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'अरे का भिया? हरिराम बेटा खूब जुलुम कर रहे हो। हम आधे द्घंटे से मांग रहा हूँ बाकिर चाह का गिलास बार-बार हमरी तरपफ दिखाके दूसरे को दे दे रहे हो।'
'चच्चा तीन बार कह दिया अब समाई नाही है। देखा, आज तो मीठा-परेमी ब्यौहार में इहाँ बैठकर आप चार बात कर ले रहे हैं। बाकी पहिले ही एक सौ बहत्तर रुपया हो गया है। आखित हमरे भी चार गदेला हैं।'
'अरे तो बेटा हम कहीं भाग रहा हूँ। ई हफ्रता साला परेशान कर रहा है। नाहीं तो एक सौ बहत्तर का नौ सौ बहत्तर का?' |
अंततः चाय वाले पर इस बात का असर हुआ। उसने अनमने भाव से ही सही चाय का गिलास थमा दिया। बोला- 'बड़ा बुजुरग के नाते मुँह की लाली रख दे रहा हूँ। खाली चाह लीजिए। पाव-मक्खन हिसाब पूरा होने पर।' बुजुर्गवार ने बेमन से चाय का गिलास थाम लिया। कुछ चिर हरिराम को देखते रहे जो अपने में व्यस्त था। अंततः उन्होंने पहला द्घूंट पिया।
उनका नाम लालता प्रसाद सोनकर है। लंबे कद के सांवले और झुर्रियों द्वारा द्घेरे जा रहे चुचुके चेहरे वाले इस आदमी ने एक बार मोतियाबिंद का ऑपरेशन करवा लिया है पिफर भी दृष्टिदोष का शिकार है। छह पफुट दूर की चीजें भी धुंधली दिखाई देती हैं। सब उन्हें एक नंबर का लपफाड़िया और मक्कार कहते हैं लेकिन सीधे-सीधे उन जैसा सज्जन पूरी आजादपुर मंडी में नहीं दिखाई देगा। पिफर भी जल्दी ही पता चलेगा कि स्थितियों और लोगों ने उन्हें इतना ल(ड़ बना दिया है कि स्वयं लालता प्रसाद यह भूल चुके हैं कि उनकी जिंदगी में सम्मान और अपमान क्या है?
आजकल लालता प्रसाद बहुत खिन्न हैं। टमाटर के माशाखोर उनके बड़े दामाद ने उनकी बेटी पर वे जुल्म ढाए हैं कि अब मामला बर्दाश्त से बाहर हो गया है। बनारस में बड़ा बेटा तंगहाल है। छोटा उनके साथ दिल्ली में है। खुद पकाकर खाता है, बाप को पूछता तक नहीं। एक ही कमरे में रहने के बावजूद दोनों को एक दूसरे से कोई मतलब नहीं है। एक दिन सवेरे ही लालता प्रसाद ने आँखों पर गमछा रख कर रोना शुरू किया। साथ रह रहे बेटे का संबंध अपने जीजा के बड़े भाई की बेटी से ही हो गया है। द्घर में झगड़े और मारपीट की नौबत रोज ब रोज आई हुई है।
लालता प्रसाद थोड़े हतप्रभ हो गए हैं। बेटी का उत्पीड़न बेटे की करनी की वजह से हल्का हुआ जा रहा है। वे अपना नैतिक बल खो रहे हैं। कुछ सूझ नहीं रहा है कि क्या करें? लोगों से कहकर अपनी ग्लानि कम करना चाहते हैं लेकिन समय की कमी से कोई बात पूरी नहीं हो रही है। किसी से बात करना शुरू करते हैं तब तक कोई ग्राहक आ जाता और बात अधूरी छूट जाती है।
'राजू ने अपनी द्घर वाली की वो बुरी गत बनाई है कि रोएँ खड़े हो जाते हैं। लेकिन इसमें बाबा का भी कम दोष नहीं है।' ठेली वाले पप्पू ने बताया जो लालता प्रसाद के पड़ोस में रहता है। उसने तपफसील से बताया- 'दरअसल सारे पफसाद की जड़ बाबा हैं। एक तो बात-बेबात लड़ाई-झगड़ा करते हैं। पति-पत्नी के बीच भी नाक धंसाते हैं। ऊपर से अभी झगड़ा करेंगे और अभी आप देखेंगे कि राजू के साथ बैठकर चुक्कड़ भरेंगे। कलिया खाएँगे। यहाँ आम लोगों के सामने रोएँगे-गिड़गिड़ाएँगे और मौका पड़ने पर धौंस भी दिखाएँगे लेकिन सचमुच ये बहुत बड़े भगोड़े हैं। एक बार आम का सीजन द्घाटा दे गया। कुछ तो सारा बागान सुभिक्षा-रिलायंस ने खरीद लिया था। दूसरे इनके बड़े बेटे ने जो आम का पाल लगाया था वह सुलग गया। चालीस मन आम में आग लग गई जैसे। एक दाना भी साबुत नहीं बचा। अब वह लड़का जब लाख डेढ़ लाख के कर्जे में दब गया तो ये बनारस से भाग खड़े हुए। यहाँ से उसे क्या देंगे कमाकर। खुद का पेट तो भरता नहीं। रोज आढ़तियों से माँ-बहन होती है। कई बार लात खा चुके हैं लेकिन जाएँगे कहाँ। यह मंडी छोड़कर कहाँ ठिकाना मिलेगा। उमर रही नहीं। आँख से कम दिखता है लेकिन सबसे बड़ी बात तो यह कि टेंट ही खाली है।'
पप्पू थोड़ा थमा और इधर-उधर देखकर पफुसपफुसाने लगा- 'राजू से हजारों बार झगड़े हुए। इनके दोनों दामादों ने मिलकर इन्हें बुरी तरह पीटा है। एक बार तो राजू ने अपनी द्घरवाली की जांद्घ में सरिया लाल करके डाल दिया था। दूसरी औरत होती तो मर जाती। बाबा अब उसे बिगाड़ रहे हैं। चार बच्चों की माँ की दूसरी शादी कराने पर तुले हैं। थाने से कुछ नहीं हुआ तो महिला आयोग में केस लिखाया है। लेकिन अब उसे पूछेगा भी कौन। शकल सूरत है नहीं...'
राजू सोनकर दुबला-पतला, काला और नाटा आदमी है। मिचमिची आँखें हमेशा चढ़ी रहती हैं। दो नंबर के टमाटर की माशाखोरी करता है। रोज एक अद्(ा पीता है और लगातार पान चबाता रहता है जिसकी पीक उसके गमछे और कपड़ों को रंगीन बनाती रहती है। राजू अपने ससुर को खड़ी गालियाँ देता है और मंडी में ही काटकर पफेंक देने की द्घोषणा करता है, क्योंकि बकौल राजू ऐसे ससुर को काटने से कोई दोष पाप नहीं लगता।
राजू को दुख है कि उसने इन लोगों को मछली तो खिलाया ही तालाब का पता भी बता दिया और ये लोग उसी की जड़ काटने पर तुले हैं। जब राजू ये बातें बताता है तो उसकी आँखें बुरी तरह मिचमिचाने लगतीं और मालूम होता कि अब आँसू बह निकलेंगे। उसका चेहरा दयनीय हो उठता और अनेक द्घटनाओं और झगड़ों का हवाला देते हुए वह पूछता कि बताइए मेरा कसूर क्या है?
लालता प्रसाद के बारे में स्वयं लालता प्रसाद बताते हैं। उनके माँ बाप की एक दर्जन संतानें थीं। वे सबसे बड़े थे। उनकी शादी एक सम्पन्न सोनकर परिवार में हुई जहाँ से उन्हें नवासा मिला। बाद में जवानी के दिनों में वे नवासा संभालने के लिए ससुर के द्घर आ गए। 'भगवान की दया से कड़ी मशक्कत की जरूरत नहीं थी। आराम से दाल-रोटी और पुदीने की चटनी मिल जाती थी। इससे ज्यादा सोचना दूसरे का सेन्हुर देखकर अपना लिलार पफोड़ना था भिया!' बताते हैं लालता प्रसाद।
धीरे-धीरे लालता के नौ बच्चे हो गए। चार बेटे पाँच बेटियाँ। खर्च ही नहीं समस्याएँ भी बढ़ीं। ससुराल के नवासे में केवल खपरैल का द्घर साबुत था। जाहिर है द्घर रोटी में नहीं बदल सकता था। लालता प्रसाद कहते हैं- 'हमरी दुलहिन ने माथे पर दौरी रखकर सब्जी बेचने की बात चलाई। यहाँ उनका मायका था कोई लाज की बात नहीं थी लेकिन हम इसे कैसे बरदास करता। हमने कहा, खबरदार! बोटी-बोटी काट डालूँगा अगर ड्यौढ़ी से गोड़ बाहर निकला तो।' अभी भी लालता प्रसाद का चेहरा लाल हो उठा था।
'जाड़े के दिन थे। उन दिनों हमने चण्डीगढ़ से मटर खरीद कर कलकत्ते में भेजा था। तीन पाटनर थे और उस जमाने में ;१९८६द्ध हमने साठ-साठ हजार बनाए। खूब मौज-मस्ती से जाड़ा कटा। लेकिन उन्हीं दिनों की बात है। तीनों पाटनर बिजनस की खुशी में खूब पीते थे। समझ लीजिए कि सारा पैसा हमने पानी की तरह बहा दिया।' उन्होंने इतने गर्व से बताया गोया यह एक महान कार्य था और इसकी दाद मिलनी चाहिए।
आगे का किस्सा उनके एक पुराने पट्टीदार लालजी सोनकर ने सुनाया था- 'लालता द्घर से बहेंडु़आ थे। बाप ने जो सतरोहन पैदा कर दिया था उसे कभी दाना-द्घास मिले कभी उपवास हो। वह तो खटिक होने का यही पफायदा था कि इधर-उधर बाग-बगैचा में से कुछ झटक लेते थे। ससुरार में भी ये रहे जंगरचोर के जंगरचोर। कितने दिन कोई जंगर चोट्टे को ढोएगा। ऊपर से खुद एक बड़ी पफौज खड़ी किए थे। साले अलग हो गए। अब क्या ये खपड़ा खाएँगे। उस पर तुर्रा यह कि बड़के खटिक हैं। बिजनस बड़ा करेंगे। जब-जब एक झोंक में लखपति बनने की कोशिश किए तब-तब मरभखपति होकर रहे।'
वास्तव में लालजी ने भी एकबार लालता से पार्टनरशिप की थी। टमाटर की माशाखोरी थी। लालजी खरीदते लालता प्रसाद बेचते। शाम को दोनों ठर्रा पीते और यह सब पंद्रह दिन से अधिक नहीं चला। माँ-बहन की गालियाँ देते हुए दोनों अलग हो गए। इस बात के छह साल बीत गए लेकिन आज भी दोनों एक दूसरे को देखते ही बद्दुआएँ देते हैं।
लालता प्रसाद अपने गौरवपूर्ण अतीत को याद कर चहकने लगते हैं लेकिन लालजी उनके पतन से शर्म महसूस करते हैं। यूँ लालजी और लालता प्रसाद पद में साढ़ू होते थे, लेकिन राजू के नाते अब उनका रिश्ता दामाद और ससुर का है क्योंकि राजू लालजी के चचेरे भाई हैं।
लालजी के बेटे शिवकुमार कहते हैं- 'नाना ने अपनी दोनों लड़कियों का बेचनामा कर दिया था। बब्बा ने एक बार पैसा लगाकर बिजनस किया था। तभी के पचास हजार लिए थे। जब नहीं अंटा तब पैर पर गिर पड़े कि राजू और बहादुर के लिए दोनों लड़कियाँ ले लीजिए। बब्बा ठहरे दयालु आदमी। सोचे कि बिरादर है। हमारी उसकी इज्जत दो थोड़े है। तब बाजा-गाजा से बारात ले गए। लेकिन इस बेशर्म आदमी को क्या कहूँ, बुढ़ापे में बेटी दामाद के द्घर पड़ा हुआ है।'
दरअसल लालता प्रसाद एक ऐसी उपकथा बन गए हैं जो हर विभीषिका की महाकथा के तलछट में पाई जाती है। भारत में मुख्यधारा के समानांतर जो प्रतिधारा विकसित हुई उसके एक अनिवार्य पात्रा की तरह लालता प्रसादों की एक पूरी जमात देश में मिल सकती है। यह अभाव, बेरोजगारी, अपराध, लाचारी और अलगाव की ऐसी बिखरी हुई कहानी है जिसे करीने से जोड़ देने पर एक दर्दनाक महाकाव्य बन जाएगा।
शहरी निम्नवर्ग के वे श्रमिक चौथे-पाँचवें स्तर पर काम करते हुए जीते हैं। कभी-कभी अपनी बेहतरी की जोर मारती इच्छाओं के वशीभूत जोखिम उठाने की कोशिश करते हैं लेकिन अक्सर ही मुँह की खाते हैं। जिन्हें भारत की परजीवी अर्थव्यवस्था ने इतने तनावों और दुर्दिनों का उपहार दिया है कि क्षणिक आमोद-प्रमोद तथा सबसे सस्ती शराब भी उन्हें आर्थिक रूप से तोड़ती है। लालता प्रसाद जैसे न जाने कितने प्राणी रो८ा ब रो८ा स्थितियों से टकराते-टकराते कब आपस में टकराते हुए भयानक परिणति तक पहुँचते हैं किसी को पता नहीं चल पाता।
धीरे-धीरे लालता प्रसाद एक ऐसी हवाई दुनिया में शामिल होते गए जिसका कोई आधार न था। वे स्वभाव से चापलूस हो गए थे और छोटे-बड़े सभी लोगों की मौके बे मौके चापलूसी करने लगते और जैसे ही काम निकलता, जोकि थोड़े-बहुत पैसों का लेनदेन होता, वे द्घूमकर भी उसकी ओर न देखते। यहाँ तक कि हजार बार मांगने पर भी उनकी जेब से पैसा न निकलता। सच तो यह है कि जेब में कुछ होता ही नहीं था। लेनदार को पाँच सौ चाहिए होता तो उनकी जेब से निकलते साठ रुपये। अंततः मामला मारपीट और गालीगलौज से होता हुआ लेन-देन के खात्मे पर जाकर ठहरता।
लेकिन बार-बार निहंग होते जाते लालता प्रसाद एक बार पिफर खड़ा होने की कोशिश करते। पिछली हानि को लाभ में बदल डालने पर आमादा उन्हें यह ज्ञान ही न रहता कि धीमे चलना चाहिए। वे किसी दिन पाँच सौ कमाते तो अपने को पंद्रह हजार का आदमी समझने लगते। इस हिसाब से वे एक की जगह दो अद्धा पी डालते और सुअर की जगह बकरे का मांस पकाते। लेकिन अक्सर सौ-पचास ही बनते थे और कभी-कभी गाँठ की मामूली पूंजी भी डूब जाती। तब लालता प्रसाद पफांका करते और हफ्रते दो हफ्रते बौंड़ियाने के बाद किसी से सौ दो सौ रुपया कर्ज लेकर पिफर काम शुरू करते।
सिगरेट का भरपूर कश लेकर इत्मीनान से धुआँ उगलते शिवकुमार ने कहा 'लालता प्रसाद बात के पक्के भी नहीं हैं जिससे बिरादरी में उनकी कोई इज्जत नहीं रह गई है। बनारस से भागने की कहानी और भी है- मंझले बेटे की शादी तय किया था उन्होंने कापफी माल मत्ता लेकर। पता नहीं क्या हुआ कि लड़के ने शादी से इनकार कर दिया। तब बिरादरी की पंचायत जुटी। मर्दवा हियां से अभी वैसी पंचाइत कभी देखे ही नहीं थे। चार दिन तक खाना-पीना और मनसौदा चलता रहा। लोगों ने चांप चढ़ाया कि सारा माल वापस करो या शादी करो। अब माल हो तब तो दें। आन के धन पर कनवां राजा बने थे। जैसे चिल्होर के खोथे में कलिया नहीं मिलता वैसे ही लालता के द्घर में खोटी अठन्नी न थी। सोच रहे थे कि लड़की वाले से सब ऐंठ लेंगे और दांव उल्टा पड़ गया। बिरादरी के सामने भगई खोल दिए। खपड़ा बेचने की नौबत आ गई। आखिर बड़े लड़के ने हाँ भरी कि दंड भरेगा। तब चालीस हजार का कर्ज अपने माथे पर लेकर उसने दंड भरा। आखिर लालता का पफर्ज बनता था कि बेटे के सिर का बोझ हल्का करते लेकिन मौका पाकर वहाँ से भाग निकले और दामाद के द्घर रोटी तोड़ रहे हैं। आज को वह लड़का अपने पाँच बच्चों के साथ इनके भी सात प्राणी का खर्चा ओज रहा है।'
इसके बावजूद लालता प्रसाद इस मुद्दे पर कोई बात नहीं करते। कुछ गौरवपूर्ण दिनों की याद ताजा करते हुए अपने दामादों की आलोचना करते- 'बड़कू जने से गांजा, शराब, चरस, मरक, हुक्का कुछ भी नाहीं बचा है भिया। बरबाद कर दिया सब कुछ। ससुरा किसी महीने थाना-पुलुस, मार-पफौदारी से बांयत नहीं जाता। हम क्या करूँ, लड़की देके पछता रहा हूँ। बोलने पर लड़ने लगते हैं।'
लालता प्रसाद जेब के भीतर रखे मोमजामे को खोलकर पान निकालते हैं और मुँह में रखकर उंगली से चूना चाटते हैं। कुछ चिर चबाते हैं और पिफर बनारसी पनहे की तरह मुँह उठाए गुलगुलाती आवाज में बताते हैं- 'हमहूं अब नीत से काम लिया हूँ भिया। बहादुर को अपनी ओर मिला लिया हूँ। ए दपफे राजू झगड़ा किए तो बहादुर ने ऊ कुटान कूटा है कि थाई हो गए हैं। अब हिम्मत ढीली हो गई है।'
शिवकुमार अभी पचीस-छब्बीस साल का युवक है। वह टमाटर छांटने में माहिर माना जाता है। वह स्वयं कहता है कि मैं टमाटर देख भर लूँ, पूरे क्रेट नहीं, पूरे ट्रक का हाल बता दूँगा। लालता प्रसाद उसे लबरा-झबरा कहते हैं। झूठा और चालबाज, जो भाव गिराकर खुद तो कम तौलता है मारे दूसरे माशाखोर जाते हैं। शिवकुमार भी उन्हें निपनिहा और गोबर का चोंथ कहता है। इसी गुस्से में उसने कहा- 'दरअसल भिया, चाची कभी भी चच्चा के प्रति वपफादार नहीं रही हैं। चच्चा पैसा कमाकर देते हैं और वे अपने बाप-भाई को दे देती हैं। करेक्टर लूज पहले से थीं। अब जब अपने चार बच्चे खाने वाले हैं तो कितने दिन तुम नैहर की मदद करती रहोगी! इसी से चिढ़कर चच्चा हाथ उठाते हैं। लेकिन उनको भी पता है कि यह अन्याय है। मारे चिंता के उनका शरीर आधा रह गया है। पहले देखते तो पहाड़ की तरह पहलवान थे।'
धीरे-धीरे लालता प्रसाद और राजू में एक ऐसा शीतयु( चलने लगा जिसमें कब कौन किसको कौन-सा दाँव मार दे यह पता नहीं चलता। अक्सर ये दाँव टमाटर के माध्यम से चलता। एक दिन अपने नए ग्राहक द्वारा राजू से खरीदे गए टमाटर के दोनों क्रेट उन्होंने दो नंबरी कहकर वापस करवा दिया।
यह एक व्यावसायिक पटखनी थी। बहादुर और राजू तब साझे में माशाखोरी करते थे। लालता ने रोजी पर लात मार दिया था। उनके काम से दोनों भाइयों को नुकसान हुआ। तब दोनों ने गालीगलौज और मारपीट की और इस प्रकार लालता की उस नीति की नींव हिल गई जिसके सहारे उन्होंने बहादुर को राजू के खिलापफ अपने पक्ष में खड़ा किया था।
इस नीति की रही-सही बुनियाद उनके छोटे बेटे की करनी से ध्वस्त हो गई। लड़की राजू और बहादुर के सगे बड़े भाई की बेटी है। छोटा बेटा बीरू भी अपने बहनोई के द्घर में ही रहता था। पता नहीं किन परिस्थितियों में प्रेम के अंकुर पफूट पड़े। सभी ने मुखालिपफत की। बीरू के खिलापफ धुव्रीकरण हो गया। मुहल्ले भर में बात पफैलते देर न लगी और पूरे परिवार को लेकर लोग को-को लो-लो करने लगे।
बीरू पर दिल्ली छोड़कर जाने का दबाव बनाया गया। लड़के के मामले में बीरू ने पल्ला झाड़ लिया कि मैं तो बचता हूँ वही नहीं मानती। लालता प्रसाद लाचार पड़ गए। जिस द्घर में रह रहे थे उसी में इतने झगड़े। वे प्रायः अपने दामादों के आगे झुक गए और इस बात पर सहमति जताई कि बीरू बनारस चला जाय।
लेकिन शीद्घ्र ही वे अपनी बात से पलट गए। उन्हें लगा कि बीरू के बनारस जाने की दशा में वे बिल्कुल अकेले पड़ जाएँगे। भले ही उससे कोई सहारा न मिलता हो लेकिन रहने से दोहास बना रहता है। लिहाजा इस मामले में उनकी ढिलाई देखकर दामादों ने उनके ऊपर धावा बोल दिया। बीरू डर के मारे पहले से ही कहीं और रहने लगा था।
बहुत बुरी हालत थी। द्घर में अन्न का दाना नहीं था और जेब पूरी तरह खाली थी। कई दिन बिना भरपेट भोजन के गुजर गए। चाय-ब्रेड उधार मिल जाती थी लेकिन दो दिन से अधिक उधारी की गुंजाइश न थी। राजू ने मंडी में हवा उड़ा दी थी कि लालता प्रसाद सदा के लिए बनारस जाने वाले हैं।
वे अजब मुसीबत में पफंस गए थे। नए सिरे से काम शुरू करने के लिए हजार रुपए की आवश्यकता थी। आढ़ती का बकाया पहले से चल रहा था जिसके न देने की एवज में वे मंडी भी मुँह बचाकर जाते थे। आगे कुछ सूझता नहीं था।
एक अजीब प्रतिहिंसा, दयनीयता और साहस लालता प्रसाद की आत्मा में भरने लगा। यह भी जीने का एक तरीका होता है। इसलिए प्रारंभिक उठान में ही इसने लालता प्रसाद को नयी ताकत दी।
सबसे पहले वे मंडी गए और दाँत दबाकर अपनी तकलीपफ सुनाते हुए लोगों से कहा कि उनके साथ बहुत बड़ा अन्याय हो रहा है। बरसों के शत्राु लालजी भी वहीं थे। वे मुस्कराए और लालता के लिए चाय मंगवाने लगे। उन्होंने सारी बातें तपफसील से सुनीं और यह भरोसा दिया कि चार द्घड़े पास के रहते हैं तो टक्कर होती ही रहती है। हम आपस में चाहे जो हों लेकिन मुसीबत में एक हैं। उन्होंने लालता प्रसाद को टमाटर के शेड से रिजेक्टेड टमाटर बीनकर माशाखोरी करने की सलाह दी। बिना पूंजी का काम था। लालता प्रसाद मान गए।
लेकिन उनके भीतर जो आग धधक रही थी वह धीरे-धीरे प्रज्ज्वलित होती जा रही थी। बहादुर से रिश्ता ठीक था लेकिन वे राजू के साथ कारोबार करते थे इसलिए लालता प्रसाद ने तय कर लिया कि अब दोनों को ही निशाना बनाना पड़ेगा। लेकिन कोई विशेष मुद्दा हाथ में न होने के कारण उन्होंने अपनी बेटी का सहारा लिया। उसे उकसा कर राजू के खिलापफ महिला आयोग में उत्पीड़न का मामला दर्ज करवा दिया। मंडी के पूरे डी ब्लॉक में किसी ने यह प्रचारित कर दिया था कि अब राजू को जेल हुए बिना न रहेगी। लालता प्रसाद मंडी का रगड़ा द्घर में निकालते और द्घर का झगड़ा मंडी में सुलझाने की कोशिश करते। मामला बेहद हास्यास्पद और जटिल होता जा रहा था।
बौखलाए हुए राजू ने इन्हीं स्थितियों में मौका देखकर एक दिन आढ़ती को खबर दी कि लालता ए ब्लॉक के बीच में टमाटर की माशाखोरी कर रहे हैं। आढ़ती कापफी दिनों से उन्हें ढूँढ़ रहा था। लालता प्रसाद को पकड़ मंगाया और कई जूता मारने के बाद अपना बकाया मांगने लगा। लालता प्रसाद ने रो-रोकर यह समझाने की कोशिश की कि उनके साथ बड़ा अन्याय हुआ है। कि माशाखोरी में लगातार द्घाटा उठाना पड़ा है और खाने के लाले पड़े हैं। लेकिन आढ़ती इस तरह की बातें सुनते-सुनते अपनी पूरी उम्र गुजार चुका था। अब उसे केवल अपनी रकम से मतलब था और रकम न मिलने की दशा में उसने लालता प्रसाद को कोठरी में बंद करवा दिया।
राजू ने उन्हें करारी शिकस्त दे दी थी। यह सभी जानते थे। लालता प्रसाद तिलमिलाकर रह गए लेकिन क्या कर सकते थे। अंततः राजू ने बीरू को बुलवाया और आढ़ती की रकम के बारे में पूछते हुए कहा- 'सारी मरजाद मंडी में बिक रही है। क्या यही दिन देखना बाकी था।' लेकिन बीरू इधर की सारी कमाई जुए में उड़ा चुका था। उसने जेब ही उलट दी।
रास्ता यह निकला कि यदि बीरू वापसी की कबूल करे तो राजू और बहादुर आढ़ती की रकम चुका कर लालता को छुड़ा लें। आखिर में चार आदमी को ८ाामिनकार बना कर बीरू के मत्थे कुल डेढ़ हजार की रकम मढ़ी गई और लालता छुड़ा लिए गए।
हारे हुए सिपाही की तरह उस दिन लालता प्रसाद बिना कुछ बोले द्घर चले गए।
लेकिन जल्दी ही उन्होंने अपना नया अभियान शुरू कर दिया। उन्होंने यह खबर उड़ा दी कि होली के पहले वे लड़की को लेकर बनारस चले जाएँगे। यहाँ तक कि उन्होंने लड़की की नई शादी की बात भी लोगों को बताई और राजू के कुछ खास मित्राों से उस दुहाजू लड़के के बारे में बताया जिसकी बेनियाबाग, बनारस में सब्जी की दुकान है।
अब मुँह छिपाने की बारी राजू की थी। साथ के लोग मजाक कर देते और वह तिलमिला उठता।
लालता प्रसाद का काम इधर बीच जम नहीं पा रहा था। वे चाहते थे कि कुछ रकम बने तो वे बनारस चले जाएँ। वहाँ उनका इरादा बैंक से लोन लेकर द्घर को पक्का बनवाने और बीरू की शादी कर देने का था। महिला आयोग के दबाव से राजू से तीस-पैंतीस हजार वसूला जा सकता था और इस रुपए से वे बनारस में सब्जी की एक दुकान खोलना चाहते थे। लड़की की शादी का कोई इरादा न था। अगर वे चाहते तो भी शायद शादी न हो सकती थी। उन्होंने आगे के दो महीने की योजना बनाई और राजू को द्घेरने के लिए यह खबर पफैलाना शुरू किया कि अगर राजू लड़की को बनारस जाने के लिए हर्जा-खर्चा दे तो महिला आयोग से केस उठाया जा सकता है। लेकिन राजू ने कोई प्रतिक्रिया न व्यक्त की।
राजू बुरी तरह परेशान था। परिवार तो पहले ही बिखर गया था। अब नौबत दूसरी आने वाली थी। लालता प्रसाद ने उसके पौरुष को खुलेआम चुनौती दी थी। उसकी पत्नी अपने चार बच्चों को छोड़कर पिता के कमरे पर रह रही थी।
कोई नहीं कह सकता कि पीली पड़ चुकी यह ठठरी कभी एक युवती रही होगी और इसने दो बार पे्रम किया और दोनों बार धोखा खाया है। अब उसमें जवानी के कोई लक्षण शेष न थे और वास्तव में उसे देखकर द्घिन आती थी। गालों की हड्डियाँ उभर आई थीं और इसी के प्रभाव से दोनों निस्तेज आँखें कोटर में धंस गई थीं। वह बिल्कुल बदरंग और अनाकर्षक हो चुकी थी और केवल दाँत ही ऐसे अंग थे जिनसे उसकी तरपफ देखने का एक बहाना बनता था। उसके दाँत वास्तव में सुन्दर थे। लेकिन दिखते ही तब थे जब वह बोलती या मुस्कराती थी। लेकिन दोनों ही स्थितियों में उसकी सूरत वीभत्स हो उठती थी। बोलती थी तो जैसे हलक से आवाज नहीं निकलती थी। लगता था जैसे कुएँ से आवाज निकल रही है। तब उसके ऊपर दया आती थी। लगता जैसे अब पफूट-पफूट कर रो देगी। जब कभी वह मुस्कराती तो उसका मुँह विकृत हो जाता और पिफर देखा न जाता।
राजू के साथ उसने बीस वर्ष गुजार दिए लेकिन उसकी स्मृतियों में राजू का प्रेमिल चेहरा बदरंग हो चुका है, जमाने भर की गर्द पटी पड़ी है। अब उसके लिए राजू केवल एक वहशी-कामातुर सुअर भर था जिसे एक देह चाहिए थी। बीते अठारह-उन्नीस वर्षों में शायद उसने अपने पति का चेहरा ठीक से नहीं देखा था। स्खलन तक पहुँचने को पागल कुछ क्षणों के उपरांत उसने राजू को एक दरिंदे में बदलते हुए देखा है जो उसके चेहरे पर थप्पड़ों की बरसात करता। लातों और डंडों से उसकी हड्डी-पसली तोड़ता और मुस्कराते हुए बीड़ी या सिगरेट से उसके गुप्तांगों को जला डालता। यहाँ तक कि लगभग रोज ठर्रा चढ़ाने वाले राजू के हाथ में सिगरेट देखकर वह समझ जाती थी कि यह आदमी आज सिगरेट का जलता सिरा उसके शरीर के किस भाग पर रखने वाला है।
वह कहीं भाग नहीं सकती थी। दुनिया छोटी थी और चारों तरपफ अंधेरा था। दरअसल वह राजू के दो सवालों के बाड़े में कैद थी जिसका दरवाजा आज तक नहीं खुला। हर बार पीटने के दौरान राजू पूछता- 'बोल कुतिया तू किसे चाहती है? उन दोनों को या मुझे?' इसका कोई जवाब न था। राजू पिफर पूछता- 'तूने मेरे रुपए अपने बाप को क्यों दिए?' इसका भी कोई जवाब नहीं था।
राजू एक जटिल मनःस्थिति वाला चरित्रा था। उसके सामने दूसरी औरत का कोई विकल्प न था। उतने पैसे न थे। उसकी पत्नी उसकी देह के लिए एकमात्रा आधार थी। वह बार-बार सोचता कि वह उसे जरा भी प्यार नहीं करती। उसका विश्वास इसलिए भी पुख्ता होता जाता था कि इतनी पिटाई के बाद कोई औरत राजू को क्यों चाहेगी! उसे भयानक गुस्सा आता और उसके हाथ पिफर उठ जाते।
उन दिनों जब उसे पहली बेटी हुई तो भी यही सवाल पूछे जाते रहे लेकिन उसने जवाब नहीं दिया। पिटी और सिगरेट से जलाई गई। यहाँ तक उसके पिता भी सब कुछ जानते थे लेकिन पति-पत्नी के बीच में कोई बोलने वाला न था। लालता प्रसाद तब पहली बार दिल्ली आए थे।
उन दिनों उसमें थोड़ी बहुत संवेदना बाकी थी और पास की ही एक पफैक्ट्री में वह मजदूरी करने जाने लगी। इस पर उसने पति और पिता दोनों को अपने खिलापफ पाया। इससे उनकी नाक कट रही थी। पति ने पफैक्ट्री पहुँचकर उसे लातों से पीटा और बाल पकड़कर द्घसीटते हुए वैसे ही द्घर लाया जैसे द्रौपदी के बाल पकड़कर खींचते हुए दुशासन लाया था। उसके बाद इस औरत ने कभी किसी चीज के बारे में न सोचा। न मरी न जीने में उत्साह दिखाया।
इस बार वह ज्यादा बुरी तरह पीटी गई और टूट गई। औरतें पिटती ही इसलिए हैं कि वे पत्नियाँ, बहनें या बेटियाँ होती हैं और उनकी हदें बहुत कम होती हैं। बेचारी जहाँ से सिर उठाएँगी, गुलामी की दीवार से ही लड़ेगा। जंजीर कितनी लंबी और सुन्दर हो, है तो जंजीर ही। हारकर वह लालता प्रसाद के साथ रहने लगी। उसने दिल्ली महिला आयोग में अपने पति के खिलापफ बयान दिया। और अब हर वह काम करने पर राजी थी जो उसके पिता चाहते थे। हालांकि महिला आयोग में केस का नोटिस भी राजू को नहीं मिला लेकिन कई लोगों ने उसे सलाह दी कि भूल से अब पत्नी पर हाथ मत उठाना। पुलिस में केस जाते ही तुम्हारी जिन्दगी जेल में बीतना चालू होगी।
राजू खून का द्घूंट पी रहा था।
पप्पू ठेली वाले ने लालता से कहा- 'बाबा ये क्या सब हो रहा है। चारों तरपफ सोर है कि आप राजू की वाइपफ को बनारस ले जा रहे हैं।'
'ठीक सोर मच रहा है भिया! अब राजू मुँह काहें छिपा रहे हैं। करैं मुकाबिला।'
'वो तो ठीक है बाबा! बाकिर केहूं का पलिवार तोड़ना ठीक है?'
'पलिवार की आज का चिंता है भिया! बीस साल से लड़की कीरा की नहिंनी कुचा रही थी तो कहाँ रहे?' लालता तैश में आ रहे थे।
पप्पू ने निस्पृह भाव से कहा- 'बाबा द्घर ही में ई नकब८ानी ठीक नहीं है। हमरे बाऊजी कह रहे थे कि रिश्ते को टमाटर की ढेरी पर मत रखो। भार से टमाटर पफूटेगा तो एक के बाद एक सड़ने लगेगा। पिफर न टमाटर साबुत बचेगा न रिश्ते।'
'हम कइसे मान लूँ! यही तो हमरे पास एक हथकोड़ा है। उसे भी पानी में डाल दूं। जाके कह देना अपने बाऊ से कि बखत से रिश्ता टमाटर के ढेरी होता है तो बखत से केला के छिलका पर।' लालता प्रसाद के इस जवाब के बाद पप्पू ठेली वाला चुप मार कर रह गया।
लालता प्रसाद बेहद कठिन समय में जी रहे थे। अवसाद, खिन्नता और झुंझलाहट तो वे व्यक्त कर देते लेकिन उस लाचारी का वे क्या करते जो लगातार उनके भीतर पनप रही थी।
आजादपुर मंडी में नए-नए गोरखधंधे हो रहे थे। इसके दो ब्लॉक अपने एकाधिपत्य के लिए रिलायंस ेश ने खरीद लिया। तमाम बड़े-बड़े द्घराने सब्जी बेचने पर टूट पड़े और उनके लिए आजादपुर मंडी एक अखाड़ा हो गई। पैसे की ताकत से वे मंडी और मंडी के बाहर दाम तय करते और सिपर्फ उपभोक्ताओं ही नहीं, कच्चा रोजगार करने वाले किसानों और मजदूरों को भी वे खुलेआम लूट रहे थे। भारत सरकार उनके हित के लिए जन साधारण से संबंधित तमाम नियम-कायदों को बदल रही थी। एपफ.एम.सी.जी. क्षेत्रा के ये नए गुंडे किसानों को मंडी की लूट का डर और दर पर ही मुनापफा देने का लालच देकर न सिपर्फ अपने कब्जे में कर रहे थे बल्कि कई चकाचौंध से भरमाकर उन्हें निरंतर छोटे-बड़े कर्जों से लाद भी रहे थे। जाहिर है लालता प्रसाद जैसे लोग भी इस नीति से बुरी तरह प्रभावित हो रहे थे।
एक दिन लालता प्रसाद कुछ खिन्न थे। दरअसल कई दिनों से उनकी आमदनी बुरी तरह गिर गई थी। इधर बीच टमाटर के बाजार में आग लगी हुई थी। आढ़त से टमाटर ढाई सौ रुपया क्रेट मिलते और कई बार ऐसा हुआ कि दस बजते-बजते माशाखोरों का भाव टूटकर डेढ़ सौ तक पहुँच जाता। रो८ा थोड़े-बहुत झटके मिल रहे थे। जिसके पास थोड़ी-बहुत पूंजी थी वह तो संभल पाने की हालत में था लेकिन हजार-पाँच सौ की औकात वाले रोज बरबाद हो रहे थे। लालता प्रसाद पिफर गच्चे में आ गए थे। अभी डेढ़ हजार बीरू के मत्थे पर था ही कि दो हजार की और चपत लग गई। अब आढ़ती उधार देने को राजी न था। वे अभी भी एक माशाखोर के यहाँ तौलने का काम कर रहे थे। उसी से थोड़ा-बहुत पैसे लेकर उन्होंने टमाटर खरीदना शुरू किया था लेकिन बाजार ने सब बंटाधार कर दिया। वे एक अंधी गली में भटक रहे थे।
राजू उनकी एक-एक गतिविधि की टोह ले रहा था। और दिनों वह अपने ससुर को देखते ही उनकी ओर पिच्च से थूक देता लेकिन आज वह ऐसा नहीं कर रहा था। राजू बड़े दावे के साथ लालता प्रसाद के ठीहे पर जा बैठा। इसके साथ ही उसने हाथ बढ़ाकर लालता के पांव छुए। मद्घई पान का एक चौकड़ा उसने लालता के आगे धर दिया।
इसके बावजूद लालता ने न आशीर्वाद दिया न पान की ओर देखा। जबकि पान उनकी सबसे बड़ी कमजोरी है। कहा जाता है कि दस गालियाँ देकर भी कोई उन्हें पान खिला दे तो वे माख नहीं लेते। परंतु आज ऐसा नहीं हुआ बल्कि उन्होंने नजरें द्घुमा लीं और इस प्रकार मुँह पफुला लिया जिससे राजू के लिए हिकारत टपकती थी। राजू बड़ी देर बैठा रहा। कोई संवाद न हुआ।
अजीब शोरोगुल, धक्का-मुक्की और गालीगलौज से भरा वातावरण था। सुबह के दस बज रहे थे। मंडी अपने शबाब पर थी। अब धीरे-धीरे भाव टूट रहा था। लालता प्रसाद के टमाटर की ढेरी का भाव अनेक लोग पूछ गए लेकिन तौलाया किसी ने नहीं।
अंततः राजू से न रहा गया। बोल उठा- 'बाजार साली ऐसी हो रही है कि एक कप चाय तक नसीब नहीं होना चाहती।' इसके साथ ही उसने आवाज लगाई- 'अरे हरिया! दू गिलास चाय और दू ठे मट्ठी ले के आव।'
लालता प्रसाद ने मुँह बिचकाया और दूसरी ओर देखने लगे।
जब हरि चाय लेकर आया तो राजू ने कहा- 'दे पहिले बाऊ के दे। बड़े बैठे रहें, छोटे रसगुल्ला खाएँ! यह ठीक बात है!'
हरि लालता को चाय थमाने लगा। लेकिन उन्होंने नहीं थामा। उन्हें क्रोध आ रहा था। वे चाहते थे कि राजू को गालियाँ देकर भगा दें लेकिन इतनी ताकत न बची थी। रत्ती भर नैतिक बल नहीं बचा था। बेबसी में उनकी आँखों से आँसू गिरने लगे और उन्होंने मुँह पफेर लिया। राजू ने भी गर्दन झुका ली।
हरि चाय रखकर जा चुका था। पता नहीं क्यों राजू भी नाक सुड़कने लगा। यह बेहयाई का रोना था। और इसी बेहयाई से उसने लालता प्रसाद का हाथ पकड़ लिया और बोला- 'बाऊ मसल है कि लड़िका जांद्घ पर हग दे तो जांद्घ काट नहीं दी जाती धो ली जाती है। और गदेले को गोद में उठा लिया जाता है।'
'हियां लड़िका खाली हग नहीं रहा है भिया! करेजे में आरी भोंक रहा है। हम देख रहा हूँ कि लड़िका बाप को जीते जी चिता पर रखने को तैयार है।' लालता प्रसाद की खामोशी टूटी। जब वे बोल चुके तो रुलाई का एक ज्वार आया लेकिन उन्होंने उसे रोक लिया और इस प्रक्रिया में उन्हें खांसी का दौरा पड़ा। राजू ने इस मौके का पफायदा उठाया और गिलास की चाय उठाकर लालता को थमाया। लालता ने चाय ले ली और उसी झोंक में एक द्घूंट सुड़क गए। राजू का चेहरा खिल उठा।
जैसे दो विपरीत दिशाओं में जाने वाले लोग जब रास्ते की दहशत से पीछे लौटते हैं तो उनके वेग को थामना मुश्किल होता है। जैसे एक नीची जमीन से ऊँचाई पर पानी पहुँचाए जाने के क्रम में जब बोरिंग या साइपफन को बंद किया जाता है तो दूर तक पहुँचा पानी बडे़ वेग से पीछे लौटता है और पुरानी जगह पर समाने लगता है वैसे ही लालता का दुख पिद्घल गया। वे अचानक दुहास पा गए और राजू का हाथ पकड़कर ऐसे हुलस पड़े गोया उनकी आत्मा में जमी बपर्फ डिास्ट होकर बहने लगी हो।
उस दिन राजू ने लालता प्रसाद का सारा टमाटर लेकर बेच दिया। सौ रुपये के मुनापफे समेत सौ रुपये अपने पास से देकर राजू ने अपने ससुर को अपने कब्जे में कर लिया। तीसरी पहर दोनों ने पंडित के अड्डे पर जमकर शराब पी। ताजे शोरबे में सड़ा हुआ बासी मुर्गा खाया। अपने कर्मों के लिए एक दूसरे से मापफी मांगी और विदा हुए।
राजू यह जान गया कि महिला आयोग में दिया गया बयान अभी तक दर्ज नहीं किया गया है। दरअसल यह संस्था ऐसे मामलों में बहुत कम रुचि लेती है जिनमें उत्पीड़न की रूटीन द्घटनाएँ हों क्योंकि यह तो द्घर-द्घर की बात थी और उन्हें सुलटाना सरकार के बूते के बाहर था। यह और बात है कि इसी बहाने पुलिस और जाब्ता पफौजदारी की संस्थाएँ बची हुई और व्यस्त थीं और अक्सर सरकार के सामने पैदा होने वाली चुनौतियों को बिखेर कर नष्ट करती रहतीं। आज के दौर में कोई भी इस पर आसानी से सहमत हो सकता है कि लालता प्रसाद, राजू या उस औरत की समस्याएँ गरीबी, अशिक्षा, अलगाव तथा व्यवस्था और सरकारों द्वारा उच्च वर्ग के हितों को अत्यधिक सुरक्षा देने की प्रक्रिया का परिणाम है। ऐसे लाखों मामलों का हल इस व्यवस्था में नहीं है।
आजकल राजू और लालता रोज साथ पीते थे। अक्सर लालता की शाम राजू के कमरे पर बीतती। राजू के बच्चे माँ के नाना के द्घर रहने से खपफा थे। पिता और नाना को पीते देखकर वे दूर-दूर रहते लेकिन किसी चीज की जरूरत पड़ने पर वे उसे ले आते।
राजू ने सारी स्थितियों को अपने पक्ष में कर लिया था। अब खतरे की कोई बात न थी। उसने एक सिगरेट सुलगाई और अपने ससुर के कमरे पर पहुँचा। धीरे से सांकल बजाया। कुछ पलों में उसकी पत्नी ने दरवाजा खोला। अरे! सामने राजू को पाकर वह हकबका गई। राजू ने किवाड़ में पैर अड़ा दिया। दम लगाकर सिगरेट का कश लिया और राख झाड़कर कुटिलता से मुस्कराने लगा। मुँह में भरा धुआं धीरे-धीरे नाक से बाहर निकल रहा था। राजू की पत्नी पीछे मुड़ पड़ी। राजू ने कहा- 'द्घर चलो! सुबह की भूली हो। अभी शाम नहीं हुई टाइम से पहुँच जाओगी।' राजू ने पत्नी की कलाई थाम ली। लेकिन आज वह कलाई बहुत कठोर थी। बिल्कुल पत्थर की तरह। राजू ने दुबारा कहा- 'द्घर चलो!' पिफर सिगरेट ऐसे दिखाने लगा कि इसे अभी तुम्हारी देह से छुआ दूँगा।
कापफी देर तक कोई जवाब नहीं मिला। तब राजू ने झटके से उसके बाल पकड़ लिए। कसकर खींचते हुए पिफर बोला- 'द्घर चलो।'
इस पर भी वह नहीं हिली। हजारों दिनों से पिटते-पिटते वह आज पत्थर हो चुकी थी। उसने राजू के जुल्म के सारे रूप देख लिए थे और अब सब कुछ की इंतिहा हो गई थी। राजू ने उसे ८ाोर से खींचा पर वह टस से मस नहीं हुई। राजू बेहाल। आज पहली बार ऐसा हो रहा था। इस औरत ने राजू की मर्दानगी को इस तरह कभी नहीं ललकारा था। आखिर राजू ने दूसरा हाथ उठाया और द्घूंसा जमाना ही चाहता था कि एक झन्नाटेदार थप्पड़ उसके गाल पर पड़ा। वह झौंड़िया गया। उसके हाथ से पत्नी का झोंटा छूट गया। अभी वह कुछ समझता कि उसके दोनों गालों पर तड़ातड़ थप्पड़ पड़ने लगे। यह उसकी पत्नी थी। हर थप्पड़ पर वह कहती- 'मारेगा! ले मार!'
करीब पचास थप्पड़ों में राजू निढाल और ढीला पड़ गया। शरीर में इतनी जान बाकी न थी कि खड़ा रह पाता लेकिन गिरने से पहले ही चण्डी ने उसकी कमर पर कस कर लात मारी और राजू भहराकर गिर पड़ा।
उसने राजू के ऊपर थूक दिया- 'हरामी के पिल्ले! तू द्घर ले चलेगा मुझे। मैं ले चलती हूँ तुझे द्घर। कौन द्घर है मेरा। तूने आज तक इसी द्घर में रहने की कीमत वसूली कि देह का अंग-अंग जला दिया। कुत्ते।'
अब तक आस-पड़ोस से अनेक लोग निकल गए थे। यह उनके लिए एक अजब नजारा था। वर्षों से पिटने वाली औरत आज झोंटा खोले खड़ी थी। राजू जमीन पर निस्पंद पड़ा था। शोर सुनकर लालता प्रसाद भी बाहर निकले। वे कुछ ज्यादा पी गए थे और मुँह से आवाज नहीं निकल रही थी। पिता को इस रूप में देखकर वह गुस्से से लाल हो उठी। उसने जोर से आवाज दी- 'बाऊ(((!'
यह भयानक आवाज थी जो दिल को चीरकर निकली थी। लालता समेत सभी लोग एकबारगी सिहर उठे। वह पिता की ओर लपकी। लालता सोचते थे कि राजू के साथ उनकी गहरी छनती से कोई वाकिपफ नहीं था लेकिन आज तो भांडा ही पफूट गया था। उनका नशा हिरन हो गया। बेटी को अपनी ओर आता देख वे बुरी तरह डर गए और पीछे की ओर मुड़े। 'बाऊ-बाऊ' की आवाज बार-बार कान में पड़ती रही लेकिन लालता प्रसाद थोड़ी ही देर में वहाँ से हवा में विलीन हो गए।
सैकड़ों पड़ोसियों ने यह सब देखा। लालजी और बहादुर ने भी देखा लेकिन किसी ने कुछ न कहा।
इतनी देर में चारों बच्चे माँ के पास आए और उससे लिपट कर बिलख-बिलख कर रोने लगे।
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