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राग बसन्त के छेड़ें
या पतझड़ की कथा गढ़ें
प्रीत तुम्ही समझादो ना
खुशी बुने या व्यथा पढें़
पहली बरखा की बूंदें
चुभती हैं शूलों जैसी
यादें आईं बरबस ही
बचपन की भूलों जैसी
थकी हुई सोचों बतलाओ
अब अपनी क्या स८ाा पढ़ें
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चेहरा सुबह का उतरा
रंगत साँझ की पीली है
कैसे पोंछेगा चकोर
आँखें चन्दा की गीली हैं
पत्तों के मुखड़ों पर जो
अंकित है जो हवा पढ़ें
अअअ
किसी ेम जड़े हुए हैं लोग
कब से यूँ ही खड़े हुए हैं लोग
कहीं पेड़ पर टंगा हुआ बेताल
कथा बाँचता करता कई सवाल
सुनते गुनते बड़े हुए हैं लोग
कड़ी धूप में ठूँठ हुए पीपल
आए भी तो टुकड़ों में बादल
रेत में अब तो गड़े हुए हैं लोग
अअअ
सीधे सादे चलते जाते
न८ारों को हम खलते जाते
आँख तेरे सूरज तपता
नीम कहाँ तक सबको ढँकता
कहाँ बिसात हमारी थी पिफर
पर्वत जहाँ पिद्घलते जाते
थका चाँद भी चलते चलते
तारे रुक-रुक साँस निगलते
तेल कहाँ तक मिले उधारी
दीप कहाँ तक जलते जाते
अअअ
अब सारा बा८ाार यहीं है
आँखें पानीदार नहीं हैं
इधर उधर से शब्द उठाए
जमे जहाँ भी वहीं जमाए
अर्थहीन संदर्भों से कुछ
उल्टे पुल्टे भाव बनाए
बेच रहे महंगे में सस्ता
लफ्ऱ८ाों का व्यापार यही है
द्घूंद्घट ओढ़े बैठी सोच
खाती खुद को नोच नोच
अट्टहास उनके ८ाख़्मों पर
सहन नहीं अपनी खरोंच
उन खम्बों को पकड़ खड़े हैं
जिनका कुछ आधार नहीं है
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