सगा-संबंधी आ गया तो हो गई नींद पूरी, पिफर झूमो रात में देवी जैसी सवारी सिर लिए...।
वह हथेली से अलसायी आँखें मींजती, कंधे पर सरक आयी साड़ी के पल्लू को सिर पर डालकर, ऊपरी सीढ़ी का सहारा ले खड़ी हो गई थी। गेट के बाहर देखा, तो पाँव बंध गए। पता नहीं वहाँ कब कौन 'राम नाम सत्य है' का शांत उद्द्घोष करते, अर्थी उतारकर मुर्दे का पिंड बदलने में लगे हुए थे। उसे खीज हो आयी-'इन्हें भी जयीं मरने तो...?' पिफर सोचा, चलो मंदिर के सामने यह पवित्रा किरिया हो जाए अच्छा ही है। बिचारा तर जाएगा। देर में देर क्या। उसका तो ड्यूटी जाते, रोज ब रोज इन चीजों से पाला पड़ता ही रहता है।
अपनी इन्हीं दुविधाओं के चलते वह एक सभ्य नागरिक की तरह खड़े रहकर, अर्थी उठने तक के लिए मंदिर के अधखुले द्वार की ओट ले पिफर बैठ रही थी। तभी सामने से किसी ने जाम में रास्ता मिलने का तेज समर्थन किया, तो आवाज किसी दूर परिचित की लगी। वह पिफर उठ खड़ी हुई। पंजों के बल गेट की जालियों से उझक कर देखा, वह रामप्रकाश था। गया सिंह का बड़ा लड़का-बाँये हाथ में सुलगती करसी और दाँये कंधे पर द्घट रखे।... उसे सहज विश्वास न हुआ, थोड़ा और उचक कर देखा-लोगों की भीड़ के बीच अर्थी पर गेंदा और गुलाब की मालाओं के बीच, अबीर-गुलाल लगा चिकना माथा। ठोड़ी और नाक की स्पर्धा के बीच नन्हीं गिलहरी की पूँछ सी चितकबरी मूँछों ने उसे यकीन दिला ही दिया, डोकर ही हैं। उसकी चीख निकल पड़ी। अपने को सम्हाल सकने में असमर्थ जब वह द्वार की ओर दौड़ी, माथा गेट के दूसरे पल्ले से जा भिड़ा। चोट गहरी थी। गरीबिन सिर पकड़कर वहीं बैठ गयी।... अर्थी उठ चुकी थी। मन नहीं डटा तो हिलकी बंध गई। पास के वनखंडेश्वर मंदिर से जल चढ़ाकर लौटे पुजारी ने देखा, तो शिव-शिव करता सामने आकर खड़ा हो गया था-'काहे बेटा! जे गया सिंह कौ लगत तो तुम्हाओ...? रोओ मत, जाकी आय गई है, वाय कौन रोक सकत है।... सबकौं एक न एक दिन, वई द्वार पहुँचने है।'
वह स्तब्ध रह गई, जैसे चोरी? पकड़ ली गई हो। आंचल के छोर से जल्दी-जल्दी आँसू पोंछ कर चेहरे पर बनावटी मुस्कान लाते हुए, उसने बड़ी सावधानी से पुजारी को टाल दिया-''कोई नई बाबा! आगे जाम लगा देख, हियां बैठ गए थे।... उठके चले तो गेट की 'ज' माथे से लग गई, सो रूआँस छूट परी थी। केशर द्वारा इंगित स्थान पर उमड़ आए गूमड़ को देख, बूढ़े पुजारी का अनुभव भी धोखा खा गया। दूसरे केशर को ज्यादा बात करने का उत्सुक न देख, उसके माथे पर लगी चोट पर द्घर जाकर हल्दी और प्याज, तेल में कल्हाड़ कर बाँध लेने की हिदायत देता, मंदिर की बाकी सीढ़ियाँ चढ़ चुका था। उसे तनिक भी आभास नहीं हुआ कि इस अधेड़ युवती और उस बूढ़े में कोई संबंध है भी या नहीं।
नीचे केशर का बुरा हाल था। अपनी सहज नाटकीयता का प्रदर्शन करते हुए, कहने को तो पुजारी से कह गई 'कोई नईं'। लेकिन मंदिर की सीढ़ियों ने उसके मन में ग्लानि भर दी थी। कम से कम उसे यहाँ तो झूठ नहीं बोलना था। वह सहम गई। नए परिवेश ने उसे उठने-बैठने, ओढ़ने-पहनने और ढंग से खाने-पीने के गुर तो सिखा दिए थे, पर ये किसी ने नहीं सिखाया कि केवल मंदिर में ही नहीं, हर जगह सच बोलना चाहिए। सो वह अपने पुराने संस्कारों का बोझ ढोती असमंजस में पड़ गई थी। लेकिन पुजारी से वह सच बोलती क्या? सगा संबंधी, वह कुजात था? द्घरवाला-वह पहले ही मर चुका है? प्रेमी-उसने कभी माना नहीं। पिफर ...पिफर कौन था वह उसका? या पिफर कौन लगती है वह उसकी? जिसके मरने पर उसके द्घर जाना तो दूर, खुलकर रो भी नहीं पा रही है-'वह'
आँखों में आँसू और मन में उमड़ती भावनाओं की नदी की बाढ़ रोके केशर, पता नहीं कब अपने और उसके संबंधों की गुत्थियों में उलझकर अतीत के अंधकूप में उतरती चली गई। द्घुटनों पर ठोड़ी रखकर पाँव के अँगूठे को एकटक निहारती आँखेंऋ दृश्य के पार बहुत दूर तक, कुछ देख उठी थी।
जब अबोध थी, सन इकहत्तर की लड़ाई में बाप सीमा पर शहीद हो गया था। एक दिन द्वेषवश ताई ने पेंशन के कागज जला दिए, तो अपढ़-गँवार माँ दो बड़े भाई और छोटी बहन के साथ उसे लेकर चित्राकूट से कानपुर की मुस्लिम बहुल बस्ती में बाप के द्घर आ बसी थी, जहाँ नाना की चमड़े की दुकान में हाथ बंटाते हुए बड़ी तंगहाली में माँ ने उसका पालन-पोषण किया था। बमुश्किल दस-बारह की होगी और पाँचवीं जमात में पढ़ रही थी। उसी साल बड़े भैया के विवाह में इटावा वाली बुआ के साथ भिण्ड से गई उनकी छोटी ननद, उसे और उसकी छोटी बहन चंदा को देखकर लट्टू हो गई थी। अम्मा ने बुआ से मना भी किया था-'गंगाजली! निन्नी से कह दे हमरी लौंडियाँ गाँव काबिल नईं हैं।' पर बुआ तो इसके लिए पहले से ही तैयार होकर आयी थी। अपनी ननद का पक्ष लेते हुए उन्होंने यह कहकर माँ का मुँह बंद कर दिया था कि 'मँगो! तुम पे इत्ता रुपया कहाँ जो लड़किनी काहू भले द्घर कर सकौ? कोई रिक्स्सावालों या जुतगँठा ही मिलिहे... हमारी निन्नी पे राम किरपा से खेती-पाती सब-कछु है। वहाँ जब गैया-भैंसियन को दूध-द्घी खहियें, तो यहाँ की सुरति भी ना करेंगी।...' इस तरह बगैर उसकी और छोटी बहन की सहमति-असहमति की परवाह किए, उन तीन औरतों ने उसे विवाह के खूँटें से बाँध दिया था। वह तो आगे और भी पढ़ना चाहती थी, पर सातवीं करके ही छोड़ना पड़ा। बड़े भाई को ससुराल में द्घरजमाई न बनने के कारण, ससुरालियों ने जहर देकर मार डाला था।
उधर ससुराल में दो बड़े जेठों के न्यारा होते ही ससुर ने पति को भी हल की मूठ से बाँध दिया था। दिन भर खेतों पर मेहनत करने और पढ़ाई पर ध्यान न दे पाने के कारण वह मिडिल पास भी न कर सका था। बाल विवाह में जो गौना तीन साल बाद होता हैऋ माँ ने द्घर के खर्च से बचने के लिए, दूसरे ही साल कर दिया था।
केशर को अपने अनिश्चित भविष्य का पता उसी दिन लग गया था जब वह 'विदा' में पति और छोटी बहन के साथ मायके से ससुराल आ रही थी। तब जेठ मास की उमस और पैसेन्जर में यात्रिायों की धक्का-मुक्की के बीच, पति को अचानक उठी खाँसी के साथ खूनी उल्टियाँ भी शुरू हो गई थीं। ...मन में जो उमंग शेष थी, मिलन का उत्साह था, ससुराल की जिज्ञासाएँ थीं, वह सब बगल में बैठी चंदा की चीख-' ओ-जिज्जी! देख तौ जीजा को का हुय गओ...?' के साथ ध्वस्त हो गई थीं।
तब विवाह के जोड़े में शर्म से झुकी आँखें और लाज में सिमटे हाथ एकाएक सक्रिय हो उठे थे। उसने कुशल नर्स की भाँति झपटकर बाँह पकड़ी और सिर खिड़की की ओर कर, बहन को केतली से पानी लेने का निर्देश देकर स्वयं उसकी पीठ पर हाथ पफेरने लगी थी। चंदा का पति और उसका देवर अनपढ़ बकरिहा था। इसीलिए ससुराल से अकेला पति ही उन्हें लेने आया था।
...जब थोड़ा दम सधा तो उसने कुल्ला कराया और हाथ पकड़कर वहीं बैठ रही थी। ...बहुत देर बाद जब देखा कि अब दम पफूलना बंद हुआ और खाँसी भी थम चुकी है, तब उसने खिड़की की ओर मुँह किए हवा लेते पति से धीरे से पूछा था-'कैसे हो...!' पहले तो वह शांत रहा, पिफर एकाएक खिड़की से मुँह हटाकर सबके सामने उसका हाथ पकड़कर जोर से रो पड़ा था-'तुम मोहि छोड़ियो मत! बाप बैरी हो गयौ, जो बारी उमर में हल की मुठिया से बाँध दये... सो छाती पक गयी रे-?' वह हक्की-बक्की रह गयी। पंचम का हाथ पकड़े-पकड़े ही उसने 'हाँ' कर दी, और खुद भी रो पड़ी।
... अपने बहन-बहनोई को रोते देखा तो बगल में बैठी चंदा भी रो पड़ी थी। साथ ही ऊपर-नीचे और आसपास बैठी सवारियाँ भी जब-'क्या हुआ-क्या हुआ...?' करके उनकी ओर पलटीं, तब वे सम्हल चुके थे। स्टेशन भी करीब आ गया था।
लेकिन केशर बुझ गयी थी। बागी और बीहड़ के लिए पहले से ही कुख्यात-ससुराल, उसे और भी भयानक लग उठी थी। ससुराल में पहुँचने पर बहू-बेटा लिए गए। बधाया बजा। ज्यौनार बनी। नाच-रंग हुए। पर उसके मन का मरूद्यान एक बार मुरझाया तो पिफर कभी हरा नहीं हुआ। ...कई बार पाप-पुण्य, भाग्य-भगवान, विश्वास और परंपरा से उठकर मन में आया भी, कि कब तक इस जिंदा लाश को ढोते रहेंगे? क्यों न अम्मा के पास जाकर वहीं कोई...।' उससे पहले ही आँखों के सामने ट्रेन की 'हाँ' और भरी आँख साथ न छोड़ने की करुण याचना करते रुग्ण-पति का चेहरा सामने आ जाता। वह विचार शून्य होकर गड्ढे में धंस गई आँखें और हड्डियों का पिंजर मात्रा रह गए पति की सेवा में तन-मन से जुट जाती। कपफ, खकार और खून से गंदे हुए कपड़े और बिस्तर सापफ करते-करते कभी जी भी द्घिनाता, पर चेहरे पर शिकन तक न आने देती थी। उस पर आस-पड़ोस की द्घरपफोड़ू लुगाइयों की कनभरई और द्घर की कच्ची गृहस्थी के बोझ तले दवा कराते-कराते हार मान चुके सास-ससुर, अब अपनी खीज भी उसी पर उतारने लगे थे। ससुर से ज्यादा सास रोना रोती थी-'रंडों के जब से द्घर में पाँय परे हैं, तब से हमारे लला ठीक ही ना रहत...।' वह जल-भुन उठती थी-'एहसास न भलाई हरामजादी कहाई'...।
लेकिन उसने हार नहीं मानी। इस बीच उसके दो लड़की और एक लड़का भी हुआ। गाँव के परिवेश में पूरी तरह ढलने की कोशिश भी की लेकिन द्घरवालों के दृष्टिकोण में कोई परिवर्तन नहीं आया। पानी जब सिर से गुजर उठा तो पड़ोस की नाईन बुआ के आश्वासन पर पति और बाल-बच्चों को लेकर कोल्ड स्टोर में आलू छंटनी के भरोसे, इस कस्बेनुमा शहर में आ बसी थी। चलते समय भोले ससुर ने वरजा भी-'बहू कहूँ मत जाओ! एक भैंस ले देंगे वई के सहारे बाल-बच्चा पालौ, और लला की देखभाल करौ... शहर की हवा-रवा खराब है...।' पर वह जानती थी कि अब उसका निबाह, यहाँ होगा नहीं।
'गया सिंह' से उसका परिचय इसी बीच हुआ था, जब यहाँ के जिला चिकित्सालय के टी.बी. वार्ड में पति को भर्ती करके, कोल्ड स्टोर में काम पर जाने लगी थी। गया सिंह पफौज से रिटायर, अस्पताल में वार्ड बॉय की भर्ती में अपने भूतपूर्व सैनिक होने का लाभ लेकर, वहाँ नया-नया आया था। गठीला बदन, रौबीला चेहरा, बड़ी-बड़ी मूँछ व पफौजी कैप लगाने से शिलपट्ट हुई चाँद वाला एक प्रौढ़, जिसका डील-डौल और वही पुरानी खाकी की ड्रेस देखकर, कभी-कभी नर्सें भी उससे भय खा जाती थीं। ऊँची जाति का होने के कारण डाक्टरों पर भी उसका प्रभाव अच्छा खासा था। केशर लगभग हर रोज पति को अकेला छोड़कर कोल्ड स्टोर चली जाती थी। बच्चे भी ज्यादा बड़े न थे। गाँव से कभी सास जरूर आ जाती थी, पर वह भी दो-एक दिन रुकी कोई बहाना बनाया और लौट जाती। कुल मिलाकर पति के बिस्तर पर दवा-दारू के लिए दिन में कोई नहीं रहता था। शाम को जब वह थकी-हारी लौटती, बच्चों का खाना बनाती/खिलाती कुछ खाना साथ लेकर दौड़ती सी उसके पास चली जाती थी जहाँ लगातार बीमारी से चिड़चिड़े हो गए पति की गालियों से उसका स्वागत होता। वह कभी दुःखी होकर विष खाकर मरने की बात करता, तो कभी उसे गले लगाकर बाप को गालियाँ देता तो कभी ईश्वर को... उसके दुःखों का पारावार न था।
जिन्हें देखकर गया सिंह को तरस आता था। वह यथासाध्य उनकी मदद कर उठा था। अस्पताल से मिलने वाला दूध, इंजेक्शन और दवाइयाँ तो दिलवा ही देता था। साथ ही स्टोर में जो दवाएँ, ग्लूकोज, टॉनिक आदि बाजार में ब्लैक में बेचने अथवा हॉस्पीटल के ही एम.बी.बी.एसों के निजी क्लीनिक और नर्सिंग होमों में प्रयोग के लिए छोड़ दी जाती हैं, उन्हें भी गया सिंह अपने प्रभाव का पफायदा उठाकर पति के समक्ष उसे दे जाता था। केशर की अनुपस्थिति में अन्य मरीजों की अपेक्षा पंचम की देखभाल वह पहले से ही ज्यादा कर उठा था।
अब यह निश्चित तौर पर नहीं कहा जा सकता कि गया सिंह की मदद के पीछे उसके मन में गहरे तक समाया देशभिक्त और जनसेवा का पफौजी आदर्श काम कर रहा था अथवा चीथड़ों में लिपटे होने पर भी मोहक लगती केशर का निर्द्वंद्व स्वभाव। अथवा कोई अन्य वजह... जिसके चलते वह, केशर के मना करने पर भी हर तरह से उसकी मदद कर उठा था।
पति की सदिच्छा जान लेने पर अब वह भी कोई उज्र न करती। यद्यपि शक होता और स्वाभिमान भी आड़े आता, पर मन में बहुत गहरे तक समायी लाचारी उन्हें वरज देती। इसका लाभ लेकर गया सिंह बहुत से जरूरी सामान का थैला पति के बिस्तर पर या पास खेलती बड़ी लड़की को देकर, अन्य वार्डों में चला जाता था। वह डरती भी थी। लेकिन बहुत समय तक किसी पर शक भी तो नहीं किया जा सकता, जब बहुत दूर तक कोई हमारे संग भला करने के लिए निकल पड़े।... वैसे गया सिंह भी ऐसा नहीं था। बल्कि वह तो अपनी प्रत्यक्षदर्शिता के आधार पर अपनी मंझौटी के मध्य, अस्पताल के नर्स-डॉक्टरों को गरियाता था, जिनकी रासलीलाएँ अक्सर उसने अपनी नाइट ड्यूटी में देखी थीं। इसलिए केशर के भय की गाँठ कब खुल गई थी, उसे स्वयं पता ही नहीं चला। अब तो रात-ब-रात उसकी खड़खड़िया सायकल पर बैठकर वह, कमरे पर भी लौट आती थी। संयोग से उसका द्घर भी उसी रास्ते में पड़ता था, जहाँ से होकर वह अपने कमरे पर जाती थी। भीड़ और अकेलेपन से उसे पहले ही कम डर लगता था-बचपन में जब अपने द्घर के पिछवाड़े की टाकीज में पड़ोसी मुसलमानियों को पिफल्म देखने के लिए टिकट चाहिए होता था, तो वे चंचल और साहसी केशर को ही चुनती थीं। वह भी मुहल्ले के किसी शरारती लड़के की तरह, दूसरों के पोंद में पिन चुभोकर 'उई-उई' करती, रास्ता बनाकर खिड़की से टिकट ले आती थी। अपने उसी निर्द्वंद्व स्वभाव के चलते जब वह गया सिंह की साइकिल के ड्रिप की नलियों से बुनी रस्सी लिपटे कैरियर पर चलते हुए उचक कर बैठ जाती, तब वह उसकी इसी बहादुरी पर प्रसन्न होकर मन ही मन अपनी असमय बुढ़िया गई पत्नी से समानता कर उठता था। पर मन में कोई पाप न होता।
हाँ, आसपास के लोगों की नजर जरूर टेढ़ी होने लगी थी। उसके सामने तो कोई नहीं पड़ता था। लेकिन केशर से कोई न कोई बहाना बनाकर, बगैर पूछे न मानते-'काहे, जे कौ लगत हैं तुम्हारे...?' वह भी बिना झिझके/शरमाए हँसकर कह देती- 'डोकर! इनकी हमारे गाँव में बिटिया ब्याही है...।' और यह सच भी था। केशर के ससुराल वाले, जमींदारों के अत्याचारों से तंग आकर जिस गाँव से उखड़कर हार में अलग 'पुरा' डालकर आ बसे थे उस गाँव में गया सिंह की बड़ी लड़की ब्याही थी। इसका भेद खुलने के बाद गाँव-नाते इन्होंने भी 'भाई साहब' जैसा चलताऊ संबोधन के स्थान पर अपनत्व भरा शब्द 'डोकर' कहना शुरू कर दिया था। डोकर एक ऐसा क्षेत्राीय शब्द है जिसे यहाँ, प्यार से बेटी बाप को, बहू ससुर को, पत्नी पति को, दामाद ससुर को और बेटा अपने बूढ़े बाप को संबोधित करता है। पिफर भी सारे विश्वासों के पार, लोगों की कुंठित मानसिकता का निशाना वहीं सधता, जहाँ एक-दूसरे के बीच सारे अलगाव समाप्त हो जाते हैं।
धीरे-धीरे हर रोज गाँव से आने वाले बेलदार, दूधिया और सौदा-सट्टा करने वाले दूतों से यह खबर गाँव में जंगल की आग की तरह पफैल गयी थी कि-'वह तौ बूढ़े पे बाबरी भई है...।' तब सास-ससुर, देवर-जेठों के कान खड़े हुए, उन्हें अपनी मान-मर्यादा धूल-मिट्टी में मिलती दिखायी दी। ...पर गू की छितरिया सिर पर रखे कौन? उनकी सबकी अपनी कच्ची गिरस्ती थी। दो-चार साल से नहर न आने और अच्छी बरसात न होने के कारण, वैसे ही गाँव में अकाल पड़ा हुआ था। ऐसे में अपने ऊपर अतिरिक्त बोझ लेने के लिए कोई तैयार न था। लेकिन द्घर की इज्जत को भी बट्टा लग रहा था। दो-चार रिश्तेदार भी टोक चुके थे।
तब... मौका केशर के छोटे देवर के विवाह का था। बूढ़ा ससुर पंद्रह दिन पहले ही बैलगाड़ी में बैठाकर सब को गाँव ले आया था। वहाँ सबने मिलकर उसके विरु( पति को भड़काया। पर वह केशर का पक्ष लेकर ही उनसे लड़ पड़ा था। लेकिन अंततः वह हार बैठा। द्घर में त्रिाया-चरित्रा के किस्से सुन-सुनकर उसके कान पक गए थे। अंत में अपनी कुल-मरजाद की खातिर जिंदगी के दाँव पर वह गाँव में बसने के लिए राजी हो गया था। ...तब पहली बार केशर को यह तीव्र एहसास हुआ कि उसके गले में कोई अदृश्य पफंदा पड़ा है, जिसकी डोर उसके हाथ में नहीं है। वह उसी के लंबवत विचरण कर सकती है, उससे आगे-पीछे नहीं।
द्घरवालों ने गाँव में सरपंच और ग्रामसेवक को कुछ ले-देकर आई.आर.डी.पी. से केशर के लिए लोन से भैंस खरीदवा दी थी। अस्पताल में गया सिंह की मदद से पति की बीमारी भी कुछ थम गई थी।
मायके में जो काम कभी केशर की अम्मा और दादी ने भी नहीं किए होंगे, वह काम गाँव में केशर को करना पड़ रहे थे। भुरहरे उठकर भैंस का गोबर-पानी और सानी वगैरह करना। कुएँ से पानी खींचकर लाना। रोटी बना-खाकर हार से भैंस के लिए हरियाली और द्घास लाना। दोपहर लौटकर मशीन पर कुट्टी काटते और भैंस को दोबारा सानी-पानी करते, साँझ हो जाती। नहाया तो नहाया, वरना ऐसे ही शाम के रोटी-पानी में जुट जाती। लेकिन मन में हार मानने के लिए कोई जगह नहीं थी। दुःख था तो सिपर्फ इस बात का कि डोकर के साथ व्यर्थ में ही उसका नाम जोड़कर लांछित किया गया है।
इन सब के बावजूद उसे लेकर द्घरवालों के दृष्टिकोण में कोई परिवर्तन नहीं आया। अब तो पति की बीमारी के महीने भर के कोर्स के लिए, उसकी जगह सँझले देवर को ही अस्पताल भेजा जाता था। शहर जाने के मौके उसे कम ही मिलते थे। एकाध बार गया सिंह जी अपनी लड़की से मिलने जाते समय उसका हाल-चाल पूछने द्घर आया था। लेकिन द्घरवालों के अभद्र व्यवहार के चलते, उसने भी आना बंद कर दिया था। अपनी मान-मर्यादा के अलावा द्घरवालों के मन में सदियों से कटु-अनुभवों के दंश से निर्मित संस्कार थे, जिनके अनुसार कोई सवर्ण किसी दलित की कभी भी निःस्वार्थ भाव से मदद नहीं करता...?
इस तरह दिन धीरे-धीरे पंछी बनकर उड़ते रहे। केशर के जीवन में एक के बाद एक काली अंधियारी रातें आती रहीं। बसंत की आशा में खुले द्वार पर हमेशा पतझड़ ने दस्तक दी। ....और अंततः वह दिन भी आ पहुँचा जिसका केशर को पूर्वाभास था। उस दिन होली की दौज थी। पति ने सवेरे-सवेरे बड़े आग्रह के साथ केशर से खीर-पूड़ी बनाने को कहकर, अपने छोटे भाई को ब्याही साली चंदा का भी न्यौता करवा दिया था। ...खाना खाने और रंग-अबीर के बाद उसने सबको अपनी खाट के पास बैठा लिया था। माँ के सामने आँखों में आँसू भरकर खाट पर पड़े-पड़े ही उसने केशर का हाथ पकड़ लिया था- 'सीमा की मम्मी! तैने तो खूब निबाही मेरे संग... पर मैं तोको कछु न कर सकौ, मेरी भूल चूक मापफ कर दीजै!!... अब जे बारे-बारे हू तेरी ओली ;गोदद्ध में हैं, इनकी हू नैया पार लगाइयो!!! हमारी तो अब आखिरी है...? और सचमुच ही दिन ढले, दो-तीन बार खाँसी आने के बाद उसकी आँखें पिफर गई थीं। केशर हत वाक्य रह गई, आँसू तो उसके पहले ही सूख चुके थे। वह यों विवेकहीन हो जाएगी ऐसा किसी ने नहीं सोचा था। उसे पता नहीं लगा कि कब उसके पति की लाश को उसके ससुराल वाले पास की नदी में जलप्रवाह कर आए। कब उसकी चूड़ियाँ तोड़ी गईं और माँग का सिंदूर पुँछा...। कब उसकी मैली कुचैली रंगीन साड़ी और गिलट के बिछुआ उतार कर, गाँव की स्त्रिायों ने भाई के द्वारा लाई गयी धोती और ताँबे के 'पौरा' पहना दिए थे। तब आस-पड़ोस की सास-ननदियों ने ही उसे सहारा दिया था, कि अगर वह चाहे दूसरा द्घर भी बाँध सकती है। दो लड़कियाँ हैं, वह बड़ी होकर सास के द्घर चली जाएँगी। रहा लड़का, वह अइया-बाबा पर बना रहेगा। एकाध बीद्घा खेती भी उसके हिस्से में है।
पर यह सब भरमाने वाली बातें थी। पति और परिवार वालों ने गाँव में आने वाले ग्रामीण स्वास्थ्य अधिकारी और नर्स की सलाह पर, पाँच छः बरस पहले ही एक लड़का और दो लड़की के बाद नसबंदी करवा दी थी। इसलिए उसे अच्छी तरह पता था कि अब उस जैसी बंजर भूमि को, कोई अपनाने के लिए कोई राजी न होगा। दूसरे एक को तो वह जैसे-तैसे भर भुगत चुकी, दूसरा पता नहीं कैसा निकले उसे ढोने की हिम्मत अब उसमें न थी। पिफर बच्चों का मोह और मरते समय पति की दीन-याचना भी आड़े आ जाती। और अंततः इस तीसरे पक्ष की ही विजय हुई, सबके समझाने-बुझाने पर केशर मन मारकर परिवार में ही मरने-खपने की तैयारी कर चुकी थी।
लेकिन पति के गुजरने के चार-पाँच महीने बाद, अचानक पता लगने पर गया सिंह 'पफेरा' करने आया था। पति का मृदु व्यवहार और उसके निर्द्वंद्व स्वभाव ने, गया सिंह के मन में जाने कैसे जगह बना ली थी। उसके अपने द्घर में पत्नी, जवान लड़का और बहू थे। पर वे उसके अक्खड़ पफौजी स्वभाव के चलते, सहमे-सहमे रहते थे। ...पेंशन और नौकरी का पैसा ही उनमें संवाद का माध्यम था। बाकी संवाद उसकी इच्छा पर आधारित थे। उसकी उपस्थिति में द्घर में अक्सर मौन ही पसरा रहता था, सारा परिवार उससे कट चुका था।
इस तरह अपने ही द्वारा अनुशासन की इच्छा से निर्मित किए माहौल में, अब स्वयं गया सिंह को द्घुटन महसूस होने लगी थी। केशर और उसके पति के व्यवहार ने इसमें कापफी कुछ कमी लायी थी। इसलिए वह इनकी ओर कापफी कुछ झुक गया था। लेकिन मुफ्रत की बदनामी सहने का माद्दा उसमें भी नहीं था। इसलिए वह भी कुछ दिनों के लिए अपनी दुनिया में रम गया था।
पर उस दिन जब वह अपनी लड़की के लड़का होने पर 'पछ' देने के लिए, उधर से गुजर रहा था तब नहर की पुलिया पर केशर का लड़का भैंस चराते मिल गया था। उससे रहा नहीं गया। वह अनायास ही उससे पूछ बैठा था-'बेटा! पापा कैसे हैं।'
-'पापा-वे तौ मरि गये।'
-'कबै?'
-'हाेरी की दौज कौं ...दऊआ और चाचा गाड़ी में धर के नधी में डार आए हैं।' ...लड़के ने जिस भोलेपन से स्थिति बयान कर दी थी गया सिंह के मन में वैसा ही तेज धक्का लगा। अनचाहे ही उसकी सायकल धीरे-धीरे मुड़ती, केशर के द्वार पर जा खड़ी हुयी थी। आँगन में नीम के नीचे सबसे पहले केशर की सास बैठी मिल गयी थी। उसे देखते ही वह बड़े ही कहनूना करके रो पड़ी-'हाय बेटा-(! ल-ला तो धो-खा दे-गये... मो-भ-ट्-टी को का-ल न आ-यो... हाय!! मे-री चिरै-या व-न-व-न की हो ग-ईं... हा-य!!! अब-( मे-रे बारे-बारेन की, कै-से नै-या पा-र ल-गे-गी(((...?' गया सिंह का आना सुनकर केशर भी मढ़ैया की किवरिया खोलकर सास के पास आ बैठी थी। निस्तेज आँखें, विवर्ण मुख, सपफेद धोती में लिपटी देहयष्टि। उसे लगा जैसे सारी सृष्टि के दुःखों का पहाड़ मानो उसी पर टूट पड़ा हो। तब गया सिंह ने सास के माध्यम से ही उसे धीर बंधानी चाही थी-'द्घबराओ नई, ईसुर सबकी नैया पार लगावत है।...वह तुम्हारी हू सुनेगो। बाके द्घरे देर है, अंधेर नईंया...।' लेकिन केशर का इन बातों से पहले ही विश्वास उठ चुका था। वह अपने पैरों पर खड़ी होना चाहती है। गाँव में भैंस पालकर और कपड़े सिल कर भी देख लिए, पर उसमें कोई तंतु नहीं पड़ रहा था। तब सास की उपस्थिति की अवज्ञा करते हुए उसने गया सिंह को बीच में ही टोक दिया था-'डोकर! अब झूठी भरमाऊनी देने को बखत नईं है? ...हमारे संग इतनी नेखी करी हैं, एक और कर दे-!! हमें वहीं कोई काम दिवाइदे, वे तौ बीच धार में दगा दे गए!!!'
वह चुप रह गया था। पिफर अचानक बैठे-बैठे याद आया कि गीता कम्पाउण्ड में डॉ. मनोज सक्सेना के यहाँ एक बाई की जगह खाली है जो थोड़ा बहुत पढ़ी-लिखी होने के साथ-साथ, ड्रिप-इंजेक्शन लगाना भी जानती हो। ...केशर सातवीं पास होने के साथ-साथ, सुई-बोतल लगाना भी जानती है। मजबूरी वश ही सही, अस्पताल में डाक्टर और नर्सों की लापरवाही और गाँव में डॉक्टर की सुविधा न होने के चलते, पति की बीमारी का इलाज करते/करवाते धीरे-धीरे केशर इस काम में निपुण हो गई थी।
गया सिंह ने जब उसे यह बात बतलाई तो वह खुशी से तैयार हो गई थी। पर सास जल भुन गई थी। गया सिंह के जाते न जाते वह भुनभुना उठी थी- 'द्घर बर गओ रसिये मौज भई, द्घर बारह छेड़ी द्वार भये...' ;गोरी का द्घर जल गया और यार को खुशी हुई, कि अब उसकी प्रेयसी के द्घर में गुप्त रूप से आने के लिए, दस-बारह छोटे-बड़े द्वार जो हो गए हैं।द्ध.. सास के मुँह से यह कटूक्ति सुनकर केशर करिया नागिन सी पफुपफकार उठी थी। मन सारी वर्जनाएँ तोड़कर अक्षत आदर्श ध्वंस के लिए मचल उठा था। क्योंकि 'कर नहीं तो डर नहीं' का उसका सात्विक दंभ, सास ने शरबि( हिरणी सा आहत जो किया था।
उसने दूसरे दिन ही शहर जाने की द्घोषणा कर दी थी। अपनी इज्जत को लेकर सारे द्घर के अलावा मँझला जेठ कुछ ज्यादा ही कुनमुनाया था। परंतु उसे बैठाकर खिलाने की हिम्मत उस में भी नहीं थी। इसलिए उसका रास्ता रोकने के लिए कोई आगे नहीं आया। हाँ सास ने उसकी आठ नौ साल की बड़ी लड़की कुछ अपनत्व जताते हुए, इस सोच के साथ अपने पास अवश्य रख ली थी कि शहर में रहकर वह भी कुछ काला-पीला करे, उसका असर उस लड़की पर तो नहीं पड़ेगा! ...तब भादौं के महीने में रुक-रुक कर बरसते बादलों के बीच, जब चिड़िया अपना द्घोंसला नहीं छोड़ती, और पुराने वक्त में यात्राी सपफर पर नहीं जाते थे उसने अपनी अम्मा के यहाँ से लाया वही पुराना स्टोव, और कुछ कपड़े-लत्ते और आटा-दाल लेकर अपने लड़के और छोटी लड़की के साथ बड़े ही दुःखी मन शहर की यात्राा पूरी की थी।
गया सिंह के परिचय के चलते नर्सिंग होम में काम मिलने में ज्यादा दिक्कत नहीं आयी थी। अपनी मेहनत, लगन और व्यवहार कुशलता के चलते उसने कुछ ही दिनों में सारे स्टॉपफ का प्रशंसा पत्रा हासिल कर लिया था। लेकिन उसके पीछे वहाँ उसकी जाति और विधवा होना भी पहुँचा था। जिनके लिए प्रसि( है कि दीवाल भी मुँह पफाड़ती है। परंतु चलते समय बे-मन ही सही, सास की दी सीख गाँठ बंधी थी-'बहू! वहाँ काऊ से दब के मत रहियो, नहीं तो चुखरा ;चूहाद्ध की हू लुगाई बनना परेगी?...' जिसके चलते उसने हर मोर्चे पर डटकर मुकाबला किया था। जिसमें गया सिंह का भी भरपूर सहयोग रहा था। केशर को जब भी जरूरत पड़ी उसने बीच खेत आकर उसकी मदद की थी। पिफर वह चाहे लड़के-लड़कियों के द्घर-परिवार के दबाव में आकर किए बाल-विवाह हों, या प्लॉट लेकर द्घर बनवाते समय आयी आर्थिक तंगी, उसका यथायोग्य सहयोग बरकरार रहा था।
ऐसा नहीं था कि इसके एवज में गया सिंह का द्घर-परिवार में विरोध न हुआ हो। एक दिन तो उसका बड़ा लड़का माँ के उकसाने पर अपने गुण्डे भाईयों के साथ केशर और उसके बड़े लड़के के हाथ पैर तोड़ने बीच रास्ते जा खड़ा हुआ था। उस दिन केशर प्लॉट लेने के लिए गाँव में रह गई भैंस बेचकर देवरानी के भाई और अपने लड़के के साथ, हाट से लौट रही थी। पर ऐन वक्त गया सिंह ने वहाँ पहुँचकर उन्हें पिटने से बचा लिया था। ढीट लड़का दोनों को गाली देता, भाग खड़ा हुआ था। ...इस द्घटना से गया सिंह इतना आहत हुआ कि उसने सदा के लिए अपने लड़के से बोलना ही बंद कर दिया था। बेशर्म सभ्यता के प्रतिनिधि उसके पत्नी, बेटे भी उसके जिद्दीपन के आगे अंततः चुप गए थे। मन में यह पाप-विचार पालते कि उनमें तो रंडी-रखैलों का चलन रहा है। बहुत से ठाकुर तो दारी और दारू के पफंदा में पफंसकर जमीन-जायदाद तक मेट डालते हैं। ...वह तो पिफर भी अपनी सारी जिम्मेदारियों के साथ द्घर-परिवार से बंधा हुआ है।
ठीक यही हाल केशर के द्घर-परिवार का था। चार-छह बरस में जो द्घर-गृहस्थी उसने अपनी मेहनत के दम पर जोड़ ली थी उसका श्रेय 'वे' केशर को देने के लिए कतई तैयार न थे। उसके पीछे वे गया सिंह का हाथ मानते थे, जो उसे स्वतः ही कुलटा सि( करता था। इतना ही नहीं, आस-पड़ोस और नाते-रिश्तेदार जब इस संबंध में उनसे कोई टोंचरा द्घालते तब केशर की दौरानी-जिठानी ही अब बड़े आत्मविश्वास के साथ उनसे भिड़ जाती है-'दुनिया में दूध का धुबो अब कोई नई रहो? कोई करिहा ;कमरद्ध कबरौ है तो कोई कूल्हे... हमारी तो गैया है, दिनभर चर-चिंहुट के साँझ कौं खूँटा पर तो लौट आवति है। ..काहू को लै तौ न भगी?' ...जैसे वे ही उसका और गया सिंह का सेज-बिछावन करती रही हों।
ऐसा भी नहीं था कि 'वे' इस बात से अनभिज्ञ रहे हों... और मन में कुछ उमड़-द्घुमड़ न हुई हो। बल्कि उन्हें तो इस बात की हर क्षण जानकारी रहती थी। अपनी-अपनी ड्यूटी से लौटते रास्ते में जब-कभी उनकी मुलाकात होती, तो मन में भावनाएँ हिलोरें लेने लगती थीं। दिमाग में विचार भी कुलबुलाने लगते थे कि क्यों न हम भी वैसे ही हो जाएँ, जैसा उन्हें दुनिया मान चुकी है। परंतु उनमें से जब भी कोई एक, इस तरह की हिम्मत करके सामने आता तब उनमें से किसी एक न एक का आदर्श आड़े आ जाता था।
केशर, जिसके गले में पड़ा चाँदी का एक-लड़िया मंगलसूत्रा, जो पति की मौत के साथ कब का टूट चुका था, अब भी उसे अपने होने का एहसास करा जाता था। ...द्घर-परिवार की जिम्मेदारियों के बीच केशर के लिए वह एक ऐसा पफंदा बन चुका था, जिससे छुटकारा पाना उसे असंभव लगता। वह जब भी उससे अनभिज्ञ होकर गया सिंह की ओर खिंची, उसका कसाव और भी ज्यादा मजबूत हो जाता था। उस स्थिति में वह गया सिंह के आगे खड़े-खड़े, अचानक गले में कुछ टटोलने लगती थी। और मन, 'नहीं... नहीं' कर उठता था।
वहीं गया सिंह का भी यही हाल था। हालांकि उसके गले में ऐसा कोई 'तौंक' नहीं पड़ा था। लेकिन एक दिन उसकी अपनी चहेती लड़की द्वारा बगैर सच्चाई जाने, बड़े ही अलज्ज भाव से यह कहना कि-'दद्दा! हम मानत है कि तुम द्घर से नहीं बंधे? पर द्घर तौ तुमसे बंधो है... अब सजन-समधी के हौ गये, हम सब तन हू देखो।...' दूसरे वह स्वयं नहीं चाहता था कि क्षणिक सुख के बाद केशर भी अपने ऊपर किए सारे एहसान चुकता करके, उसे भी उसी श्रेणी में डाल दे जिसमें उसकी जाति सदियों से स्वयं गिरती चली आयी है।
...इस तरह केशर और गया सिंह एक दूसरे के सहयोगी होते हुए भी, एक नदी के दो पाट बने रहे। कुछ माह से तो उनका मिलना-जुलना भी बिल्कुल बंद हो गया था। अस्पताल से रिटायर होने के बाद अब वह द्घर पर ही रहने लगा था। सुना था कुछ दिन से बीमार चल रहा था। एक दो बार उसने द्घर जाकर देख आने का निश्चय भी किया था। परंतु गली के मुहाने पर पहुँचते ही निश्चय बदल जाता। ...आज वह मर गया। वह हतप्रभ है। वह रोना चाहती है। इतना, जितना कि वह अपने सात-भाँवरे पति के लिए भी न रोयी थी। पर किसे दिखाकर... क्योंकि मन का रोना तो अपने तक ही सीमित रहता है। पर व्यक्त रोना तो सार्वजनिक होता है। उस पर प्रश्न उठते हैं। सवाल दागे जाते हैं। वह किस-किस को जवाब देगी? कौन उसकी सच्चाई को स्वीकार करेगा? वह असमंजस में पड़ गई थी। अचानक हाथ में बंधी द्घड़ी पर ध्यान गया। दस बज गये। आँखों से बहती अविरल अश्रुधारा साड़ी की कोर से पोंछती केशर, उठ खड़ी हुई। मंदिर के गेट से बाहर देखा तो सड़क पर कुछ ताजे पफूल, मखाने और प्रेत का अन्न छूटा पड़ा था।... वहाँ, जहाँ गया सिंह की अर्थी रखी थी। केशर ने मंदिर से निकलकर सड़क पर इधर-उधर नजर दौड़ाई, आसपास कोई नहीं था। उसने बड़े भावुक होकर आँचल के छोर से उस जगह को छूकर माथे से लगाया और द्घर की ओर दौड़ पड़ी।
कमरे पर उसकी बालिका बहू ने दरवाजा खोला। उससे बिना कुछ कहे केशर, जोही-मोही पेड़ से टूटे पत्ते सी खाट पर जा गिरी। बहू उसके लिए द्घड़े से, ठंडे पानी का गिलास भर लायी थी। केशर ने पानी न पीने का बहाना बनाकर गिलास वापस कर दिया। सास को यूँ गुमसुम सा पाकर बहू खाट पर उसके सिरहाने बैठ गई। रात में जागते रहने का विचार करके वह केशर का सिर दबा उठी। पिफर न जाने क्या सोचते हुए अपनी चिरपरिचित मुस्कान के साथ चहककर रात में देखा सपना सुनाने लगी- 'मम्मी! रात में हम बड़ौ अटपटो बर्रराने।... तुम मम्मी नहीं एक गैया हो और तुम्हारे गले में एक मोटा पगहा है, जासें हर कोउ तुम्हें नए-नए खूँटन से बाँध रओ है।... और तुम बंध जाती हो, बिना न नुकुर के... पर एक खूँटा है जाके आस-पास तो तुम दिखाई दईं, पर बंधी नई हो! और लोग-लुगाई चिल्लाय रहे हैं-'बंधी है, बंधी है...। इत्ते में हमारी आँख खुल गई, बिलैया ने रसोई में चीनी कौ कन्टर पटक दियो तो...।' अपनी भोली बहू का यह अद्भुत सपना सुनकर केशर, और अधिक द्रवित हो उठी थी। जाने क्यों मन में आया कि वह अपनी बहू को गले लगाकर मन की सारी भभक रोकर निकाल दे। पर वह ऐसा कर न सकी। हाँ, अंदर के जाने कितने सिरे मजबूत करके, वह अपनी बहू के सामने बुदबुदाई थी-'बेटा! जनी का जन्म ही खूँटा से बंधवें के लए होवत है।... एक टूटत है तौ दूसरो गढ़ जावत है। दूसरा टूटा, तो तीसरौ... तुम हमारे काजें क एक खूँटा नईं हौ...?' बहू आश्चर्य चकित थी। मम्मी को आज हुआ क्या है...? |