काकेशिया की पहाड़ी जातियों के मशहूर सरदार 'शॉनिल' के विरु( भेजी गई थी।द्ध और डायरी के अंत में २९-३०-३१ दिसंबर १८५७ के आखिरी पृष्ठ पर लिखा 'ब्राब्रिंस की८ा' के यहाँ 'बालायु सेवा' चुपचाप मुझे आकर्षित करने लग गई है। निकोलेंका का स्वप्न लिखा। कोई भी इस 'स्वप्न' से सहमत नहीं है, पर मैं जानता हूँ कि यह अच्छी ची८ा है।'
यहाँ जानना जरूरी है कि निकोलेंका एक सुन्दर युवती थी जो टॉल्सटॉय के सपनों में प्रायः आया करती थी। इसी को थीम बनाकर उन्होंने 'स्वप्न' कहानी लिखी थी। उन्हें उक्त कहानी अच्छी लगी थी, परंतु टॉल्सटॉय के मित्राों को कहानी पसंद नहीं आई थी, संभवतः वह वर्णनात्मक अधिक हो गई होगी।
टॉल्सटॉय एक आकर्षक युवक थे। उनका जन्म २८ अगस्त सन् १८२८ में हुआ था। वे एक प्रतिष्ठित लेखक थे। 'कंटेम्पोरेरी' के अतिरिक्त वे कई दूसरे मासिकों-साप्ताहिकों में प्रकाशित होते रहते थे। इसलिए साहित्य में रुचि रखने वाली तमाम युवतियाँ उन पर मुग्ध रहा करती थीं। टॉल्सटॉय ने भी युवतियों की मुग्धता को सकारात्मक मानस में स्थान दिया। यही कारण था कि उन्होंने दर्जन भर से अधिक युवतियों से यौन संपर्क किया। इन संपर्कों को अपनी डायरी में अंकित भी कर दिया।
यह कहने की जरूरत नहीं है कि औरत टॉल्सटॉय की कमजोरी थी। हालांकि उन्होंने आलस्य, जुवा खेलने की प्रवृत्ति और शराब पीने की अपनी आदतों को भी अपनी कमजोरी माना है लेकिन औरत के सामने ये कमजोरियाँ गौण थीं।
टॉल्सटॉय के अतिशय यौन संपर्कों के बावजूद अ उन्हें लम्बी आयु मिली थी। वे ८२ वर्षों का जीवन जीते रहे थे परंतु बुरी तरह मरी८ा कभी नहीं हुए। मसलन तपेदिक, कैंसर और सुजाक आदि से पीड़ित नहीं हुए। गणिका-गमन भी उन्होंने कम नहीं किया परंतु वे भारतेन्दु, जयशंकर प्रसाद या निराला नहीं हुए। रूस की तत्कालीन जलवायु इनका साथ देती रहती थी।
हिन्दी में ऐसा कोई कथाकार नहीं है जिसकी तुलना टॉल्सटॉय से की जाय। यदि ऐसा करना जरूरी ही हो जाय तो एकमात्रा नाम कथाकार राजेन्द्र यादव का लेना कुछ सीमा तर्क संगत हो सकता है, खासतौर से कृति और प्रकृति के स्तर पर। राजेन्द्र यादव और टॉल्सटॉय में थोड़ा पफ़र्क यह है कि एक बार राजेन्द्र यादव सीरियसली बीमार पड़े थे और हिन्दी के लेखक-देवता स्वर्ग में या नर्क में उनका स्थान सुरक्षित कराने में लगे थे। टॉल्सटॉय कालीन रूस में ऐसे देवता नहीं थे। मिसाल के तौर पर रूस के लेखकों का एक ग्रुप पफोटो देखा जा सकता है जिसमें मुख्यतः ल्यू टॉल्सटॉय और डी. ग्रिगाराविच पहली पंक्ति में बैठे हैं। दूसरी पंक्ति में क्रमशः आई. गोंशारा, आई. तुर्गनेव, ए. ड्र८िानिव और ए. ऑस्ट्रावस्की बैठे हुए हैं। यह गु्रप पफोटो सन् १८५६ में लिया गया था।
अच्छा हो यहाँ एक और ग्रुप पफोटो देख लिया जाय हालांकि यह व्यंग्यचित्रा है परंतु इसकी विशेषता यह है कि इस व्यंग्यचित्रा में उस समय के अनिवार्य लेखकों के पफोटो हैं जो 'कंटेम्पोरेरी' में लिखा करते थे। बाएँ से 'कंटेम्पोरेरी' के संपादक नेक्रासोव और पानेव तथा सामने ग्रिगाराविच, तुर्गनेव, ओरट्रावस्की और ल्यू टॉल्सटॉय। यह चित्रा सन् १८५३ में लिया गया था।
ज्ञातव्य है कि टॉल्सटॉय की डायरी का हिन्दी अनुवाद ठाकुर राजबहादुर सिंह ने अक्टूबर १९३२ में किया था। इसे आँषभचरण जैन ने साहित्य मंडल, बाजार सीताराम, दिल्ली से प्रकाशित किया था।
राजबहादुर सिंह ने अंग्रेजी अनुवादक एल्मर मॉड की पुस्तक 'टॉल्सटॉय की डायरी' का ही अनुवाद प्रस्तुत किया है। एल्मर मॉड ने ल्यू टॉल्सटॉय द्वारा रूसी भाषा में लिखी डायरी का सीधे अनुवाद किया है परंतु आवश्यकतानुसार डायरी के ेंच लेखकों ए. खिरिआकोव, एस. मेलेगोनोव और टी. पॉत्न्नोव की भूमिकाओं से भी मदद ली है। अनुमति और कृतज्ञता ज्ञापन के मूल्य पर।
टॉल्सटॉय की डायरी का अनुवाद करते हुए एल्मर मॉड ने एक श्रेष्ठ अनुवादक की आदर्शमयी भूमिका निभाई है। पूरी डायरी में कहीं भी भाषाई छल नहीं किया है। टॉल्सटॉय अपने मंतव्यों को स्पष्ट करने के लिए जैसी सीधी-सादी भाषा चाहते थे वैसी ही भाषा एल्मर मॉड ने प्रयुक्त की। इनके अनुवाद की एक खास विशेषता यह भी थी कि वे नमक- मिर्च लगाने से हमेशा बचते रहे। ऐसा इसलिए कि वे अपने अनुवाद के पाठकों को उत्तेजित नहीं बल्कि उत्सर्जित करना चाहते थे।
टॉल्सटॉय की डायरी का अनुवाद करते हुए एल्मर मॉड ने कुछ अपफसोस भी जताए हैं। ये अपफसोस टॉल्सटॉय के प्रति नहीं बल्कि उसके ज्येष्ठ पुत्रा के प्रति हैं। एल्मर मॉड ने लिखा है-'सच्चरित्राता के विषय में टॉल्सटॉय बहुत उच्च विचार रखते थे और सदा उसे प्राप्त करना अपना उद्देश्य रखते थे, परंतु उनके प्रकृतिदत्त स्वभाव ने उनको भयानक संद्घर्ष में डाल दिया था और वे कभी अपने प्रयत्न में सपफल नहीं हो पाते थे। उन्होंने अपनी असपफलताओं का उल्लेख अत्यंत सत्यतापूर्वक किया है। परंतु उन अधिकांश वाक्यों को उनके ज्येष्ठपुत्रा ने प्रकाशित होने के पहले उनकी डायरी में से निकाल लिया था। जहाँ कहीं ऐसा हुआ है वहाँ बिन्दु-चिह्न ;..............द्ध लगा दिए गए हैं। जहाँ कहीं ऐसे चि''्न मिलें, समझना चाहिए कि वहाँ उन्होंने अपनी दुश्चरित्राता के विषय में कुछ लिखा था।'
अगर एल्मर मॉड के संकेतों की गणना की जाय तो ऐसे दो दर्जन से अधिक चि''्न मिल जाएँगे जो टॉल्सटॉय के सच्चरित्राता-पतन की कहानियाँ संकेतित करते हैं। उदाहरण के रूप में १८ अप्रैल १८५३ की डॉटेड द्घटनाओं को लिया जा सकता है। १८ अप्रैल को टॉल्सटाय ने लिखा, ''शाम को खाना खाने के बाद मैं इपिश्का ;एक बुड्ढा कज्जाकद्ध से मिलने गया और सालोमोनीदा एक कॉसेक्स लड़की से बातचीत की... किसी स्त्राी को देखकर मुझे उसमें अधिक सौंदर्य मालूम होता है।''
यहाँ यह कहना प्रासंगिक होगा कि किसी स्त्राी को देखना और उसके सौंदर्य में उसके स्त्राीत्व को जोड़कर सौंदर्य का अधिक आस्वाद करना अधिकांश पुरुषों की आदत होती है। परंतु वे अपनी करनी का कथनी नहीं कर पाते, लेकिन टॉल्सटॉय छिपाने की आदत की चालाकियों से दूर रहते थे। हिन्दी कथाकारों में राजेन्द्र यादव भी छिपाने के गुण-अवगुण नहीं जानते हैं। कहते हैं कि महात्मा गाँधी टॉल्सटॉय से प्रभावित थे, मह८ा इसलिए कि टॉल्सटॉय ने भी सत्य के आईने में ही संसार को देखा।
हालांकि टॉल्सटॉय अहिंसक नहीं था। उसमें शिकार खेलने की आदत थी। ३० जून १८५३ की डायरी में खुद लिखा है, ''शिकार के लिए गया पर सपफलता नहीं मिली। सुलीमोस्की ने मेरे सामने ही ओक्साना से कह दिया कि मैं उसे ;ओक्साना कोद्ध प्रेम करता हूँ। मैं बिल्कुल द्घबरा गया। मुझे पहले अपना कर्८ा चुकाने की पिफ़क्र करनी चाहिए। क... का लिखना है। कल लिखूँगा। मैं इस बात से बहुत चिंतित हूँ कि व्यूम्स्की को 'दी रेड' कहानी में अपना व्यक्तित्व सापफ़ न८ार आ रहा है।
टॉल्सटॉय और गाँधजी में सत्यकथन के अतिरिक्त और कोई साम्य नहीं था। गाँधीजी इन्द्रियनिग्रह में बहुत कुछ सपफल थे परंतु टॉल्सटॉय ऐसे नहीं थे। ४ मई १८५३ को टॉल्सटॉय ने लिखा- कोई विशेष द्घटना नहीं हुई। कहानी के पुरस्कार स्वरूप ४० रूबल मनीआर्डर प्राप्त हुए। आज बहुत लिख डाला। बहुत सा अंश परिवर्तित और संक्षिप्त करके कहानी को अंतिम रूप दिया। मुझे अब कोई स्त्राी प्राप्त करने की आवश्यकता है। इन्द्रिय लिप्सा के कारण मुझे क्षण भर भी मानसिक शांति नहीं मिल रही है।
टॉल्सटॉय की यह डायरी उनके चार नौजवान वर्षों की सत्य द्घटनाएँ हैं। अगर टॉल्सटॉय का बड़ा बेटा उनकी डायरी से निरपेक्ष रह गया होता तो टॉल्सटॉय की सत्यता पाठकों को भौंचक कर देने वाली होती। हिन्दी लेखकों, खासतौर से उपन्यास लेखकों और कहानीकारों को यह डायरी अवश्य पढ़नी चाहिए। यह डायरी केवल मसौदे ही नहीं देगी बल्कि कहानी-प्रस्तुति की अभिनव पाठ्यता भी देगी।
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