जनवरी २०१०
 
 
 
   
 
 
 
• मनीषा कुलश्रेष्ठ को 'लमही सम्मान' • निदा फाजली को पद्मश्री सम्मान •देवेंद्र इस्सर नहीं रहे• ओड़िया लेखिका प्रतिभा रॉय को २०११ का ज्ञानपीठ पुरस्कार•चंद्रकांत देवताले को साहित्य अकादमी पुरस्कार • कुणाल सिंह को युवा साहित्य अकादमी सम्मान • तीसरा 'कृष्ण प्रताप कथा सम्मान' (२०१२) गीतांजलिश्री की कृति 'यहां हाथी रहते थे' को • रविशंकर को मरणोपरांत लाइफटाइम अचीवमेंट ग्रैमी पुरस्कार • विनोद कुमार शुक्ल को हिन्दी काव्य साहित्य में रचनात्मक योगदान के लिए 'परिवार' पुरस्कार • वरिष्ठ साहित्यकार कामतानाथ नहीं रहे
 
 
 
सिंहावलोकन
प्रश्नाकुल समय से गुजरते हुए द अशोक मिश्र


मि. आरके गुप्ता मैं तुझे बर्बाद करके छोड़ूँगा। तुझे मेरी माँ के एक-एक दुःख का हिसाब देना होगा।''-पिफल्म 'त्रिाशूल'''मेरे 'पा' बहुत इंपोर्टेंट आदमी हैं। उन्हें क्या कहते हैं, ..हाँ, पॉलिटिशियन हैं। वह एमपी हैं। मेरे साथ वह बहुत अच्छा सलूक करते हैं... जब मैं थक जाता हूँ तो वह मुझे अपनी पीठ पर बिठा लेते हैं।''

कारवां गुजर गया गुबार देखते रहे जैसी पंक्तियाँ लिखने वाले गीतकार गोपालदास नीरज ने पिछले दिनों पुरस्कारों को लेकर एक टिप्पणी की जो आज के साहित्यिक हालात पर मौजूं है- वे कहते हैं कि- अब साहित्यकार की मेधा नहीं बल्कि ऊंची पहुँच को ही सम्मान दिया जा रहा है। इससे उदीयमान साहित्यकार आगे नहीं बढ़ पाते। कविता मनोरंजन का साधन बनती जा रही है। वर्तमान परिवेश में नए कवियों ने शब्द के अर्थ की सत्ता को भुला दिया है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है। कवि व श्रोता गंभीर नहीं रह गये। कवि सिपर्फ तालियां व वाहवाही चाहते हैं। अब जो कविता व गीत लिखे जा रहे हैं उनमें अर्थ की बजाय मनोरंजन पर अधिक ध्यान दिया जा रहा है। यह साहित्य के लिए शुभ नहीं है।
कुछ इसी तरह के हालात पर बहुत पहले हिन्दी के प्रखर कवि दुष्यंत कुमार ने लिखा था -
- वे जो प्रतिभावान बडे़ हैं/ उनके साथ बड़े लपफड़े हैं/ अंतिम निर्णय का अवसर है/ इन प्रश्नों पर आज मनन कर/ चल भाई गंगाराम भजन कर। नीरज और दुष्यंत की ये पंक्तियाँ इक्कीसवीं सदी के गुजरते नौवें साल पर इसलिए सटीक बैठती हैं कि साहित्य की भूमिका पर सवाल उठने लगे हैं और इन सवालों के दायरे में साहित्यिक संस्थाएँ, संपादक, पुरस्कार, संगोष्ठियाँ, प्रसंगहीन हो चुके लेखक संगठन सभी हैं। इक्कीसवीं सदी का नौवां साल चुपके से जाते-जाते कई खरोंचें देकर जा रहा है। साथ ही कई सवालों का जवाब भी मांग रहा है। जाहिर है कि हम एक प्रश्नाकुल समय में जी रहे हैं।

 
विवादों का साल
 
नये साल की शुरुआत जनवरी की कड़कड़ाती ठंड और साहित्यिक विवाद से हुई। विवाद के बीज गुजरे साल के नया ज्ञानोदय के दिसंबर अंक में छिपे हुए थे। जिसमें चुहलबाज संपादक रवीन्द्र कालिया ने कुछेक साहित्यकारों के लिए दारूकुट्टा, रसरंजन, मीडियाकर शब्दों का प्रयोग किया। इसी के तत्काल बाद सुपरिचित कवयित्राी गगन गिल ने जनसत्ता दैनिक में महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय के नए कुलपति विभूति नारायण राय के रवैये पर एक आक्रामक आलेख लिखा। विवि कार्य परिषद की सदस्या कवयित्राी ने नए कुलपति को 'उत्साही जीवन' और 'परेशान आत्मा', 'संशयात्मा' और 'कोतवाल कुलपति' लिखा। लेख में भारतीय ज्ञानपीठ के निदेशक और नया ज्ञानोदय के संपादक रवींद्र कालिया पर भी निशाना साधा गया। गगन गिल ने अपने लेख में पुस्तक वार्ता और अंग्रेजी में प्रकाशित पत्रिाका 'हिन्दी' के संपादक के रूप में क्रमशः भारत भारद्वाज और ममता कालिया के चयन पर एतराज जताते हुए कुछ तल्ख टिप्पणियां भी कीं। नया ज्ञानोदय में प्रकाशित संपादकीय को गगन गिल ने खुद पर हमले के रूप में लिया। यह विवाद दो तीन हफ्रतों तक चलकर खुद ही ठंडा पड़ गया। लोकसभा चुनाव में धन लेकर खबरों का धंधा करने वालों को दिवंगत वरिष्ठ पत्राकार प्रभाष जोशी ने जमकर ललकारा। उनके खिलापफ कई वेबसाइटों पर जमकर जहर उगला गया। छत्तीसगढ़ सरकार ने नाटककार हबीब तनवीर के बहुचर्चित नाटक 'चरणदास चोर' पर प्रतिबंध लगाने का निर्देश दिया था जो कि बाद में जोरदार विरोध के चलते वापस ले लिया गया। जुलाई माह में जैसे ही दिल्ली की मुख्यमंत्राी और हिन्दी अकादमी की पदेन अध्यक्ष श्रीमती शीला दीक्षित ने हास्य कवि अशोक चक्रधर की अकादमी के उपाध्यक्ष पद पर नियुक्ति की वैसे ही कार्यकारिणी सदस्य के रूप में मनोनीत लेखकों की एक जमात उनके विरोध में उठ खड़ी हुई। विवाद की शुरुआत अर्चना वर्मा के मुख्यमंत्राी को लिखे पत्रा के माध्यम से हुई। उन्होंने उन्हें 'विदूषक कवि' तक लिख डाला। इस विवाद का शिकार हुए शालीन छवि वाले आलोचक ज्योतिष जोशी को अकादमी के सचिव पद से इस्तीपफा देकर मूल संस्थान में वापस जाना पड़ा। मध्य प्रदेश प्रगतिशील लेखक संगठन में मचे द्घमासान से क्षुब्ध होकर वरिष्ठ साहित्यकार ज्ञानरंजन ने इस्तीपफा दिया। संगठन के राष्ट्रीय उप महासचिव और मशहूर कहानीकार सत्यनारायण पटेल ने कमला प्रसाद द्वारा संगठन को पूरी तरह कब्जाने का आरोप लगाया। कवि पत्राकार नीलाभ ने साहित्य अकादमी का अनुवाद पुरस्कार ठुकराया। पुरस्कार उन्हें अरुंधती राय के अंग्रेजी में प्रकाशित 'गॉड आपफ स्माल थिंग्स' के हिन्दी अनुवाद के लिए दिया जा रहा था। अरुंधती राय पहले ही अकादमी का पुरस्कार ठुकरा चुकी थीं। मनोज कुमार झा को वर्ष २००९ का भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार उनकी कविता 'स्थगन' पर दिया गया। यह कविता 'कथन' पत्रिाका में वर्ष २००८ में प्रकाशित हुई थी। कविता के लिए दिया जाने वाला भारत भूषण अग्रवाल सम्मान खासा विवादों में रहा। पुरस्कार के निर्णायकों में से एक विष्णु खरे ने सम्मानित कवियों पर केंद्रित 'उर्वर प्रदेश-३' पुस्तक में पिछले बीस बरसों के दौरान पुरस्कृत कवियों के लेखन पर नकारात्मक टिप्पणी की जिससे हिन्दी जगत में खासा हंगामा हुआ। विष्णु खरे की खरी-खरी ने पुरस्कार को सहसा अविश्वसनीय बना दिया। रायपुर में आयोजित प्रमोद वर्मा स्मृति सम्मान समारोह को लेकर खासा विवाद हुआ और कार्यक्रम के आयोजक और छत्तीसगढ के पुलिस महानिदेशक विश्वरंजन के खिलापफ टिप्पणियां की गयीं। साहित्य अकादमी में बहुराष्ट्रीय कंपनी सैमसंग के प्रवेश पर लेखकों ने आपत्ति जताई। वैसे भी हिन्दी साहित्य सदा से बाजारवाद का सख्त विरोधी रहा है और इसका विरोध जरूरी भी है।
 
पुरस्कार
 
चर्चित वरिष्ठ कथाकार गोविंद मिश्र को उनके उपन्यास 'कोहरे पर कैद रंग' पर साहित्य अकादमी पुरस्कार दिया गया। हिन्दी जगत में इस उपन्यास को पुरस्कृत किये जाने पर भी विवाद उठा। अकादमी पुरस्कार पिछले कई बरसों से लगातार स्तरहीन कृतियों को देने की बात उठती रही है। वाजश्रवा के बहाने जैसी कालजयी कृति के रचयिता और हमारे समय के महत्वपूर्ण कवि कुँवरनारायण को हिन्दी का प्रतिष्ठित ज्ञानपीठ पुरस्कार वर्ष २००५ के लिए राष्ट्रपति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल के हाथों प्राप्त हुआ।
हिन्दी की चर्चित कथा लेखिका मन्नू भंडारी को वर्ष-२००८ का केके बिरला पफाउंडेशन द्वारा दिया जाने वाला व्यास सम्मान उनकी आत्मकथा 'एक कहानी यह भी' के लिए प्रदान किया गया। बीते १८ सालों में यह पहला अवसर है कि जब यह सम्मान किसी आत्मकथा को दिया गया। वरिष्ठ कवि-पत्राकार कन्हैयालाल नंदन को वर्ष २००९ का परंपरा विशिष्ट आँतुराज सम्मान। युवा आलोचक प्रणय कृष्ण आलोचना पुस्तक 'उत्तर आधुनिकता के स्रोत और हिन्दी साहित्य' के लिए देवीशंकर अवस्थी सम्मान से विभूषित हुए।
भागलपुर के शिवकुमार शिव द्वारा दिया जाने वाला सुधा स्मृति सम्मान-२००८ लेखिका मैत्रोयी पुष्पा को दिल्ली में दिया गया। पंद्रहवां कथा यूके सम्मान सुपरिचित कथाकार भगवानदास मोरवाल को उनके उपन्यास 'रेत' पर दिया गया लेकिन वे पुरस्कार ग्रहण करने लंदन नहीं जा सके। चर्चित कवि-कथाकार उदय प्रकाश को पहला कृष्ण बलदेव वैद सम्मान। उदय प्रकाश द्वारा साल की शुरुआत में गोरखपुर में डॉ. कुंवर नरेंद्र प्रताप सिंह जयंती समारोह में वर्ष २००९ का नरेंद्र सम्मान सांसद योगी आदित्यनाथ के हाथों स्वीकार करने पर खासा बवाल हुआ जो उनके द्वारा क्षमा मांगने पर ही जाकर समाप्त हुआ। उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान का वर्ष २००७ का भारत-भारती पुरस्कार वरिष्ठ कवि केदारनाथ सिंह को मिला। वरिष्ठ कथाकार और नया ज्ञानोदय के संपादक रवींद्र कालिया को लोहिया सम्मान से नवाजा गया। भारत भवन भोपाल की अरसे से बंद पड़ी पत्रिाका 'पूर्वग्रह' पिफर से नये संपादक प्रभाकर श्रोत्रिाय के संपादन में शुरू हुई। प्रभाकर श्रोत्रिाय सुपरिचित आलोचक और संपादक हैं जो इससे पहले साक्षात्कार, अक्षरा, वागर्थ, नया ज्ञानोदय पत्रिाकाओं के संपादक रह चुके हैं। शीर्षस्थ कवि केदारनाथ अग्रवाल की स्मृति में दिया जाने वाला केदार सम्मान हिन्दी के प्रतिष्ठित कवि दिनेश शुक्ल को उनके कविता संग्रह 'ललमुनिया की दुनिया' पर मिला। कथाकार महेश कटारे वर्ष २००९ के लिए आनंद सागर स्मृति 'कथाक्रम सम्मान' से लखनऊ में सम्मानित हुए। आलोचक पुरुषोत्तम अग्रवाल को 'अकथ कहानी प्रेम की, कबीर की कविता और उनका समय' नामक पुस्तक के लिए राजकमल प्रकाशन का पहला कृति सम्मान। युवा कथाकार मुरारी शर्मा वर्ष २००८ के लिए रमाकांत स्मृति कहानी से सम्मानित। उनकी पुरस्कृत कहानी 'बाणमूठ' हंस के नवंबर-०८ में प्रकाशित हुई थी। के.के. बिरला पफाउंडेशन का बिहारी पुरस्कार राजस्थ्ाान के प्रख्यात कवि नंद भारद्वाज को कविता संग्रह 'हरी दूब का सपना' पर मिला। वर्ष २००६ का २०वां मूर्तिदेवी पुरस्कार कृष्ण बिहारी मिश्र को उनकी पुस्तक 'कल्पतरू की उत्सवलीला' को और २१वां पुरस्कार एम.वीरप्पा मोइली की पुस्तक 'श्रीरामायण महान्वेषण' को देने की द्घोषणा की गयी। युवा कवि राकेश रंजन 'चांद में अटकी पतंग' शीर्षक कविता संग्रह के लिए हेमंत स्मृति कविता पुरस्कार २००९ से सम्मानित। तेरहवां व्यंग्य श्री सम्मान-२००९ व्यंग्य लेखन के लिए प्रेम जनमेजय को। राजू शर्मा को उपन्यास 'विसर्जन' पर वर्ष २००९ का विजय वर्मा कथा सम्मान। 'पाखी' की ओर से श्रीलाल शुक्ल को शब्द साधक शिखर सम्मान से सम्मानित किया गया। इसके अलावा शब्द साधना पुरस्कार से भगवानदास मोरवाल ;रेतद्ध, एस.आर. हरनोट ;जीन काठी और अन्य कहानियाँद्ध, अपूर्वनंद ;साहित्य का एकांतद्ध, शैलेय ;याद्ध, और युवा कवि रमेश कुमार वर्णवाल को भी सम्मानित किया गया।
 
संगोष्ठियां
 
वर्ष की शुरुआत में ही इलाहाबाद शहर में हरिवंश राय बच्चन की जन्म शताब्दी पर एक संगोष्ठी आयोजित हुई। हिन्दी साहित्यकारों का सबसे बड़ा महाकुंभ चर्चित कथाकार और महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय के कुलपति विभूति नारायण राय ने 'हिन्दी समय' नाम से वर्धा में आयोजित किया जिसमें तीन सौ से अधिक रचनाकारों ने शिरकत की और साहित्य, कला, संस्कृति, रंगमंच, सिनेमा, मीडिया समेत कई अनुशासनों पर बृहद चर्चा हुई। पफरवरी में दिल्ली की हिन्दी अकादमी ने पाँच दिवसीय निराला पर्व का आयोजन कर निराला साहित्य के विविध पक्षों का पुनर्मूल्यांकन किया। कोलकाता में भारतीय भाषा परिषद ने आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी व्याख्यानमाला का आयोजन किया। साहित्य अकादमी और भारतीय भाषा परिषद ने संयुक्त रूप से कोलकाता में प्रतिष्ठित आलोचक नंददुलारे वाजपेयी की जन्म शत वार्षिकी के अवसर पर संगोष्ठी आयोजित की। साहित्य अकादमी दिल्ली ने प्रख्यात आलोचक रामचंद्र शुक्ल की १२५वीं जयंती मनाई। यहाँ विषय प्रवर्तन में डा. नामवर सिंह ने पहली बार खुद को शुक्ल जी के ही खेत ;काशी हिन्दू विश्वविद्यालयद्ध में उगा छोटा सा पौधा बताया। उन्होंने रामचंद्र शुक्ल को २०वीं सदी का सबसे बड़ा समालोचक साहित्यकार बताया। गाँधी शांति प्रतिष्ठान और सामयिक वार्ता ने संयुक्त रूप से राममनोहर लोहिया के जन्मशती वर्ष पर 'भारत में भाषा समस्या' पर दो दिवसीय सेमिनार आयोजित किया। हंस की २४वीं संगोष्ठी 'युवा रचनाशीलता और नैतिक मूल्य' विषय पर केंद्रित रही। संगोष्ठी में सुप्रसि( आलोचक नामवर सिंह ने 'हंस' के नवलेखन अंक और युवा रचनाशीलता की जमकर धज्जियां उड़ाई। महादेवी वर्मा सृजनपीठ के कर्ताधर्ता बटरोही ने अक्टूबर में उत्तराखण्ड स्थित मल्ला रामगढ़ में समकालीन कविता और कहानी पर दो दिवसीय गोष्ठी में चर्चा की। कहानी केंद्रित संगमन की संगोष्ठी उदयपुर में प्रियंवद और उनके प्रिय रचनाकारों की उपस्थिति में हुई जिसमें 'कथा साहित्य की जनपक्षधरता' पर बहस हुई। लखनऊ की पहचान बन चुके कथाक्रम की संगोष्ठी में इस बार 'हिन्दी साहित्य और भविष्य का समाज' विषय पर बोलते हुए प्रख्यात आलोचक नामवर सिंह ने यह कहकर एक नया विवाद खड़ा कर दिया कि 'प्रेमचंद ने शहर की आँखों से गाँव को देखा था। उनका गाँव शहर के पास का गाँव है जबकि महेश कटारे ठेठ ग्रामीण समाज के रचनाकार हैं। उनकी कहानियों में भिंड, मुरैना की ठेठ बोली मिलती है।' नामवर सिंह के बयान पर साहित्यकारों के बीच तीखी प्रतिक्रिया हुई और संजीव, मूलचंद गौतम, वीरेंद्र यादव, हरिचरन प्रकाश समेत कई अन्य कथाकार इससे खासे असहमत नजर आए। प्रख्यात आलोचक नामवर सिंह के ८३वें जन्मदिन के मौके पर 'जेएनयू में नामवर' शीर्षक पुस्तक का लोकार्पण हुआ। वरिष्ठ साहित्यकार और 'हंस' के संपादक राजेंद्र यादव का ८०वां जन्मदिन दिल्ली में धूमधाम से मनाया गया।
महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय, वर्धा की बंद पड़ी पत्रिाकाएँ हिन्दी, पुस्तक वार्ता तथा बहुवचन की शुरुआत हुई। 'वागर्थ' को नये संपादक के रूप में प्रसि( आलोचक विजय बहादुर सिंह का साथ मिला। पंकज बिष्ट के संपादन में प्रकाशित वैचारिक पत्रिाका 'समयांतर' ने प्रकाशन के दस साल साल पूरे किए।वसुधा का दो खण्डों में कहानी अंक, आधारशिला का त्रिालोचन अंक, परिकथा का हिन्दी कहानी पर दो अंक, निष्कर्ष का कहानी अंक, हंस का नवलेखन पर दो अंक और स्त्राी विमर्श विशेषांक, वसुधा का सिनेमा पर केंद्रित विशिष्ट अंक, लमही का रवींद्र कालिया और कहानी अंक उल्लेखनीय रहा। 'पाखी' का संजीव अंक, इंडिया न्यूज का साहित्य के खिलाड़ी अंक, नया ज्ञानोदय के प्रेम पर केंद्रित पाँच अंक, कथादेश का मीडिया विशेषांक, लोकमत समाचार का दीपावली विशेषांक, 'दि संडे पोस्ट' की वार्षिकी 'प्रलय प्रवाह में शब्द-२', हरिगंधा का किसानी जीवन अंक, व्यंग्य यात्राा का श्रीलाल शुक्ल अंक, साहित्य अमृत का व्यंग्य विशेषांक प्रमुख रहे। साहित्य अकादमी ने निर्मल वर्मा, हरिवंश राय बच्चन का मोनोग्रापफ निकाला और अमृत लाल नागर रचना संचयन प्रकाशित किया।
 
उपन्यास
 
इस बरस उपन्यास विधा को लेकर भारतीय ज्ञानपीठ ने बाकायदा उपन्यास वर्ष मनाया और इस कड़ी में दुक्खम सुक्खम और अंधेरे का ताला ;ममता कालियाद्ध, छुट्टी के दिन का कोरस ;प्रियंवदद्ध, प्रेम की भूतकथा ;विभूति नारायण रायद्ध, सात पफेरे ;चंद्रकिशोर जायसवालद्ध, देश निकाला ;धीरेंद्र अस्थानाद्ध, आखेट ;ज्ञानप्रकाश विवेकद्ध, मेरा निर्णय ;अभिमन्यु अनतद्ध, मैंने नाता तोड़ा ;सुषमा बेदीद्ध, वरः मिहिर ;द्घनश्याम पांडेयद्ध, मोनेर मानुष ;सुनील गंगोपाध्यायद्ध, देवदास ;शरतचंद्र चट्टोपाध्यायद्ध, ग्लोबल गाँव के देवता ;रणेन्द्रद्ध, विश्वामित्रा ;ब्रजेश के बर्मनद्ध, टूटने के बाद ;संजय कुंदनद्ध, नया जन्म ;संतोख सिंह धीरद्ध, सबसे अधिक उपन्यास प्रकाशित किए। इसी कड़ी में क्रांतिकारी ;रोशन प्रेमयोगीद्ध, बीच की धूप ;महीप सिंहद्ध, दोजख, ;सैयद जैगम इमामद्ध, मैं खुश हूँ कमली ;सुनीता शर्माद्ध, बरखा रचाई ;असगर वजाहतद्ध, मासूमा ;इस्मत चुगतईद्ध, दिल की दुनिया ;इस्मत चुगतईद्ध, ताम्रपट ;रंगनाथ पठारेद्ध, पंख वाली नाव ;पंकज बिष्टद्ध, बंधन ;मनोज सिंहद्ध, मिलजुल मन ;मृदुला गर्गद्ध, पचकौड़ी ;शरद सिंहद्ध, सही नाप के जूते ;लता शर्माद्ध, खानाबदोश ख्वाहिशें ;जयंतीद्ध, यमदीप ;नीरजा माधवद्ध, बांसपुर की उत्तरकथा ;आर के पालीवालद्ध, सुनामी में विजेता ;मुशर्रपफ आलम जौकीद्ध, मैं मुहाजिर नहीं हूँ ;बादशाह हुसैन रिजवीद्ध, जीवन यु( ;यादवेंद्र शर्मा चंद्रद्ध, मुन्नी मोबाइल ;प्रदीप सौरभद्ध, कृष्ण एक रहस्य ;ईशान महेशद्ध, सीमेंट नगर ;विजयद्ध, पहचान ;अनवर सुहैलद्ध, अधबनी रस्सी : एक परिकथा ;सच्चिदानंद चतुर्वेदीद्ध, कला बाजार ;अभिज्ञातद्ध आदि प्रमुख उपन्यास प्रकाशित हुए।
 
कहानी
 
कहानी एक ऐसी विधा रही जिसकी उर्वर जमीन पर हरी-भरी पफसल लहलहाती रही। इस बरस प्रकाशित कहानी संग्रहों में अमरीका मेरी जान ;हरिओमद्ध, ईस्ट इंडिया कंपनी ;पंकज सुबीरद्ध, शहतूत ;मनोज कुमार पांडेयद्ध, डर ;विमल चंद्र पांडेयद्ध, द्घोड़ा एक पैर ;दीपक शर्माद्ध, कित्ता पानी ;अनिता गोपेशद्ध, मुन्ना बैंड वाले उस्ताद ;शिवदयालद्ध, कैरियर गर्लैड और विद्रोह ;अनुजद्ध, खंडित संवाद ;से.रा.यात्राीद्ध, पचास बरस का बेकार आदमी ;रवीन्द्र वर्माद्ध, सौरी की कहानियाँ ;नवीन कुमार नैथानीद्ध, अकथ ;रणविजय सिंह सत्यकेतुद्ध, परदा बेपरदा ;योगेन्द्र दत्त शर्माद्ध, श्रेष्ठ कहानियाँ ;वरयाम सिंह संधूद्ध, बदली हुई दुनिया ;ज्ञानप्रकाश विवेकद्ध, शिकार ;हृदयेशद्ध, नींद में मृत्यु ;परमानंद श्रीवास्तवद्ध, ढाक ढोल ;कुशेश्वरद्ध बारह प्रेम कहानियाँ ;लवलीनद्ध, वसंत के हत्यारे ;हृषीकेश सुलभद्ध, पियरी का सपना ;मैत्रोयी पुष्पाद्ध, गली दुल्हन वाली ;मीरा कांतद्ध, जातिदंश की कहानियाँ ;सं. सुभाषचंद्र कुशवाहाद्ध, मकान, कमरे और द्घर ;अजय श्रीवास्तवद्ध, उपसंहार ;प्रेम कुमार मणिद्ध, पहाड़ की पगडंडियां ;प्रकाश थपलियालद्ध, कोहरे में कंदील ;अवधेश प्रीतद्ध, देह यात्राा ;सुधाकर अदीबद्ध, गोवा में तुम ;बलरामद्ध, संपूर्ण लद्घुकथाएँ ;विष्णु प्रभाकरद्ध, आतंकित ;आबिद सुरतीद्ध, भूमिकमल ;आँता शुक्लद्ध, इनसानी नस्ल ;नासिरा शर्माद्ध, कारोबार ;ओमा शर्माद्ध, अंतिम पड़ाव ;हरियश रायद्ध, शहर की आखिरी चिड़िया ;प्रकाश कांतद्ध आदि को मुख्य कहा जा सकता है।
 
कविता
 
कविता विधा यद्यपि अपने में सिमटकर सिपर्फ कवियों के बीच ही पढ़ी जा रही है और आम आदमी से पूरी तरह से कट चुकी है। इस बरस युवा कवियों के साथ-साथ पुराने कवियों के संग्रह भी प्रकाशित हुए। संपादित संकलनों में छत्तीसगढ़ के कवियों की ६०० वर्षों की काव्य यात्राा पर केंद्रित जल भीतर इक बृच्छा उपजै ;सं. रमेश अनुपमद्ध एक प्रभावशाली प्रस्तुति रही। अन्य प्रमुख पुस्तकों में शीर्षक नहीं चाहिए ;निविड़ शिवपुत्राद्ध, रात जब चंद्रमा बजाता है बांसुरी ;सुधीर सक्सेनाद्ध, लौटता हूँ मैं तुम्हारे पास ;रमेश अनुपमद्ध, भीड़ के भवसागर में ;विनय दुबेद्ध, कहते हैं तब शहंशाह सो रहे थे ;उमाशंकर चौधरीद्ध, यात्राा ;रविकांतद्ध, अनाज पकने का समय ;नीलोत्पलद्ध, पहली बार ;संतोष कुमार चतुर्वेदीद्ध, आखर अरथ ;दिनेश शुक्लद्ध, खिलाड़ी दोस्त और अन्य कविताएँ ;हरे प्रकाश उपाध्यायद्ध, जवान होते हुए लड़के का कबूलनामा ;निशांतद्ध, जिस तरह द्घुलती है काया ;वाजदा खानद्ध, अलमारी में रख दिया है द्घर ;ब्रजेश्वर मदानद्ध, जिन्हें डर नहीं लगता ;उमेश चौहानद्ध, चिट्ठी आएगी एक दिन ;जगदीश चंद्रद्ध, जब मैं स्त्राी हूँ ;रंजना जायसवालद्ध, अच्छे दिनों में उंटनियों का कोरस ;शहंशाह आलमद्ध, आती है बहुत अंदर से आवाज ;विश्व रंजनद्ध, पृथ्वी के लिए तो रुको ;विश्वशंकर चतुर्वेदीद्ध, सहरा मेरी आँखों में ;राजश्री त्रिावेदीद्ध, उसका तो कोई गाँव होगा ही नहीं ;मनोज कुमार शर्माद्ध, अस्पताल के बाहर टेलीपफोन ;पवन करणद्ध, कविता में अब और नहीं ;ओमप्रकाश वाल्मीकिद्ध, बात नदी बन आए ;मधुकर उपाध्यायद्ध, नहीं ;पकंज सिंहद्ध, स्याही ताल ;वीरेन डंगवालद्ध, यह भूमंडल की रात है ;पंकज रागद्ध, रोशनी के रास्ते पर ;अनीता वर्माद्ध, बगदाद से एक खत ;महेंद्र मिश्रद्ध, अनंतिम ;कुमार अंबुजद्ध, पानी का दुखड़ा ;विमल कुमारद्ध, नागकेशर का देश यह ;एकांत श्रीवास्तवद्ध, चाँद में अटकी पतंग ;राकेश रंजनद्ध, मैं नदी की सोचता हूँ ;कमलेश भट्ट कमलद्ध, अमलतास ;कमलेश भट्ट कमलद्ध, एक भाषा हुआ करती है ;उदय प्रकाशद्ध, इस बार सपने में तथा अन्य कविताएँ ;परमानंद श्रीवास्तवद्ध, गेहूँ द्घर आया है ;दिविक रमेशद्ध, आँधी में यात्राा ;विजय किशोर मानवद्ध, एक दुनिया है असंख्य ;सुंदरचंद ठाकुरद्ध हाशिए का गवाह ;कुँवर नारायणद्ध, इतिहास में चिड़िया ;राधेश्याम तिवारीद्ध, संग्रहों को वर्ष की प्रमुख कृतियों में शुमार किया जा सकता है।
 
विविध विधाएँ
 
भाजपा के वरिष्ठ राजनेता जसवंत सिंह द्वारा लिखित 'जिन्ना भारत विभाजन के आईने में' मीडिया की सुर्खियां बटोरने के कारण विवादों में रही। देश के गृहमंत्राी पर जूता पफेंककर सुुुर्खियां बटोरने वाले पत्राकार जरनैल सिंह द्वारा सिख कत्लेआम का सच बयां करती 'कब कटेगी चौरासी' पुस्तक चर्चा में रही। पेंगुइन बुक्स से प्रकाशित इसकी प्रस्तावना वरिष्ठ पत्राकार खुशवंत सिंह ने लिखी है। आलोचक सुरेंद्र चौधरी की तीन पुस्तकें प्रकाशित हुईं जिसमें हिन्दी कहानीः रचना और परिस्थिति का प्रकाशन महत्वपूर्ण है। पेंगुइन से प्रकाशित हिन्दी की पहली आत्मकथा अर्धकथानक ;लेखक बनारसी दास जैन-अनुवाद रोहिणी चौधरीद्ध चर्चा में रही। वरिष्ठ कथाकार हृदयेश की आत्मकथात्मक संस्मरण पुस्तक 'जोखिम' महत्वपूर्ण रही। महादेवी की कविता का नेपथ्य ;विजय बहादुर सिंहद्ध, बुनियाद अली की बेदिल दिल्ली ;द्रोणवीर कोहलीद्ध, दिल्ली की हिन्दी अकादमी ने महात्मा गाँधी द्वारा लिखित पुस्तक 'हिन्द स्वराज और सत्य के प्रयोग' अथवा आत्मकथा का पुनर्प्रकाशन और लोकार्पण किया। यात्राी की डायरी ;कमला प्रसादद्ध, मेरे दिन मेरे वर्ष ;एकांत श्रीवास्तवद्ध, कालातीत ;मुद्राराक्षसद्ध, महादेवी ;दूधनाथ सिंहद्ध, दिल्ली टी हाउस ;संपादन बलदेव वंशीद्ध, अमृतलाल नागर की बाबूजी-बेटाजी एंड कंपनी ;अचला नागरद्ध, अकेला मेला ;रमेश चंद्र शाहद्ध, गाँधी का अहिंसक इन्कलाब और हिन्द स्वराज ;संपादन विनोद शाहीद्ध, प्रतिमानों के पार ;परमानंद श्रीवास्तव पर प्रकाशित अभिनंदन ग्रंथ-संपादन देवेंद्र आर्यद्ध, मेरा गाँव ;वेदप्रकाश पांडेयद्ध, दिल्ली शहर दर शहर ;निर्मला जैनद्ध, यादों से रची यात्रााः विकल्प की तलाश ;पूरनचंद जोशीद्ध, अतीत राग ;नंद चतुर्वेदीद्ध, सृजन का अंतर्पाठः उत्तर आधुनिक विमर्श ;कृष्णदत्त पालीवालद्ध, मीडिया और जनसंवाद ;वार्तिका नंदा/उदय सहायद्ध, मुख्यधारा और दलित साहित्य ;ओमप्रकाश वाल्मीकिद्ध, अंधेरे समय में शब्द ;परमानंद श्रीवास्तवद्ध, कहना जरूरी था ;कन्हैयालाल नंदनद्ध, एक अनूठा गाँधीवादी विट्ठलभाई पटेल ;सं. आलोक मेहताद्ध, बिटिया है विशेष ;मृदुला सिन्हाद्ध, शब्दों के द्घर ;पंकज बिष्टद्ध, चर्चा हमारा ;मैत्रोयी पुष्पाद्ध, १८५७ः विरासत से जिरह ;सं. राजीव रंजन गिरिद्ध, इतिहास गढता समय ;प्रियदर्शनद्ध, पृथ्वी परिक्रमा ;कृष्णनाथद्ध, हिन्दी समुदाय और राष्ट्रवाद ;सुधीर रंजन सिंहद्ध, उपन्यास और वर्चस्व की सत्ता ;वीरेंद्र यादवद्ध, पत्राकारिता की कसौटी ;जनार्दन मिश्रद्ध, हाशिए की इबारतें ;चंद्रकांताद्ध, राजनीति मेरी जान ;पुण्य प्रसून वाजपेयीद्ध, अद्य गद्य बिंदास ;सुधीश पचौरीद्ध, मेरा बचपन मेरे कंधों पर ;श्यौराज सिंह बेचैनद्ध, शहनाई वादक उस्ताद बिस्मिल्लाह खां ;मुरली मनोहर श्रीवास्तवद्ध, दलित साहित्य का समाजशास्त्रा ;हरिनारायण ठाकुरद्ध, कविवर बच्चन के साथ ;अजित कुमारद्ध, धर्मवीर भारती के पत्रा ;पुष्पा भारतीद्ध पुस्तकें प्रमुख रहीं।
 
साथ छोड़ने वाले
 

वर्ष की शुरुआत से ही क्रूर काल हमारे समय की महान विभूतियों को एक-एक कर छीनता रहा और हमें बार-बार बिछुड़ने वालों के गम से सराबोर करता रहा। ऐसी विभूतियों में कथाकार लवलीन, आवारा मसीहा के रचयिता और बुजुर्ग साहित्यकार विष्णु प्रभाकर, कवि सुदीप बनर्जी, व्यंग्यकार श्रीराम ठाकुर दादा, कथाकार यादवेंद्र शर्मा चंद्र, विश्वंभरनाथ उपाध्याय, रंगकर्मी हबीब तनवीर, खेल पत्राकार याोगराज थानी, रंजना कक्कड़, राकेश कोहरवाल, विनोद कुमार शुक्ल, कथा लेखिका चंद्रकिरण सौनरेक्सा, संगीतकार अली अकबर खाँ, शास्त्राीय संगीत की महान गायिका गंगूबाई हंगल, युवा कवि आँतु कुमार, गीतकार नईम, विज्ञान लेखक गुणाकर मुले, मराठी कवि लेखक दिलीप चित्रो, गीतकार गुलशन बावरा, युवा कवि शैलेंद्र सिंह, लेखिका और कवयित्राी कमला दास, जनकवि हरीश भादानी, कवि प्रमोद उपाध्याय, पत्राकार शारदा पाठक, नवगीतकार उमाशंकर तिवारी, मशहूर पत्राकार और कागद कारे के लेखक संपादक प्रभाष जोशी, हास्य कवि अल्हड़ बीकानेरी, ओमप्रकाश आदित्य, कवि पत्राकार रामकृष्ण पांडेय, आलोचक और वर्तमान साहित्य के संपादक कुंवरपाल सिंह का जाना साहित्य, कला, संस्कृति की दुनिया को सूना कर गया। ऐसी समस्त विभूतियों को 'पाखी' और 'दि संडे पोस्ट' परिवार की ओर से विनम्र श्र(ांजलि।

;लेखक कथाकार और वरिष्ठ पत्राकार हैंद्ध
डी-१/ १०४ डी, डीडीए फ्रलैट्स कोंडली
दिल्ली-११००९६
मोबाइल-९९५८२२६५५४

 
 
 
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