इसके मुताल्लिक सोचता हूँ तो कहना ही पड़ता है कि मेरी शिक्षा ने कुछ मामलों में मेरा भारी नुकसान किया है। यह उलाहना बहुत से लोगों की तरपफ मुखातिब है जैसे कि मेरे माता-पिता, बहुत से रिश्तेदार, मेरे द्घर आने वाले अतिथिगण, शिक्षकों का जमद्घट ;इन्हें मुझे अपनी स्मृति में ८ाोर से जकड़कर रखना पड़ता है, अन्यथा ये यहाँ-वहाँ गिर पड़ेंगे-किन्तु चूंकि मैंने इन्हें जकड़कर रख दिया है इसलिए इस जमद्घट की समूची राशि में से थोड़ा-थोड़ा किसी तरह टूट-टूटकर गिरता रहता है।द्ध वह खास रसोइया जो साल भर मुझे स्कूल ले गया, बहुत से रचनाकार, विद्यालय निरीक्षक, मंद-मंद चलते बटोहीगण। संक्षेप में, यह उलाहना इस समाज के बीच छुरी की तरह चक्कर काट रहा है। और कोई भी, मैं दुहराऊँगा... दुर्भाग्यवश कोई भी! आश्वस्त नहीं हो सकता कि छुरी की नोंक अचानक कभी उसके सामने से, कभी पीछे से या कभी बगल से प्रकट नहीं हो जाएगी। मैं इस उलाहने का खंडन नहीं सुनना चाहता, चूंकि पहले ही ८ारूरत से ८यादा प्रतिवादों को सुन चुका हूँ और चूंकि अधिकांश प्रतिवादों ने मुझे गलत साबित किया है अतः मैं इन प्रतिवादों को भी अपने उलाहने के साथ शामिल करता हूँ और द्घोषित करता हूँ कि मेरी शिक्षा ने और इन प्रतिवादों ने कई मामलों में मेरा भारी नुकसान किया है।
मैं इस पर अक्सर सोचता हूँ और हर बार कहने के लिए यही रहता है कि मेरी शिक्षा ने कुछ मामलों में मेरा भारी नुकसान किया है। यह उलाहना बहुत से लोगों की तरपफ निर्दिष्ट है। दरअसल ये लोग साथ-साथ खड़े हैं और, जैसा कि पुराने पारिवारिक पफोटोग्रापफ में भी होता है, नहीं जान पा रहे हैं कि एक दूसरे के प्रति क्या करें, और बस इतना भी नहीं हो पाता कि उनकी आँखें नीची हो जाएँ एवं पहले आप, पहले आप के चलते ये मुस्कराने का साहस भी नहीं बटोर पाते। इन लोगों में शामिल हैं- मेरे माता-पिता, बहुत से संबंधी, बहुत से शिक्षक, वह खास रसोइया, पुराने दिनों में हमारे द्घर आते रहने वाले बहुत से लोग, बहुत से लेखक, तैराकी सिखाने वाले शिक्षक, चंद वे लोग जिनसे मैं राह चलते एक ही बार मिला तथा दूसरे लोग जिन्हें मैं याद नहीं कर सकता और भविष्य में भी याद नहीं कर पाऊँगा। और वे लोग जिनके निर्देशों ने मुझे एक समय येन-केन-प्रकारेण विभ्रांत कर दिया था, किन्तु पिफर जिस पर मैंने ८ारा भी ध्यान नहीं दिया। संक्षेप में, ये लोग इतनी बड़ी संख्या में हैं कि सावधानी बरतनी पड़ती है कि किसी का नाम दुबारा न लिया जाए। और मैं इन सबों की तरपफ अपने उलाहनों को मुखातिब करता हूँ, इस तरह एक का दूसरे से परिचय करा देता हूँ। लेकिन कोई प्रतिवाद बर्दाश्त नहीं कर पाता क्योंकि मैं पहले ही पर्याप्त प्रतिवादों को ईमानदारीपूर्वक सह चुका हूँ एवं चूंकि उनमें से अधिकांश ने मुझे गलत साबित किया है अतः मैं मात्रा यह कर सकता हूँ कि इन प्रतिवादों को भी उलाहनों में शामिल कर लूँ कि मेरी शिक्षा के अतिरिक्त इन प्रतिवादों ने मेरा भारी नुकसान किया है।
शायद आशंका हो कि कहीं मेरी शिक्षा लीक से हटे किसी स्थान पर तो नहीं हुई? नहीं, मेरी शिक्षा शहर के मध्य में हुई, बिलकुल शहर के मध्य में। उदाहरण के लिए खंडहरों में, पहाड़ों पर या झील के किनारे यह नहीं हुई। अब तक मेरा उलाहना मेरे माता-पिता को आच्छादित कर चुका है और वे थक चुके हैंऋ परंतु अब वे इससे आसानी से किनारा कर लेते हैं और मुस्कुराते हैं क्योंकि अपने हाथों को मैं उनकी तरपफ से खींचकर अपने ललाट पर ले आया हूँ और सोचता रहता हूँऋ मुझे थोड़ा खंडहरों में ठहरने वाला होना चाहिए थाऋ कौओं की चिल्लाहट को ध्यान से सुनता, इनकी छायाएँ मेरे ऊपर मंडरातीं, चाँद तले ठंडाता, सूरज से झुलसता जो मेरे लिए आइवी लताओं की सज्जा पर चारों ओर से रौशनी डालताऋ यद्यपि इससे मैं पहले पहल, जंगली पौधों की ताकत के साथ विकसित होते जा रहे अपने अच्छे गुणों के दबाव से थोड़ा कम८ाोर हो जाता।
मैं इस पर अक्सर सोचता हूँ और इनमें बिना कोई दखल दिए अपने खयालात को खुली छूट दे देता हूँ और हर बार, चाहे इन्हें कितना भी द्घुमाऊँ-पिफराऊँ, मैं इसी निष्कर्ष पर पहुँचता हूँ कि मेरी शिक्षा ने कुछ मामलों में मेरा भयानक नुकसान किया है। इस स्वीकृति में बहुत से लोगों के प्रति मेरा उलाहना अंतर्निहित है। इनमें हैं मेरे माता-पिता एवं परिजन, वह खास रसोइया, मेरे शिक्षकगण, बहुत से लेखक ;जिस प्रेम के चलते उन्होंने नुकसान किया वह उनकी अपराध की गुरुता को और बढ़ा देता है, चूंकि इस प्रेम के द्वारा वे मेरी बहुत ही भलाई कर सकते थेद्ध, मेरे साथ मित्राभाव वाले बहुत से परिवार, ग्रीष्मकालीन सैरगाह के निवासी, सिटीपार्क की बहुत-सी महिलाएँ जिन्हें इस उलाहने की उम्मीद नहीं होगी, हज्जाम, भिखारिन, सुकानी, पारिवारिक चिकित्सक और इनके अतिरिक्त भी इनमें बहुत से लोग शामिल हैंऋ यदि मैं चाहूँ और नाम ले पाऊँ तो और भी बहुत से नाम लिए जा सकते हैं। संक्षेप में, इनकी संख्या इतनी अधिक है कि यह ध्यान रखना होगा कि किसी का नाम दुबारा न आ जाए।
यह भी सोचा जा सकता है कि इतनी बड़ी संख्या उलाहने की दृढ़ता को नष्ट कर देगी। बस इससे उलाहने की दृढ़ता नष्ट हो जाएगीऋ क्योंकि उलाहना कोई आर्मी-जनरल नहीं है और नहीं जानता कि अपनी शक्ति को कैसे आवंटित करे। खासकर इस तरह की स्थिति में जबकि यह अतीत के लोगों के साथ जुड़ा हुआ है। स्मरण की ऊर्जा इन व्यक्तियों को स्मृति में कसकर पकड़ के रखे हुई है लेकिन धुएँ में तब्दील हो चुके इनके पाँवों के नीचे जमीन शायद ही बची है। और इस क्रिया को किसी उपयोग के काबिल होने की उम्मीद कैसे की जा सकती है जिसके तहत उन लोगों को ऐसी स्थिति में धकेला जा रहा है जिन्होंने एक बच्चे को शिक्षित करने में गलतियाँ कीं, जो कि उस समय उतना ही नाक़ाबिल ए-इसलाह था ;जिसको सुधारा न जा सकेद्ध जितना कि आज भी हम लोगों के लिए है। बल्कि दरअसल कोई इतना भी नहीं कर सकता कि उन्हें उन दिनों की याद दिला दे। ८ााहिर है, बाध्यता का तो जिक्र भी नहीं किया जा सकता, और यदि आप उन पर दबाव डालेंगे तो वे बिना कुछ बोले किनारे धकेल देंगे, ८ााहिर है ८यादा उम्मीद इसी बात की है कि वे कुछ सुनेंगे ही नहीं। वे वहाँ थके हुए कुत्तों की तरह खड़े हैं क्योंकि उन्होंने अपनी सारी ताकत किसी के स्मृतिपटल पर सीधे खड़े रहने में झोंक दी है।
लेकिन अगर आप उन्हें वास्तव में सुनने और बोलने के लिए बाध्य कर देंगे तो आपके कान में सिपर्फ प्रत्युत्तर के उलाहनों की गूंज होगी क्योंकि लोग मृतकों के प्रति श्र(ा की प्रतिब(ता को मृतकों के साथ पहुँच के पार लेकर चले जाते हैं और दस गुणी ज्यादा ताकत से पकड़े रखते हैं। और अगर यह बात सही नहीं है एवं मृत व्यक्ति भी जीवन के विस्मयलोक में ही स्थित होते हैं, तो वे अपने जीवित अतीत के और भी ज्यादा पक्ष में होंगे-आखिरकार, यह उनका निकटतम है-और ऐसे में भी हमारे कान में गूंज होने लगेगी। और अगर यह राय भी सही नहीं है तथा आखिरकार मृत व्यक्ति बहुत निष्पक्ष होते हैं, तो भी वे सि( न हो सकने वाले उलाहनों से अपने अस्तित्व को अस्त-व्यस्त होने का अनुमोदन भला क्यों करेंगे! क्योंकि इस तरह के उलाहने तो दो व्यक्तियों के मध्य भी कभी सि( नहीं किये जा सकते। शिक्षण में हुई अतीत की भूलों को कभी सि( नहीं किया जा सकता, अतः उनके लिए बुनियादी ८िाम्मेदारी बहुत कम है। और इस स्थिति में मुझे एक ऐसा उलाहना दृष्टि में लाने दें जो मात्रा आह में तब्दील न हो पाए।
यही वह उलाहना है जो मुझे व्यक्त करना है। इसका सारभाग मजबूत है, सि(ांत इसे समर्थित करता है। जो मेरे अंदर वस्तुतः नष्ट हुआ, उसे पिफर भी एक क्षण के लिए भूल जाता हूँ या इसके लिए क्षमा कर देता हूँ और अभी तक इसके लिए कोई भी हो-हल्ला नहीं मचाता। दूसरी तरपफ, किसी भी समय मैं यह साबित कर सकता हूँ कि मेरी शिक्षा मेरे अन्दर उस व्यक्ति से भिन्न व्यक्ति का निर्माण करना चाहती थी जो कि मैं बना। मेरा उलाहना उस नुकसान को लेकर है जो कि मेरे शिक्षक अपने इरादों के द्वारा कर सकते थे। मैं उनके हाथों से उस व्यक्ति की मांग करता हूँ जो कि मैं अभी हूँ, और चूंकि वे मुझे वह व्यक्ति नहीं दे सकते, मैं अपने उलाहनों और अट्टहासों को ढोल-ध्वनि में परिवर्तित कर देता हूँ जो पहुँच से बाहर की दुनिया में ध्वनित होती रहती है। मेरा एक अंश नष्ट कर देने का उलाहना है यह- एक उत्तम, सुंदर अंश को नष्ट कर देने का। ;यह मेरे सपनों में कभी-कभार उसी तरह आता रहता है, जिस तरह दूसरे लोगों के सपनों में मृत दुल्हनें आती हैं।द्ध यह उलाहना जो कि हमेशा आह के रूप में तब्दील हो जाने के बिन्दु पर रहता है, सभी लोगों के समक्ष बिना क्षतिग्रस्त हुए ईमानदार आलोचना के रूप में जाना चाहिए, जो कि यह है ही।
मैं अक्सर इस पर सोचता हूँ और बिना दखल दिए खयालात को खुली छूट दे देता हूँ, लेकिन हमेशा इसी निष्कर्ष पर पहुँचता हूँ कि मेरी शिक्षा ने मेरा उससे ज्यादा नुकसान किया है जितना कि मैं समझ सकता हूँ। बाहर से दिखने में मैं अन्य पुरुषों की तरह ही हूँ, क्योंकि मेरी शारीरिक शिक्षा साधारण के उतनी ही निकट थी जितना कि मेरा शरीर, और यद्यपि मैं कापफी ठिगना और थोड़ा स्थूलकाय हूँ, पिफर भी मैं बहुतों के द्वारा पसंद किया जाता हूँ। लड़कियाँ भी मुझे पसंद करती हैं। इसके मुताल्लिक मुझे कुछ नहीं कहना है। हाल ही में उनमें से एक ने बड़ी बु(मित्तापूर्ण बात कही 'आह! काश! मैं तुम्हें एक बार निर्वसन देख पाती! ऐसे में तुम वस्तुतः सुंदर और चूमने योग्य होते।' लेकिन अगर यहाँ ऊपरी होंठ नहीं होता, यहाँ एक कान नहीं होता, वहाँ एक उंगुली नहीं, यहाँ एक पसली नहीं, सर पर चंद केशविहीन धब्बे होतेऋ तो भी ये सब मेरी आंतरिक अपूर्णता के उचित प्रतिरूप नहीं होते। यह आंतरिक अपूर्णता जन्मना नहीं है इसलिए इसे बर्दाश्त करना और भी कठिन है।
क्योंकि किसी भी आदमी की तरह मेरे अंदर भी जन्म से ही मेरा गुरुत्वकेन्द्र रहा है जिसे सर्वाधिक मूर्खतापूर्ण शिक्षा भी स्थानच्युत नहीं कर सकती थी। यह उत्तम गुरुत्वकेन्द्र अभी भी मेरे पास बचा हुआ है, लेकिन कुछ हद तक उसके तुल्य शरीर नहीं बचा है। और जिस गुरुत्वकेन्द्र के पास करने के लिए कुछ नहीं रहता वह सीसे में तब्दील हो जाता है, और शरीर से बंदूक के छर्रे की तरह चिपक जाता है। पिफर यह अपूर्णता अर्जित भी नहीं है, अपनी गलती न होने के बावजूद मैंने इसकी पीड़ा झेली है। यही कारण है कि मुझे अपने भीतर कहीं भी पश्चाताप नहीं मिल पाता, चाहे मैं इसकी कितनी भी तलाश करूँ। इस स्थिति के मद्देन८ार पश्चाताप मेरे लिए अच्छा ही होताऋ यह स्वयं को सबकुछ का कसूरवार ठहराता है, यह पीड़ा को एक तरपफ ले जाता है और सब कुछ को अकेले ऐसे सुनियोजित कर देता है गोया वह सम्मान का मामला होऋ हम बस सन्न रह जाते हैं, क्योंकि यह हमें मुक्ति प्रदान करता है।
जैसाकि मैंने कहा, मेरी अपूर्णता न तो जन्मजात है और न ही अर्जित, पिफर भी मैं अपनी कल्पना के श्रम और तलाशी गई तरकीबों की मदद से दूसरों की तुलना में इसे बेहतर ढंग से वहन करता हूँ। साथ ही, मेरा चेहरा निराशा से ८ारा भी कालिमायुक्त नहीं हुआ है, बल्कि सपफेद और रक्तिम है।
मैं ऐसा नहीं रहता, यदि मेरी शिक्षा मुझमें उतनी गहरी उतर जाती जितना कि इसने प्रयास किया। शायद इसके लिए मेरी युवावस्था बहुत छोटी रही, इस वजह से अपने जीवन की चौथी दहाई ;दरअसल इस समय वे २८ साल के थेद्ध में युवावस्था की लद्घुता का तहेदिल से आनंद उठाता हूँ। मात्रा इसके चलते यह संभव हुआ कि अपनी अवनति के प्रति सचेत होने के लिए पर्याप्त शक्ति बची रहीऋ इससे आगे, अवनति के कष्ट को झेलना, इससे भी आगे अतीत का हर मामले में तिरस्कार, अंततः मेरे लिए इस शक्ति का अवशेष बचा रहना, इसी के चलते मुमकिन हुआ। लेकिन पिफर भी ये सारी शक्तियाँ उनका अवशेष मात्रा हैं जो एक बच्चे के तौर पर मुझे हासिल थींऋ जिन्होंने मुझे युवावस्था के भ्रष्टकारी तत्वों के समक्ष ज्यादा जोखिम में डाल दियाऋ हाँ, धूल और हवा का झोंका सबसे पहले तीव्र गति के रथ के पीछे ही लग जाते हैं और उसे पकड़ लेते हैं।
मैं अभी तक जो कुछ हूँ वह मेरे सामने सर्वाधिक स्पष्ट रूप से उस शक्ति के माध्यम से प्रकट होता है जिसके साथ उलाहने मेरे अंदर से अपना रास्ता तलाशते हैं। ऐसा भी समय था जब मेरे अंदर भावावेश-प्रेरित उलाहनों के अतिरिक्त और कुछ नहीं बचा था, जिसके चलते मैं शारीरिक रूप से स्वस्थ होने के बावजूद गली के अजनबियों को कसकर पकड़ लेता था क्योंकि उलाहने, मेरे अंदर, बेसिन से द्रुतगति से निकल रहे पानी की तरह उछलते रहते थे।
वह समय बीत चुका है। उलाहने मेरे भीतर उन विचित्रा औ८ाारों की तरह अवस्थित हैं, जिन्हें पकड़ पाने एवं ८ारा भी देर तक उठा रखने का साहस मुझमें शायद ही बचा है। इसी के साथ मालूम पड़ता है कि पुरानी शिक्षा द्वारा सौंपी गई अशु(ता ने पुनः मुझे अधिकाधिक प्रभावित करना प्रारंभ कर दिया है। मेरी उम्र के कुंवारों का सामान्य लक्षण, याद करने की गहरी चाह, मेरे हृदय को उन लोगों की तरपफ खोलना प्रारंभ कर दिया है जो उलाहनों के पात्रा होने चाहिए। और बस कल की ही द्घटनाएँ, जो कि भोजन की तरह बार-बार द्घटित होती थीं, इतनी दुर्लभ हो चुकी हैं कि अब इन पर टिप्पणियाँ दर्ज करता हूँ।
पर इससे भी आगे जाकर, मैं स्वयं, जिसने कि अभी-अभी खिड़की खोलने के उपक्रम में कलम छोड़ी है, अपने ऊपर हमला करने वालों का सबसे बड़ा सहयोगी हूँ। चूंकि मैं अपने को कम कर आंकता हूँ, इसका स्वतः अर्थ होता है कि मैं दूसरों को अनावश्यक महत्व देता हूँऋ बल्कि इससे हटकर भी मैं उनको बढ़ा-चढ़ाकर आंकता हूँ और इसके अतिरिक्त मैं खुद को नुकसान भी पहुँचाता रहता हूँ। जब मैं उलाहना देने की इच्छा से अभिभूत हो उठता हूँ, तो खिड़की से बाहर झांकता हूँ। इससे भला कौन इन्कार कर सकता है कि वहाँ मछुआरे अपनी नाव में उन छात्राों की तरह बैठे होते हैं जिन्हें विद्यालय से नदी तक लाया गया हो। उनकी निश्चलता अबूझ है, खिड़की पर बैठी मक्खियों की निश्चलता की तरह। और सदा की भांति पवन-सदृश कठोर गर्जन करते ट्राम पुल के ऊपर से गुजरते हैं एवं खराब हो चुकी द्घड़ी की तरह शोर करते हैं
एवं सर से पाँव तक काला पुलिसवाला, जिसके सीने पर बैज का पीला प्रकाश है, बिलाशक जहन्नुम की याद दिलाता है जो अभी मेरी ही तरह मछुआरे पर ध्यान केन्द्रित किए हुए है। अरे अचानक मछुआरा-क्या वह चिल्ला रहा है? क्या उसने कोई प्रेत देखा है या उसकी नौका डूब-उतरा रही है? -वह नौका के किनारे झुक गया है। यह सब बिलकुल ठीक है, पर अपने वक्त परऋ अभी तो सिपर्फ मेरे उलाहने सही हैं।
मैं इस पर अक्सर सोचता हूँ, और बिना दखल दिए, अपने खयालात को खुली छूट दे देता हूँ, लेकिन हमेशा इसी निष्कर्ष पर पहुँचता हूँ कि जिन लोगों को मैं जानता हूँ उन सब लोगों ने और मेरी शिक्षा ने जितना मैं कल्पित कर सकता हूँ उससे ज्यादा नुकसान किया है। पिफर भी लंबी अवधि में एकाध बार मैं यह कह सकता हूँ, क्योंकि कोई अगर पूछे 'वाक़ई?' तो उत्तेजना-मिश्रित भय के चलते मैं इस पर तुरंत विराम लगा देना चाहूँगा।
द्वारा श्री सुरेश मिश्र
दिवानी तकियन, कटहलबाड़ी, दरभंगा- ८४६००४
मो. ०९९७३४१०५४८ |