जनवरी २०१०
 
 
 
   
 
 
 
•अमरकांत को इलाहाबाद में ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित• जितेन्द्र श्रीवास्तव को देवीशंकर अवस्थी सम्मान•दिल्ली में विश्व (पुस्तक मेला ;राजकमल प्रकाशन के स्थापना दिवस पर तीन लखटिया पुरस्कारों की द्घोषणामहुआ माजी के उपन्यास 'मरंग गोड़ नीलकंठ हुआ' को तीसरा राजकमल कृति सम्मानविश्वनाथ त्रिापाठी की पुस्तक 'व्योमकेश दरवेश' को पहला सृजनात्मक गद्य सम्मान अमरेन्दु किशोर की कृति 'बादलों के रंग हवाओं के संग' को चौथा कृति सम्मानस्तंभ लेखक भारत भारद्वाज के खिलापफ वारंटद्ध)
 
 
 
मुठभेड़
माओवादी का वैचारिक राजनीतिक परिप्रेक्ष्य : प्रसन्न कुमार चौधरी
एक वैचारिक-राजनीतिक प्रवृत्ति के रूप में माओवाद एक 'उत्तर-माओजेदुंग विचारधारा', एक 'उत्तर-माओ' परिद्घटना है। माओ जेदुंग विचारधारा के पराभव के साथ कुछ देशों में माओवाद का अविर्भाव हुआ।
पिछली शताब्दी के साठ के दशक में विश्व कम्युनिस्ट आन्दोलन में तत्कालीन सोवियत संद्घ की कम्युनिस्ट पार्टी और चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के बीच जो महाविवाद ;अथवा दो लाइनों के बीच संद्घर्षद्ध चला, उसके परिणामस्वरूप विभिन्न देशों की

कम्युनिस्ट पार्टियों में विभाजन हुआ। माओ के नेतृत्व में चीन की कम्युनिस्ट पार्टी की लाइन का समर्थन करने वालों ने अपने-अपने देशों में संशोधनवाद के खिलापफ संद्घर्ष करते हुए ;यह संद्घर्ष पहले से भी चल रहा थाद्ध मूल पार्टी से अलग होकर नये दल का गठन किया और माओ जेदुंग विचारधारा को अपना मार्गदर्शक सि(ान्त द्घोषित किया। ये दल मार्क्सवादी-लेनिनवादी ;मालेद्ध दल कहलाए। विश्व भर में तब ऐसे करीब ३६ दल और संगठन बने। कुछेक अपवादों को छोड़कर मूल कम्युनिस्ट पार्टियों से नाता तोड़कर मार्क्सवादी -लेनिनवादी पार्टी बनाने वाले नेताओं तथा कार्यकर्त्ताओं की संख्या अत्यन्त सीमित थी और अधिकांश देशों में ये दल कापफी छोटे समूह भर थे। तब विश्व के कई देशों में चल रहे राष्ट्रीय मुक्ति संग्रामों में भी इस विभाजन का असर पड़ा। कुछ देशों में चीन -समर्थक धड़ों से अपने अलग संगठन भी खड़े किए, तथापि वे कम्युनिस्ट पार्टियाँ नहीं थीं।

ये दल एशिया, अीका एवं लातिन अमेरिका के अर्ध-सामंती, अर्ध औपनिवेशिक देशों में माओ जेदुंग विचारधारा के आधार पर क्रांति के चीनी रास्ते का अनुसरण करते हुए सशस्त्रा कृषि क्रांति को अंजाम देने, गुरिल्ला यु( के जरिए इलाके के आधार पर सत्ता दखल करने, गाँवों से शहरों को द्घेरने, और इस प्रकार मजदूर वर्ग के नेतृत्व में नव जनवादी क्रांति संपन्न करने के हिमायती थे। कुछ देशों में उन्होंने इस तरह का अभियान भी छेड़ा। भारत में ;मई १९६७ काद्ध नक्सलबाड़ी आंदोलन और बाद में ;२२ अप्रैल, १९६९ को गठितद्ध भाकपा ;मालेद्ध के नेतृत्व में चला सशस्त्रा संद्घर्ष ऐसा ही एक अभियान था।

साठ के दशक में उसी महाविवाद के क्रम में माओ जेदुंग ने १९६६ में चीन में 'महान सर्वहारा सांस्कृतिक क्रांति' का सूत्रापात किया। इसके पीछे उनकी मूल प्रस्थापना यह थी कि समाजवादी देशों में भी वर्ग संद्घर्ष समाप्त नहीं होताऋ समाजवाद जीतेगा या पूंजीवाद, यह सवाल हल नहीं होता। पफलतः समाजवादी देशों में भी वर्ग संद्घर्ष की कुंजी मानकर ही नीति- निर्धारण करना चाहिए। माओ ने इसी पृष्ठभूमि में चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के अन्दर 'पूंजीवादी रास्ता अपनानेवालों' के खिलापफ सांस्कृतिक क्रांति का सूत्रापात करते हुए 'बोम्बाई दि बुर्जुआ हेडक्वार्टर' का नारा दिया। चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के अनेक वरिष्ठ नेताओं, यहाँ तक कि चीन के तत्कालीन राष्ट्रपति ल्यू शाओ को तथा पार्टी के महासचिव देंग श्याओ पिफड को पदच्युत कर नजरबंद कर दिया गया, हजारों नेताओं तथा कार्यकर्ताओं को 'पुनर्शिक्षण' के लिए ग्रामीण इलाकों में भेज दिया गया, अनेक लोग प्रताड़ित एवं गिरफ्रतार किए गए और मारे गए। यह 'क्रांति' चीन में करीब दस वर्षों तक चली।
कहने की जरूरत नहीं कि दुनिया भर में गठित माओ जेदुंग विचारधारा-आधारित मार्क्सवादी- लोनिनवादी कम्युनिस्ट पार्टियाँ इस 'महान सर्वहारा सांस्कृतिक क्रांति' का उत्साही समर्थक थीं और उससे प्रेरणा ग्रहण करती थीं। उन दिनों के चीनी रेड गार्डों की तर्ज पर कई देशों में रेड गार्ड अभियान भी चलाये गये।
वक्त बदला। सत्तर का दशक समाप्त होते-होते कुछेक देशों में माले पार्टियों द्वारा चलाये गये सशस्त्रा संद्घर्ष दम तोड़ने लगे। वियतनाम, और पूरे हिन्द-चीन का मुक्ति संग्राम, जो विश्व भर के कम्युनिस्टों के लिए प्रेरणा-स्रोत था, समाप्त हो चुका था। वियतनाम -चीन सशस्त्रा सीमा संद्घर्ष ;१९९७द्ध और पोक्ष पोह के नेतृत्व में कम्बोडिया में समाजवाद- निर्माण के नाम पर चलाये गये जनसंहार इस प्रेरणा- स्रोत की छवि धूमिल कर चुके थे।
१९७६ में ;९ सितम्बर कोद्ध माओ जेदुंग का निधन हो गया। चीन में दस सालों से चल रही कापफी उथल-पुथल भरी सांस्कृतिक क्रांति आधिकारिक रूप से समाप्त द्घोषित कर दी गई। १९७८ में देंग श्याओ पिफड की पुनर्स्थापना के साथ चीन में आर्थिक सुधारों के नये युग का आगाज हुआ। सांस्कृतिक क्रांति चीन की पार्टी के अंदर के 'कथित बुर्जुआ हेडक्वार्टर' को शिकस्त देने में नाकाम रही- ७८ के बाद इस 'हेडक्वार्टर' ने पिफर से कमान संभाल ली, ली शाओ की को सम्मानजनक ढंग से पुनर्स्थापित किया गया, सांस्कृतिक क्रांति को 'भारी विध्वंस काल' के रूप में चिन्हि्‌त किया गया और उस दौर की सारी नीतियाँ उलट दी गईं। १९४९ के बाद माओ द्वारा उठाए गए लगभग सारे महत्वपूर्ण कदमों ;यथा, १९५० के दशक में चलाये गये 'दक्षिणपंथ- विरोधी अभियान, 'लंबी छलांग', सांस्कृतिक क्रांति, आदिद्ध को गैर- जरूरी तथा चीन के विकास के लिए नुकसानदेह साबित किया गया। चीनी क्रांति के नेता के रूप में ;१९३३-४९द्ध माओ की छवि ;सीमित अर्थों मेंद्ध बरकरार रही, चीनी मुद्रा युआन पर उनका चित्रा कायम रहा और बीजिंग में उनका सुरक्षित शव देशी- विदेशी पर्यटकों का दर्शनीय स्थल बना रहा।

सन्‌ ७८ में 'चीनी विशिष्टताओं के साथ समाजवाद' ;इसे दूसरे शब्दों में, 'चीनी विशिष्टताओं के साथ पूंजीवाद' भी कह सकते हैंद्ध के निर्माण का जो अभियान शुरू हुआ, वह पूरे दमखम के साथ आज तक जारी है। इस तरह, अस्सी का दशक समाप्त होते-होते चीन के नेतृत्व के लिए साठ के दशक का वैचारिक महाविवाद बेमानी हो चुका था ;उसका महत्व सिपर्फ चीन-रूस के राष्ट्रीय संद्घर्ष के रूप में ही रह गया थाद्ध। चीन की कम्युनिस्ट पार्टी उस महाविवाद की पृष्ठभूमि में बनी माओ जेदुंग -विचारधारा आधारित माले पार्टियों से पल्ला झाड़ चुकी थी और अपने राष्ट्रीय हित में संबंधित देशों की अन्य राजनीतिक पार्टियों से अपना संबंध विकसित करने तथा माओ के दिनों में बनी अपनी 'क्रांतिकारी- अतिवादी' छवि से छुटकारा पाने में अपना ध्यान केंद्रित कर रही थी। अस्सी के दशक का अन्त आते-आते बर्लिन की दीवार भी टूट गई ;१९८९द्ध। उसके दो सालों के भीतर १९१७ की अक्टूबर क्रांति की बुनियाद पर खड़ी सोवियत संद्घ की ;प्रत्यक्षतः भव्य और मजबूत दिखने वालीद्ध इमारत भी ढह गई और उसका स्थान आक्रामक ;और कुछ महत्वपूर्ण आर्थिक क्षेत्राों में मापिफयाद्ध पूंजीवाद ने ले लिया।
उपर्युक्त पृष्ठभूमि में अस्सी का दशक समाप्त होते-होते ;साठ के दशक के उत्तरार्ध तथा सत्तर की दशक के आरंभ में बनी माओ जेदुंग विचारधारा आधारितद्ध माले पार्टियों की बड़ी संख्या या तो बिखर गई, भंग कर दी गई, या पिफर उन्होंने अपना अस्तित्व बनाये रखने, अपनी एक नई 'राष्ट्रीय पहचान' कायम करने के लिए खुले तथा कानूनी जनसंगठनों- जनआंदोलनों का सहारा लेने और संसदीय रास्ता अपनाने के जरिए खुद का रूपांतरण करना शुरू किया। वैसे विश्वव्यापी पफलक पर माले पार्टियाँ कुछेक देशों को छोड़कर पहले भी कोई खास प्रभाव नहीं डाल पाई थीं।

अस्सी और नब्बे के दशकों में माओ जेदुंग- विचारधारा आधारित माले पार्टियों के इसी पराभव तथा रूपान्तरण के साथ कुछेक देशों में माओवाद और माओवादी पार्टियों का अविर्भाव हुआ। विश्वव्यापी पैमाने पर यह और भी छोटी प्रवृत्ति थी। तथापि नेपाल में इसे महत्वपूर्ण सपफलता मिली। इसके पहले, माले धारा की पार्टियों में भी सबसे प्रभावशाली उपस्थिति नेकपा ;एमालेद्ध ने ही दर्ज की थी। बहरहाल, कम्युनिस्ट पार्टियों में चले अनेकों दो लाइनों के संद्घर्ष तथा दर्जनों टूट-पफूट एवं विभाजनों की भूल-भुलैया में न जाकर हम यहाँ माओवाद के विकास के कुछ प्रमुख पड़ावों की ही चर्चा करेंगे।
माओ जेदुंग के सि(ांतों को लेनिनवाद के अनुषंगी अथवा पूरक सि(ांतों के रूप में देखने के बजाए माओवादी उन्हें मार्क्सवाद लेनिनवाद की एक बिल्कुल नई मंजिल ;माओवादद्ध मानते हैं। उनके अनुसार, चूंकि यह साम्राज्यवाद के पूर्ण विनाश और समाजवाद के विश्वव्यापी विजय का युग है, इसलिए तीसरी दुनिया के अर्ध-सामंती, अर्ध- औपनिवेशिक देशों में क्रांति की वस्तुगत स्थिति हमेशा तैयार रहती है। सवाल सिपर्फ आत्मगत प्रयासों का, एक माओवादी पार्टी के गठन और सशस्त्रा क्रांति शुरू करने का है। माओवादी माले धारा की पार्टियों को संशोधनवादी मानते हैं, सांस्कृतिक क्रांति को माओ का बहुमूल्य अवदान तथा देंग के बाद के चीन को पूंजीवादी देश बताते हैं। इस अर्थ में 'माओवाद' का प्रयोग करने का श्रेय अल्माओ गोंजालो के नेतृत्ववाली पेरू की कम्युनिस्ट पार्टी को दिया जाता है। पेरू ;लातिन अमेरिकाद्ध का माओवादी आन्दोलन 'शाइनिंग पाथ' के नाम से भी जाना जाता है। नेपाल में कम्युनिस्ट दलों के एक धड़े ने १९८६ से 'माओवाद' का प्रयोग करना शुरू किया। वैसे, भारत में माओइस्ट कम्युनिस्ट सेंटर ;एमसीसीद्ध १९६९ से ही सक्रिय है और वह उसी समय से माले दल के गठन का विरोधी रहा है। उन दिनों 'माओवादी' होने का निहितार्थ माओ का अनुयायी होने से ही था, तथापि उसके माओवादी पार्टी का द्घटक बनने को भी उसके उस विरोध से जोड़कर देखा जा सकता है।

१२ मार्च, १९८४ को रिवोल्यूशनरी इंटरनेशनलिस्ट मूवमेण्ट ;रिमद्ध की स्थापना की गई। शुरू में इसमें १९ माओवादी दल शामिल थे। बाद में यह संख्या द्घटकर १३ रह गई। उन दिनों पेरू का शाइनिंग पाथ आंदोलन ही अग्रणी माओवादी दल था। दिसंबर १९९१ में नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टी ;एकता केन्द्रद्ध के प्रचण्ड ग्रुप ने ने.क.पा. ;माओवादीद्ध के रूप में पार्टी का पुनर्गठन किया। नब्बे के दशक के मध्य में इस पार्टी की केंद्रीय कमिटी ने नेपाल में 'दीर्द्घकालीन यु(' छेड़ने का निर्णय लिया और १३ पफरवरी, १९९६ को इस 'जनयु(' का सूत्रापात किया गया। पेरू की कम्युनिस्ट पार्टी में इस समय तक पफूट पड़ चुकी थी और गोंजालो गिरफ्रतार कर लिए गए थे। पफलतः माओवाद का, और रिम का, मुख्य क्रियास्थल अब पेरू की जगह नेपाल बन गया।

२१ जुलाई, २००१ को दक्षिण एशिया की विभिन्न माओवादी पार्टियों और संगठनों ने कोऑर्डिनेशन कमिटी ऑपफ माओइस्ट पार्टीज एण्ड ऑर्गेनाइजेशन्स इन साउथ एशिया ;कॉमपोसाद्ध का गठन किया। इस संगठन की कमान स्वभावतः नेकपा ;माओवादीद्ध के हाथों में थी और इसमें शामिल संगठन थे- नेकपा ;माओवादीद्ध, एमसीसी ;भारतद्ध, रिवोल्यूशनरी कम्युनिस्ट सेंटर ऑपफ इंडिया ;मालेमाद्ध, भाकपा ;माले- नक्सलबाड़ीद्ध, श्रीलंका की कम्युनिस्ट पार्टी ;माओवादीद्ध, पूर्व बांग्ला सर्वहारा पार्टी ;माओवादी पुनर्गठन केन्द्रद्ध, बंगलादेश साम्यवादी दल ;मालेद्ध सीपीईबी ;एम.एलद्ध, पूर्व बांग्ला सर्वहारा पार्टी ;केंद्रिय कमिटीद्ध। बांग्लादेश की पूर्व बांग्ला सर्वहारा पार्टी के एक और धड़े और भूटान की कम्युनिस्ट पार्टी ;मालेमाद्ध को पर्यवेक्षक के रूप में शामिल किया गया था। ;दरअसलद्ध १९८५ के भूटान नागरिकता कानून के क्रियान्वयन के बाद नेपाली मूल के करीब १,०५,००० लोगों को गैर- नागरिक द्घोषित कर भूटान से निष्कासित कर दिया गया था। ये शरणार्थी पूर्वी नेपाल के विभिन्न शिविरों में रहते हैं। इन्हीं शरणार्थियों के बीच विक्षुब्ध लोगों को लेकर नेपाली माओवादियों के प्रयास से 'विकल्प' के नेतृत्व में भूटान की कम्युनिस्ट पार्टी ;मार्क्सवादी- लेनिनवादी-माओवादी, मालेमाद्ध का गठन किया गया था।द्ध माओवादियों के अन्तरराष्ट्रीय संगठन रिम में इन दलों के अलावा पेरू की कम्युनिस्ट पार्टी, अमेरिका की क्रांतिकारी कम्युनिस्ट पार्टी ;बॉब एरेकियन के नेतृत्ववालीद्ध, और तुर्की, ईरान तथा पिफलीपीन के माओवादी संगठन भी जुड़े थे। बेल्जियम की वर्कर्स पार्टी का भी इससे संबंध बताया जाता है। बहरहाल, इन सबमें नेपाल की माओवादी पार्टी ही सबसे बड़ी पार्टी थी और पेरू, भारत तथा पिफलीपीन को छोड़कर शेष माओवादी संगठन अत्यन्त छोटे-छोटे समूह भर थे।

इन गतिविधियों का, जाहिर है, सबसे ज्यादा पफायदा नेपाल के माओवादियों को मिला। उन्हें अपने 'जनयु(' का प्रचार-प्रसार करने तथा उसके पक्ष में सहायता जुटाने में मदद मिली। कॉमपोसा ने अपनी द्घोषणा में अमेरिकी साम्राज्यवाद, भारतीय विस्तारवाद और दक्षिण एशिया की संबंधित सरकारों के खिलापफ माओवादियों को एकजुट होने, जनयु( छेड़ने तथा दक्षिण एशिया को विश्व क्रांति के मजबूत दुर्ग में परिणत करने की अपील की थी।
भारत में भारत की कम्युनिस्ट पार्टी ;माओवादीद्ध का गठन २१ सितंबर, २००४ को हुआ। यह पार्टी माले धारा से जुड़ी भाकपा ;माले-पीपुल्सवारद्ध तथा माओइस्ट कम्युनिस्ट सेंटर ऑपफ इंडिया ;एमसीसीआईद्ध के विलयन से अस्तित्व में आई थी। पीपुल्स वार का गठन १९८० में हुआ था, इसका मुख्य आधार आन्ध्र प्रदेश में था और तब दिवंगत कोंडपल्ली सीतारमैया इस ग्रुप के नेता थे। इसके पहले, माले धारा से ही जुड़ी बिहार में सक्रिय नारायण सान्याल ;पिफलहाल रायपुर जेल में बंदद्ध के नेतृत्व वाली पार्टी युनिटी ग्रुप का अगस्त १९९८ में पीपुल्स वार के साथ विलय हो चुका था। एमसीसी का गठन २० अक्टूबर, १९६९ को कनाई चटर्जी के नेतृत्व में हुआ था। इसके पहले यह ग्रुप 'दक्षिण देश' के रूप में जाना जाता था। इसका मुख्य कार्यक्षेत्रा बिहार-बंगाल था। यह ग्रुप २२ अप्रैल, १९६९ को चारू मजुमदार के नेतृत्व में गठित भाकपा ;मालेद्ध के गठन का विरोधी था। जनवरी, २००३ में एमसीसी और पंजाब आधारित रिवोल्यूशनरी कम्युनिस्ट ऑपफ इंडिया का विलयन हुआ और इस ग्रुप का नाम माओइस्ट कम्युनिस्ट सेंटर ऑपफ इंडिया ;एमसीसीआईद्ध हो गया। किशन इस गु्रप के नेता थे।

पीपुल्स वार और एमसीसीआई के विलयन के बाद गठित भाकपा ;माओवादीद्ध का नेतृत्व पीपुल के महासचिव गणपति ;मुपल्ला लक्ष्मण रावद्ध को सौंपा गया। माले तथा एमसीसी के संस्थापक नेताओं, चारू मजुमदार और कनाई चटर्जी को संयुक्त रूप से इस नयी पार्टी के संस्थापक नेताओं के बतौर स्वीकृत किया गया। यह पार्टी साठ के दशक के 'महाविवाद' में माओ जेदुंग के नेतृत्व में चीन की कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा प्रस्तुत प्रास्थापनाओं का समर्थन करती है, दीर्द्घकालीन लोकयु( के जरिए नवजनवादी क्रांति संपन्न करने की हिमायती है और इसी लक्ष्य के लिए जनमुक्ति गुरिल्ल सेना ;पीएलजीएद्ध तथा ग्रामीण आधार क्षेत्राों के निर्माण का दावा करती है।
यह है माओवाद के उद्भव की एक संक्षिप्त रूपरेखा।
आकलन
माओवाद एक ठहरे हुए समय की ठहरी हुई वैचारिक- राजनीतिक प्रवृत्ति है। करीब साढ़े चार दशकों का ठहराव, जाहिर है, अनेक किस्म की विच्युतियों तथा विकृतियों का सबब बन गया है। माओवादियों के लिए समय का चक्र कम्युनिस्ट आंदोलन की एक संक्षिप्त कालावधि ;१९६६-६९द्ध में ही रुक गया। उस संक्षिप्त कालावधि में उभरी एक खास वैचारिक- राजनीतिक धारा ;जो उन दिनों भी एक छोटी धारा ही थीद्ध का बन्दीगृह ही उनका 'मुक्तिलोक' है जिसे इस लोक में साकार करने की हिंसक जद्दोजहद ही उनका मुक्तिसंग्राम।
व्यक्तियों, समुदायों और विचारधाराओं के जीवनकाल में कभी-कभी ऐसा होता है कि वे अपने समय के प्रवाह के किसी एक क्षण पर ही अटक कर रह जाते हैं और उसी एक क्षण के इर्द गिर्द त्राासदी भरी जिंदगी झेलने को अभिशप्त होते हैं। यहाँ हम इस प्रवृत्ति का कोई मनोवैज्ञानिक या पिफर सामाजिक-आर्थिक विश्लेषण नहीं करने जा रहे- प्यार, अपराध और क्रांतियों/यु(ों में ऐसी प्रवृत्ति का दिलचस्प विवरण कई साहित्यिक कृतियों अथवा वैचारिक- राजनीतिक रचनाओं में उपलब्ध है। कुल मिलाकर, समय की रेत पर एक छोटे वैचारिक- राजनीतिक वृत्त के दलदल में धंसी इस प्रवृत्ति के लिए वह वृत्त ही पूरी दुनिया है। जो उस दलदल में निकलने की कोशिश करते हैं अथवा निकल जाते हैं, वे उनकी नजर में संशोधनवादी हैं। समय-समय पर कुछ मुसापिफर उस दलदल में पफंसते भी रहते हैं।

माओवादी पार्टी, कम्युनिस्ट अर्थ में, एक पार्टी की शक्ल लेने में अब तक समर्थ नहीं हुई है। इसका एक महत्वपूर्ण द्घटक एमसीसी करीब ३५ वर्षों ;१९६९-२००४द्ध तक पार्टी- निर्माण के लिए 'अनुकूल स्थितियों' की प्रतीक्षा करता रहा। कम्युनिस्ट आन्दोलन के इतिहास में एक ढीले-ढाले संगठन से पार्टी बनने में इतना वक्त संभवतः किसी संगठन ने नहीं लिया है। ३५ वर्षों तक जिस संगठन ने एक ढीले-ढाले केन्द्र का जीवन जिया, ;और वह जीवन उसकी आदत बन गयाद्ध उसके लिए लेनिन या माओ की जनवादी केंद्रीयता पर आधारित पार्टी संगठन का स्वरूप लेना लगभग नामुमकिन ही था। उसकी सब- जोनल, जोनल या स्पेशल एरिया कमेटियाँ तथा सशस्त्रा दस्ते स्वतंत्राता की हद तक स्वायत्त थे- अपने-अपने क्षेत्राों में लेवी वसूलने तथा हथियारों पर उनका लगभग एकाधिकार था। पार्टी बनने के बाद भी स्थानीय स्तरों पर हुई टूट-पफूट, हत्याओं, आदि के केंद्र में यही धन और हथियारों पर अधिकार का सवाल था। यही स्वायत्तता दो संगठनों और उसकी सशस्त्रा शाखाओं के विलयन में मुख्य बाधा थी और संभवतः अभी तक है। यूरोप के वामपंथी हल्कों में ढीले-ढाले संगठन की इस प्रवृत्ति को अराजकतावादी- संद्घवाद ;एनार्को- सिंडिकलि८मद्ध की संज्ञा दी गई। उस संद्घवाद का आधार मजदूरों का एक हिस्सा और उसकी ट्रेड-यूनियनें थीं। भारत के ऐसे दलों की इस प्रवृत्ति का आधार किसानों के कुछ हिस्सों में विद्यमान बागी गिरोहों की परंपरा है।

एक विचारधारा- आधारित पार्टी का ग्रामीण इलाकों में किसानों के बीच काम एक दोरूखी क्रिया है। किसानों के आंदोलनों अथवा संद्घर्षों में उसकी भागीदारी का उद्देश्य किसानों को अपनी राजनीति से लैस करना और राजनीतिक रूप से प्रतिब( जनाधार का निर्माण करना होता है। ऐसे आंदोलनों में अपनी भागीदारी की सपफलता की कसौटी वे इस बात को बनाते हैं कि पार्टी की सदस्य संख्या में कितनी वृ(ि हुई, कितनी पार्टी यूनिटें बनीं और पार्टी का राजनीतिक जनाधार कितना विस्तृत हुआ। पार्टी का विस्तृत राजनीतिक आधार पार्टी को और बड़ी राजनीतिक पहलकदमी लेने में सक्षम बनाता है। जो आंदोलन इन कसौटियों पर खरे नहीं उतरते, उन्हें वे खास महत्व नहीं देते। यह एक प्रक्रिया है।
दूसरी प्रक्रिया इन पार्टियों के 'किसानीकरण' की है। किसान करीब दस हजार साल पुराना वर्ग है। इस वर्ग के जहाँ कई अत्यन्त सकारात्मक पहलू हैं, वहीं उसकी अपनी रूढ़ियाँ तथा संकीर्णताएँ भी हैं। कभी-कभी ये नकारात्मक प्रवृत्तियाँ ऐसे दलों के राजनीतिकरण पर भारी पड़ जाती हैं और ये उन दलों की कार्यशैली तथा उनके संद्घर्ष के रूपों में प्रकट होती रहती हैं। माओवादी पार्टी से जुड़े संगठनों में यह प्रक्रिया ;खासकर उनके विकास के पहले चरण मेंद्ध स्पष्ट रूप से परिलक्षित हुई- किसानों के निजी तथा जातीय झगड़ों में उलझ जाना, सजा के नाम पर विरोधियों के नाक-कान काट लेना, महिलाओं के प्रति रूढ़िग्रस्त मानसिकता, जातीय जनसंहारों को अंजाम देना ;दलेलचक-बद्घौरा, सेनारीद्ध, इत्यादि, इत्यादि, इसी प्रक्रिया की अभिव्यक्तियाँ थीं।

माओवादी भले ही एक खास समय में ठहर गए हों, देश- दुनिया अथवा समाज ठहरा नहीं रहता। खासकर 'क्रांति संपन्न कर लेने' की किसी दल की हसरत को पूरा करने के लिए तो कतई नहीं। पिछले साढ़े चार दशकों में भारत में भी सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक तथा सांस्कृतिक क्षेत्राों में कई परिवर्तन द्घटित हुए जिसमें ऐसे दलों का कुछ-न-कुछ योगदान भी समाविष्ट था। जीवन के विभिन्न क्षेत्राों में पूंजीवादी संबंधों का विस्तार हुआ- खासकर १९९१ के आर्थिक सुधारों के बाद अपेक्षाकृत अधिक तेजी से। कल्याणकारी कार्यक्रमों तथा ग्रामीण विकास के लिए सरकारी बजट में भी वृ(ि हुई।

पूंजी का आदिम संचय पूंजी के विकास के हर चरण के साथ जुड़ी एक अनिवार्य प्रक्रिया है। इस आदिम संचय का एक आयाम पूंजी की अवैध दुनिया है। पूंजी की प्रत्यक्ष तथा वैध दुनिया के साथ-साथ उसकी एक अप्रत्यक्ष और अवैध दुनिया भी जुड़ी होती है और उनके बीच पारस्परिक आदान-प्रदान भी चलता रहता है। इन दोनों दुनियाओं का एक-दूसरे में रूपान्तरण भी होता रहता है। किसी भी शहर तथा औद्योगिक नगर के निवासियों को इस अवैध दुनिया की, निजी तथा सार्वजनिक उद्योगों के पिछवाड़े की हकीकत की तथा इन दोनों दुनियाओं की मिलीभगत की भलीभांति जानकारी होती है। इसी तरह ग्रामीण विकास के नाम पर तथा अन्य योजनाओं के जरिए सार्वजनिक धन की खुली बंदरबाँट और लूट तो देश के कई प्रधानमंत्राी तक बयान कर चुके हैं। समय-समय पर यदि एक ओर इस अवैध दुनिया में पुलिस कार्रवाई के बतौर गिरफ्रतारियाँ, हत्याएँ, गोलीबारी, आदि होती रहती हैं, तो दूसरी ओर इसी दुनिया से, कथित आदिम संचय से पूंजीपतियों की नई-नई खेप निकलकर पूंजी की मुख्य दुनिया में निरंतर शामिल होती रहती है। सरकार भी अवैध धन को वैध बनाने के लिए कदम उठाती रहती है।
प्रमुख राजनीतिक पार्टियाँ जहाँ सीधे कॉरपोरेट द्घरानों से, पूंजी की मुख्यधारा से चन्दे प्राप्त करती हैं, वहीं अनेक छोटे दल तथा निर्दलीय समूह अपने आर्थिक संसाधन पूंजी की उसी अवैध दुनिया से उगाहते हैं। पूंजी की इस अवैध दुनिया से न केवल पूंजीपतियों की नई-नई खेप निकलती रहती है, बल्कि राजनीतिक दलों अथवा राजनीतिज्ञों की नई-नई पीढ़ी भी निकलकर मुख्यधारा की राजनीति में शामिल होती रहती है।

पूंजी का यह 'आदिम' संचय अब माओवाद का भी 'अधुनातन' आर्थिक स्रोत बन गया है। यह 'आधुनिक' उगाही उनकी कार्यशैली और संद्घर्ष के रूप में भी प्रकट हो रही है। ;परम्परागत हथियारों की जगहद्ध एके-४७, एके-५०, लैंड माइन्स, रॉकेट लॉन्चर्स, इम्प्रोवाइज्ड एक्सप्लोसिव डिवाइसेज, आदि उसी स्रोत की देन हैं। भयोत्पादक 'हैरतअंगेज' अथवा 'चमत्कारिक' सशस्त्रा हमले उसी आर्थिक स्रोत को विस्तार देने के उद्देश्य से किए जाते हैं। उन्नत हथियारों पर निर्भरता जनसमुदाय से उन्हें निरंतर दूर करती गई है। वैसे भी माओवादियों ने किसी जनमुद्दे पर बड़ी सक्रिय जनगोलबंदी का प्रयास शायद ही कभी किया है। आर्थिक स्रोत पर कब्जे को लेकर उनके बीच प्रायः टूट-पफूट और हत्याएँ होती रही हैं। उनके बीच से निकले उनके कैडर मुख्य धारा की राजनीति में जगह बनाने की कोशिश भी करते रहे हैं। ;प्रसंगवश, कथित रूप से 'क्रांतिकारी' दल मुख्य धारा के दलों के लिए कापफी मात्राा में कार्यकर्ता तैयार करते रहे हैं। खासकर, साठोत्तर हर नये दल की निचली और मंझली कतारों में ऐसे कार्यकर्ता आपको सहज ही मिल जाएँगे। ये कार्यकर्ता पाते हैं कि 'क्रांतिकारी' दल एक सीमा तक ही उनकी आकांक्षाओं को पूरा करते हैं। पफलतः अपनी राजनीतिक आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए वे अन्य पार्टियों का सहारा लेते हैं।
बहुदलीय भारतीय लोकतंत्रा उनके सामने विविध दलों के बीच 'चयन की स्वतंत्राता' प्रदान करता है। बहरहाल, 'चयन की यह स्वतंत्राता' इन कार्यकर्ताओं तथा उनके समर्थक जनाधार के लिए भले ही 'प्रगतिशील परिद्घटना' हो, संबंधित क्रांतिकारी दलों के लिए वह 'पतनशील प्रवृत्ति' ही होती है।द्ध

पूंजी का 'आदिम' संचय यदि आपका 'आधुनिक' आर्थिक स्रोत है, तो इसका मतलब हुआ कि आप भावी पूंजीपति हैं। पिफलवक्त हथियारबंद भावी बुर्जुआ। ग्रामीण समाज के कल के बागी गिरोहों से यह भावी बुर्जुआ बनने की प्रक्रिया है-आखिर हर कृषि क्रांति का सारतत्व बुर्जुआ-जनवादी ही होता है।
मानसिक रूप से ठहरे हुए समय की ठहरी हुई वैचारिक प्रवृत्ति का शिकार होने के बावजूद आप ठहरे नहीं रह सकते। दल-दल का भी एक 'हरा-भरा' अंत होता है। हाँ, चूंकि आप दलदल से होकर जाते हैं, इसलिए आपके दम तोड़ने की भी संभावना बनी रहती है। अवैध कार्रवाइयाँ एक सीमा तक वैध शासन की वैधता निर्धारित करती हैं। एक सीमा के बाद ये कार्रवाइयाँ वैध शासन की विश्वसनीयता पर ही प्रश्न खड़े कर देती हैं। ऐसी स्थिति में सरकार और ऐसे दलों के बीच मुठभेड़ की स्थिति उत्पन्न हो जाती है और शासन की ओर से इन दलों के खिलापफ सद्घन सैन्य अभियान छेड़ा जाता है।

बहरहाल, नेपाल में माओवाद का उत्थान भारत में माओवादी पार्टी के विकास से कापफी भिन्न परिद्घटना रही है। किसी भी देश की नई पीढ़ी को कुछ विचारधाराएँ विरासत में प्राप्त होती हैं। उन्हें अपने सामाजिक- आर्थिक- राजनीतिक आन्दोलन के लिए इन्हीं उपलब्ध विचारधाराओं व बीच से, खासकर उनके रैडिकल हिस्सों के बीच से चयन करना सबसे स्वाभाविक लगता है। नेपाल में विपक्ष में कम्युनिस्ट पार्टियों के विभिन्न धड़े ही कार्यरत थे। १९९० के जन आंदोलन के बाद राजतंत्रा के अधीन जो सीमित लोकतंत्रा स्थापित हुआ, उसमें ने.क.पा. ;एमालेद्ध सबसे बड़े विपक्षी दल के रूप में उभरी और कुछ ही वर्षों में नेपाली कांग्रेस को पीछे छोड़ते हुए सबसे बड़ी पार्टी बनकर सत्ता के शीर्ष पर भी जा पहुँची। अब विपक्ष में एमाले से भी वाम धड़ा-ने.क.पा. ;माओवादीद्ध था, जिसने १९९४ के संसदीय चुनावों का बहिष्कार किया था।

१ जून, २००१ के राजमहल हत्याकांड और ४ अक्टूबर, २००२ को राजा ज्ञानेन्द्र द्वारा सारी सत्ता अपने हाथों में ले लेने के बाद राजतंत्रा की बची-खुची विश्वसनीयता भी नेपाली जनता की नजर में समाप्त हो चुकी थी। इसी पृष्ठभूमि में १९९६ से ही 'जनयु(' चला रही तथा राजतंत्रा के खात्मे और नई संविधान सभा की मांग करने वाली ने क पा ;माओवादीद्ध नेपाल के राजनीतिक मानचित्रा पर स्वभावतः सर्वप्रमुख राजनीतिक ताकत के रूप में उभर कर सामने आई। इसके अलावा, नेपाली माओवादियों ने अपने जनाधार का विस्तार करने के लिए समाज के जनतांत्राीकरण की दिशा में उन मांगों को भी अंगीकार किया, जिन्हें भारत जैसे देश में विभिन्न क्षेत्राों में अलग-अलग दलों ने उठाकर सत्ता हासिल की थी-यथा, दलितों, उत्पीड़ित जनजातियों तथा पिछड़े क्षेत्राों की मांगें। दलित मुक्ति मोर्चा, मगर मुक्ति मोर्चा, तमांग मुक्ति मोर्चा, थारू मुक्ति मोर्चा, नेवारियों के बीच नेवा खाला, मधेशी मुक्ति मोर्चा जैसे संगठन बनाए गए और जनजातीय तथा पिछड़े क्षेत्राों के लिए स्वायत्त क्षेत्रा बनाये जाने की मांग की गई। जनजातीय तथा क्षेत्राीय आंदोलनों के पहले दौर में प्रायः क्रांतिकारी कम्युनिस्ट दलों को सपफलता मिलती रही है, लेकिन विकास की एक खास मंजिल के बाद इन समुदायों का मध्य वर्ग ऐसे दलों से अपना दामन छुड़ाने लगता है। नेपाल में भी अपेक्षाकृत विकसित मधेशी समुदाय के बीच, खासकर नई संविधान सभा के निर्वाचन के दौरान तथा उसके बाद, यह परिद्घटना सामने आई।
कुल मिलाकर, किसी सामाजिक-राजनीतिक आंदोलन के वैचारिक आवरण और उसके सारतत्व के बीच के संबंध को समझना जरूरी है। एक ही सारतत्व ;पूंजीवादी- जनवादी सारतत्वद्ध वाले आंदोलन विभिन्न देशों में भिन्न-भिन्न वैचारिक आवरणों में संपन्न होते रहे हैं। इसका कारण संबंधित देशों की जनता को विरासत में प्राप्त वैचारिक प्रणालियाँ हैं। शीद्घ्र ही ऐसे आंदोलनों का सारतत्व वैचारिक आवरण को चीरकर सतह पर आ जाता है। ऐसी स्थिति में ऐसे आंदोलन की वाहक पार्टी के समक्ष नई समस्याएँ खड़ी हो जाती हैं। रूप के आकर्षण से चिपका पार्टी का एक समूह सारतत्व की सच्चाई का सामना करने से इन्कार कर देता है। वहीं सारतत्व के यथार्थ सम्मोहन के सामने अनेक लोगों के लिए रूप का आकर्षण पफीका पड़ जाता है। नेपाली माओवादी पिफलहाल इसी स्थिति का सामना कर रहे हैं। कॉमपोसा के कई माओवादी दलों के साथ उनकी दूरी बढ़ने लगी है। नेपाल विश्व क्रांति का कोई दुर्ग नहीं बनने जा रहा। वह तो राजतांत्रिाक कृषि समाज से प्रजातांत्रिाक पूंजीवादी- जनवादी समाज में रूपांतरण की प्रसव- पीड़ा से गुजर रहा है। वैसे यह प्रक्रिया वहाँ दशकों से जारी रही है जिसमें अलग-अलग दौरों में अलग-अलग दलों ने अपनी-अपनी भूमिकाएँ निभाई। माओवादी इस प्रक्रिया के आखिरी दौर में आए।
आसार

एक वैचारिक- राजनीतिक प्रवृत्ति के रूप में भारत जैसे देश में माओवाद का कोई भविष्य नहीं है। हर विचारधारा पुनर्नवीकरण के कुछेक चक्रों के बाद ऐसे भी काल के गाल में समा जाती है। माओवाद तो पुनर्नवीकरण की अपनी क्षमता ही खो चुका है।
अपनी तमाम सीमाओं तथा विकृतियों के बावजूद भारतीय लोकतंत्रा विचारधाराओं तथा दलों के चयन की जितनी स्वतंत्राता प्रदान करता है, उसमें ऐसे दलों की गुंजाइश नहीं रह जाती है। भारतीय लोकतंत्रा, निर्वाचन के जरिए, नए-नए कानूनों तथा संविधान संशोधनों के जरिए तथा सत्ता में नए-नए वर्गों, समुदायों और समूहों को भागीदार बनाने के जरिए अपना पुनर्नवीकरण करता रहा है। वैसे भी कार्यशील लोकतंत्राों में सशस्त्रा आंदोलनों को इतिहास में कभी कोई खास सपफलता नहीं मिली है। ऐसे आंदोलन राजतंत्राों अथवा एकदलीय निरंकुश शासन-तंत्राों में ही कहीं-कहीं अपनी सपफलता दर्ज कर पाए हैं। लोकतंत्रा में कम्युनिस्टों को सबसे अधिक सपफलता चुनावों के जरिए ही मिली है। कई अवसरों पर उनकी सपफलता के सामने शासक दलों को ही 'गैर-लोकतांत्रिाक' कदम उठाने पड़े हैं।
प्रस्तुत आलेख में यद्यपि मेरा विषय माओवाद के वैचारिक- राजनीतिक परिप्रेक्ष्य पर चर्चा करना था, तथापि इसका समापन करने से पहले थोड़ा विषयान्तर होना जरूरी है। हाल के वर्षों में माओवादियों द्वारा की गई बड़ी हिंसक कार्रवाइयों ;शहरों, ट्रेनों, रेलवे स्टेशनों, आदि पर हमलोंद्ध हत्याओं, लगातार होने वाली बन्दियों तथा उसके दौरान तोड़पफोड़ से आम लोगों और खासकर मध्य वर्ग में न सिपर्फ सरकार की शासन करने की क्षमता संदेह के द्घेरे में आ गई, बल्कि नागरिक जीवन में उत्पन्न व्यवधानों तथा अस्तव्यस्तताओं और निर्दोष लोगों के मारे जाने के कारण माओवादियों के प्रति रोष भी बढ़ा है। लालगढ़ ;प. बंगालद्ध अभियान के बाद इसी पृष्ठभूमि में अब केन्द्र सरकार माओवादियों के खिलापफ सैन्य अभियान चलाने जा रही है। मीडिया के कुछ हल्कों में देश के समक्ष उत्पन्न माओवादी चुनौती से कड़ाई से निपटने के पक्ष में माहौल तैयार किया जा रहा है। प्रधानमंत्राी तथा गृहमंत्राी पहले ही इस चुनौती से निपटने को अपनी सरकार की प्राथमिकता द्घोषित कर चुके हैं। बहरहाल, इस पूरे प्रकरण में सरकार अपनी जवाबदेही से भाग नहीं सकती। आखिर आजादी के बासठ वर्षों बाद भी माओवादी गतिविधियों वाले क्षेत्राों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति इतनी बदतर क्यों हैं? इन क्षेत्राों में रहने वाले लोग राज्य से इतना अलगाव, इतना परायापन क्यों महसूस करते हैं? ऐसे सैन्य अभियानों के क्रम में आम जनवादी अधिकारों के हनन, ज्यादतियों और दमन की द्घटनाएँ भारत में आम हैं और आने वाला सैन्य अभियान भी इसका अपना नहीं होने जा रहा है। जनतांत्रिाक नागरिक समाज को ऐसे अभियानों की आड़ में राज्य द्वारा दमन, मौलिक अधिकारों के हनन, और भाड़े के गिरोह तैयार करने की कार्रवाइयों की कभी इजाजत नहीं देनी चाहिए।
लेखक प्रखर समाजिक चिंतक हैं। एक जमाने में लंबे समय तक नक्सली आंदोलन से सक्रिय रूप से जुड़े रहे।द्ध

शांति निवास, बम्पास टाउन, देवद्घर-८१४११४, झारखंड
मो. ०९४३०१०५४३३

 
पफांसी के तख्तों में वो दम कहाँ : आनंद स्वरूप वर्मा
 
तकरीबन ३६ साल पुरानी बात है। १९७४ में आंध्र प्रदेश के दो आदिवासी युवकों किस्टा गौड और भूमैया को पफांसी की सजा दी गयी थी। इन पर आरोप था कि इन्होंने कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में किसी जमींदार की हत्या की साजिश में हिस्सा लिया था। उन दिनों नक्सलवादी आंदोलन, जो १९६७ में नक्सलबाड़ी से शुरू होकर देश के विभिन्न हिस्सों में पफैल चुका था, पश्चिम बंगाल में सि(ार्थ शंकर राय की सरकार के दमन के आगे

कापफी हद तक पस्ती के दौर से गुजर रहा था। दोनों आदिवासी युवकों को मृत्युदंड दिए जाने के विरोध् में अनेक कविताएँ लिखी गयीं और लेख प्रकाशित हुए। हिन्दी में भी सर्वेश्वर दयाल सक्सेना ने 'लोकतंत्रा का गाना' शीर्षक से एक कविता लिखी थी। सर्वेश्वर जी की कविता की पहली पंक्ति थी-'किस्टा औ भूमैया क्या पफांसी चढ़ाएँ जाएँगे? हिन्द के दो लाल क्या यूँ ही गंवाएँ जाएँगे?' इस कविता की अंतिम पंक्तियाँ थीं-'अनसुनी आवाज उनकी कैसे कर देगा वतन जिनके सुर से कल भी लाखों सुर मिलाए जाएँगें?' मलयालम में कवि उदयभानु ने अपनी कविता में 'जेलखाने के भीतर भी पवित्रा इंसान की खुश्बू' के बिखरने का जिक्र करते हुए लिखा कि 'बहुत दूर कृष्णा नदी के तट पर/पफांसी के तख्ते से टंगे हुए इंसान/मौत के बाद भी जो जिंदा रहेंगे/मेरे भीतर भी थिरकन जगा रहे हैं।'
बांग्ला भाषा में सव्यसाची देव ने अपनी कविता में दोनों युवकों की गिरफ्रतारी का वर्णन करते हुए आगे लिखा था-'याददाश्त को पफाड़कर हड़हड़ाकर खुल गया सेल का दरवाजा/सामने आ खड़ा हुआ पहरेदार/साथ कोई नहीं है/काले कपड़े से चेहरा ढंक देने से पहले/लाल हो आए पूर्व आकाश को पुकार कर उन्होंने कहा/याद रखना, हमलोगों ने प्यार किया था।' तेलुगू कवि चेरबंड राजू ने 'कम्युनिस्ट किस्टा गौड़, कामरेड भूमैया गरीबों, मजूरों का स्वीकारो लाल सलाम' शीर्षक कविता में कहा कि-'तुम जिंदा हो हरदम/हम सबके बीच हो/पफांसी के तख्तों में क्या दम होगा/ कहो तेलंगाना, नक्सलबाड़ी, श्रीकाकुलम/इनके संद्घर्षों का/स्वीकारो लाल सलाम/लो लाल झंडे का लाल सलाम।'
इससे पहले ८ जून १९७५ को सारे देश में किस्टा गौड़-भूमैया दिवस मनाया गया था। दिल्ली में भी हिन्दी, अंग्रेजी और पंजाबी के अनेक लेखकों-बु(जिीवियों ने जॉर्ज पफर्नांडीज की अध्यक्षता में एक अभियान समिति का गठन किया था। इस समिति के सदस्यों ने पफांसी की सजा रद किए जाने की मांग करते हुए बोट क्लब पर रात भर ध्रना भी दिया था। समिति का एक प्रतिनिध्मिंडल अपनी मांग को लेकर तत्कालीन राष्ट्रपति पफखरुद्दीन अली अहमद से मिलने गया। प्रतिनिधिमंडल के सदस्यों ने राष्ट्रपति से बातचीत के दौरान कुछ ही दिनों पूर्व लखनउफ की एक युवती शमीम रहमानी की मौत की सजा समाप्त करने का जिक्र किया। एक प्रेम त्रिाकोण की वजह से शमीम रहमानी ने लखनउफ के एक युवा डाक्टर गौतम की गोली मार कर हत्या कर दी थी। राष्ट्रपति से जब इसका जिक्र किया गया तो वह बौखला गए। उनका जवाब था कि 'शमीम रहमानी एक खानदानी लड़की थी, वह नवाब खानदान की थी और उससे एक चूक हो गयी। किस्टा गौड़ और भूमैया उस तबके से आते हैं जो जरायमपेशा है, जिसका काम ही अपराध् करना है। ऐसे लोगों की तुलना आप शमीम रहमानी से कैसे कर सकते हैं। इनकी सजा किसी भी हालत में मापफ नहीं की जा सकती।'

इन दोनों युवकों को १ दिसंबर १९७५ को, जिस समय पूरे देश में श्रीमती इंदिरा गांध्ी की सरकार ने इमरजेंसी लगा रखी थी, पफांसी पर लटका दिया गया। आजाद भारत के इतिहास में राजनीतिक बंदियों को पफांसी पर लटकाने की यह पहली द्घटना थी।
इस द्घटना का जिक्र मैंने इसलिए किया क्योंकि यह भारतीय गणराज्य के राष्ट्रपति की सोच को व्यक्त करती है। शशि थरूर एक मूर्ख राजनीतिज्ञ है इसलिए उसने हवाई जहाज में इकोनॉमी क्लास में यात्राा करने वालों के लिए मवेशी ;कैटिल क्लासद्ध शब्द का खुलेआम इस्तेमाल कर दिया। आप जानते हैं कि इकोनॉमी क्लास में भी यात्राा करने वालों की संख्या कितनी है। आप कल्पना करिए कि जो लोग ट्रेन के अनारक्षित डिब्बों में यात्राा करते हैं अथवा झुग्गी-झोपड़ियों में रहते हैं उन्हें तो यह सत्ताधरी वर्ग, जिसका प्रतिनिध्त्वि पफखरुद्दीन अली अहमद अथवा शशि थरूर करते हैं, कीड़े-मकोड़े से भी बदतर मानता होगा।

अभी पिछले दिनों अध्रिाज बोस की एक रिपोर्ट देखने को मिली जिससे पता चला कि मौजूदा १५वीं लोकसभा में ३०० से भी ज्यादा सांसद ऐसे हैं जिनकी द्घोषित परिसंपत्ति एक करोड़ रुपए से ज्यादा है। इससे पहले १४वीं लोकसभा में ऐसे सांसदों की संख्या १५४ थी। इन सांसदों में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के प्रपफुल्ल पटेल ;रु. ८९. ९ करोड़द्ध, कांग्रेस के जी. विवेकानंद ;रु. ७२.९ करोड़द्ध, कांग्रेस के वाई.एस.जगमोहन रेड्डी ;रु. ७२.८ करोड़द्ध, कांग्रेस के राजकुमार रत्न सिंह ;रु. ६७.८ करोड़द्ध, अकाली दली की हरसिमरत कौर ;रु. ६०.३ करोड़द्ध और नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी की सुप्रिया सुले ;रु. ५०.४ करोड़द्ध शामिल हैं। इसके अलावा तेलुगू देशम पार्टी के खम्माम से निर्वाचित सांसद नम्मा नागेश्वर राव की कुल परिसंपत्ति एक अरब ७४ करोड़ रुपये की है। हरियाणा में कुरुक्षेत्रा से निर्वाचित उद्योगपति नवीन जिंदल ;कांग्रेसद्ध की कुल परिसंपत्ति एक अरब ३१ करोड़ रुपए है। इन करोड़पति सांसदों की मौजूदगी अलग-अलग पार्टियों में है लेकिन सबसे ज्यादा करोड़पति सांसद कांग्रेस में हैं जहाँ इनकी संख्या १३८ है। भाजपा में ५८, समाजवादी पार्टी में १४ और बसपा में १३ ऐसे सांसद हैं। इसके अलावा द्रमुक में ११, शिवसेना में ९, जनता दल ;यूनाइटेडद्ध में ८, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी में ७ और बीजू जनता दल तथा तृणमूल कांग्रेस में इस कोटि के ६-६ सांसद हैं।
इस रिपोर्ट में टिप्पणी की गयी है कि संसद में इतनी बड़ी संख्या में ध्न कुबेरों की मौजूदगी से जाहिर हो जाता है कि बुर्जुआ लोकतंत्रा की इस प्रमुख संस्था पर पूंजी का कितना दबदबा है और किस तरह इसने देश को एक पूंजीवादी गणराज्य का रूप दे दिया है। गौर करने वाली बात है कि हर चुनाव के बाद 'जनतंत्रा' के गले में पूंजी का पफंदा कसता चला गया। इनके पास जो अपार संपत्ति है उसका उपयोग इन्होंने मीडिया के जरिए अपने पक्ष में जनमत तैयार करने के लिए किया है। जिस संसद में ५४३ सदस्यों में से तकरीबन ३५० करोड़पति होंगे उससे यह कैसे उम्मीद की जा सकती है कि वह गरीबों के हित में कोई कानून बनाएगी।

आंध््र प्रदेश, उड़ीसा, छत्तीसगढ़ या झारखंड में जो माओवादी आंदोलन निरंतर तेज होता जा रहा है उसके पीछे इस पूंजी की बहुत बड़ी भूमिका है। गृहमंत्राी चिदंबरम उसी वेदांत समूह के निदेशक मंडल के सदस्य रहे हैं जिसने उड़ीसा में नियामगिरी की पहाड़ियों को बॉक्साइट की तलाश में खोद-खोद कर बर्बाद कर दिया और जो आज करोड़ों डॉलर की परियोजना लेकर रायपुर में बैठा इंतजार कर रहा है कि कब चिदंबरम अपने सैनिकों से छत्तीसगढ़ के 'अराजक माओवादियों' का सपफाया कराएँ और वेदांता का प्रोजेक्ट चालू हो। अब यह बात ध्ीरे-ध्ीरे सामने आने लगी है कि छत्तीसगढ़ की समस्या के मूल में टाटा और एस्सार ग्रुप की क्या भूमिका है। टाटा उद्योग समूह के साथ जिस दिन छत्तीसगढ़ की सरकार ने एक करारनामे पर हस्ताक्षर किया था ;एमओयूद्ध उसके दूसरे दिन से ही सलवा जुडुम कार्यक्रम शुरू हो गया था। इस द्घटना से संदेह की सुई लगातार टाटा की ओर द्घूम रही थी। लेकिन सरकारी रिपोर्ट ने उन लोगों को भी चौंका दिया जो समझ रहे थे कि यह कुछ सिरपिफरे बु(जिीवियों का दुष्प्रचार है।

भारत सरकार के ग्रामीण विकास मंत्राालय ने २००८ में यह महत्वपूर्ण रिपोर्ट तैयार की थी जिसका शीर्षक है 'कमेटी ऑन स्टेट ऐग्रेरियन रिलेशन्स ऐंड अनपिफनिश्ड टॉस्क ऑपफ लैंड रिपफॉर्म्स'। इसकी अध्यक्षता केंद्रीय ग्राम विकास मंत्राी ने की। १५ सदस्यीय समिति में अनेक राज्यों के सचिव और विभिन्न क्षेत्राों के विद्वान तथा कुछ अवकाश प्राप्त प्रशासनिक अध्किारी शामिल थे।

इस रिपोर्ट में बताया गया है कि विकास परियोजनाओं के नाम पर कितने बड़े पैमाने पर उपजाउफ जमीन और वन क्षेत्रा को उद्योगपतियों को दिया गया। इसकी वजह से बहुत बड़े पैमाने पर विस्थापन हुआ और इसने एक व्यापक अशांति को जन्म दिया। रिपोर्ट के अनुसार पिछले दो दशकों में खनन उद्योग के लिए ७ लाख ५० हजार एकड़ और औद्योगिक कार्यों के लिए २ लाख ५० हजार एकड़ पर कब्जा किया गया। स्पेशल इकोनॉमिक जोन के अंतर्गत ज्यादातर वही जमीनें ली गयीं जहाँ अच्छी खेती होती थी जिसकी वजह से गरीब किसानों की जिंदगी बर्बाद हो गयी। रिपोर्ट में कहा गया है कि गैर कृषीय उद्देश्यों के लिए खेतिहर जमीन को हड़पने का सिलसिला बड़े पैमाने पर पूरे देश में जारी है।
'आदिवासियों की जमीन हड़पने की कोलंबस के बाद की सबसे बड़ी कार्रवाई' उपशीर्षक के अंतर्गत भारत सरकार की इस रिपोर्ट में बताया गया है कि- ''छत्तीसगढ़ के तीन दक्षिणी जिलों बस्तर, दांतेवाड़ा और बीजापुर में गृहयु( जैसी स्थिति बनी हुई है। यहाँ एक तरपफ तो आदिवासी पुरुषों और महिलाओं के हथियारबंद दस्ते हैं जो पहले पीपुल्स वॉर ग्रुप में थे और अब भारत की कम्युनिस्ट पार्टी ;माओवादीद्ध के साथ जुड़े हैं तथा दूसरी तरपफ सरकार द्वारा प्रोत्साहित सलवा जुड़ुम के हथियारबंद आदिवासी लड़ाकू हैं जिनको आध्ुनिक हथियारों और केंद्रीय पुलिस बल के तमाम संगठनों का समर्थन प्राप्त है। यहाँ जमीन हड़पने की अब तक की सबसे बड़ी कार्रवाई चल रही है और जो पटकथा तैयार की गयी है वह अगर इसी तरह आगे बढ़ती रही तो यह यु( लंबे समय तक जारी रहेगा। इस पटकथा को तैयार किया है टाटा स्टील और एस्सार स्टील ने जो सात गाँवों पर और आसपास के इलाकों पर कब्जा करना चाहते थे ताकि भारत के समृ(तम लौह भंडार का खनन कर सकें।

शुरू में जमीन अध्ग्रिहण और विस्थापन का आदिवासियों ने प्रतिरोध् किया। प्रतिरोध् इतना तीव्र था कि राज्य को अपनी योजना से हाथ खींचना पड़ा। सलवा जुडुम के साथ नये सिरे से काम शुरू हुआ। अजीब विडंबना है कि कांग्रेसी विधयक और सदन में विपक्ष के नेता महेंद्र कर्मा ने इसकी शुरुआत की लेकिन भाजपा शासित सरकार से इसे भरपूर समर्थन मिला। इस अभियान के पीछे व्यापारी, ठेकेदार और खानों की खुदाई के कारोबार में लगे लोग हैं जो अपनी इस रणनीति के सपफल नतीजे की प्रतीक्षा कर रहे हैं। सलवा जुडुम शुरू करने के लिए पैसे मुहैया करने का काम टाटा और एस्सार गु्रप ने किया क्योंकि वे 'शांति' की तलाश में थे। सलवा जुडुम का पहला प्रहार मुड़िया लोगों पर हुआ जो अभी भी भाकपा ;माओवादीद्ध के प्रति निष्ठावान हैं। यह भाई भाई के बीच खुला यु( बन गया।
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक ६४० गाँव खाली करा दिये गये, इन गाँवों के मकानों को ढाह दिया गया और बंदूक की नोक पर तथा राज्य के आशीर्वाद से लोगों को इलाके से बेदखल कर दिया गया। साढ़े तीन लाख आदिवासी, जो दांतेवाड़ा जिले की आध्ी आबादी के बराबर हैं, विस्थापित हुए, उनकी औरतें बलात्कार की शिकार हुईं, उनकी बेटियां मारी गयीं और उनके युवकों को विकलांग बना दिया गया। जो भागकर जंगल तक नहीं जा पाये उन्हें झुंड के झुंड में विस्थापितों के लिए बने शिविरों में डाल दिया गया जिसका संचालन सलवा जुडुम द्वारा किया जाता है। जो बच रहे वे छुपते छुपाते जंगलों में भाग गये या उन्होंने पड़ोस के महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश और उड़ीसा में जाकर शरण ली।
''६४० गाँव खाली हो चुके हैं। हजारों लाखों टन लोहे के उफपर बैठे इन गाँवों से लोगों को भगा दिया गया है और अब ये गाँव सबसे उफंची बोली बोलने वाले के लिए तैयार बैठे हैं। ताजा जानकारी के अुनसार टाटा स्टील और एस्सार स्टील दोनों इस इलाके पर कब्जा करना चाहते हैं ताकि वहां की खानें इनके पास आ जायँ।''

आमतौर पर नक्सलवाद/माओवाद की समस्या को विकास के सवाल से जोड़कर देखा जाता है और यह दलील दी जाती है कि अगर इन क्षेत्राों का समुचित विकास होता या भूमि सुधार कानून को सही ढंग से लागू किया गया होता तो यह समस्या नहीं पैदा होती। अब ये बातें बड़ी द्घिसी पिटी बातें हो गयी हैं। पूरा तंत्रा इतना भ्रष्ट हो चुका है कि वह कितनी भी कसम क्यों न खाये विकास के नाम पर भ्रष्टाचार से मुक्त हो ही नहीं सकता। २००७ तक की रिपोर्ट देखने से पता चलता है कि नक्सल प्रभावित जिलों के लिए बनी विभिन्न योजनाओं के तहत झारखंड को जो पैसे मिले हैं उसमें से २४० करोड़ का उस समय तक इस्तेमाल नहीं हुआ था। तब तक उसे ६५० करोड़ मिल चुके थे। पुलिस के आधुनिकीकरण के मामले में भी झारखंड का रिकॉर्ड बहुत खराब है। २००४-५ में इस काम के लिए इसे २२.२३ करोड़ रुपए दिए गए जिसमें से इसने केवल ७.३३ प्रतिशत का इस्तेमाल किया। २००६ में इसे ४० करोड़ रुपए दिए गए लेकिन उसका भी सही ढंग से इस्तेमाल नहीं हुआ। तत्कालीन मुख्यमंत्राी मध्ु कोड़ा का कहना था कि राज्य के १८ में से १२ जिले माओवाद से बुरी तरह प्रभावित हैं और राज्य को अर्(सैनिक बलों की १२ अतिरिक्त बटालियनें पफौरन चाहिए।

समस्या केवल झारखंड की नहीं है। जहाँ-जहाँ नक्सलवाद/माओवाद का असर दिखायी दे रहा है वहां सरकार की पहली प्राथमिकता दमन के जरिए इसका समाधन है। वैसे तो पूर्व मुख्यमंत्राी अर्जुन मुंडा ने अप्रैल २००४ में ही यह बताते हुए कि नक्सलवाद की समस्या एक सामाजिक आर्थिक समस्या है, आश्वासन दिया था कि लगभग २० हजार करोड़ की परियोजना पर जल्द ही काम शुरू होने जा रहा है। उनका मानना था कि इससे माओवादी गतिविधियों में कमी आएगी। उन्होंने तमाम निजी कंपनियों को अपने राज्य में विकास योजनाएँ शुरू करने के लिए आमंत्रिात भी किया। उनकी सोच थी कि ऐसा करने से यहाँ की आदिवासी जनता माओवादी प्रभाव से बाहर आ जाएगी। लेकिन जैसा कि प्रायः होता है, विकास की सारी योजनाएँ ध्री की ध्री रह जाती हैं और सारा जोर पुलिस के आध्ुनिकीकरण पर लगा दिया जाता है। केंद्र सरकार ने अपनी जिस नयी नीति को अंतिम रूप दिया है उसे 'सेक्योरिटी रिलेटेड एक्सपेंडिचर' ;एसआरईद्ध कहते हैं। पिफलहाल ९ राज्यों के ७६ जिलों में एसआरई योजना लागू रहेगी। इसके तहत ५० करोड़ के सालाना बजट में से इस वर्ष अगस्त तक १४ करोड़ रुपया दिया जा चुका है। इस योजना को २००५ में व्यापक तौर पर संशोध्ति किया गया और अब तक इस योजना के अंतर्गत नक्सलवाद प्रभावित राज्यों को १७५.५५ करोड़ रुपए दिए जा चुके हैं। नक्सलवाद प्रभावित राज्यों का मानना है कि इस योजना से कापफी लाभ हुआ है। इस बात को ध्यान में रखते हुए २०११ तक के लिए इस योजना को बढ़ा दिया गया है।

इंडियन एक्सप्रेस, १० जुलाई २००९ में प्रकाशित एक समाचार के अनुसार झारखंड में नक्सल विरोध्ी अभियान के अंतर्गत पैसों की गड़बड़ी को लेकर महालेखा कार्यालय ने सवाल उठाये हैं। इसके अनुसार पुलिस महानिदेशक बी. डी. राम तथा अन्य अध्किारियों से सवाल किया गया है कि इस अभियान के लिए सेक्रेट सर्विस पफंड से उन्होंने १४ करोड़ रुपये से भी अध्कि की राशि जो ली थी उसे कैसे खर्च किया। लेखा महानिरीक्षक ने इसकी जाँच की माँग करते हुए आशंका व्यक्त की है कि पैसे के खर्च में 'धेखाध्ड़ी और गबन' की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।
एक मामले में डी.जी.पी. राम ने १६ मार्च २००६ को स्टेट बैंक आपफ इंडिया रांची की सचिवालय शाखा से ५ करोड़ ६० लाख रुपये निकाले और पुलिस के अतिरिक्त महानिरीक्षक को इसके वितरण का अध्किार दिया।
महालेखा कार्यालय द्वारा आपत्ति किये जाने पर मुख्य सचिव ए.के. बसु ने डी.जी.पी. राम को लिखा- 'महालेखा
निदेशालय ने सेक्रेट सर्विस के पैसे खर्च किये जाने के बारे में स्पेशल ब्रांच मैनुअल और बिहार पफाइनेंशियल रूल्स के प्रावधनों के उल्लंद्घन की बात की है। ये आपत्तियाँ बहुत गंभीर हैं और इनकी जांच की जानी चाहिए। कृपया इस दिशा में आपने जो कदम उठाये हैं उनकी विस्तृत जानकारी दें ताकि आगे कार्रवाई की जा सके।'

स्पेशल ब्रांच मैनुअल के नियम ४ के अनुसार सेक्रेट सर्विस पफंड का पैसा 'उन मुखबिरों को दिया जाना चाहिए जिनसे गुप्त किस्म की उपयोगी जानकारी मिलती है अथवा मिलने की संभावना है और जिनकी पहचान को गुप्त रखा जा सके।'
हालांकि स्पेशल ब्रांच मैनुअल में कहा गया है कि सेक्रेट सर्विस एक्सपेंडीचर की जांच किसी लेखा अधिकारी द्वारा नहीं की जा सकती लेकिन बिहार पफाइनेंशियल रूल्स, जो अभी भी झारखंड में लागू है, में स्पष्ट किया गया है कि इसके लिए एक अध्किारी से ऑडिट कराकर महालेखा कार्यालय को रिपोर्ट जानी चाहिए।
इंडियन एक्सप्रेस की जानकारी के अनुसार कुल १४ करोड़ १८ लाख ५० हजार रुपये निकाले गये जिनका खर्च किस तरह किया गया यह स्पष्ट नहीं है।

झारखंड का ही एक और मामला काबिलेगौर है। २००७ में हिंदुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड ;एच.ए.एल.द्ध से झारखंड सरकार ने ३५ करोड़ रुपये देकर ध््रुव हेलीकॉप्टर खरीदा। यह हेलीकॉप्टर पुलिस के आध्ुनिकीकरण के लिए प्राप्त ध्नराशि से खरीदा गया था और इसका मकसद माओवाद विरोध्ी अभियान के लिए इस्तेमाल किया जाना था। खरीदे जाने के बाद यह हेलीकॉप्टर ४ महीने से भी अध्कि समय तक खड़ा रहा क्योंकि राज्य सरकार ने एच.ए.एल को पूरे पैसे का भुगतान नहीं किया था। इसके अलावा उसे कोई प्रशिक्षित चालक नहीं मिल रहा था क्योंकि सरकार ज्यादा पेैसे नहीं खर्च करना चाहती थी। इसके बाद जब हेलीकॉप्टर ने उड़ना शुरू किया तो इसे मुख्यमंत्राी, मंत्रिायों और राज्य के बड़े अपफसरों को ढोने से ही पुफर्सत नहीं मिली। यहाँ तक कि ११ मई को हजारीबाग जिले में नक्सलविरोध्ी अभियान में दो सुरक्षा अध्किारी द्घायल हुए लेकिन उन्हें लाने के लिए हेलीकॉप्टर उपलब्ध् नहीं हुआ और दोनों की मृत्यु हो गयी। इसी प्रकार रांची के बुंदू ब्लॉक में एक बारूदी सुरंग के पफटने से पुलिस उपअध्ीक्षक प्रमोद कुमार सहित ५ लोग द्घायल हुए जिनमें से अस्पताल ले जाते समय २ की मौत हो गयी। उस समय भी यह हेलीकॉप्टर उपलब्ध् नहीं हुआ।

माओवाद को समाप्त करने के नाम पर करोड़ों-अरबों रुपये सरकार राज्यों को दे रही है लेकिन इन पैसों का अध्किांश हिस्सा भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जा रहा है। राज्यों में सत्ता के शीर्ष पर जो लोग बैठे हैं उनके अंदर एक निहित स्वार्थ पैदा हो गया है जिसके मूल में लालच है। आपको याद होगा कि उत्तराखण्ड में जब भुवनचंद खंडूरी मुख्यमंत्राी थे। २१ दिसंबर २००७ को दैनिक जागरण के नैनीताल संस्करण में प्रकाशित खबर के अनुसार खंडूरी ने नेपाल का हौआ दिखाते हुए अपने राज्य में माओवाद का खतरा बताया और राज्य की आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था को उन्नत करने के लिए २०८ करोड़ की मांग की। पिफर २४ दिसंबर को इन्हीं अखबारों ने प्रकाशित किया कि 'प्रशांत राही नामक जोनल कमांडर को हंसपुर खत्ता के जंगलों से उस समय गिरफ्रतार किया गया जब वह एक नदी के किनारे अपने ५ साथियों के साथ बैठकर कोई योजना बना रहा था। उसके अन्य साथी भाग गये।' बाद में पता चला कि १७ दिसंबर २००७ को पत्राकार और कम्युनिस्ट विचारों के लिए ज्ञात प्रशांत राही को उस समय गिरफ्रतार किया गया जब वे शाम को अपने द्घर के बाहर टहल रहे थे। उत्तराखण्ड में माओवाद का हौव्वा खड़ा किया गया और हर उस युवा को प्रताड़ित किया गया जो सामाजिक मुद्दों पर थोड़ा भी सक्रिय था। आश्चर्य नहीं कि यह दमन-नीति आने वाले दिनों में सचमुच वहाँ माओवादी आंदोलन पैदा कर दे।

सरकार ने स्कूलों को सैनिक शिविर बना दिया है। झारखंड की २००७ की एक रिपोर्ट के अनुसार सरकार ने राज्य के २५ स्कूलों में पढ़ाई बंद कराने के बाद इन्हें पुलिस शिविरों में बदल दिया है। पिछले पाँच वर्षों के दौरान अनेक स्कूलों के साथ यही सलूक किया गया। इससे अनुमानतः १२ हजार छात्रा प्रभावित हुए हैं। राज्य में कई स्कूल तो ऐसे हैं जिनके कमरों में पुलिसकर्मी रहते हैं और बच्चों को छत पर या मैदान में पढ़ाई करनी पड़ती है। इसके अलावा पुलिस की मौजूदगी से जो माहौल पैदा होता है वह भी बच्चों के लिए कापफी खौपफनाक है। स्कूल की इमारतों में पुलिस छावनी बनाने से माओवादी हमले उन इमारतों पर होते हैं जो आने वाले दिनों के लिए कोई सुखद स्थिति नहीं है। अगर दिन में कभी हमला हुआ तो सुरक्षाकर्मी इन स्कूली बच्चों को ढाल की तरह इस्तेमाल करते हैं। स्कूलों की इमारतें जब माओवादियों के बमों से ध्वस्त होती हैं तो सरकारी विज्ञप्तियाँ अखबारों की सुर्खियाँ बनती हैं और बताया जाता है कि माओवादी शिक्षा के खिलापफ हैं।
जोशी जी, कहाँ तक इन बातों का जिक्र करूँ। मुझे नाइजीरिया के प्रमुख बु(जिीवी, कवि और पर्यावरणविद् केनसारो वीवा का एक बयान याद आता है। उन्हें १० नवंबर १९९५ को इसलिए पफांसी पर लटका दिया गया क्योंकि उन्होंने अपने इलाके की जनता को बहुराष्ट्रीय तेल कंपनी 'शेल' के शोषण के खिलापफ संगठित किया था। अदालत में दिए गए उनके बयान का यह अंश गौर करने लायक है- 'मी लॉर्ड, मैं उन लोगों में से नहीं हूँ जो यह दलील देते हुए कि सैनिक सरकारें तो दमनकारी होती ही हैं, अन्याय और उत्पीड़न का विरोध् करने से अपने को बचाता रहूँ। कहीं भी सैनिक हुकूमत अकेले काम नहीं करती। उसे राजनीतिज्ञों, वकीलों, न्यायाध्ीशों, विद्वानों और व्यापारियों के एक गिरोह का समर्थन प्राप्त रहता है और यह गिरोह दावा करता है कि वह अपना कर्तव्य निभा रहा है। ये लोग पेशाब में तर-बतर पतलूनें पहने रहते हैं और धेने में डरते हैं। माई लॉर्ड, आज हम सभी कटद्घरे में खड़े हैं। हमने अपनी हरकतों से इस देश को दुर्दशा के कगार पर पहुँचा दिया है और इस देश के बच्चों का भविष्य तबाह कर दिया है।'

केन सारो वीवा ने यह बात सैनिक सरकारों के संदर्भ में कही थीं क्योंकि उनके देश में उस समय सानी अबाचा के नेतृत्व में एक सैनिक सरकार काम कर रही थी। सारो वीवा की यह बात किसी भी दमनकारी तंत्रा के लिए सही बैठती है। आप खुद देखिए कि आज अनेक अखबारों के संपादक ;जो वस्तुतः पत्राकार नहीं बल्कि सत्ता के दलाल हैंद्ध चिदंबरम के साथ इस मुद्दे पर खड़े हैं कि छत्तीसगढ़ में माओवादी ठिकानों पर बम गिराए जायं-यह जानते हुए भी कि ऐसा इसलिए किया जाएगा ताकि टाटा, जिंदल, मित्तल, एस्सार, बेदांता आदि आराम से वहाँ की खनिज संपदा लूट सकें। २००१ में जिस समय नेपाल में माओवादी आंदोलन अपने चरम पर था, नेपाली कांग्रेस और एमाले के नेताओं ने बार-बार महाराजा बीरेन्द्र से मांग की कि माओवादियों के खिलापफ सेना का इस्तेमाल किया जाए। राजा बीरेन्द्र ने यह कहते हुए कि सेना का इस्तेमाल विदेशी आक्रमण की स्थिति में ही किया जा सकता है, सेना परिचालन से इंकार किया। एक राजतंत्रा को इतनी शर्म थी कि वह अपने देश की जनता के खिलापफ सेना का इस्तेमाल करने में हिचकिचा रहा था लेकिन दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्रा का गृहमंत्राी बेहिचक सेना के इस्तेमाल की बात कर रहा है और उसकी प्रशस्ति लिखने में अनेक संपादक अपनी कलमें तोड़ रहे हैं।
उफपर मैंने जो बातें कहीं हैं उन्हें कहना या प्रकाशित करना पी. चिदंबरम का गृह मंत्राालय राष्ट्रविरोधी कार्रवाई मानता है। कोई भी दमनकारी सत्ता अगर किसी बात से सबसे ज्यादा द्घबराती है तो वह है सच।
जार्ज ऑरवेल ने एक जगह कहा था कि 'जिस समय चारों तरपफ धेखाध्ड़ी का साम्राज्य हो, सच को बयान करना ही क्रांतिकारी कर्म है।' जरूरत है आज ज्यादा से ज्यादा लोगों को सच्चाई से रू-ब-रू कराने की।

;लेखक वरिष्ठ पत्राकार एवं माओवाद के जानकार।द्ध
क्यू-६३ सेक्टर-१२ नोएडा
मो. ०९८१०७२०७१४

 
नक्सलवाद के किसान बनाम माओवाद के आदिवासी : अभय कुमार दुबे
 

नक्सलवादी आंदोलन को मुख्य तौर पर दो नजरियों से समझा जा सकता है। पहला नजरिया सरकार का है। इसके मुताबिक हमें १९६८ में शुरू हुई इस क्रांति-कथा के मौजूदा अध्याय को सरकारी पहलकदमियों के आईने में देखना होगा। इस दृष्टिकोण की रचना प्रधानमंत्राी मनमोहन सिंह के उस वक्तव्य के इर्द-गिर्द हुई है जिसमें उन्होंने माओवाद को देश की सुरक्षा और अखंडता के लिए सबसे बड़ा खतरा करार दिया था। दूसरा नजरिया उन लोगों का है जो इस आंदोलन को उसकी ऐतिहासिक विरासत की रोशनी में देखते हैं। इस दृष्टिकोण की भित्ति उन सरोकारों के इर्द-गिर्द खड़ी होती है जो इस आंदोलन के नीचे से ऊपर तक दो भागों में बंट जाने के कारण पैदा हुए हैं।
सरकारी नजरिए की रूपरेखा पर प्रधानमंत्राी के वक्तव्य की छाप बहुत गहरी है। सरकार आदिवासियों के हितों और विकास की दौड़ में उनके पिछड़ जाने के प्रति कितनी भी चिंता क्यों न व्यक्त करे, उसकी योजनाओं में राजनीति की कम और दमनकारी मशीनरी के इस्तेमाल की भूमिका लाजमीतौर पर अधिक रहेगी।
आंदोलन के हमदर्दों का नजरिया क्रांतिकारी राजनीति के उन दो अनुभवों की समीक्षा से निकला है जिनके आधार पर दो अलग-अलग रास्ते बने। इनमें से एक पर भाकपा ;मालेद्ध ;लिबरेशनद्ध जैसा संगठन चल रहा है, और दूसरे पर भाकपा ;माओवादीद्ध। लिबरेशन का राजनीतिक अनुभव मुख्य तौर पर मैदानी किसानों ;मध्य बिहारद्ध को गोलबंद करने पर आधारित है। इसलिए सामंतवाद और सरकार की मिली-जुली ताकत के खिलापफ उनकी हथियारबंद बगावत रेडिकल डेमोक्रेसी की तहरीक में बदल कर चुनाव में भागीदारी के मुकाम पर पहुँच गई है। लिबरेशन को लगता है कि भारतीय राज्य बहुत मजबूत है और जनता की क्रांतिकारी चेतना का स्तर अभी लोकतांत्रिाक संद्घर्षों के जरिए और बढ़ाना होगा। माओवादी पार्टी के प्रमुख द्घटक पीपुल्सवार का तजुर्बा मुख्य तौर पर जंगलों-पहाड़ों में बसने वाले आदिवासियों के बीच क्रांतिकारी राजनीति ले जाने का रहा है। वह इस निष्कर्ष पर पहुँचा है कि हथियारबंद कार्रवाई एकमात्रा रास्ता होना चाहिए। पीपुल्सवार को लगता है कि आदिवासी जनता को सरकार के खिलापफ एक स्थायी और अंतिम किस्म के यु( में उतारा जा सकता है और पहाड़ों-जंगलों में राज्य की मशीनरी की पहुँच कम८ाोर है इसलिए वहाँ किसी किस्म के जनवादी आंदोलनों की जरूरत नहीं है।

नक्सलवादी आंदोलन में 'किसान', 'आदिवासी' और 'क्रांति' की श्रेणियों का जबरदस्त द्घालमेल शुरू से ही रहा है। आंदोलन के संस्थापक नेता चारु मजूमदार हमेशा आदिवासियों को 'किसान' के रूप में चित्रिात करते थे। उन्होंने अपनी रचनाओं में जिन किसानों का वर्णन किया है, वे दरअसल आदिवासी ही हैं। क्रांति और बुनियादी जनता की गोलबंदी के संदर्भ में पहाड़ और जंगल के जिस नजारे का वे वर्णन करते हैं, उसके बीच में एक शब्द बड़े समस्याहीन ढंग से टँका रहता है : 'किसान'। श्रीकाकुलम में उनके साथ बैठक में शामिल होने वाले भी 'किसान' हैं और उनकी मुक्ति परियोजना भी 'किसानों' के लिए ही है। चारुबाबू उत्तर बंगाल के जिस इलाके के नेता थे, उसमें भी 'किसान' ही रहते थे। नक्सलबाड़ी में जिन लोगों ने विद्रोह किया था, वे भी 'किसान' ही थे। बुनियादी जनता के अंग के रूप में क्रांति का यह कच्चा माल क्या वास्तव में 'किसान' की वर्गीय श्रेणी में उस तरह से पिफट था जिस तरह से चारुबाबू और उनके सि(ांतकारों ने उसे मान लिया था? हकीकत में ये सब लोग मुंडा, ओराँव, संथाल, जातापू और सवारा आदि आदिवासी जनजातियों के सदस्य थे। भूमि के मालिकाने, आजीविका के लिए जंगल पर निर्भरता, खान-पान, जीवन-शैली, सांस्कृतिक विरासत, धार्मिक-जातिगत संरचना, हथियारों के इस्तेमाल, आखेट-यु( परंपरा और उपनिवेशकालीन इतिहास के लिहाज से चारुबाबू के किसानों और कृषि प्रधान अर्थव्यवस्था में हजारों साल से जीवन गुजार रहे भारतीय किसानों के बहुलांश के बीच बहुत बड़ा पफर्क था। इसके बावजूद न सिपर्फ चारुबाबू, बल्कि भारतीय मार्क्सवाद के प्रमुखतम बु(जिीवियों ने भी बीसवीं सदी का ज्यादातर हिस्सा इसी मान्यता के साथ गुजारा है कि जंगलों-पहाड़ों के आदिवासियों और मैदानी इलाकों के किसानों के बीच कोई पफर्क नहीं है। उनका आग्रह रहा है कि दोनों पर समाज परिवर्तन, आधुनिकीकरण, राजनीतिकरण और क्रांति की एक ही थ्यॉरी लागू होगी।

इस वैचारिक समरूपीकरण का सर्वाधिक 'कुशाग्र' उदाहरण सबाल्टर्न इतिहासकारों के गुरु प्रोपफेसर रंजीत गुहा की विख्यात रचना 'पीजेंट इंसरजेंसी इन कॉलोनियल नॉर्थ इंडिया' ;औपनिवेशिक उत्तरी भारत में किसानों का नवजागरणद्ध में मिलता है। इस 'महान' किताब में बिरसा मुंडा, सीदू-कानू वगैरह के ब्रिटिश राज विरोधी यु(ों का अध्ययन मिलता है। चारुबाबू की ही तरह रंजीत गुहा की मार्क्सवादी विद्वत्ता में भी ये सब किसान या पीजेंट हैं। वे उनकी हथियारबंद बगावतों के भीतर क्रांति और उसकी राजनीति की नैसर्गिक चेतना की शिनाख्त की बौ(कि परियोजना चलाते हुए दिखते हैं। इस तरह चारुबाबू अपने एक्शन के जरिए और सबाल्टर्न इतिहासकार गुहा अपने इतिहास के जरिए एक ही काम करते हुए न८ार आते हैं कि 'क्रांतिकारी एजेंसी' केवल औद्योगिक सर्वहारा में ही नहीं, बल्कि 'किसान' में भी होती है। नक्सलवादी नेता और संगठक पूरे कौशल से आदिवासियों की यु( परंपराओं और अंग्रेजों के खिलापफ लड़ते हुए शहीद हो जाने वाले वीरों की छवि को लेनिन, स्तालिन और माओ के बिम्ब से जोड़ते रहे। इस पहलू का नक्सलवाद की गोलबंदी में जम कर पफायदा उठाया गया, पर वर्गीय सि(ांत के लिहाज से आदिवासी 'किसान' ही बने रहे। इसकी वजह एक ही हो सकती थी। मार्क्सवाद के पास आदिवासियों के लिए कोई विश्लेषणात्मक श्रेणी थी ही नहीं। उसके लिए वे ज्यादा से ज्यादा किसान ही हो सकते थे।

जब तक किसान और आदिवासी श्रेणियों के बीच यह द्घालमेल चलता रहा, आंदोलन कई संगठनों में बंटा होने के बावजूद क्रांति के एक ही महा-प्रवाह की अभिव्यक्ति देता था। लेकिन, समय के साथ जैसे ही उसमें श्रेणीगत विभाजन हुआ, वह महा-प्रवाह दो प्रवाहों में बंट गया। लिबरेशन ने अस्सी के दशक में इंडियन पीपुल्स ंट बनाया जिसमें जनता की संद्घर्षशील हिस्सों की व्यापकतम एकता पफलीभूत होते हुए दिखी। लेकिन, शुरूआती सपफलताओं के बाद यह प्रयास भूमिगत पार्टी के लिए समस्या बन गया। दरअसल आईपीएपफ जितना विशाल संयुक्त मोर्चा चला पाने के तजुर्बे के अभाव के कारण धीरे-धीरे गैर-पार्टी ताकतें साथ छोड़ गईं। मोर्चे में केवल लिबरेशन के तत्व ही रह गए। इसलिए पार्टी ने उसे भंग कर दिया। उसकी जगह खुद आ गई। इतने बड़े परिवर्तन करते हुए यह पार्टी कभी टूटी-बिखरी नहीं। यह कमाल उसके संस्थापक नेता विनोद मिश्रा और उनके साथियों का था। अपनी एकता बचा लेने और बाकायदा एक व्यवस्थित कम्युनिस्ट पार्टी के रूप में विकसित होने के बाद अब यह संगठन मानता है कि उसकी चुनौती खुद को भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन की मुख्य धारा के रूप में प्रतिष्ठित करने की है। दिवंगत विनोद मिश्रा मानते थे कि बिहार में रेडिकल किसान आंदोलन खड़ा करने से पार्टी का यह लक्ष्य पूरा नहीं होगा। उसे बंगाल में अपने कदम जमाने होंगे और माकपा को उसके गढ़ में परास्त करना होगा। नंदी ग्राम की द्घटनाओं के बाद लिबरेशन को लगने लगा है कि शायद अब उसका यह सपना पूरा होने का समय आ गया है।

माओवादी पार्टी को व्यापक जनता के साथ संयुक्त मोर्चा बनाने में कोई दिलचस्पी नहीं है। चुनाव में हिस्सा लेने की बात तो छोड़ ही दीजिए, चूँकि वे खुली राजनीति बिल्कुल नहीं करते। इसलिए मजदूर वर्ग में, छात्राों के बीच और मध्यवर्ग के रेडिकल हिस्सों के मध्य उनका प्रभाव बढ़ने की कोई संभावना नहीं है। राष्ट्रीय प्रकृति के पूँजीपति वर्ग के साथ उनका कोई हेल-मेल संभव ही नहीं लगता। माओवादियों की दलितों के बीच भी कोई विशेष साख नहीं है। वैसे भी दलित समुदाय आरक्षण का लाभ उठा कर और संसदीय राजनीति में भागीदारी के जरिए सारे देश में तेजी से मध्यवर्गीकरण की प्रक्रिया की तरपफ जा रहे हैं। माओवादियों को तो दलितों के साथ सिर खपाने की पफुर्सत ही नहीं है। वे तो आदिवासियों में ही व्यस्त हैं और मानते हैं कि भारत की मात्रा नौ पफीसदी आबादी के बीच प्रभाव बढ़ाकर क्रांति निकाल ले जाएँगे। माओवादियों में भारतीय राज्य की ताकत को कम करके आँकने का रुझान भी मौजूद है। वे आंध्र प्रदेश में अपनी ताकतों के हश्र से भी सबक सीखने के लिए तैयार नहीं है। आंध्र कभी पीपुल्स वार के क्रांतिकारियों का प्रमुख अड्डा हुआ करता था। आज वहाँ पुलिस और अर्धसैनिक बलों ने सतत प्रयास चला कर माओवादियों को वहाँ से खदेड़ दिया है। तेलंगाना, वारांगल और अन्य इलाकों में माओवादी रुतबा अब पहले जैसा नहीं रह गया है।

पिछले पाँच साल से माओवादी हिंसा की चमक-दमक ने लिबरेशन के नक्सलवादी परिचय को कापफी ठेस पहुँचाई है। भाकपा ;माओवादीद्ध अब मीडिया ही नहीं, बल्कि सरकार की निगाह में भी नक्सलवाद की पर्याय बन चुकी है। चूँकि नक्सलवाद को हिंसक गतिविधियों के आईने में ही देखा जाता है, इसलिए नक्सली क्रांति के प्रतीक के तौर पर माओवादी लिबरेशन से आगे निकल गए हैं। लेकिन, इस पफर्क के बावजूद इस हकीकत से इनकार नहीं किया जा सकता कि ये दोनों ताकतें या तो अलग-अलग तरह की जड़ता की शिकार हो गई हैं या होने जा रही हैं। भूमंडलीकरण के नेतृत्व में दिन-प्रतिदिन बलवती होती जा रही वित्तीय पूँजी की ताकतों और भारतीय राज्य के गठजोड़ को चुनौती देना न तो बरसों से मध्य बिहार के हाशियों में सिमटे लिबरेशन के बस की बात है, और न ही मध्य भारत की आदिवासी पट्टी से बाहर पफैल पाने में असमर्थ माओवादियों के। लिबरेशन ज्यादा से ज्यादा कुछ अधिक लाल रंग की मार्क्सवादी पार्टी बन कर रह गया है। माओवादी तेजी से एक गैर-गंभीर और सिपर्फ सनसनीखेज धमाके करने वाले जमावड़े में पतित होने की तरपफ बढ़ रहे हैं। दोनों में किसी के पास क्रांति और समाज परिवर्तन का कोई एजेंडा नहीं है।
अअअ

;लेखक विकासशील समाज अध्ययन पीठ ;सीएसडीएसद्ध के भारतीय भाषा कार्यक्रम में संपादक।द्ध
७ सनब्रिज अपार्टमेंट, सेक्टर-५ वैशाली, गाजियाबाद
मो. ०९८१००१३२१३

 
 
 
 
ऊपर जाये...
पिछे जाये...
 
 
  Copyright 2009 | All right reserved Powered by : Innovative Web Ideas
(A division of Innovative Infonet Private Limited)