जनवरी २०१०
 
 
 
   
 
 
 
• मनीषा कुलश्रेष्ठ को 'लमही सम्मान' • निदा फाजली को पद्मश्री सम्मान •देवेंद्र इस्सर नहीं रहे• ओड़िया लेखिका प्रतिभा रॉय को २०११ का ज्ञानपीठ पुरस्कार•चंद्रकांत देवताले को साहित्य अकादमी पुरस्कार • कुणाल सिंह को युवा साहित्य अकादमी सम्मान • तीसरा 'कृष्ण प्रताप कथा सम्मान' (२०१२) गीतांजलिश्री की कृति 'यहां हाथी रहते थे' को • रविशंकर को मरणोपरांत लाइफटाइम अचीवमेंट ग्रैमी पुरस्कार • विनोद कुमार शुक्ल को हिन्दी काव्य साहित्य में रचनात्मक योगदान के लिए 'परिवार' पुरस्कार • वरिष्ठ साहित्यकार कामतानाथ नहीं रहे
 
 
 
संपादकीय
सवालों से 'मुठभेड़'

सरकार कहती है- नक्सलवाद और माओवाद का तेजी से विस्तार हो रहा है। इस विस्तार के पीछे कुछ विदेशी शक्तियों का हाथ है जो इन नक्सलियों और माओवादियों को हथियार और धन उपलब्ध करा रहे हैं। इन माओवादियों के चलते आदिवासियों तक विकास को पहुँचाना या इन वनवासियों को विकास की मुख्यधारा से जोड़ना लगभग असंभव हो चला है। सरकार की भाषा समझ में आती है क्योंकि यह भाषा हमेशा से ऐसी ही रही है। यह सत्ता की भाषा है। सत्ता में बैठने की यह सजा भी है। १९४७ में आजादी के मतवाले सत्ता पा बैठे तो उनकी भाषा बदल कर ऐसी ही हो गयी। बंगाल में वामपंथी सत्ता पाते ही बदल गए। उनकी भाषा नहीं, सब कुछ बर्बर हो गया। लेकिन रोंगटे तब खड़े होने लगते हैं जब बु(जिीवी वर्ग या यूँ कहूँ कि प्रभावशाली बु(विादियों का एक तबका सरकार के सुर से अपना सुर मिलाने लगता है। पिछले कुछ अर्से से और सच तो यह कि लंबे अर्से से ऐसा ही होता आ रहा है। नक्सली हिंसा को लेकर अखबारों से लेकर इलेक्ट्रॉनिक चैनलों तक में प्रायोजित खबरों के जरिए जो कुछ परोसा जा रहा है वह आधा सच है।

केन्द्रीय गृह मंत्राालय की वार्षिक रिपोर्टों का अध्ययन किया जाए तो एक बात सापफ उभरती है कि सरकार भी इसे मात्रा कानून-व्यवस्था की समस्या नहीं मानती और लाल गलियारे के बढ़ते प्रभाव क्षेत्रा को सामाजिक-आर्थिक दृष्टिकोण से समझने की वकालत करती है। यहाँ तक कि देश का रक्षा मंत्राालय तक इसे 'आर्थिक पिछड़ेपन' की देन बताने से गुरेज नहीं करता। जाहिर है सरकार में बैठे नीति निर्धारकों को भी कैटल क्लास ;मवेशी वर्गद्ध का दर्द समझ में आ रहा है। तो पिफर खांटी पत्राकार और तमाम प्रकार के 'विमर्शों' वाले बु(विादी कैसे यह कहने-लिखने की चूक कर देते हैं कि नक्सलवाद के चलते विकास बाधित हो रहा है। विकास नहीं पहुँचा क्योंकि जयप्रकाश और लोहिया के शिष्यों ने समाजवाद का अर्थ बदल डाला, क्योंकि रोटी कपड़ा और मकान के सपने अधूरे ही रह गए और आजाद मुल्क में गुलामों से बदतर जिंदगी जीने की विवशता ने हथियार को ही अंतिम उपाय मान माओवाद को विस्तार दिया।

बहरहाल माओवाद-नक्सलवाद आज जिस रूप में सामने आ रहा है या लाया जा रहा है उस पर चर्चा करना बहुत जरूरी हो गया है। जरूरी इसलिए क्योंकि यह कहीं-न-कहीं कतार के अंत में खड़े आम आदमी की बात करता है। उस अंतिम आदमी की जिससे समाज है, साहित्य है, जीवन है, संद्घर्ष है, प्रेम है, गीत और कविता है। उच्च वर्ग या उच्च मध्यम वर्ग की तो छोड़िए हमारा मध्यम वर्ग और यहाँ तक कि निम्न मध्यम वर्ग भी इस नक्सली-माओवादी हिंसा को कानून व्यवस्था से जुड़ा मसला समझने लगा है। और उसकी इस समझ को विकसित करने में, उसे पुख्ता करने में मीडिया खासकर बड़े मीडिया का पूरा सहयोग मिलना बहुत खतरनाक संकेत है। न केवल हमारे लोकतंत्रा के लिए बल्कि पूरे समाज के लिए। सरकार इस समस्या का हल मुख्य रूप से हथियार में तलाश रही है। सरकारी आंकड़े देश के १७० से अधिक जिलों को माओवादियों की सक्रियता का केन्द्र बताते हैं। ये जिले १३ राज्यों में हैं। और हथियारबंद माओवादियों की संख्या कुल ११ हजार। जाहिर है

इन माओवादी संगठनों को स्थानीय तौर पर जबरदस्त समर्थन मिलता होगा। अन्यथा राजशक्ति के तमाम प्रयासों के बावजूद इनका विस्तार न होता और देश के प्रधानमंत्राी इसे सबसे बड़ा खतरा बताने को विवश न होते। माओवादियों ने अपनी शक्ति का दमदार प्रदर्शन वर्ष २००३ से करना शुरू किया। आन्ध्र प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्राी चन्द्र बाबू नायडू पर प्राण द्घातक हमला इसकी शुरुआत कही जा सकती है। इस हमले के पीछे माकपा ;मालेद्ध और पीपुल्स वार ग्रुप का हाथ था। नायडू उन दिनों अपनी लोकप्रियता के शिखर पर बताए जा रहे थे। मीडिया नायडू की साइबर इमेज के आगे नतमस्तक था और भक्तिभाव से इस इमेज को विकास परक बता नायडू को देश के भावी नेता के तौर पर पेश कर रहा था। मीडिया और नायडू, दोनों ही, बिल गेट्स की इस आशंका को नजरअंदाज कर गए कि 'डिजिटल डिवाइड' के चलते 'हैव' और 'हैव नॉट्स' के बीच की खाई बढ़ रही है।

माओवाद आन्ध्र प्रदेश में इसी डिजिटल डिवाइड के चलते पफला-पफूला। २००४ में माओवादियों के दो शक्तिशाली गुटों के बीच आपसी समझ और अन्ततोगत्वा उनके विलय ने सीपीआई ;माओवादीद्ध को जन्म दिया। बढ़ी शक्ति का नमूना जहानाबाद, बिहार में जेल तोड़ ३४१ माओवादियों के भागने और रणवीर सेना के बीस सदस्यों का अगवा करना रहा। १३ नवंबर २००५ को द्घटी इस ऐतिहासिक द्घटना के बाद से माओवादियों के हौसले बढ़े हैं। ९ पफरवरी २००६ को नेशनल मिनरल डेवलेप्मेंट कारपोरेशन की छत्तीसगढ़ के दंतवाड़ा जिले में स्थित स्टोर से लगभग २० टन गोला बारूद लूटना, सुरक्षा बलों के साथ लगातार यु(रत्‌ रहनाऋ यह साबित करने के लिए कापफी है कि इसे कानून-व्यवस्था की स्थिति मान चुप नहीं बैठा जा सकता। यदि यह केवल कानून व्यवस्था की समस्या होती तो केन्द्रीय सुरक्षा बलों के लगभग तीस हजार जवान, एंटी नक्सल पफोर्स, ग्रेहाऊंड पफोर्स ;आन्ध्र प्रदेशद्ध इंडिया रिजर्व बटालियन आदि जो नक्सल-माओ प्रभावित इलाकों में तैनात किए गए हैं, अब तक इनका सपफाया कर बैरकों में लौट चुके होते।

केन्द्रीय गृह मंत्राालय अपनी वार्षिक रिपोर्ट ;२००८-०९द्ध में यह स्वीकारता है कि 'नक्सलवादी, प्रशासनिक और राजनीतिक संस्थानों की अकर्मण्यता द्वारा सृजित माहौल में काम करते हैं और शोषित वर्ग के मध्य विद्यमान अंधविश्वास और अज्ञान का लाभ उठाते हैं। यहाँ यह गौरतलब है कि सरकार स्वीकार रही है कि जनता शोषित है, उसके साथ अन्याय हो रहा है और प्रशासनिक एवं राजनीतिक दल अकर्मण्य हो चले हैं। गृह मंत्राालय अपनी रिपोर्ट में आगे कहता है कि 'नक्सल समस्या से प्रभावी रूप से निपटने के लिए एक परिपूर्ण पुलिस एवं सुरक्षा उन्मुखी नीति पर्याप्त नहीं है।... विकास एवं सुशासन मुद्दों पर, खासकर न्यूनतम स्तर पर, विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है।' यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि केन्द्र और राज्य सरकारें अपने सुरक्षा बलों का लगातार आधुनिकीकरण करती जा रही हैं। केन्द्र सरकार ने राज्य पुलिस बल आधुनिकीकरण स्कीम के तहत २००२ से २००७ तक नक्सल प्रभावित ९ राज्यों को २१४०.७० करोड़ की विपुल धनराशि उपलब्ध कराई। २००७-०८ में ५३८ करोड़ रुपया और २००८-०९ में सबसे अधिक ५०१.५२ करोड़ रुपये ९ नक्सल प्रभावित राज्यों को आवंटित किए गए। यही नहीं इनस्ट्रक्चर को भी इन क्षेत्राों में प्रभावी बनाने के लिए विशेष उपाय किए जा रहे हैं। यह सब बातें इसलिए कि नक्सलवाद के चलते विकास बाधित नहीं हुआ बल्कि विकास न होने, शोषण के न केवल जारी रहने बल्कि बढ़ने और कारपोरेट द्घरानों की धन पिपासा के चलते आदिवासियों के विस्थापन आदि ने नक्सली सोच के विस्तार के लिए उर्वर भूमि उपलब्ध कराई।

इक्कीसवीं शताब्दी का एक बड़ा सच है आंदोलनों की इस धरती का आंदोलन विहीन होना। साठ और सत्तर के दशकों में जो आग सड़कों पर दिखती थी, जिसके बारे में हमने पढ़ा और अस्सी के दशक में जब हम समझने की स्थिति में पहुँचे, तब भी उस ताप को महसूस किया था। आज ऐसा कहीं कुछ नजर नहीं आता। भू-मण्डलीकरण की आँधी में बह चुका मध्यम वर्ग शायद इसी के चलते माओवाद को मात्रा लॉ एंड आर्डर की समस्या मान लेता है। लेकिन यह भी ध्यान देने योग्य बात है कि ऐसे ही समय में माओवादियों का लगातार विस्तार हो रहा है।
दरअसल सरकार जिस विकास के मॉडल की बात कर रही है वह बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हितों को ध्यान में रखकर तैयार किया जाता है। कारपोरेट सेक्टर छत्तीसगढ़ के जंगलों में यदि खनिज तलाशने का काम करेगा तो जाहिर है उसका लक्ष्य अधिक से अधिक मुनापफा कमाना और उस मुनापफे को राज्य से बाहर ले जाना होता है। सरकारी विकास का मॉडल इसी के चलते मात खा रहा है। माओवादी इसे कारपोरेट लूट करार देते हैं, वह बड़ी-बड़ी परियोजनाओं में स्थानीय लोगों को रोजगार न मिलने के सवाल को उठाते हैं। राष्ट्रीय खनिज विकास निगम की मध्य प्रदेश के दन्तेवाड़ा जिले में चल रही बड़ी परियोजना में क्षेत्राीय लोगों को नहीं लिया गया है। इससे जनता का आक्रोशित होना स्वाभाविक है।
वर्तमान को देखकर यह अनुमान लगाया जा सकता है कि भविष्य कैसा होगा। जो हालात आज हमारे मुल्क के हैं वह एक अच्छे भविष्य की तरपफ इशारा करते नजर नहीं आते। वह इशारा कर रहे हैं एक रक्तरंजित समाज की ओर। ऐसा समाज जहाँ विषमता की खाई हर रोज गहराते-गहराते इतनी गहरी हो जाएगी कि उसे पाटा नहीं जा सकेगा 'हैव' और 'हैव नॉट्स' के बीच की यह दूरी तब पूरे हिन्दुस्तान को लाल गलियारे के गिरफ्रत में कर देगी। इससे बचना है तो हर नागरिक को न केवल चिंतन करना होगा बल्कि एक समता मूलक समाज के निर्माण के लिए सार्थक हस्तक्षेप भी करना होगा। माओवाद को मात्रा कानून-व्यवस्था की समस्या बताने भर से काम नहीं चलने वाला। नक्सलियों और माओवादियों की हिंसा को कतई जायज नहीं ठहराया जा सकता। उनके इस अपराध के लिए देश के कानून के तहत कड़ी से कड़ी कार्रवाई की जानी चाहिए। लेकिन इस सच से आँखें नहीं मूंदनी होंगी कि उनको जन समर्थन हासिल है क्योंकि वह आम जनता के शोषण और लूट के खिलापफ आवाज उठा रहे हैं। उन्हें देशभक्त भले ही नहीं कहा जा सकता लेकिन सामान्य अपराधी और लूटेरे बताकर सच्चाई से मुँह मोड़ना भी तो जायज नहीं।
'पाखी' में इस अंक से 'मुठभेड़' की शुरुआत हो रही है। मुठभेड़ उन प्रश्नों से, मुद्दों से, सरोकारों से जिनका सीधा संबंध हम से है, समाज से है। ऐसे मुद्दे जिनकी छाया साहित्य-संसार में भी परिलक्षित होती है। साहित्य-संसार का ऐसे मुद्दों, प्रश्नों और सरोकारों से सीधा संवाद शायद मार्ग तलाशने की दिशा में छोटा ही सही लेकिन सार्थक हस्तक्षेप कर सके।

 
 
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