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जनवरी २०१०
 
 
 
   
 
 
 
• मनीषा कुलश्रेष्ठ को 'लमही सम्मान' • निदा फाजली को पद्मश्री सम्मान •देवेंद्र इस्सर नहीं रहे• ओड़िया लेखिका प्रतिभा रॉय को २०११ का ज्ञानपीठ पुरस्कार•चंद्रकांत देवताले को साहित्य अकादमी पुरस्कार • कुणाल सिंह को युवा साहित्य अकादमी सम्मान • तीसरा 'कृष्ण प्रताप कथा सम्मान' (२०१२) गीतांजलिश्री की कृति 'यहां हाथी रहते थे' को • रविशंकर को मरणोपरांत लाइफटाइम अचीवमेंट ग्रैमी पुरस्कार • विनोद कुमार शुक्ल को हिन्दी काव्य साहित्य में रचनात्मक योगदान के लिए 'परिवार' पुरस्कार • वरिष्ठ साहित्यकार कामतानाथ नहीं रहे
 
 
 
लद्घु-कथाएँ
नींद नहीं आतीः सोमनाथ नन्दी
उसका यह रूप देखकर मेरा दिल अंदर से ही काँप गया। मैं उसके और अपने बचपन के दिनों में पहुँच गया।
''जल रावण जल!'' वह अकसर द्घास या अखबार से बनाए गये पुतले को रावण समझकर जलाया करता था। कुछ हद तक वह अपने आपको राम भी समझता था।
''सीता को चुराएगा!'' वह पुतले में आग लगा देता। पिफर ताली मारकर और उछलकर कहता-''बुराई के प्रतीक और बुरे इंसान! जल, तू खूब जल।''

कल रात भर नींद नहीं आई। इस साल जो रेकॉर्डतोड़ गर्मी पड़ी है ये तो प्रमाणित है। माँ को कहते हुए सुनते थे कि हमें बचपन में सुलाने के लिए उनको कितनी मुमशक्कत करनी पड़ती थी। वही अनिद्रा की वापसी! सोचकर भयभीत हूँ।
सच मानिए तो नींद का आना भी एक अभ्यास ही है। एक वो भी दिन था जब नींद के साथ मेरी अच्छी दोस्ती थी। सुबह पढ़ाई के टेबुल में, दोपहर में और साँझ ढलते ही मेरी आँखों में दुनिया भर की नींद अपने आप ही द्घिर आती थी।
आज उसी नींद के लिए कितनी साधना, कितने उपचार, नींद की गोली, सिरप पिफर भी नींद का अता-पता नहीं, मानो हमसे रूठ कर चली गयी हो कोसों दूर। इधर-उधर करवट लेते-लेते रात समाप्त हो जाती है।
सुबह करीब नौ बजे थे। गरमी बढ़ रही थी। रास्ता पार ही कर रहा था कि मुँह उठाकर देखा तो छोटे-छोटे टूटे पत्थरों से लदा हुआ एक ट्रक साँय-साँय शब्द बिखेरकर गुजर रहा था। और भी आश्चर्यचकित हो गये जब देखा कि उस तमतमाती गरमी में पत्थर के बिस्तर पर दो मजदूर सर पर गमछी लपेटे बेसुध सो रहे हैं। ट्रक नजर से ओझल होने तक उसकी साँय साँय मेरी कानों में गूँजती रही और जैसे मुझसे कह रही हो- तुम्हें नींद नहीं आती, तुम्हें नींद नहीं आती...।
अनिकेत, १५ गुनमय कॉलोनी, मानगो
जमशेदपुर, झारखण्ड
मो. ९९०५१६०६५९

 
अधिकार विहीन : सुधीर कुमार
 
बस की सीटें पूरी तरह से भर गयी थी। पिफर भी बस को, ड्राइवर रोके हुए था, लोग खींझते, ''जल्दी चलो... बस भर गयी है...।''
कन्डक्टर को सुनाई नहीं दे रहा था, वो टिकट काटे जा रहा था। लोगों की बातों को अनसुनी करके टिकट काटने में व्यस्त कन्डक्टर, एक औरत को चढ़ा दिया। एक व्यक्ति बोला, ''कहाँ बैठाओगे... चढ़ा लेते हो औरतों को...।' औरतों की सारी सीटें पहले से ही भर गयी थी। कुछ देर बाद बस चली। लम्बा सपफर। उससे रहा नहीं गया, उसने अपनी सीट छोड़कर उस औरत को बैठा दिया। बस सरपट दौड़ रही थी। एक छोटे से स्टैण्ड पर बस रुकी, एक औरत चढ़ी, उसके साथ दो औरतें और थी। उस औरत का बच्चा होने वाला था। वो दर्द से कराह रही थी। कोई भी अपनी सीट छोड़ने के लिए तैयार नहीं था। उस व्यक्ति ने जिस औरत के लिए सीट छोड़ी थी, उससे बोला, ''माता जी! मैंने अपनी सीट आपको दी थी,-कृपया करके आप ही अपनी सीट छोड़ दीजिए।''
वो औरत बोली, ''तुमने जब अपनी सीट मेरे लिए छोड़ी उसी समय तुम अधिकार विहीन हो गए। अब इस सीट पर पूरा अधिकार मेरा है।'' यह कहकर वो औरत अपनी आँख बन्द करके पीछे की तरपफ झुक गई।
द्वारा श्री पन्ना लाल ग्राम-पोस्ट रामगढ़, जिला कैमूर-८२१११० बिहार
 
इज्जत : महेन्द्र सिंह राणा
 
हजारों की संख्या में पब्लिक जमा है, कारण? आज एक पफेमस अभिनेत्राी का नाइट शो जो है। सभी टिकटें बिक चुकी हैं...।
ठीक समय पर कार्यक्रम शुरू हुआ, भद्दा सा कानपफोडू संगीत अपने पूरे वॉल्यूम से चीख-चीखकर सब को सूचित करने लगा। जिसका न कोई अर्थ, न कोई मतलब, न लय, न ताल... बस, सब थिरक रहे हैं, भेड़चाल के समान...।
अभिनेत्राी इस्टे८ा पर अपनी कामनीय काया का ८ालवा बिखेरने लगी। शरीर पर नाममात्रा के कपड़े, वो भी शरमाकर शरीर का साथ छोड़ने को उतावले हो रहे थे। अभिनेत्राी संगीत पर मदमस्त हो नाचने लगी, लोगों का ध्यान नृत्य से ८यादा अभिनेत्राी के शरीर के उभारों पर टिका था, वह अपने शरीर का पूरे जोश के साथ इस्तेमाल कर रही थी। बूढे तिरछी नजरों से, नौजवान सीधी नजरों से और बच्चे जो अभी किशोरावस्था की दहलीज पर कदम रख रहे थे, छिपते-छिपाते अपनी आँखें सेंक रहे थे। दूसरी ओर बस्ती की झोपड़पट्टी में लाचार पति, बूढ़े सास-ससुर भूख से बिलखते बच्चे, ठंडा चूल्हा, दूसरी स्त्राी के द्घर की कहानी बयां कर रहे थे। जब वेदना धैर्य की सीमा लाँद्घ गयी तो एक विचार ने जन्म लिया, वह पास के नुक्कड़ में आयी, और एक साए के साथ हो, अंधेरे में गुम हो गयी...।
कुछ समय पश्चात स्त्राी के हाथ में खाने का सामान, बच्चे के लिए दूध तथा कुछ दवाइयाँ थीं। स्त्राी चेहरे पर धोती का पल्लू डाले, बचते-बचाते तेज कदमों से द्घर की ओर आ रही थी, उसे डर था कि कहीं कोई इतनी रात को देख न ले, समाज में बदनामी का डर... इ८जत का भय...।
वहीं नाइट शो में संगीत का शोर चरम पर था, अभिनेत्राी मस्ती में शरीर का प्रत्येक अंग हिला हिलाकर सभी को आकर्षित कर रही थी। क्योंकि अगले दिन ही न्यूज में उसकी हॉट तस्वीर जो छपनी थी, उसे अपनी इ८जत की, न चिन्ता थी, और न भय...।
रा.इ.का. सिलोगी, पौड़ी गढ़वाल-२४६१७३, उत्तराखण्ड
मो. ९४१०५५२०३९
 
नौकरी : कैलाश केशरी
 
सात वर्ष की कड़ी मेहनत के बावजूद नरेन को नौकरी नहीं मिली। आवेदन भरते-भरते व परीक्षा देते-देते नरेन थक चुका था। वह निराश-व-हताश होकर परीक्षाओं में बैठना छोड़ चुका था। वह अब न किसी से मिलता, और न ही कहीं जाता था। दिन-रात अपने को कोसता रहता। उसकी यह दशा उसके पिता रद्घुवीर के दिल को तकलीपफ पहुँचाती थी। चाहकर भी रद्घुवीर कुछ नहीं कर पा रहा था। बेटे को टूटता देख रद्घुवीर परेशान रहने लगा। रद्घुवीर ज्वाइंट सेलटैक्स में क्लर्क के पद पर ५८ वर्षों तक नौकरी कर चुका था। उनके रिटायर्ड होने में अब मात्रा दो वर्ष ही शेष रह गये थे। एक दिन ऑपिफस से लौटते हुए रद्घुवीर का मन बहुत ही विचलित था। मन-मस्तिष्क में अनगिनत विचार चलचित्रा की भाँति आ-जा रहे थे। अनायास उसे क्या बात सूझी की द्घर लौटने की बजाए उसने अपने कदमों को स्टेशन से कुछ दूर रेलवे क्रासिंग की ओर मोड़ दिया। अगले सुबह रेलवे क्रांसिग के पास लोगों की भीड़ लगी थी। खून से लथपथ एक अधेड़ की लाश पड़ी थी, जिसे लोग द्घेरे खड़े थे। पुलिस लाश की शिनाख्त में लगी थी। तभी भीड़ में से किसी ने चिल्लाकर कहा- ''अरे यह रद्घुवीर की लाश है। ...कल शाम से ही इसकी पत्नी और बेटे इसे तलाश रहे हैं, और यह बेचारा यहाँ...''
उसी समय रोता-बिलखता नरेन और उसकी माँ वहाँ पहुँचकर रद्घुवीर की शव से लिपटकर रोने लगे।
आज रद्घुवीर की मौत को छः माह बीत चुके थे। नरेन को अनुकंपा पर पिता की जगह क्लर्क की नौकरी मिल चुकी थी। नरेन की माँ अब उसकी शादी के लिए एक अच्छी लड़की की तलाश में व्यस्त थी।
द्वारा एंजल कलर लैब, धर्मस्थान रोड, दुमका, झारखंड
मो. ९४४७०१०५७६४
 
 
 
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