अपने हित में इस्तेमाल करने की प्रवृत्ति तेज हुई है। विचारधारा या मूल्यों को ताक पर रखते हुए मूल्यहीन लाभ के लिए तत्पर रहना शीर्ष पर अब उतना बुरा नहीं रह गया प्रतीत होता है। सांप्रदायिकता, कट्टरवाद या वैश्वीकरण के खिलापफ बयान देते, बोलते हुए भी, इनसे जुड़ी संस्थाओं से आर्थिक मदद या अनुदान लिया जा सकता है जिनका विरोध करना उनकी पहली जिम्मेदारी रही है। जाहिर है आर्थिक लाभ सामने हों तो सै(ान्तिक कर्मकाण्ड को हाशिए पर डाला जा सकता है ।
अखबार, भाषा संस्कार का एक महत्वपूर्ण माध्यम होते हैं, किन्तु इन दिनों भाषा के साथ जितना खिलवाड़ इनके द्वारा हो रहा है वैसा पहले शायद ही कभी देखा गया हो। प्रतिस्पर्धा के नाम पर अखबार जो छाप रहे हैं वह चौंकाने वाला है। समाचारों का चयन और उनकी प्राथमिकता उनका नीतिगत मामला हो सकता है लेकिन भाषा को विकृत करने का अधिकार उन्हें नहीं है। ई-मेल या एसएमएस के प्रचलन के साथ युवा पीढ़ी अंग्रेजी शब्दों के साथ रोमन लिपि में हिन्दी का उपयोग विवशता में कर रही है। यदि संभव हो तो अभी भी ज्यादातर युवा हिन्दी के प्रयोग को प्राथमिकता देते हैं। किन्तु हमारे हिन्दी अखबार पिफल्मी सितारों की तरह हैं जो खाते तो हिन्दी की हैं लेकिन जैसे ही मौका मिलता है अंग्रेजी के दरबारी हो जाते हैं। वे अपने भ्रम के चलते अंग्रेजी शब्दों का धड़ल्ले से द्घालमेल कर रहे हैं। तर्क यह दिया जा रहा है कि आज के युवाओं को हिन्दी समझ में नहीं आती है । यदि बिना विचारे हम शब्दों को प्रचलन से हटाते चले जाएंगे तो भाषा में बचेगा क्या! यह चिंता तब और बढ़ जाती है जब हमारे लेखक संद्घ इस तरह के मुद्दों की अनदेखी करते हुए उन्हीं अखबारों की खुशामद में व्यस्त नजर आते हैं। भाषा को लेकर चल रही इस तरह की अश्लीलता पर जो विरोध दर्ज हुआ है वो कुछ साहित्यिक पत्रिाकाओं एवं सुधीजनों द्वारा निजी स्तर पर हुआ है। राजेन्द्र यादव, राजकिशोर, सच्चिदानंद सिंहा, सुधीश पचौरी, जितेन्द्र भाटिया, प्रभु जोशी, वेदप्रताप वैदिक, रमेश दवे जैसे कुछ विद्वानों ने इस पर अपना विरोध दर्ज कराया किन्तु अखबारों पर कोई असर दिखा नहीं। लेखक संगठनों के स्तर पर न कोई विरोध हुआ, न ज्ञापन दिये गए, न प्रदर्शन हुए और न ही अखबार मालिकों/संपादकों से चर्चाएँ की गईं।
भाषा के साथ मनमानी करने वालों को यदि कहीं से विरोध का स्वर सुनाई नहीं देता है तो स्वाभाविक रूप से वे मान लेते हैं कि उनका यह 'रेप' रेप नहीं सहमति से हो रहा रचनात्मक प्रयोग है।
आजादी के बाद चेतना बढ़ी है और साधारण समझ का आदमी भी समय-समय पर यह जानना चाहता है कि पिछले साठ सालों में क्या हुआ। पफलां राजनीतिक दल ने इतने वर्षों के शासन में क्या किया या पांच साल के कार्यकाल के बाद पुनः चुने जाने योग्य है या नहीं, वगैरह। लेकिन लेखक संद्घ आत्ममुग्ध बैठे हैं। कुछ तो आजादी से पहले के हैं और कुछ को सत्तर साल से अधिक हो गया है। दशकों बाद भी देशभर में पफैली इनकी इकाइयों पर नजर डालने की जरूरत नहीं है कि आखिर इनसे हासिल क्या हो रहा है! इनकी उपलब्धियों का मूल्यांकन करने और आम आदमी के सामने रखने की जरूरत है या नहीं? भले ही अनुदान आदि नहीं मिलने के कारण सरकार के प्रति उनकी जवाबदेही नहीं बनती हो पर इसके सदस्यों और समाज के प्रति तो बनती है। हिन्दी भाषा और साहित्य के इस कठिन समय में क्या वे अपने होने का औचित्य सि( कर पाएँगे? कुछ संगठन अपनी पत्रिाकाएँ भी निकाल रहे हैं, अच्छा है। किन्तु इन पत्रिाकाओं की पहुंच कितनी है? कुछ सैकड़ा पत्रिाकाओं में अपनी बात छाप कर अपने सदस्यों में बाँट देने भर से समाज पर कभी इसका असर हुआ है?
प्रायः कहा जाता है कि भारत में लेखन के जरिए जीवन गुजारना संभव नहीं है। लेकिन क्यों संभव नहीं है? जबकि देश में प्रकाशन व्यवसाय करोड़ों का है। हर साल सैकड़ों पुस्तकें प्रकाशित होती हैं। वर्षभर कहीं न कहीं पुस्तक मेले लगते हैं, सरकारी खरीद बड़ी मात्राा में होती है और नियमित बिक्री भी होती ही है। कितने आश्चर्य की बात है कि पुस्तक व्यवसाय से जुड़ी हर इकाई महत्वपूर्ण है और उसे वाजिब पारिश्रमिक मिल रहा है सिवा लेखक के। प्रकाशकों के संद्घ हैं, छपाई-बंधाईकर्मियों, विक्रेताओं के संद्घ हैं जो अपने हितों के लिए संद्घर्ष करते हैं किन्तु लेखक संद्घ कभी इन मुद्दों पर गौर करते दिखाई नहीं देते हैं। बड़े बड़े लेखकों को रायल्टी के लिए झींकते-खीझते देखा जा सकता है। कोई यह जानने का प्रयास नहीं करता कि किताबें क्या वास्तव में नहीं बिकती हैं! यदि यह सही है तो प्रकाशन व्यवसाय पफल-पफूल कैसे रहे हैं! धंधा अगर द्घाटे का है तो पीढ़ी दर पीढ़ी लोग उसमें जुटे क्यों हैं? किसी जमाने में, जब शिक्षा का प्रतिशत कम था, पांच हजार प्रतियों के संस्करण हुआ करते थे जो द्घट कर ग्यारह सौ प्रतियों के हुए और अब मात्रा तीन सौ प्रतियों के संस्करण हो रहे हैं। कोई सामान्य पाठक भी इस स्थिति से चिंतित हो सकता है किन्तु लेखक संद्घों के लिए ये कोई मुद्दा ही नहीं है। ५० करोड़ हिन्दी भाषियों के बीच मात्रा तीन सौ प्रतियां किसके लिए शर्मनाक है? उस पर पुस्तकों की चर्चा समीक्षा के लिए पत्रा-पत्रिाकाओं में कितना स्थान बचा दिखता है? पुस्तक अपनी धूमिलता साथ लेकर प्रकाशित होती है। दुनियाभर में पुस्तक प्रकाशन इस तरह नहीं होता है। वहां पुस्तक जारी होने की खबरें दी जाती हैं, विज्ञापन छपते हैं, चर्चाएँ करवाई जाती हैं।
एक व्यावसायिक योजना के तहत काम होता है जिसका लाभ लेखक को भी मिलता है। यहां ऐसे कोई प्रयास नहीं होते हैं क्योंकि कहीं से कोई दबाव नहीं है। व्यवसाय में कोई पारदर्शिता नहीं है। कई प्रकाशक वर्षों तक पाण्डुलिपि दबाए बैठे रहते हैं। पिफर एक दिन अवैध संतान की तरह गुपचुप पैदा करके लेखक की झोली में डाल देते हैं। ले भई, अब तू जान तेरा काम जाने। हमारा जाबवर्क खत्म हुआ। विमोचन, चर्चा समीक्षा वगैरह के लिए पैसा बचा हो तो करवाते रहना। नए लेखक तो रायल्टी के विषय में सोच भी नहीं सकते हैं, उन्हें प्रायः अपनी किताबें पैसा दे कर छपवानी पड़ती हैं। क्या यह कहा जा सकता है कि लेखक संद्घों का इन सबसे कोई सरोकार नहीं है? कभी लेखक संद्घों ने पारिश्रमिक के लिए कोई संद्घर्ष नहीं किया, यह आश्चर्यजनक है।
लेखक संद्घ को पार्टी लाइन से अलग रखने की जरूरत भी है। एक विचारधारा के अंतर्गत दोनों में साम्य हो सकता है किन्तु क्षेत्रा, दायित्व व सक्रियता के स्तर पर दोनों अलग हैं। कुछ जगहों पर पदाधिकारी लेखक संद्घों को राजनीतिक दल की लाइन पर चलाने की कोशिश करते हैं, जो गलत है। विचारों और मूल्यों की एक विरासत होती है, जिसका परिष्कार कर अगली पीढ़ी को उससे संस्कारित करना लेखक संद्घों का काम है। लेकिन हो कुछ और रहा है। प्रतिष्ठित लेखक संद्घ प्रायः अंदरूनी राजनीति और पुरस्कारों की उठापटक के अड्डे होते जा रहे हैं। संगठन के नाम पर गुट खड़े हो गए हैं। किसी लेखक को पीली रौशनी में आने देना या नहीं आने देना, उसके साथ क्या सुलूक किया जाना है यह किसी अदृश्य पंचायत में तय होता है। कई बार साहित्यिक पत्रा-पत्रिाकाएँ भी इस प्रदूषित विचारों का शिकार हो जाती हैं। इसका असर उन लेखकों पर होता है जो प्रभावी गुटों द्वारा अपेक्षित स्वामीभक्ति प्रमाणित नहीं कर पाते हैं। एक प्रेत नृत्य हो रहा है, जिसमें होने का शोर बहुत है लेकिन होता कुछ नहीं है।
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