जनवरी २०१०
 
 
 
   
 
 
 
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मीडिया विमर्श
ताकि पत्राकार निहत्था हो जाए : हिमांशु शेखर

कुछ हफ्रते पहले बंगाल के लालगढ़ में नक्सली नेता छत्राधर महतो को पुलिस ने गिरफ्रतार किया। छत्राधर महतो ने ही कुछ महीने पहले पुलिस के खिलापफ लालगढ़ की मुहिम का नेतृत्व किया था। पुलिस ने छत्राधर को पत्राकार बनकर गिरफ्रतार किया। बताया जा रहा है कि पिछले कई महीने से पुलिस छत्राधर को तलाश रही थी लेकिन वह अपने मंसूबों में कामयाब नहीं हो पा रही थी। वहीं दूसरी तरपफ पत्राकारों के लिए छत्राधर उपलब्ध थे।



छत्राधर ने इस बीच मीडिया वालों से कई बार बातचीत की। यह बात पुलिस को ठीक नहीं लग रही थी। पुलिस को यह लग रहा था कि आखिर कैसे वह छत्राधर तक नहीं पहुँच पा रही है और पत्राकार पहुँच जा रहे हैं। इसलिए पुलिस ने पत्राकार का चोला पहनकर ही छत्राधर तक पहुँचने का रास्ता चुना और वह कामयाब भी रही। पर पुलिस के इस कदम को पत्राकारिता के लिए गंभीर चुनौती माना जाना चाहिए।
वैसे ही पत्राकारिता कई तरह के संकट से गुजर रही है। यह बात सिपर्फ भारत की नहीं है बल्कि दुनिया के ज्यादातर देशों में खबरों की दुनिया को कई तरह के खतरों से दो-चार होना पड़ रहा है। पुलिस ने छत्राधर को गिरफ्रतार करने के लिए जो किया उससे पत्राकारों की साख पर बट्टा लगा है। छत्राधर कोई पहला नक्सली नेता नहीं है जो पुलिस की पहुँच से दूर था लेकिन पत्राकार उससे बात कर लेते थे। पहले भी कई नक्सली और यहाँ तक कि कई आतंकवादियों के मामले में भी ऐसा हुआ है।

दरअसल, पुलिस इस व्यवस्था का ही एक अहम हिस्सा है। उसी व्यवस्था का जिसके खिलापफ छत्राधर जैसे नक्सली नेता काम करते हैं। बजाहिर, इस वजह से पुलिस और ऐसे लोगों में छत्तीस का आंकड़ा तो रहेगा ही। वहीं दूसरी तरपफ प्रेस को लेकर ऐसी बात नहीं है। प्रेस इस लोकतांत्रिाक व्यवस्था का हिस्सा तो है लेकिन वह व्यवस्था चलाने वालों की चाकरी नहीं करती है। प्रेस स्थापित व्यवस्था की आलोचना करती है और सभी पक्षों को जनता के सामने रखना चाहती है।
यही वजह है कि छत्राधर जैसे नक्सली भी प्रेस से बिना किसी भय के बातचीत करते हैं। पर पुलिस ने इस बार जो किया है, उसका बड़ा गहरा असर पड़ेगा। अगली बार अगर किसी नक्सली नेता से कोई पत्राकार बात करना चाहेगा तो उसे कई तरह की मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा। संभव है कि कई मौकों पर अब ये नक्सली या इस तरह के लोग जो पुलिस की नजरों से बचकर अपनी गतिविधियों को अंजाम देने में लगे हैं, पत्राकारों से मिलने से या बात करने से ही मना कर दें। इसके लिए सीधे तौर पर पुलिस की हालिया कार्रवाई को जिम्मेदार माना जाना चाहिए।

किसी भी हालत में छत्राधर जो कर रहे थे उसे सही नहीं ठहराया जा सकता। पर पुलिस ने उनकी गिरफ्रतारी के लिए पत्राकारों की साख को मिट्टी में मिला दिया। इसकी जितनी भी आलोचना की जाए वह कम है। दरअसल, पुलिस की पकड़ में जब छत्राधर नहीं आ रहा था तब भी पुलिस पत्राकारों को इस्तेमाल सीढ़ी पर करने की कोशिश कर रही थी। उन पत्राकारों पर निगाह रखी जा रही थी, जो छत्राधर से बातचीत करके खबरें छाप रहे थे। यह बात भी सामने आ रही है कि कुछ पत्राकारों के पफोन कॉल्स पर भी पुलिस ने निगरानी रखवाने का काम किया। इसके जरिए पुलिस ने पत्राकारों और छत्राधर के बीच होने वाली बातचीत के आधार पर छत्राधर के सही ठिकाने को जानने की कोशिश की। पर वह छत्राधर को पकड़ नहीं पाई।
इसके बाद पिफर पुलिस ने पत्राकार बनकर ही छत्राधर तक पहुँचना तय किया और वह पहुँच भी गई। इससे सापफ है कि पुलिस के पास चाहे तमाम साधन हों लेकिन पत्राकारों के पास साख है। इसी साख के बूते पत्राकार वैसे लोगों तक पहुँच पाने में सपफल होते हैं जिनके पास पुलिस नहीं पहुँच पाती है। पर अब ऐसा हो पाना बेहद मुश्किल हो गया है। अब पुलिस की नजरों से बचकर अपनी गतिविधियों को अंजाम देने वाले लोग पत्राकारों से या तो सीधे तौर पर मिलने से मना कर देंगे या पिफर पत्राकारों को कई सवालों का जवाब देना होगा और कई तरह की पहचान और जांच प्रक्रिया से गुजरना पड़ेगा।

दरअसल, पुलिस के इस कदम को सिपर्फ छत्राधर को गिरफ्रतार करने की कोशिश के तौर पर ही नहीं देखा जाना चाहिए। बल्कि यह उससे कहीं ज्यादा सोची-समझी हुई रणनीति का हिस्सा है। छत्राधर को गिरफ्रतार करना पुलिस का मौजूदा मिशन हो सकता है लेकिन पत्राकार बनकर इस काम को अंजाम देने को एक दीर्द्घकालिक योजना का हिस्सा माना जा सकता है। पुलिस की इस कार्रवाई को पत्राकारों के स्रोत को कम करने की रणनीति का हिस्सा माना जाना चाहिए। पत्राकारों के लिए सबसे अहम सही स्रोत होता है। इसके जरिए मिलने वाली जानकारियों में से वह सही-गलत का पफैसला करते हुए खबर लोगों तक पहुँचाता है। पर अब तो मौजूदा व्यवस्था पत्राकारों के स्रोत को ही खत्म करने पर आमादा है।
दरअसल, पुलिस भी इसी व्यवस्था का एक हिस्सा है और वह नहीं चाहती कि व्यवस्था विरोधी बातें जनता के सामने आएँ। जबकि अगर लालगढ़ के मामले में ही देखें तो पुलिस एक तरपफ नक्सलियों के खिलापफ अपना आंदोलन चला रही थी लेकिन दूसरी तरपफ नक्सलियों के हवाले से उनकी बातें मीडिया में आ रही थीं। ऐसा पहले भी कई बार हो चुका है। पुलिस सीधे तौर पर मीडिया को यह नहीं कह सकती है वह नक्सलियों से या किसी ऐसे संगठन या व्यक्ति से बात करे जो व्यवस्था विरोधी गतिविधियों को अंजाम दे रहे हों। पर मीडिया ऐसा करती रही है।

इससे पुलिस को कई मौकों पर कापफी दिक्कत भी महसूस होती रही है। इसलिए मौजूदा व्यवस्था की पोषक पुलिस ने पत्राकारों की साख को ही मिट्टी में मिलाने को सही समझा। पुलिस को यह लगा होगा कि एक बार अगर पत्राकारों पर व्यवस्था विरोधी काम करने वाले लोगों का भरोसा उठ जाए तो वे इनसे बातचीत नहीं करेंगे। इसके बाद इनका पक्ष मीडिया में आना बंद हो जाएगा और पुलिस जो कहेगी, उसे ही पत्राकार सही मानते हुए खबर बनाएँगे।
अगर ऐसा हो पाता है तो यह व्यवस्था को चलाने वालों के हित में होगा। इन्हें इस बात से काई पफर्क नहीं पड़ता है कि प्रेस की आजादी और लोकहित का क्या होता है। बंगाल में पुलिस ने जो किया उसे पत्राकारों को गंभीरता से लेना चाहिए और इसका विरोध होना चाहिए। सवाल पत्राकारों की साख का है और यह सत्ता-व्यवस्था और प्रशासनिक व्यवस्था इसी साख को मिटाने में लगी हुई है ताकि वह पीआर पत्राकारिता करवा सके।
दरअसल, आज यह संकट सिपर्फ भारत का नहीं है। दुनिया के कई देशों में पत्राकारों के स्रोत तक पहुँचने के रास्ते को नष्ट करने के लिए वहाँ की व्यवस्था प्रयासरत है। जबकि यह बात पत्राकारिता के बुनियादी सि(ांतों में शामिल है कि कोई भी पत्राकार अपने स्रोत का उल्लेख नहीं करता है और अपने स्रोत की रक्षा करना पत्राकारों का धर्म माना जाता है। दुनिया भर में कई पत्राकार अपने स्रोत की रक्षा के खातिर खुद भी जेल गए हैं। पर अब यह सुनिश्चित करने की कोशिशें तेज हुई हैं कि पत्राकार खुद स्रोत तक नहीं पहुँच पाए।

इससे व्यवस्था को अपने हिसाब से सूचना देने और उसे खबर बनवाने में सहूलियत होती है। पड़ोसी चीन और पाकिस्तान का उदाहरण ले सकते हैं। पहले तो चीन की मीडिया पूरी तरह स्वतंत्रा है ही नहीं। वहाँ की मीडिया पर कई तरह की बंदिशें हैं। जब वहाँ कोई विदेशी पत्राकार जाता है तो उसे कई तरह की मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। कई क्षेत्रा तो ऐसे हैं जहाँ विदेशी पत्राकारों को जाने ही नहीं दिया जाता है। इसी से सापफ है कि वहाँ की व्यवस्था ने यह तय कर लिया है कि पफलां सूचना को मीडिया तक पहुँचने देना है और पफलां सूचना को नहीं। पिछले साल बीजिंग में हुए ओलंपिक के बाद कई पत्राकारों ने वहाँ के अपने अनुभव लिखे। इसमें यह बात निकल कर सामने आई कि वहाँ विदेशी पत्राकारों के साथ जासूस लगा दिए जाते थे। हर समय विदेशी पत्राकारों की निगरानी होती रहती थी। हमेशा ये जासूस इस बात पर नजर रखते थे कि वह पत्राकार कहाँ जा रहा है और किन लोगों से मिल रहा है। अगर कभी भी उस जासूस को कुछ गड़बड़ लग जाता था तो चीन की पुलिस सीधे उस पत्राकार से बात करती थी और उस पर दबाव बनाया जाता था।
बजाहिर, ऐसे दबाव के हालत में बेबाक और निष्पक्ष पत्राकारिता कर पाना असंभव सरीखा है। यही वजह है कि चीन के विकास और उससे जुड़ी तमाम सकारात्मक खबरें तो प्रमुखता से दुनिया के सामने आ जाती हैं पर वहाँ जिस तरह से कम लागत पर उत्पादन के लिए मजदूरों का शोषण किया जा रहा है, उसकी खबरें कहीं नहीं आती हैं। चीन की व्यवस्था को चुनौती देने वाली खबरों का मीडिया से गायब रहना उस व्यवस्था में पत्राकारिता और पत्राकारों की हालत बयां कर रही है।

पाकिस्तान में भी कुछ ऐसा ही है। वहाँ भी जो विदेशी पत्राकार जाते हैं, उनके काम को वहाँ की व्यवस्था बेहद मुश्किल बना देती है। इस बात को हर हाल में वहाँ की व्यवस्था सुनिश्चित करती है कि सही स्रोत तक कोई पत्राकार नहीं पहुँच पाए और सरकारी पक्ष को सही मानते हुए उसे दुनिया के सामने रखे। वहाँ से रिपोर्टिंग करके आए कई पत्राकारों ने लिखा है कि उनकी जासूसी करवाई जाती थी। उनके रहने के स्थान पर निगाह रखी जाती थी। उनसे मिलने-जुलने वालों पर नजर रखी जाती थी। साथ ही वे कहाँ आते हैं और कहाँ जाते हैं, इस पर भी कड़ी निगरानी रहती थी।
कई पत्राकारों ने बताया है कि कुछ खास जगहों पर अगर वे अपने किसी स्रोत से बात करने जाना चाहते हैं तो सरकार वहाँ जाने से उन्हें सुरक्षा के नाम पर रोकती है। पर इसके बावजूद अगर कोई पत्राकार अपनी जान जोखिम में डालकर वहाँ जाना चाहे तो उसके साथ सुरक्षाकर्मियों के वेष में जासूस लगा दिए जाते हैं। ताकि व्यवस्था को हर बात का पता चलता रहे अौर वह सुनिश्चित कर सके कि कोई भी वैसी बात खबर के तौर पर बाहर नहीं जा सके जिससे वहाँ की स्थापित व्यवस्था को कोई परेशानी हो।
ऐसी स्थिति और भी कई देशों में है। अब कोशिशें पत्राकारों को सही स्रोतों तक नहीं पहुँचने देने की हो रही है ताकि सही बात मीडिया में आ ही नहीं सके और लोग सच्चाई से बेखबर रहें। यह एक तरह से सरकारी पीआर पत्राकारिता विकसित करने की साजिश का हिस्सा है। सरकारें अब नहीं चाहती हैं कि सच लोगों तक पहुँच पाए। सरकारी पीआर पत्राकारिता विकसित करने की इस साजिश का जितना भी संभव हो विरोध होना चाहिए। नहीं तो लोगों को सच से वाकिपफ करना पत्राकारों के लिए सपना सरीखा हो जाएगा।

; लेखक उभरते हुए युवा टिप्पणीकार हैंद्ध
एस-२४ बी, तृतीय तल
पाण्डव नगर, नई दिल्ली, मो. ०९८९१३२३३८७

 
 
 
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