जनवरी २०१०
 
 
 
   
 
 
 
•अमरकांत को इलाहाबाद में ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित• जितेन्द्र श्रीवास्तव को देवीशंकर अवस्थी सम्मान•दिल्ली में विश्व (पुस्तक मेला ;राजकमल प्रकाशन के स्थापना दिवस पर तीन लखटिया पुरस्कारों की द्घोषणामहुआ माजी के उपन्यास 'मरंग गोड़ नीलकंठ हुआ' को तीसरा राजकमल कृति सम्मानविश्वनाथ त्रिापाठी की पुस्तक 'व्योमकेश दरवेश' को पहला सृजनात्मक गद्य सम्मान अमरेन्दु किशोर की कृति 'बादलों के रंग हवाओं के संग' को चौथा कृति सम्मानस्तंभ लेखक भारत भारद्वाज के खिलापफ वारंटद्ध)
 
 
 
कहानियां
पतन : अखिलेश श्रीवास्तव चमन
ऐसा भी होता है कभी-कभी जब आदमी स्वयं अपनी ही नजरों में गिर जाता है। सचमुच बहुत भयावह स्थिति होती है वह। उठते-बैठते, खाते-पीते, जागते-सोते हर वक्त अन्दर ही अन्दर कुछ सुलगता रहता है, निरंतर कोई बात कांटे की तरह अन्तस में चुभती रहती है जो पल भर के लिए भी चैन नहीं लेने देती। दूसरों से तो आदमी छिपाव भी कर ले, बहाना भी बना ले और जरूरत पड़ने पर झूठी-सच्ची सपफाई भी दे दे, लेकिन स्वयं अपने आप से क्या करे कोई?

अपनी आत्मा तो राई-रत्ती सच्चाई जानती है, अपनी हर कमजोरी से वाकिपफ है और अपनी हर सही गलत करतूत की चश्मदीद गवाह भी है। पिफर उससे बचकर कहाँ जाए कोई? जब अपनी ही आत्मा कटद्घरे में खड़ा कर के जवाब माँगने लगे तो उससे क्या बहाना करे कोई? ऐसे में तो अंदर ही अंदर कुढ़ने, छटपटाने और शरबिंधे पक्षी की भाँति पफड़पफड़ाने के सिवा और कोई चारा भी नहीं रह जाता।
कुछ ऐसा ही हादसा हुआ है मेरे साथ कि मेरी अंतरात्मा ने मेरा चैन से जीना दूभर कर रखा है। मेरे अंदर मवाद से भरा कोई द्घाव पक कर बजबजा रहा है, और पफूट कर बह जाने के लिए मचल रहा है। लगातार पिछली कई रातों से मैं सो नहीं सका हूँ। मेरी अंतरात्मा बार-बार मुझे धिक्कारती और सचेत करती रही है-''हरीश! तुम कोई अबोध बालक नहीं हो जो जिम्मेदारी से बरी हो सको। दूसरों की स्वार्थ सि(ि के खेल का मोहरा बनकर तुम बहुत बड़ा अक्षम्य अपराध करने जा रहे हो। अभी भी समय है। यदि चेत जाओ तो ठीक है वरना मैं, तुम्हारी आत्मा तुम्हें कभी नहीं मापफ कर सकेगी, कभी भी नहीं, पूरी जिन्दगी नहीं।''
कल सारी रात मैं बिस्तर में पड़ा करवटें बदलता रहा। केशव की निरीह सूरत लगातार मेरी आँखों के सामने नाचती रही। एक गरीब पनवाड़ी का बेटा केशव चौरसिया जिसकी साधन विहीनता का मैं नाजायज पफायदा उठाने जा रहा हूँ। मेरी मौन स्वीकृति जिसका हक छीनने जा रही है। मेरा भविष्य संवारने के लिए जिसके भविष्य को मिट्टी के द्घरौंदे की तरह रौंदा जा रहा है। सारी रात मेरे मन-मिस्तष्क में अनगिनत प्रश्नों का एक बवंडर सा द्घुमड़ता रहा है, और ये सारे अनुत्तरित प्रश्न एक-एक कर के, बारी-बारी मेरी चेतना के अंग, प्रत्यंग पर जहरीले बिच्छुओं की तरह डंक मारते रहे हैं। क्या मैं चुप रह कर इस द्घृणित कार्य में अप्रत्यक्ष रूप से अपने पिताजी का सहयोग नहीं कर रहा हूँ? क्या इस द्घिनौने कृत्य के लिए केशव की आत्मा मुझे मापफ कर सकेगी? क्या असहाय केशव और उसके गरीब माँ-बाप की बद्दुआयें लेकर मैं चैन से जी सकूँगा? यदि कहीं ईश्वर का अस्तित्व है तो क्या वह सर्वज्ञ और सर्वशक्तिमान ईश्वर इस द्घृणित अपराध के लिए मुझे दण्डित किए बगैर छोड़ देगा? यदि नहीं तो क्या अब भी मुझको चुप ही रहना चाहिए या विद्रोह कर देना चाहिए? विद्रोह? अपने बाप के विरु(? विद्रोह उस व्यक्ति से जिससे आज तक मैं न८ारें मिलाकर बातें करने का भी साहस नहीं जुटा पाया? विद्रोह उस व्यक्ति से जो अपने उद्देश्यों की पूर्ति के लिए पलक झपकते गिरगिट सा रंग बदल सकता है, साम, दाम, दण्ड, भेद हर हथकण्डा अपना सकता है और नीचता के किसी भी स्तर तक गिर सकता है। उफ्रपफ! यूं लगता है कि दिमाग की सारी नसें पफट जाएँगी या कि पागल हो जाऊँगा मैं। सच, बहुत बड़ी दुविधा में पफंस गया हूँ मैं। कोई राह नहीं सूझ रही है मुझे। सांप-छछून्दर की स्थिति हो गयी है मेरी। न तो निगलते बन रहा है और न ही उगलते।
उलझन, उधेड़बुन, कुढ़न और दुश्चिन्ताओं में डूबते उतराते ही सारी रात बीत गयी। यह लगातार चौथी रात थी जो मैंने बगैर सोए गुजार दी थी। सुबह से ही सिर भारी था और मन परेशान। नीचे से मम्मी कम से कम तीन या चार बार नाश्ता करने के लिए आवाज दे चुकीं लेकिन मैं नीचे नहीं गया और सिर से पाँव तक चादर ताने अपने कमरे में बिस्तर पर चुपचाप पड़ा रहा। थोड़ी देर बाद चाय की प्याली और नाश्ते की प्लेट लिए मम्मी स्वयं मेरे कमरे में आ गयीं।
''क्या बात है हरीश? यह सुबह-सुबह मुँह क्यों लटकाए हुए हो? और इतने दिन चढ़े तक अभी बिस्तर में क्यों लेटे पड़े हो? ऐं...? पिछले तीन-चार दिनों से मैं तुम्हें ऐसे ही गुमसुम और उदास देख रही हूँ। आखिर बात क्या है? कुछ बताते क्यों नहीं?'' मेज पर नाश्ता रखने के बाद मम्मी ने प्रश्नों की झड़ी लगा दी।
बगैर कोई उत्तर दिए मैं पूर्ववत बिस्तर में पड़ा रहा। मुझे खामोश देख मम्मी पिफर बोल पड़ी- ''अजीब लड़का है, न कोई बात न चीत, बेवजह मुँह पफुलाए कोप-भवन में पड़ा है। पूछो तो कुछ बताता भी नहीं। चलो उठो, हाथ मुँह धोकर नाश्ता करो और यदि कोई बात हो तो उसे सापफ-सापफ बताओ। यूं मनहूस की तरह पड़े रहना मुझको बिल्कुल पसंद नहीं।''
मम्मी के बार-बार पूछने पर मैं अपने आपको रोक नहीं सका। मेरे अन्दर कापफी दिनों से इकट्ठा हो रहे आक्रोश का ज्वालामुखी पफूट पड़ा- ''यह क्या तमाशा है मम्मी? पढ़ना मुझको है लेकिन मेरे विषयों का चुनाव दूसरे करेंगे... जिंदगी मेरी है लेकिन उसका दिशा निर्धारण दूसरे करेंगे... जैसे मेरा अपना कोई अस्तित्व ही न हो, जैसे मैं जीता-जागता इंसान न होकर कोई कठपुतली होऊँ। सचमुच मैं तो तंग आ गया हूँ इन सबसे। अपनी इच्छाएँ, अपने स्वार्थ और अपने मनमाने निर्णय मुझ पर आखिर कब तक थोपती रहेंगी आप लोग...?''
मम्मी मेरा इशारा तत्काल समझ गयीं। ''तुम समझते क्यों नहीं हरीश? वे तुम्हारे बाप हैं, कोई दुश्मन नहीं जो तुम्हारा बुरा सोचेंगे। हर माँ-बाप अपनी औलाद की भलाई ही सोचता है। वे जो कुछ भी कर रहे हैं तुम्हारे भले के लिए ही कर रहे हैं पिफर भी न जाने क्यों तू हर समय उनसे चिढ़ा रहता है।'' वह मुझे समझाने लगी।
''जी, मापफ करिए मम्मी। अब मैं दूधपीता बच्चा नहीं रहा... अपना भला-बुरा सोचने लायक हो चुका हूँ। आप लोग आखिर कब तक मुझको बच्चा ही बनाए रखेंगी। पिफर बच्चे की भी ऊँगली बस तभी तक पकड़ी जाती है जब तक कि वह स्वयं चलना न सीख ले। मैं अपने पैरों अपनी मंजिल तक जाना चाहता हूँ ...मुझे किसी बैसाखी की जरूरत नहीं है... आप लोग मुझे अपाहिज न बनाइए प्लीज।''
''हो सकता है अपनी निगाह में तुम बहुत काबिल हो गए होगे लेकिन माँ-बाप का दिल तो नहीं मानता है न। बच्चे चाहे जितने भी बड़े हो जाएँ, माँ-बाप की निगाह में वे बच्चे ही रहते है। यहाँ बैठे-बिठाए तुम्हारी सारी व्यवस्था हो रही है, बगैर हाथ-पैर डुलाए अच्छी-खासी नौकरी मिलने जा रही है, तभी इतनी अक्ल और आदर्श की बातें निकल रही हैं तुम्हारे मुँह से। अगर अपने बूते कुछ करना पड़े तो मालूम पड़ जाए आटे-दाल का भाव। एक से एक धुरंधर और काबिल लड़के दर-बदर की ठोकरें खाते पिफर रहे हैं आज के जमाने में। जरा उनसे जाकर पूछो जिनकी नौकरी की तलाश में चप्पलें द्घिसटते आधी उम्र बीत गयी पिफर भी अभी बेकार ही द्घूम रहे हैं तब समझ में आएगी बात। तुम्हें तो अपने बाप का एहसानमंद होना चाहिए कि वे तुम्हारा भविष्य संवारने के लिए इतने चिंतित हैं, सही-गलत जो कुछ भी कर रहे हैं तुम्हारे भले के लिए कर रहे हैं। लेकिन तुम हो कि उल्टे मुँह पफुलाए उन्हें कोस रहे हो।''
''नहीं मम्मी, किसी दूसरे के मुँह का आहार छीनकर पेट भरने के मुकाबले, भूखे रह जाना मैं अधिक अच्छा समझता हूँ। मुझे पता है कि जो चीज मुझे दी जा रही है उसे पाने का वास्तविक अधिकारी मैं नहीं हूँ। मैं यह भी जानता हूँ कि पिताजी जो भी तीन-तिकड़म कर रहे हैं उसमें उन्हें मेरा भविष्य संवारने की चिंता कम, बल्कि स्वयं अपने भविष्य की चिंता अधिक है। आप पिताजी को सापफ-सापफ बता दीजिए कि मैं उनके शतरंजी खेल का मोहरा बनने के लिए कत्तई तैयार नहीं। जो चीज गलत है वह गलत है और गलत काम में मैं सहयोग नहीं करने वाला।''
मेरी कटु बातें सुन मम्मी झुंझला उठीं और न जाने क्या-क्या बोलती-बकती नीचे लौट गयीं। पिताजी के विषय में मेरी टिप्पणी उनको बुरी लग गयी। हुँह... उनको बुरी लगती है तो लगे, मुझे कोई परवाह नहीं। वो यह क्यों नहीं सोचतीं कि मुझको भी तो कोई चीज बुरी लग सकती है, मेरी भी तो कुछ पसंदगी, नापसंदगी हो सकती है। अब यह भला कहाँ तक संभव है कि मैं उन्हीं लोगों की पसंद को ढोता पिफरूँ।
दरअसल मूल बात यह है कि अपने पिताजी का बरगद सा पफैला व्यक्तित्व मुझे खलने लगा है क्योंकि उसके कारण मेरे स्वयं के स्वतंत्रा अस्तित्व के सम्मुख प्रश्नचि''न सा लग गया है। जैसे कि बरगद के द्घने विस्तार के नीचे किसी दूसरे पौधे का पनप सकना संभव नहीं हो पाता ठीक उसी प्रकार पिताजी के मायावी व्यक्तित्व की काली छाया तले मेरा स्वतंत्रा विकास असंभव सा दिखने लगा है। मेरे पिताजी निरंतर अपने प्रभाव को अधिकाधिक विस्तार देने की चेष्टा में लगे रहते हैं। इसके लिए भले ही उन्हें कोई भी हथकंडा क्यों न अपनाना पड़े, या किसी दूसरे का चाहे कितना भी बड़ा अहित क्यों न करना पड़े। जिस किसी को भी अपनी राह में अवरोध समझते हैं उसकी जडं़े वे बहुत चतुराई से कुतर देते हैं। प्रोपफेसर महाजन और डॉ. यादव के उदाहरण मेरे सामने हैं।
मेरे पिताजी यानी डॉ. आर.सी. पाठक अपने विश्वविद्यालय में अंग्रेजी के विभागाध्यक्ष तथा वाइसचांसलर महोदय के सर्वाधिक विश्वासपात्रा व्यक्ति हैं। दुनिया की नजरों में मेरे पिताजी सज्जन, सहृदय और विद्वान व्यक्ति के रूप में जाने जाते हैं। लोग उनकी दूरदृष्टि, वाक्‌पटुता और व्यवहारकुशलता की प्रशंसा करते नहीं थकते। उनकी कृपादृष्टि पाने के लिए अच्छे-अच्छे लोग उनके आगे-पीछे डोलते रहते हैं। कारण कि लोगों को मेरे पिताजी के चरित्रा का केवल एक वही पक्ष ज्ञात है जो अच्छाइयों और तमाम सपफलताओं का कलेवर ओढ़े हुए है। दुनिया का दस्तूर भी यही है कि सभी चमत्कार को नमस्कार करते हैं सो लोग मेरे पिताजी को सर-आँखों पर लिए रहते हैं। लेकिन मेरे मन में अपने पिताजी के लिए बेहिसाब द्घृणा भरी हुई है। कारण कि मैं उनके चरित्रा का दूसरा यानी काला पक्ष भी जानता हूँ। वह पक्ष जो नख-शिख लोभ, स्वार्थ और बुराइयों के कीचड़ में धंसा हुआ है। वह पक्ष जो उनकी दुर्बलताओं की अनंत गाथायें समेटे हुए है। वह पक्ष जो उनकी अधमताओं से रंगा हुआ है। लोग भले ही मेरे पिताजी की सपफलता और प्रतिष्ठा की वजह उनकी विद्वता को मानते हों लेकिन मुझको पता है कि पिताजी की सपफलता की कुंजी उनकी विद्वता नहीं बल्कि उनका छल, प्रपंच और अवसरवादिता है। यह उनके तिकड़म का ही प्रतिपफल है कि विश्वविद्यालय की हर समिति, हर प्रतिनिधि मंडल में उनका नाम अवश्य होता है।
लोग मुझे नालायक कह सकते हैं। मेरे पिताजी भी मुझे कुपुत्रा द्घोषित कर सकते हैं। क्योंकि अपने पिता के विरु( सार्वजनिक रूप से विषवमन करना नालायकी नहीं तो भला और क्या है? लेकिन जरा कल्पना करे कोई कि मेरे ऊपर उस समय क्या गुजरती होगी जब विश्वविद्यालय में मेरे सहपाठी या पिताजी के विरोधी खेमे के लोग रास्ता चलते रोक कर मुझसे माधुरी चतुर्वेदी का हाल-चाल पूछने लगते हैं। लोग मुझसे बातें करते समय उम्र में मुझसे मात्रा चार या पाँच वर्ष बड़ी माधुरी को मेरी 'नई माँ' कह कर संबोधित करते हैं और मुँह पफेर कर पिफक्‌ से हँस देते हैं। सच मेरे तन-बदन में आग सी लग जाती उस समय, लेकिन मैं जानता हूँ कि मेरी ही गोट कमजोर है इसलिए मुझे खून का द्घूँट पीकर रह जाना पड़ता है।
जी हाँ, विश्वविद्यालय के अंग्रेजी विभाग में गत वर्ष नियुक्त हुयी डॉ. माधुरी चतुर्वेदी मेरे पिताजी की चहेती शिष्या रही है। गोरी, छरहरी, बला की खूबसूरत माधुरी ने जब बी.ए. प्रथम वर्ष में प्रवेश लिया था तभी से मेरे पिताजी की विशेष कृपा-पात्रा बन गयी थी। कभी खूब सवेरे, कभी देर शाम तक और प्रायः गर्मी की सूनी, वीरान दुपहरियों में मेरे पिताजी अंग्रेजी विभाग के अपने कक्ष में अकेले बिठाकर उसे शेली, कीट्स, वर्ड्सवर्थ और शेक्सपियर के साहित्य की बारीकियाँ समझाया करते थे। विश्वविद्यालय में जितनी मुँह उतनी बातें होतीं लेकिन उसकी परवाह न तो मेरे पिताजी को थी न ही माधुरी को। बी.ए. करने के बाद पिताजी की ही प्रेरणा से माधुरी ने एम.ए. अंग्रेजी में एडमिशन लिया और एम.ए. पफाइनल परीक्षा में उसने विश्वविद्यालय में प्रथम स्थान प्राप्त किया। माधुरी ने विश्वविद्यालय में कैसे टॉप किया और उसको टॉप कराने के लिए कितनों का भविष्य खराब किया गया इसकी एक अलग ही कहानी है।
मेरे पिताजी की विशेष स्नेह-पात्रा के रूप में माधुरी चतुर्वेदी की चतुर्दिक पफैल रही कीर्ति से उसके द्घर वाले बेहद परेशान थे। अतः उसके एम.ए. करते ही उन्होंने चट-पट उसकी शादी कर देनी चाही, लेकिन मेरे पिताजी ने ऐसा वशीकरण मंत्रा मार दिया था कि शादी का नाम सुनते ही वह हत्थे से उखड़ गयी। उसने शादी करने से सापफ इंकार कर दिया और अपने द्घर में यह द्घोषणा कर दी कि यदि उसके ऊपर शादी के लिए दबाव डाला गया, या पढ़ाई आगे जारी रखने से उसे रोका गया तो वह अपने गले में दुपट्टा बाँध कर छत के पंखे से लटक जाएगी। उसका रौद्र रूप देख उसके माँ-बाप ने उसके आगे हथियार डाल दिया।
उसने एम.ए. करने के बाद मेरे पिताजी के ही निर्देशन में शोधकार्य प्रारंभ किया। उसकी थीसिस के लिए सामग्री जुटाने हेतु मेरे पिताजी उसे साथ लेकर इलाहाबाद, बनारस, कलकत्ता, दिल्ली, शिमला, भोपाल तथा और भी न जाने कहाँ-कहाँ, किन-किन शहरों में भ्रमण करते रहे। पिताजी और माधुरी को लेकर विश्वविद्यालय परिसर में नित्य नए किस्से जन्म लेते और दपफन होते रहे लेकिन उन दोनों की मोटी चमड़ी पर कोई असर नहीं हुआ। माधुरी के शोध के लिए पिताजी ने अपनी जान लगा दी। इतनी कड़ी मेहनत तो उन्होंने संभवतः अपने शोधकार्य के समय भी न की होगी। इस प्रकार मेरे पिताजी की लगन और जी तोड़ मेहनत के चलते विश्वविद्यालय द्वारा निर्धारित न्यूनतम समय में माधुरी का शोधकार्य पूरा हो गया। पिफर अगले ही दिन से पिताजी अपने विभाग में माधुरी की नियुक्ति के प्रयास में जुट गए और अपने पद, प्रभाव तथा तिकड़म की बदौलत अंततः उन्होंने अपने विभाग में माधुरी की नियुक्ति करा ही ली।
अपने पिताजी के सभी कुकर्मों और उनकी सारी नीचताओं का चश्मदीद गवाह हूँ मैं। चाहे प्रोपफेसर महाजन को बदनाम करने का कुचक्र रहा हो या डॉ. यादव को विश्वविद्यालय छोड़कर अन्यत्रा जाने के लिए विवश करने का षड्यंत्रा, सबके सूत्राधार मेरे पिताजी ही थे। एक साधारण प्राध्यापक से विभागाध्यक्ष बनने, पिफर जातिवाद और क्षेत्रावाद के आधार पर जोड़-तोड़ कर के विश्वविद्यालय शिक्षक संद्घ के मंत्राी बनने के लिए पिताजी ने कौन-कौन से हथकंडे अपनाए हैं, कैसी-कैसी द्घृणित चालें चली हैं, मुझसे कुछ भी नहीं छुपा है।
नीचे पिताजी के कमरे में हँसी-ठहाके गूंज रहे हैं। शायद उनके दोनों चमचे तिवारी और शुक्ला आ गए हैं। संभवतः पिफर किसी के विरु( कोई षड्यंत्रा रचा जा रहा होगा ठीक वैसे ही जैसे प्रोपफेसर महाजन और डॉ. यादव के विरु( रचा गया था।
प्रोपफेसर महाजन अंग्रेजी के विभागाध्यक्ष थे। वे निहायत सीधे, सज्जन और ईमानदार व्यक्ति थे। अपनी सरलता और सज्जनता के कारण ही वे बहुत आसानी से मेरे पिताजी की कूटनीति के शिकार हो गए। मेरे पिताजी ने पहले वपफादारी दिखाकर प्रोपफेसर महाजन का विश्वास अर्जित किया और शनैः शनैः उनके इतने विश्वासपात्रा बन गए कि प्रोपफेसर महाजन उन पर आँख मूंद कर भरोसा करने लगे। कुछ दिनों बाद स्थिति यह हो गयी कि अंग्रेजी विभाग का सारा काम-काज मेरे पिताजी ही निपटाने लगे। प्रोपफेसर महाजन बस हस्ताक्षर भर बना देते थे।
एम.ए. प्रथम वर्ष में एडमिशन चल रहे थे। प्रोपफेसर महाजन ने सब कुछ मेरे पिताजी के भरोसे छोड़ रखा था। मेरे पिताजी ने प्रोपफेसर महाजन को धोखे में रख कर कापफी कम मेरिट वाले छात्राों का एडमिशन करा दिया जबकि अधिक मेरिट वाले छात्रा एडमिशन पाने से वंचित रह गए। बाद में स्वयं ही छात्रा नेताओं को इस गड़बड़ी की सूचना देकर पिताजी ने अपना पल्ला झाड़ लिया। पेशेवर छात्रा नेता तो चर्चा में बने रहने के लिए ऐसे मौकों की तलाश में रहते ही हैं। अतः उन लोगों ने इस मामले को खूब उछाला। चूंकि समस्त कार्रवाई प्रोपफेसर महाजन के हस्ताक्षर से हुयी थी अतः प्रथम दृष्टया वे ही दोषी भी थे। पिफर तो एक तरपफ छात्रा नेताओं के धरना-प्रदर्शन और दूसरी तरपफ विश्वविद्यालय प्रशासन की मार के बीच पफंसे बेचारे प्रोपफेसर महाजन की इतनी दुर्गति हुयी, इतनी पफजीहत और छीछालेदर हुयी कि वे बीमार पड़ गए। कापफी समय तक चिकित्सा अवकाश पर रहने के बाद अपने रिटायरमेंट से लगभग डेढ़ वर्ष पूर्व ही उन्होंने स्वैच्छिक सेवा निवृत्ति ले ली।
प्रोपफेसर महाजन के बाद मेरे पिताजी की कूटनीति के शिकार हुए डॉ. के.पी. यादव। अब डॉ. यादव ही अंग्रेजी विभाग में सबसे वरिष्ठ थे और उन्हीं के विभागाध्यक्ष बनने की पूरी संभावना भी थी। अतः मेरे पिताजी ने तुरंत डॉ. यादव के खिलापफ मोर्चा खोल दिया। अध्यापकों से लेकर छात्रा नेताओं तक में पिताजी ने अपना एक अलग गुट पहले से ही बना रखा था। उन्होंने अपने उस गुट के लोगों को चुपचाप डॉ. यादव के विरु( सक्रिय कर दिया। विश्वविद्यालय परिसर में एकाएक बहुत तेज अपफवाह पफैली कि डॉ. यादव का डी.पिफल. का शोध-प्रबंध चोरी का है। कि डॉ. यादव ने किसी दूसरे के शोध प्रबंध में मामूली पफेर-बदल करके उसे अपने नाम से जमाकर दिया था और डॉक्टरेट की डिग्री हासिल कर ली थी। छात्रा नेताओं का एक गुट उप-कुलपति पर लगातार इस बात के लिए दबाव डालने लगा कि इस प्रकरण की न्यायिक जांच कराई जाय और डॉ. यादव के विरु( कार्रवाई की जाय।
इस खुरापफात के पीछे किस व्यक्ति का दिमाग काम कर रहा था इस बात को डॉ. यादव अच्छी तरह से समझ रहे थे। प्रोपफेसर महाजन का ताजा उदाहरण उनके सामने था ही। अतः उन्होंने बहुत ही समझदारी से काम लिया और अवसर मिलते ही यह विश्वविद्यालय छोड़कर पंजाब विश्वविद्यालय चले गए। कहना न होगा कि डॉ. यादव के जाते ही उनके विरु( चल रहा षड्यंत्रा खुद ब खुद थम गया। अब मेरे पिताजी का मार्ग पूरी तरह निष्कंटक था। सुबह-शाम वाइसचांसलर के द्घर का चक्कर लगाकर वे येन-केन-प्रकारेण अंग्रेजी के विभागाध्यक्ष बन ही गए। जिस दिन मेरे पिताजी विभागाध्यक्ष बने वह दिन अंग्रेजी विभाग के इतिहास में सर्वाधिक काला दिन था, कारण कि उस दिन के बाद से अंग्रेजी विभाग में पढ़ने-पढ़ाने की संस्कृति का अंत हो गया।
प्रारंभ में मैं विज्ञान का विद्यार्थी था और बड़े होकर डॉक्टर बनने का सपना संजो रखा था। लेकिन मेरे पिताजी को यह बात स्वीकार न हुयी क्योंकि तब मैं उनकी महात्वाकांक्षा पूर्ति के खेल में सहायक नहीं हो सकता था। मेरे पिताजी की तमन्ना है कि वे इस विश्वविद्यालय के वाइसचान्सलर बनें और यदि वाइसचान्सलर न भी बन सकें तो इतने अधिक सशक्त हो जायें कि छद्म वाइसचान्सलर के रूप में विश्वविद्यालय के प्रत्येक मामले में मनचाहा हस्तक्षेप कर सकें। इसके लिए आवश्यक है कि विश्वविद्यालय के हर विभाग में अधिकाधिक प्राध्यापक उनके अपने गुट के हों जिनके माध्यम से वे सदैव वाइसचान्सलर पर दबाव बनाए रख सकें। अपने इस लक्ष्य की प्राप्ति हेतु उन्होंने बहुत सतर्कतापूर्वक गोटें बिछानी प्रारंभ कर दी थीं। उन्होंने मुझे भी अपने इस शतरंजी खेल की एक गोट के रूप में इस्तेमाल किया और इण्टरमीडिएट की परीक्षा उत्तीर्ण करते ही मुझसे विज्ञान के विषय छुड़ाकर मेरा एडमिशन बी.ए. में करा दिया। 'न्यूटन के सि(ांत', 'सल्फ्रयूरिक एसिड' की क्रियायें और 'पाचनतंत्रा' की आंतरिक संरचना पढ़ने वाला मैं बगैर कोई प्रतिरोध किए 'कादम्बरी' तथा 'अभिज्ञानशाकुन्तलम्‌' के श्लोक कंठस्थ करने लगा। इण्टरमीडिएट तक सदैव द्वितीय श्रेणी में उत्तीर्ण होने वाला एक औसत दर्जे का विद्यार्थी मैंने एकाएक बी.ए. में पूरे विश्वविद्यालय में प्रथम स्थान प्राप्त कर लिया। यह चमत्कार कैसे संभव हुआ इसे मैं स्वयं भी नहीं समझ सका।
बी.ए. के बाद मेरा एडमिशन एम.ए. ;प्राचीन इतिहासद्ध में कराया गया। बी.ए. की ही भांति एम.ए. प्रथम वर्ष की परीक्षा में भी मुझे पूरे विश्वविद्यालय में प्रथम स्थान प्राप्त हुआ। सच कहें तो मेरा प्रथम स्थन प्राप्त करना पूर्व निर्धारित था क्योंकि परीक्षा से लगभग एक माह पहले ही 'इम्पार्टेन्ट क्यूश्चन्स' के रूप में सारा का सारा प्रश्न-पत्रा मुझको बता दिया गया था। पिफर उत्तर पुस्तिकाओं का मूल्यांकन निष्पक्ष रूप से हुआ होगा इस बात की संभावना भी कम ही है।
दरअसल यह सारी तैयारी विश्वविद्यालय में मेरी नियुक्ति के लिए हो रही है। विश्वविद्यालय के नियमानुसार यदि किसी विभाग में स्थान रिक्त हो तो उस विषय में टॉप करने वाले छात्रा को वहाँ अस्थायी नियुक्ति मिल जाती है। और जिसे एक बार नियुक्ति मिल गयी वह कालांतर में येन-केन-प्रकारेण स्थायी हो ही जाता है। अगले वर्ष प्राचीन इतिहास विभाग में डॉ. सिन्हा रिटायर हो रहे हैं। उनकी ही जगह लेने के लिए मुझको खींच-तान कर तैयार किया जा रहा है। इतिहास के विभागाध्यक्ष डॉ. तिवारी और मेरे पिताजी के बीच यह सौदेबाजी हुयी है कि इस वर्ष प्राचीन इतिहास में डॉ. तिवारी मुझे टॉप करा देंगे और उसके बदले में अगले वर्ष मेरे पिताजी अंग्रेजी में डॉ. तिवारी के भान्जे अरविन्द मिश्रा को टॉप करा देंगे। इस प्रकार हम दोनों की विश्वविद्यालय में नियुक्ति का मार्ग भी प्रशस्त हो जाएगा और मेरे पिताजी या डॉक्टर तिवारी के ऊपर कोई अंगुली भी न उठा सकेगा।
मैं एम.ए. पफाइनल ईयर का छात्रा हूँ और इस समय उम्र के इक्कीसवें वर्ष में हूँ लेकिन मेरे पिताजी ने कभी भी मुझे एक जीता-जागता इंसान नहीं समझा। मैं उनके हाथों की कठपुतली बनकर रह गया हूँ। अभी तक एक आदर्श आज्ञाकारी पुत्रा के रूप में मैं अपने पिताजी की इच्छाओं के अनुसार नाचता रहा हूँ लेकिन अब मेरा धैर्य जवाब दे चुका है। एक सप्ताह पूर्व जब से मेरा मन अशांत है। मैं भली-भांति जानता हूँ कि जिस स्थान पर मुझको जबरन बिठाया जा रहा है उसका वास्तविक अधिकारी केशव चौरसिया है। मेरी कक्षा का सर्वाधिक मेधावी छात्रा, एक साधारण पनवाड़ी का बेटा केशव चौरसिया। लगातार पिछली कई रातों से मैं सो नहीं सका हूँ। मेरी आत्मा मुझे धिक्कारती रही है। केशव का हताश, निराश चेहरा मेरी आँखों के सामने नाचता रहा है।

''हरीश! ऐ हरीश...।'' नीचे से पिताजी अपने कमरे से आवाज दे रहे हैं। शायद मम्मी ने उनसे वह सारी बातें बता दी हैं जो अभी थोड़ी देर पहले मैंने कही थीं। चाहे जो भी हो आज मैं नहीं डरूँगा। आज पिताजी को अपना पफैसला सापफ-सापफ सुना दूँगा। मन ही मन विद्रोह का पक्का इरादा बनाकर मैं पिताजी के कमरे में आ गया। पिताजी के सामने वाले सोपफे पर डॉ. तिवारी बैठे थे। कमरे में मेरे द्घुसते ही पिताजी बरस पड़े- ''क्या बात है हरीश? खाना-पीना क्यों छोड़ रखा है? यह क्या नाटक पफैला रखा है तुमने द्घर में...?''
मैंने पिताजी के प्रश्नों का कोई उत्तर नहीं दिया, और सर झुकाए एक तरपफ चुपचाप खड़ा हो गया। मुझे खामोश देख पिताजी ने तुरंत दूसरा प्रश्न दागा- ''तिवारी जी ने जो इम्पार्टेन्ट क्यूश्चन्स दिए थे उन्हें तैयार कर लिया तुमने?''
''जी नहीं।''
''क्यों? तुम्हें पता नहीं कि उन्हीं प्रश्नों के बीच से पेपर सेट हुआ है। ठीक से तैयार कर लो उन प्रश्नों को। यदि कहीं कोई दिक्कत आए तो तिवारी जी से समझ लो।''
''मुझे इन प्रश्नों की कोई आवश्यकता नहीं है। मुझे टॉप नहीं करना है आपके विश्वविद्यालय में। यह हक चौरसिया का है और उसे ही मिलना भी चाहिए। मैं उस असहाय का हक नहीं छीनना चाहता...।'' यह कहते हुए मैंने डॉ. तिवारी द्वारा दिया गया तह किया कागज अपनी जेब से निकाला और पिताजी के सामने पफेंक दिया। आश्चर्य से मुँह बाए डॉ. तिवारी मेरी तरपफ देखते रह गए क्योंकि उन्हें स्वप्न में भी मुझसे ऐसे आचरण की उम्मीद नहीं थी। गुस्से में तिलमिलाए पिताजी एकदम से चीख पड़े- ''हरीश! यह क्या बदतमीजी है...?''
''चिल्लाइए मत पिताजी ...बहुत हो चुका। मेरे अंदर का द्घाव अब पक चुका है... मेरी भी बहुत इच्छा थी कि आपका सम्मान करूँ... एक लायक बेटे की भांति आपकी बातों का आदर करूँ... लेकिन अपने चरित्रा और क्रिया-कलापों के द्वारा आपने जो उदाहरण मेरे सामने प्रस्तुत किए हैं उन्हें देखने और जानने के बाद मुझे खुद को आपकी औलाद कहने में भी शर्म महसूस होने लगी है। बहुत हो चुका... अब और आपके हाथों की कठपुतली बनकर नहीं रह सकता मैं। आपके द्घृणित कार्यों में आपका सहयोगी बनना मुझे कत्तई स्वीकार नहीं... कत्तई नहीं...।'' मुझ जैसे दब्बू, गंभीर और अनुशासित व्यक्ति में न जाने कहाँ से इतना साहस आ गया कि मैं इतना कुछ बोल गया। मेरे अंदर लम्बे समय से एकत्रा आक्रोश लावे की तरह पफूट पड़ा था।
''चटाक्‌!'' पिताजी सहसा सोपफे से उछल पड़े और उनका झन्नाटेदार थप्पड़ मेरे बाएँ गाल पर पड़ा।
''बेशरम... तुम्हारी इतनी हिम्मत? तुम्हारा यह चारित्रिाक पतन...? नालायक... बदतमीज... जुबान लड़ाता है मुझसे...? बाप से बात करने की यही तमीज है...? बहुत ज्यादा दिमाग खराब हो गया है तुम्हारा?'' गुस्से में कांप रहे पिताजी गला पफाड़-पफाड़ कर चीख रहे थे। डॉ. तिवारी को तो जैसे काठ मार गया था। मुझ जैसे सीधे और विनम्र युवक से ऐसे आचरण की उम्मीद उन्हें स्वप्न में भी नहीं थी। पिताजी का चिल्लाना सुनकर मम्मी भी भागी-भागी आ पहुँचीं और दरवाजे के पास खड़ी होकर बात को समझने की कोशिश करने लगीं।
मैंने डॉ. तिवारी की तरपफ एक द्घृणा भरी नजर डाली। मुझसे आँखें मिलते ही वे द्घबड़ा से गए और दूसरी तरपफ देखने लगे। उसी द्घृणा भरी नजर से मैंने पिताजी की तरपफ देखा पिफर अपने मन में द्घोर वितृष्णा, विद्रोह और आँखों में क्रोध के आँसू लिए मैं पिताजी के कमरे से बाहर निकल आया। मेरे मन में पल रहा संकल्प पिताजी का थप्पड़ खाने के बाद और भी अधिक पुख्ता हो चुका था।

 
 
 
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