हरेक हफ्रते नएपन के एक नये उद्द्घोष के साथ आता हैे लेकिन विचारनीय है कि इस नएपन में नया क्या होता है। और यदि वाकई कुछ नया होता है तो इतना प्रभावशाली माध्यम सिर्पफ हमारे वा''य आवरण को ही प्रभावित क्यों कर पाता है? क्यों नहीं हमारे विचारों, हमारी समझ को नएपन के लिए प्रेरित कर पाता है?
नई सदी के पहले दशक के अंतिम वर्ष की हरेक दूसरी पिफल्म नएपन के व्यापक उद्द्घोष के साथ आयी। चाहे वह 'देव डी' हो या 'स्टे्रट' या पिफर 'लव आजकल' या 'न्यूयार्क'। 'ब्लू' या पिफर 'कमीने'... नएपन का इतना भव्य आभा मंडल रचा जाता है कि इस सवाल कि शायद गुंजाइश भी नहीं बनती कि नया है क्या? हमें मान लेने को बाध्य हो जाना पड़ता है कि हाँ, यही नया है। 'लव आजकल' वर्ष की सबसे सपफल पिफल्मों में शुमार की जाती है। अपने नएपन के लिए भी चर्चित रही यह पिफल्म। युवा पिफल्मकार इम्तियाज अली ने इस पिफल्म में प्रेम को एक नए तरीके से परिभाषित करने की कोशिश की। ३० वर्षों के अंतराल में प्रेम के बदलते मूल्यों को दो समांतर कहानियों के कान्ट्रास्ट के माध्यम से उन्होंने सहजता से रेखांकित किया। आज का नायक ३० साल पहले के नायक से पूछता है, आप लोग सिर्पफ प्रेम करते रहे और कुछ हुआ नहीं। इम्तियाज अली बदलाव को पहचान तो करते हैं लेकिन अपनी कहानी को बदलाव पर खत्म नहीं करते, वे पीछे लौट जाते हैं। हिन्दी सिनेमा में पहली नजर के प्यार का जो पफार्मूला दशकों से चलता आ रहा है, इम्तियाज अली उसे तोड़ने का जोखिम नहीं उठाते। आश्चर्य नहीं कि पूरी पिफल्म ताजी होते हुए भी बासी हो जाती है। ये बासी पन दर्शकों को संतोष तो देती है, नए समाज की विद्रुपता के प्रति बेचैन नहीं करती।
यह अद्भुत विडम्बना है कि हिन्दी सिनेमा आज भी जब प्यार, परिवार समाज को पिफल्माने की कोशिश करती है तो नएपन के प्रति पूरी तरह से निरपेक्ष दिखती है। अभी भी ६० के दशकों के दोस्तों या भाइयों के बीच स्वार्थ संद्घर्ष और प्रायश्चित के क्रम का वे पूरे विश्वास से निर्वाह करते हैं, जबकि आज प्रायश्चित का क्रम वास्तविक जीवन में शायद ही कभी आ पाता है। दो भाई जब आज अलग होते हैं, तो अलग हो जाते हैं, बगैर किसी पछतावे के। उनकी जिंदगी के अपने विस्तार होते हैं अपनी स्थितियाँ होती है, अपनी समस्याएँ, अपने निराकरण लेकिन हिन्दी सिनेमा के लिए समाज के इस नये बदलाव को गले से उतारना कठिन हो जाता है। कठिन इसलिए कि इस नए विस्तार पर किसी कहानी की परिकल्पना ही वे नहीं कर पाते। उन्हें सहुलियत होती है एक सहज परंपरागत अंत में जहाँ दोनों भाई वापस मिल जाते हैं, या पिफर जो गलत होता है वह शहीद हो जाता है या पिफर सजा भोग लेता है। विशाल भारद्वाज की 'कमीने' प्रस्तुति में नवीनतम प्रयोगों के बावजूद कथ्य के स्तर पर एक कदम भी आगे की ओर नहीं बढ़ती। भाई के लिए भाई जान दे यह अच्छी बात है, लेकिन परिस्थितियों ने अब जब संबंधें को इस उफंचाई पर टिकने नहीं दिया है
तो इसे स्वीकार करने कतराने की क्या जरूरत? और यदि कतरा रहे हैं तो यह भी स्वीकार करना चाहिए कि सूरज बड़जात्या और पफराह खान की तरह हम एक नॉस्टेलजिक पिफल्म बना रहे हैं, कथ्य के स्तर पर नएपन की उम्मीद न रखी जाय।
वास्तव में हिन्दी सिनेमा के साथ मुश्किल यह रही है कि यह मूलतः सितारों और तकनीक पर केन्द्रित रही है। शाहरूख खान रहने के बाद दर्शकों को पफर्क नहीं पड़ता कि डान मारा जा रहा है या विजय, उसके लिए अहम् हमेशा शाहरूख होते हैं। विचार, जो पटकथा के रूप में आकार लेते हैं हिन्दी पिफल्मकारों के लिए हमेशा से ही उपेक्षित रहे है। इसलिए नएपन का अर्थ यहाँ तकनीक में नयापन होता है, सितारों में नयापन होता है, प्रस्तुति में नयापन होता है, विचार या कथ्य के स्तर पर नएपन की संभावना पर विचार नहीं किया जाता। हिन्दी सिनेमा के नएपन की तुलना ज्योतिषी के आगे हाथ पसारे शार्ट्स और टॉप में सजी आध्ुनिका से की जा सकती है। समाजशास्त्रा की शब्दावली में कहें तो 'सांस्कृतिक विडम्बना' का सबसे सटीक उदाहरण हो सकता है २००९ का सिनेमा। जिसमें एक ओर तकनीकी विकास का चरम दिखता है वहीं वैचारिक जड़ता का सम्मोहन।
एंथोनी डी सूजा की 'ब्लू' को क्या कहा जा सकता है? वाकई 'ब्लू' हिन्दी सिनेमा के दर्शकों के लिए एक नया अनुभव था, लेकिन क्या देखा उन्होंने 'ब्लू' में इसका उत्तर किसी दर्शक के पास नहीं था। जो पिफल्मकार दिखाना चाहते थे उसके आस-पास वे कहानी नहीं बुन सके, नतीजतन जो दर्शक देखना चाहते थे, वह वे पूरी तरह दिखा नहीं सके। '२०१२' हॉलीवुड से हिन्दी में डब होकर आयी और हिन्दी दर्शकों को विस्मित कर गई। अभी भी सिनेमा द्घरों से उसे स्थानापन्न करना 'रॉकेट सिंह' के लिए भी संभव नहीं हो पा रहा। हिन्दी में 'तुम मिले' या 'ब्लू' बनाने की कोशिश भी की जाती है तो यहाँ द्घटना गौण हो जाती है, परंपरागत प्रेमकथा उभर आती है। प्रेम कथाओं की गुत्थियां दर्शकों के मन को तन्द्रा की उस सीमा में पहुँचा देती है, जहाँ बड़ी से बड़ी द्घटना की गंभीरता उन्हें छू ही नहीं सकती। आश्चर्य नहीं कि न तो बड़े बजट की 'जुरासिक पार्क' या 'इंडिपेंडेंस डे' वे बना पाते हैं, न ही छोटे बजट की 'स्लमडॉग मिलयेनर' या 'मानसून वेडिंग'।
वास्तव में 'चांदनी चौक टू चाइना' से शुरू होने वाले वर्ष से बहुत उम्मीद की भी नहीं जा सकती। इसी क्रम में यह वर्ष भी 'राज-२', 'लक बाइ चांस', 'विक्टरी', 'बिल्लू', 'आ देखें जरा', 'एक-दी पॉवर ऑपफ वन', 'कम्बख्त इश्क', 'वांटेड', 'दिल बोले हड़िप्पा' जैसी परंपरागत पिफल्मों की गवाह रही, जहाँ वस्त्रा विन्यास और संवादों के अलावा शायद कुछ भी नया नहीं था। शायद यहाँ नए दिखने की जिद भी नहीं थी, लेकिन वेक अपसिड', कुर्बान, अजब प्रेम की गजब कहानी, कॉपफी हाउस, आलू चाट, जैसी पिफल्में जो नएपन के दावे के साथ आयीं, उनका भ्रम भी बस पहले शुक्रवार तक कायम रहा। यहाँ आमिर खान की ईमानदारी याद आती है, जिन्होंने 'गजनी' प्रस्तुत करते हुए कहा था, यह पिफल्म उन्होंने हिन्दी सिनेमा के लोकप्रिय पफामूर्ले के आधार पर बनायी है।
इस वर्ष कुछ नयेपन का निर्वाह करते हमेशा की तरह मधुर भंडारकर 'जेल' के साथ आए। कबीर खान ने 'न्यूयार्क' दिखाई। नंदितादास 'पिफराक' लेकर आयीं, आशु शिखा की 'बाबर' को भी इस क्रम में याद कर सकते हैं, अनुराग कश्यप 'देवदास' के नए अवतार 'देव डी' के साथ आए। 'पा' ने भी एक हदतक नवीनता का अहसास कराया और आशुतोष गोवारीकर की 'व्हाट्स योर राशि' ने भी। लेकिन यह भी सच है कि इनमें से शायद ही किसी पिफल्म को देखते हुए कुछ नया देखने का बोध् हो पाता है। शायद इसलिए कि इन अध्किांश पिफल्मों में ऐसा कुछ नहीं जो हम नहीं जानते हों, चाहे 'पिफराक' हो या 'जेल' जानी पहचानी द्घटनाएँ, जाने पहचाने दृश्य उद्वेलित तो करते हैं, लेकिन अखबार की एक अच्छी रपट की तरह। कला के लिए यदि नवीनता कोई शर्त होती है तो उसका अभाव इन पिफल्मों में भी झलकता है।
आमिर खान की 'थ्री इडियट्स' शायद इस वर्ष के साथ दशक की भी आखरी पिफल्म होगी। निश्चय ही 'लगान' और 'तारे जमीन पर' की तरह यहाँ भी नयेपन का विश्वास है। सिर्पफ इसलिए नहीं कि यह आमिर खान की पिफल्म है, इस लिए कि 'लगान' में जब उन्हें अवध के गाँव को तलाश करने की जरूरत पड़ी थी तो वे वरिष्ठ साहित्यकार के. पी. सक्सेना की शरण में गये थे। डिस्लेक्सिया ग्रसित बच्चे को एक पात्रा के रूप में वे परिकल्पित तब करते हैं जब कई वर्षों से इस क्षेत्रा में काम कर रहे अमोल गुप्ते दम्पत्ति का साथ उन्हें मिलता है। वास्तव में नयापन पफार्मूले की पफैक्ट्री से नहीं आ सकता, वह उस विश्वास से आता है जिससे कोई भी कलाकार अनुभव और ज्ञान की खराद पर द्घिस कर हासिल करता है। यह गुरुदत्त को हासिल था। इसीलिए उन्होंने 'आर-पार' भी बनायी और 'प्यासा' भी। शैलेन्द्र को हासिल था इसीलिए 'तीसरी कसम' बनाने राजकपूर वहिदा रहमान के साथ वे पुर्णियां के गाँव तक पहुँच गए। लेकिन अब पिफल्मकारों को विश्वास ही नहीं कि वे जो सोच रहे हैं, समझ रहे है वह सही है। इसीलिए वे दर्शकों की सोच समझ को परखने की कोशिश करते है, बावजूद इसके कि उनकी यह कोशिश बार-बार असपफल होती है। वे शायद भूल रहे हैं उनकी इसी कमजोरी का पफायदा उठाने के लिए हॉलीवूड ने कमर कस ली है। हिन्दी सिनेमा ने जगह छोड़ी है तभी '२०१२' पूरी दुनिया में एक साथ रिलीज होती है, भारत में भी और हिन्दी में। पता नहीं कितना गवां कर सीखेगी हिन्दी सिनेमा कि कला का कोई पफार्मूला नहीं होता, उसका महत्व उसकी मौलिकता में ही है, नवीनता में ही है। लेकिन हम भी प्रियंवद की कहानी 'खरगोश' पर पिफल्म बनाने वाले )षि चंदा के साहस, जज्बे, मेहनत और कल्पनाशिलता को पिफल्मकार रजत कपूर के साथ सलाम करना चाहेंगे, जिसके चलते अगले दशक में कुछ अनूठी पिफल्मों की आधरशिला रखे जाने की उम्मीद की जा सकती है।
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;लेखक पिफल्म समीक्षा के लिए राष्ट्रीय पिफल्म पुरस्कार से सम्मानित हैंद्ध
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