| शैलेन्द्र |
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यह भी एक द्वंद्व है
चुप-चुप सुनने में आनंद है
आनंद है चुप-चुप बांचने में
नसीहतों को गुनते रहना चुप-चुप
निश्चित ही एक प्रक्रिया है आनंददायक
चेहरे पर पफैलती है मुस्कान
खुद-ब-खुद तो लोगबाग हो लेते हैं खुश
और दुखी हो जाते हैं दुखी देखते/
रहने की चाह रखने वाले |
पर मूल बात यह
कि सुनते हुए बांचते हुए, गुनते हुए
मायूस होने जैसी कोई द्घटना नहीं द्घट पाती
जब समझ हो सापफ
और इरादा हो पक्का
तो आप सुन सकते हैं सबकी धैर्य के साथ
और करते रह सकते हैं वही,
जो चाहते हैं करते रहना
इसी में रस है, छंद है
उच्छास है, तरंग है
आनंद है, आनंद है
चुप-चुप सुनते, बांचने
और गुनने में आनंद है
यह सोच किसी को नापसंद
तो किसी को पसंद है
दोस्त! यह भी एक द्वंद्व है! |
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| झूठ एक उपलब्धि है |
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हम पढ़ते हैं
सपफाई से टंकित झूठ
चमचम चमकते पन्नों पर
और देखते हैं श्याम-सपफेद
और रंगीन पर्दों पर वही झूठ
दोहराए जाते
बार-बार
और पाते हैं
स्थापित होते उसे सच के रूप में
झूठ को सच
और सच को झूठ
यानी सच्चे को झूठा
और झूठे को सच्चा
करार देने का खेल
ऐसा खेल है
जिसे खेला जा रहा है अरसे से
इस खेल के परिणाम से
कैसे नहीं खुश हो सकते हैं खिलाड़ी
अब तो झूठ एक उपलब्धि है
बा-जरिए अभिव्यक्ति की आजादी के!
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