जुलाई २०१२
 
 
 
   
 
 
 
• मनीषा कुलश्रेष्ठ को 'लमही सम्मान' • निदा फाजली को पद्मश्री सम्मान •देवेंद्र इस्सर नहीं रहे• ओड़िया लेखिका प्रतिभा रॉय को २०११ का ज्ञानपीठ पुरस्कार•चंद्रकांत देवताले को साहित्य अकादमी पुरस्कार • कुणाल सिंह को युवा साहित्य अकादमी सम्मान • तीसरा 'कृष्ण प्रताप कथा सम्मान' (२०१२) गीतांजलिश्री की कृति 'यहां हाथी रहते थे' को • रविशंकर को मरणोपरांत लाइफटाइम अचीवमेंट ग्रैमी पुरस्कार • विनोद कुमार शुक्ल को हिन्दी काव्य साहित्य में रचनात्मक योगदान के लिए 'परिवार' पुरस्कार • वरिष्ठ साहित्यकार कामतानाथ नहीं रहे
 
 
 
कहानी
इस द्घटित होते समय में...
शेखर मल्लिक
 

जन्म : १८ दिसंबर १९७८

हंस, वसुधा, अन्यथा, समकालीन कविता, संवेद वाराणसी, उद्द्घोष, जन विकल्प ;साहित्य वार्षिकीद्ध, दैनिक हिन्दुस्तान आदि विभिन्न पत्रा-पत्रिाकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। एक कहानी 'कोख बनाम पेट' तेलगु में अनूदित। बी.डी.एस.एल. महिला महाविद्यालय, काशिदा, द्घाटशिला, पूर्वी सिंहभूम-०३ झारखंड मो. ०९८५२७१५९२४

 
पूर्वपीठिका...। २९ जुलाई के अखबारी ख़बरों ने इसकी पुष्टि कर दी कि इक्कीस साल के स्नातक खंड-३ के मेधावी मगर गरीब आदिवासी छात्रा होपना मुर्मू ने आत्महत्या कर ली थी ;यह आत्महत्या ही थी या हत्या, इसका खुलासा अंत्यपरीक्षण से नहीं, इसी कहानी में आगे होगा।द्ध उसी समय से २१वीं सदी में एक दशक बिताने जा रहे हमारे कुछ युवाओं का, कुछ-कुछ रंगीन सा... लगभग कविताई प्रभाव सा... विशिष्टता का छायाभास देता, मस्तिष्क के सबसे खुपिफया कोने में सुरक्षित एक सुखद भ्रम, जो लंबे समय से सुरक्षित था, का अंत हुआ था और यह कोई गोपनीय कथा नहीं थी...
गोपेश, राखी, नवनीत कुमार, सेन दा और यह लड़का-होपना मुर्मू-जो इस पूरी कहानी में सिपर्फ अंत में है, और नहीं भी है-जैसे पात्राों की सिमटती, पफैलती, सकपकाती हुई छायायें, जो इस वक्त के परदे पर उभर रही हैं... पफुसपफुसाती हैं कि... ''सुनो, सुनो... बेहद महीन आवा८ा में कराहते हुए इस वक्त के सच को सुनने की कोशिश करोऋ लेकिन ख़बरदार...। कि पिफर एक सच यह भी है कि 'जो' इसे इस वक्त मनोयोग से सुनने की कोशिश करेगा... कोशिश करके समझ भी लेगा... समझ कर उसे अभिव्यक्त करने लगेगा, तत्काल 'वह' व्यवस्था-विरोधी द्घोषित कर दिया जाएगा...। भा.दं.वि. की कठोरतम धाराएँ तो बाद में चेंपी जाती ही रहेंगी। 'उसे' उसी तरह से ख़तरनाक माना जाएगा, जैसे किसी टैंकर के पीछे लिखा रहता है ''खतरा। अत्यंत ज्वलनशील रसायन''... इसमें सबको 'उससे' एक सुरक्षित दूरी बनाये रखने का छिपा हुआ संकेत रहता है...।

नवनीत, जो इस कहानी का प्रोटोगोनिस्ट और वामपंथी छात्रा संगठन का कार्यकर्ता है, कई जगह, कई बार बोल चुका था कि, ईमानदार आदमी पिफलहाल किसी खास आदमियत के दायरे में ही 'मिसपिफट' पाया जा सकता है, और सारी असपफलताओं के बाद निर्वाण प्राप्त करता हुआ-सा वह निहायत मौलिक किस्म का 'दार्शनिक' बन जाने की ओर अग्रसर है... ''असपफलता ही दर्शन की जननी है।'' -इस सि(ांत का प्रतिपादन करता हुआ...। सारी सूचनाएँ... सत्य... किसी सूदखोर तिजोरी में बंद हो गए थे और धनलोभ और सत्ता की अश्लील ताकत की चाशनी में पफेंट कर अंतरात्मा जैसी पारदर्शी चीज़ इतनी पारदर्शी हो गयी थी कि उसका अक्स सुचेतना के पर्दे पर उभरता ही नहीं था। हर चीज़ आचरण की भ्रष्टता के बूते हासिल की जा सकती थी या पिफर, कुछ भी हासिल नहीं हो सकता था...। और दरअसल यह हो रहा था कि जो आदमी इन हथकंडों से हासिल किये जा रहा था, वह दूसरों से उनका वाजिब हक और हासिल छीने जा रहा था...

ठीक इसी बिंदु पर यह किस्सा शुरू होता है...
इसी बिंदु पर कहने का मतलब, इस आत्महत्या की ख़बर से कुछ बीसेक दिन पहले, जब नवनीत का दोस्त गोपेश मन्ना बी.ए. अंतिम वर्ष की अपनी सहपाठिन... ;सहपाठिन बाद में, पहले पड़ोसन... और पिफर गर्लेंड से होते हुए अब उससे बढ़कर। और अन्य दोस्तों की शब्दावलियों में, 'तेरे वाली' 'आयटम' 'माल' आदि संबोधनों से विभूषित होने वालीद्ध राखी दास को 'पार लगाने' के चक्कर में उसी कॉलेज के हेड क्लर्क सेन दा के चक्कर में आया। सेन दा, प्रदेश यूनिवर्सिटी के मान्यता प्राप्त, संब(ता-प्राप्त निजी महाविद्यालय के 'बड़ा बाबू' थे। तो सरकारी दफ्रतरों के विराट और भव्य विरासत वाले यातना-गृहों ;सरकारी आदमी के लिए नहीं, आम आदमी नामक जीव के लिएद्ध में 'बड़े बाबुओं' की जो हैसियत और रुतबा, या हेकड़ी होती है ;यानी यम के समान।द्ध, वही सेन दा की थी। हालांकि, यह 'यम' वाली उपमा उन पर ज्यादती लगती है, हाँ, उनके 'जैसे' और लोगों पर बेशक चस्पां कर डालिए... अतिशयोक्ति नहीं होगी।
सेन दा यानी, खैनी मुँह में डालते हुए, कुर्सी पर बैठे-बैठे थोड़ा-सा एक तरपफ टेढ़ा होकर पादते हुए... जल्दी ही भन्ना जाने वाले और, भन्ना गए तो, 'गाँजा पीकर काम करता है।'' -कभी चीखते, कभी शांत स्वर में बुदबुदाते हुए...छियालीस साल के अधेड़, जो ठेठ बंगाली शैली में, कापफ़ी तेज और ऊँची तान में बात करते थे... लेकिन खासियत यह थी कि अपने काम में बहुत तेज-तर्रार और बहुत ही 'सहयोगी' स्वाभाव के विरल प्राणी थे...
''कौन-कौन सा पेपर करना है?'' सीधा सवाल होता था सेन दा का और 'काम' का जुगाड़ लगाने आये छात्रा या छात्राा या उनके जिम्मेदार अभिभावक, जिसे अपनी जिम्मेदारी का आभास इस 'स्थिति' में जाकर हुआ है, काे सिपर्फ़ इतना बताना भर होता था कि बच्चे ने किस-किस विषय में ढीला किया है...
''सेन दा, काम कर दीजियेगा।'' टेबुल की दूसरी तरपफ से आशा, आकांक्षा, महत्वाकांक्षा से भरी आवाज़ आती और सेन दा मुंडी हिलाते हुए कहते, ''कोशिश करेंगे।'' लेकिन सामने वाला जानता है कि सेन दा बोल दिए 'कोशिश', मतलब काम हो जायेगा। लेकिन कुछ असंतुष्टों की राय में, ऐसा कतई नहीं है। ''ढाई हजार लगेगा बाबू...'' सेन दा कागज के चुटके पर हिसाब लगाते हुए बताते, ''हिन्दी का बारह सौ...
साइक्लोजी में पन्द्रह पकड़ लो... और...
''अरे, तुम्हारा बंगला कैसे खराब हो गया जी?'' सेन दा सहानुभूति से पूछ भी लेते और भकुआया सा 'कंडीडेट' मारे शर्म के या संकोच से कुछ भी बड़बड़ा देता... ''ठीक है, हो जायेगा। लेकिन पैसा पूरा लगेगा बाबू!'' 'बाबू' 'भाई' 'दोस्त-यार' यह सेन दा के तात्कालिक और द्घोर व्यावसायिक संबोधन थे... आखिरकार वे एक प्रोपफेशनल जो थे। जब सेन दा बोल दिए हो जायेगा, तो 'काम' करवा ही देंगे। वे सब कुछ किया या करवाया करते हैं... अपने कॉलेज का 'जूता सिलाई से लेकर चंडीपाठ तक!' ;उन्हीं का उवाच!द्ध इसलिए वह दम ठोंक कर यदि कहते कि 'साला मेरे दम से यह कॉलेज चल रहा है' तो, इस
गर्वोक्ति का खंडन किया नहीं जा सकता था। थे भी मेहनती... कॉलेज के होल-
टाइमर।...
यह और बात है कि कमबख्त जमाना ठीक नहीं रहा। दोस्ती-यारी या भलमनसाहत में किसी का काम उधारी में करवा दिए तो हरामखोरी का स्तर इतना उन्नत है, कि वही आदमी बाद में पैसा मार जाता है... इससे सेन दा दुखी थे, और ज्यादा अनुशासित हो गए थे... आजकल पहले पेशगी, पिफर पैरवी। ...कौन से सेंटर की कॉपियाँ कहाँ जा रही हैं... कहाँ की कॉपियाँ कहाँ आ रही हैं... पैरवी किससे करनी है... मार्क्स पफांयल में चढ़ने से पहले किस तरह 'अपना आदमी' प्राप्तांकों में हेर-पफेर कर देगा... यानी ०६ का ६०! और कब कितने मार्क्स तक का उ(ार हो सकने की गुंजाइश है... यानी ३३ उत्तीर्णाक हैं तो, बच्चा १८-२० तक खुद ला सके, बाकी वह देख लेंगे। मगर ६-१० नंबर वाले का जरा मुश्किल है, और यह सेन दा पहले स्पष्ट कर देते...
जा त्तेरे की! लड़की पिछले तीन साल से पार्ट-थ्री में लटकी है, बिचारी की शादी नहीं हो पा रही कम दहेज में और स्थिति यह थी कि पढ़ाई, माने स्नातक डिग्री अंटियाने के झमेले से निकले तो द्घर-बार बसाये या पारा-शिक्षिका के तौर पर कहीं भिड़ा जाय!... सो सेन दा ने उसकी वैतरणी पार लगा दी। क्या याद करेगा कि 'सेन दा की बदौलत मेरी लड़की सैकिंड क्लास पास ग्रेजुएट है!' ऐसे पिछले १७-१८ सालों से सेन दा 'भलाई' करते आ रहे थे, और अपने लिए 'मलाई' छानते। लेकिन इसमें दोष सेन दा का कोई नहीं... जब देश की प्रत्येक संस्था में ''द्घूसखोरी-पैरवी संस्कृति'' का मुक्त पर्यावरण है तब... ईमानदारी जैसी बीमारी के कीटाणु पनपने से पहले ही बेईमानी के टीके से नेस्तनाबूद किये जा रहे थे... और सेन दा जैसे लोगों के पास अपनी सीमित आय को बढ़ाने का इससे अलग और क्या तरीका हो सकता था! इसमें भी तो उनकी विशिष्ट प्रतिभा खर्च होती थी, समय और निवेश के रुपयों के अतिरिक्त! कुछ समय पहले ही तक कहा जाता था, सरकारी आदमी को जितना मिलता है, उससे ना टीवी आ सकता है, ना जि, ना ढंग का द्घर-द्वार, ना बेटी की शादी, ना बेटे की उच्च शिक्षा...। इसीलिए तो ये 'काम' करना पड़ जाता है... और अब तो महंगाई सबकी पेंदी में दूसरा सुराख करने पर उतारू है। और बेईमानी?... सेन दा उवाच, ''स्साला, तुमको क्या मालूम? परिषद् में, यूनिवर्सिटी में, सब मुँह पफाड़के बैठा है। पियोन से लेकर बड़ा बाबू तक... और उससे भी ऊपर। मुँह पर मांगता है, सौ रुपया दो तो काम होगा। पियोन-क्लर्क तो, एक पफाइल खोजने-हिलाने तक का पैसा...! सोचता होगा उधर से हमीं लोग स्टुडेंट्स से जन्ट के आये होंगे। सो इन्हीं से छीलो!'
यूनिवर्सिटी और परिषद् का यह हाल है, तब कॉलेज स्तर पर क्या कहें! स्थानीय सरकारी कॉलेज के काउंटर पर आप जाइए, मार्कशीट, कॉलेज लीविंग, चरित्रा प्रमाणपत्रा या माइग्रेशन सर्टिपिफकेट... कोई भी चीज़ निकालनी हो, काउंटर के पीछे बैठा तृतीय-वर्गीय क्लर्क दन्न से कहेगा... ''कुछ दीजिए, चाय-पानी।'' यानी पचास रुपये की एक पत्ती! पहले दस के नोट से काम चल जाता था, अब इस महंगाई के ८ामाने में रेट बढ़ाना पड़ा है! और अगर आपने नहीं दिया, तो ईश्वर भी पैदा हो जाए और आपकी मदद को आये, काउंटर से काम नहीं करा सकता... दौड़ते रहेंगे पच्चीसों दिन... आप और आपके ईश्वर भी। अस्तु, गरीब से गरीब छात्रा वापसी के लिए बचाए हुए गाड़ी-भाड़े में से पैसे दे देता और मुँह बाये खड़ा रहता। यह तब, जबकि सरकार और यू जी सी ने छठा वेतनमान लागू कर दिया था... किंतु आखिर हवस भी कोई 'प्रतिभा' हाेती है। आप पाबंदी-कानून बना लो, कि द्घूस मत लो-दो... जैसे कि 'दहेज मत दो-लो...' मगर इससे पफर्क क्या पड़ता है? जिसमें थोड़ा भी विवेक और आत्मसम्मान होगा, वह इन बातों को नहीं मानेगा ;नयी परिभाषा के मुताबिक विवेक यानी बु(ि इसमें है कि किसी भी तरह अपना पफायदा बनाओ और आत्मसम्मान माने स्टेटस जो कि धन से बनता है, ढीठ आदर्शों से नहींद्ध... और सेन दा जैसों की तो मजबूरी है कि इसमें लगे हुए हैं... भयंकर महंगाई है। जो कि हमेशा से ही थी, आगे भी रहेगी, ऊपरी या निचली कमाई से ही गृहस्थी का चक्का चला रहे हैं। प्रायवेट कॉलेज के बड़ा बाबू सेन दा को तो इसी 'बिजनेस' का ज्यादा आसरा है...
गोपेश के साथ आई राखी पूरे आत्मविश्वास के साथ बता रही थी, ''सेन दा, मेरा बंगाली, इंग्लिश और... हिस्ट्री में भी डाउट है। कर दीजियेगा ना? कितना लगेगा?...''
''काहे तुम लोग बाप का पैसा डबल बर्बाद करता है, हैं...?'' सेन दा अपने भीतर के सत्‌ और असत्‌ का द्घालमेल करते हुए, कुछ शिकायत, कुछ सहानुभूति और कुछ अभिभावकीय आग्रह के साथ डाँटने जैसा कहते, ''बाप मर-मर कर खर्चा उठा रहा, ट्यूशन करा रहा... किताब-खाता... उस पर भी तुम लोग ऐसा काहे करता है जी?''
यह शायद ऐसा ना भी हो, मगर सच है कि सेन दा दूसरे खूनचूस बड़े बाबुओं से इसी मामले में भिन्न हैं कि उनके पास सहयोग और सहानुभूति की भावना वाला दिल है... ये और बात है कि धंधे के उसूलों के साथ वह छेड़खानी नहीं करते...
यह शायद धंधे का उसूल है कि ग्राहक को पहले सहानुभूति के चाबुक से मारो, 'चूं' भी नहीं करेगा और बल्कि एहसानमंदी जैसे भाव में लटपटाकर दोहरा हो जायेगा... लेकिन अब सेन दा की एकदम यही मंशा होती हो, कैसे बताया जाय! लेकिन जैसा कि कहा गया, उनके पास संवेदनशील दिल तो था। राखी वाले मामले में ही मकसद और उम्मीद में सेन दा के दरबार में अर्जी डालने आया एक बाप सामने वाली कुर्सी पर बैठा-बैठा मुंडी हिलाकर सेन दा से सहमत होता रहता, पिफर कहता, ''अब सेन दा, ये लोग को क्या कीजियेगा। समझता नहीं है। आप देख लीजियेगा, खर्चा जो लगेगा, देना ही है!'
सेन दा कागज के चिट पर 'हिसाब' जोड़कर उसके आगे सरका देते। बाप जेब में हाथ डालकर चिट पर लिखी रकम और 'ग्रांड टोटल' को पढ़ता हुआ पैसे टटोलने लगता...
एक मुश्किल तब शुरू हुई, जब प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लगा और परिषद् में राज्यपाल द्वारा अनुशंसित श्रीमती दया मुखोपाध्याय को अध्यक्ष बना दिया गया... प्रशासनिक सेवा से रिटायर्ड दया जी अनुशासन के मामले में द्घाद्घ थीं... उनकी ऐनक के नीचे किसी पफाइल-पतर में हेरपफेर करना लोहे के चने चबाने से ज्यादा कठिन कारनामा साबित होता, अगर होता। इसलिए सेन दा और उनकी नस्ल के तमाम जीव भन्नाये हुए थे... यह उनके लिए दुर्द्घटना थी, उनके निवाले पर अचानक कौए के बीट कर देने के बराबर था... उनके मुँह से एकाएक निकल जा रहा था, ''यह स्साली बुढ़िया, हमारा दाना-पानी मार दिया!'' और सेन दा कहते, ''जब तक यह बुढ़िया है, कुछ नहीं हो सकता... तीन साल में इसको जाने दो पिफर...'' ;बात वापस पटरी पर आ जायेगी।द्ध
लेकिन यह समस्या माध्यमिक परिषद् में थी, राखी तो यूनिवर्सिटी की छात्राा थी, जहाँ अभी कोई दया मुखोपाध्याय पदस्थापित नहीं हुई थीं और इसलिए राखी के लिए तमाम गुंजाइशें पहले की तरह बरकरार थीं। सेन दा को पैसे अग्रिम दिए थे उसने। उसकी बेचैनी दरअसल यह थी कि, बाप ने कह दिया था, इस बार भी पफेल तो ईंट-भट्टे वाले के लड़के से शादी पक्की समझ लेना, पिफर तेरी चूँ-चाँ नहीं चलेगी... इस पर गोपेश भीतर से तप कर कहता, ''हूँह... तू ईंट-भट्टे वाले के ही बच्चे पैदा करने के लिए पैदा हुई है।''
''और तुम?'' राखी जलकर पूछती,
''हमको किसी खूंटे से कोई बाँध दे, ये मजाल...?''
''इस बार सेन दा करवा देंगे ना? नहीं कर दिए तो?''
''तो तू ईंट-भट्टे की मालकिन!''
''बंद कर ना ये...'' राखी तिलमिला उठती। उसे भी गोपेश पसंद था। कितना या कब तक या हमेशा के लिए? यह राखी नहीं जानती थी, ना सोचती थी। पर यह पसंद नहीं था कि ईंट-भट्टे के काले और थोड़ा लंगड़ा कर चलते उस बत्तीस साल के आदमी के साथ... मजाक में भी कोई... छिः उसे तो उबकाई सी हो आती थी...!
कितनी ही बार तो उसने परीक्षा के दौरान अपनी कॉपी, जो कि अक्सर एक-तिहाई खाली ही होती थी, में सौ रुपये का नोट छुपाकर रखकर, कॉपी वीक्षक के सुपुर्द कर परीक्षा हॉल से निकल गयी थी। और कितनी ही बार उसने प्रश्नोत्तर की जगह परीक्षक को संबोधित करते हुए लिखा था, ''सर! कृपया हमको कम-से कम पास नंबर दे दीजिए। मेरी शादी ढंग की जगह हो जायेगी... दो साल से यही जगह अटक रहे हैं...!'' पता नहीं इस पत्रां-पुष्पम-दानं और करुण आग्रह-अर्जी का परीक्षक पर कितना प्रभाव पड़ता ये तो बाद की बात है, सौ के नोट तो परीक्षा-नियंत्राण कक्ष में चपरासियों या स्वयं परीक्षा नियंत्राक महोदय द्वारा ही टपा दिए जाते...! हत्‌ भाग्या...!
जबकि उसी शहर के कोंस्टीच्यूएन्ट कॉलेज के इतिहास के लेक्चरर ने जब अपनी दुमंजिला कोठी बनवाई तब, उसकी बेटी के श्रीमुख से ही सुना गया है कि 'ज्यादा कुछ हाथ से लगा नहीं। 'जरूरतमंद' स्टूडेंट लकड़ी, सीमेंट आदि सामान ले आते थे।' उन्होंने लेक्चरर साहब की ज़रूरत का ख्याल रखा, बदले में निश्चित ही उनकी ज़रूरतों का भी ख्याल रखा गया होगा। यह परोपकार का सामान्य सि(ांत है... ''एक हाथ दे, एक हाथ ले!''

''सर, अमरेन्द्र बाबू को याद करते हैं?'' सेन दा पूछ रहे थे, पास ही के अंचल के निजी महाविद्यालय के प्राचार्य से...
''कौन? हाँ, पहचान रहे हैं।''
''हाँ, वही अमरेन्द्र बाबू जो रसीद काटने का एक सौ रुपया मांगते थे!''
''हाँ-हाँ...'' प्रिंसिपल सिर हिला रहा था।
''सुने कि नहीं, वह परिषद् में वित्तीय अधिकारी हो गए हैं... डिपार्टमेंट में विशेष पदों पर सब चोर-चुहाड़ों की बहाली हुई है!''
सेन दा आगे बता रहे थे।
''और सुनील जी?''
''नहीं। सुनील जी तो साधू आदमी हैं। नियुक्ति परीक्षा में बैठे ही नहीं। कहते थे, मेरे जैसा आदमी ऐसी जगह नहीं चल सकेगा।''
''हाँ, उनके जैसा आदमी ऐसी जगह थोड़ा मुश्किल है।'' प्राचार्य जी सहमत थे।

इसी समय गोपेश, राखी, नवनीत और कुछ छात्रा कॉलेज परिसर में बैठे दिसंबर की धूप से पीठ सेंक रहे थे और चर्चा में था, प्रदेश में पूरे ३२ वर्ष बाद हो रहा 'पंचायत चुनाव'। वामपंथी छात्रा संगठन का कार्यकर्ता नवनीत इस दल में सबसे तेज और बौ(कि किस्म का लड़का था, जो भावुक होने के अलावा उसूलों वाला भी था, ये गुण इधर हाल के वर्षों में कतिपय नव-मध्यवर्ग की नयी पीढ़ी में नहीं के बराबर पाए जाने लगे हैं। ;इसके लिए किसी रजिस्टर्ड संस्था से शोध या सर्वे कराने की आवश्यकता नहीं, जिसकी आँख खुली हो, देख-भांप सकता है।द्ध खासकर जब अमेरिका की थूक-बू-बास और अमेरिका का आदर्श उनके सपनों में स्वप्नदोष सरीखा क्षणिक, मगर अनिर्वचनीय सुख देने लगा है... ये चरम पर पहुँचे बिना ही 'स्खलित' हुए जा रहे हैं...।
खैर, तो नवनीत कह रहा था, ''इस चुनाव को भी धंधा बना दिया है। देखो, ये सब बेरोजगार, रोजगार अभियान में जुट गए हैं। कम से कम पाँच सालों तक सरकारी आमदनी पक्की, अगर जीत गए। सोचते हैं, बेरोजगार बैठे ही हैं, इसी बहाने कमाने लगेंगे, और ऊपरी कमाई तो बंधी हुई है! खड़े हैं, जिला परिषद् सदस्य, वार्ड सदस्य, मुखिया के लिए। अरे, इनसे कोई संविधान के बारे में पूछे... संवैधानिक दायित्वों और पंचायत चुनाव के बारे में पूछे... 'पंचायती राज' की परिभाषा और संकल्पना के बारे में पूछ कर देखो... जो कोई एक सही जवाब दे दे, तो वोट उसी को मार दूँगा। साले कमाने के लिए चुनाव में खड़े हैं... अरे उस दिन मेरे ही सामने एक प्रत्याशी, कि उसका समर्थक पूछ रहा था, अमुक पद के लिए वेतन कितना है? वाह। ...यही है इनका मोटिव...!''
''यानी चुनाव भी रोजगार के लिए लड़ रहे हैं?'' राखी हँसने लगी...
मगर नवनीत उसी तरह गंभीर था, ''स्वरोजगार के लिए! और नहीं तो, तुम क्या सोच रही हो, जनसेवा के लिए? वह तो पफोकट में डॉक्टर भी नहीं करता! 'रिम्स में इतने हड़ताल क्यों होते हैं, नहीं जानती?''
गोपेश कुछ नहीं कह रहा था, अचानक हँसने लगा... हँसना शायद इस समय मखौल उड़ाने से ज्यादा अपनी कड़वाहट को हालात के साथ समझौता करने से उठे दंश को सहने का एक उपाय बच गया था...
सारी व्यवस्थायें आमूल-चूल भ्रष्टाचार के कीच में पगुरा रही थीं या द्घोर मौकापरस्त हो चुकी थीं...
वह लड़का सेन दा के सामने इतनी लाचार मुद्रा में आ कर खड़ा हुआ कि, मानों करुणा और दयनीयता जैसे भावों का मानवीकरण हो गया हो। उसने धीरे से मार्कशीट की पफोटोकॉपी सेन दा की मेज पर उनकी आँखों के सामने करते हुए सिपर्फ इतना कहा, वह भी जैसे पफुसपफुसा रहा हो। ''सेन दा, यह...''
परीक्षापफल 'पफेल' था, मार्कशीट की प्रति में। न८ार डालते ही सेन दा के चेहरे पर निराशा, क्षोभ और अपफसोस का मिला-जुला इपफेक्ट देखने को मिला। वह एकदम हतप्रभ थे! इतनी पैरवी और जुगाड़-द्घूस के बावजूद 'कस्टमर' 'सेवा के बारे में शिकायत कर रहा था... धंधे के लिए अशुभ संकेत।
''यह कैसे हो गया?'' तत्काल उनके मुँह से निकला। उन्होंने मोबाइल पर एक नं. ढूंढ़ कर कॉल बटन दबाया और उस निरीह प्राणी से कहा, ''रुको, झाड़ते हैं! साला पैसा लेकर भी काम नहीं करते...''
पफोन मिलते ही सेन दा बिपफर उठे, ''अरे सर, ऐसा कैसे हो गया? आप तो बोले थे हो गया है। अरे कॉमर्स में तो दो-तीन नहीं हुआ था। मगर साइंस में देख रहे हैं, काम नहीं हुआ है...
''अरे आप ही बोले थे सबका हो गया। पिफर?'' वह मार्कशीट हाथों में पफड़पफड़ा रहे थे... उधर से जो कहा जा रहा था, उन्हें संतुष्ट नहीं कर पा रहा था।
कॉल काटने के बाद सेन दा गहरी निराशा और कुढ़ते हुए बोले, ''आदमी का भरोसा नहीं रहा! किसी का भरोसा नहीं रहा...''
वह लड़का बोला, 'अब?'
''देखो कोई दूसरा उपाय करते हैं।''
''यह हो सकता है?'' लड़के को अब भी उम्मीद थी।
''दूसरा उपाय माने, पैसा वापस कर सकते हैं।'' सेन दा खड़े हो चुके थे... कमर पर नीचे खिसकते ढीले पतलून को हाथों से ऊपर उचकाते हुए।
''यह नहीं हो सकता?'' लड़का रिजल्ट के बारे में सोच रहा था।
'नहीं।' सेन दा विरक्ति के भाव से बोले, ठंडी आवा८ा में और जेनरल
सेक्शन से बाहर निकलते हुए बराबर बोलते रहेऋ ''किसी का भरोसा नहीं रहा... हमलोग सोचते हैं, पैसा दे दिया, वायदा कर दिया तो कर देगा। मगर छेः ह्‌... किसी का भरोसा नहीं रहा...''
सेन दा को खलनायक की न८ार से क्यों देखा जाय? वह तो जरूरतमंदों की मदद ही करते हैं। बस इसके लिए कीमत लेते हैं... और यह सीधा सा नियम है। काम के बदले दाम। इससे वह खुद और गृहस्थी को ढंग से पोस रहे हैं... वह खुद जरूरतमंद हैं, इसलिए यह ऊपरी धंधा करते हैं। असल बात, ऐसे पद और जगह पर हैं, जहाँ से कर सकते हैं। और यह सब इतना आसान भी नहीं है। इसमें भी मेहनत और प्रतिभा, निष्ठा की सख्त अपेक्षा होती है। तमाम लोगों से संपर्क करना, ''गोटियाँ बैठना''
नौसिखिए का काज नहीं है... जेब से पैसे भी लगते हैं, बारहा जगह दौड़-धूप करनी होती है, तब पैसे की शक्ल देखने को मिलती है। संसार के हर सत्‌-असत्‌ काम में भी एक समान प्रतिब(ता चाहिए ही।
अब लगाइये तोहमत इनके इस कृत्य पर!
सचमुच किसी का भरोसा नहीं रहा था। इतिहास और भविष्य के अंत का मसला दार्शनिकों, विचारकों के माथा-पच्ची की वस्तु थी... यहाँ तो आम आदमी के 'भरोसे' का ही अंत हो गया था। पिफर वह आम आदमी किसी 'बदलाव' की उम्मीद में संगीनों के शामियाने के नीचे वोट टीपने या गिराने जाता हो, या पिफर सेन दा की तरह भरोसे का 'धंधा' करता हो!... इस समय की प्राथमिकता थी-बढ़ती हुई महंगाई, मुद्रास्पफीति, सेंसेक्स के चढ़ाव-उतराव, बाढ़-सुखाड़ और उस पर आधारित या अन्यान्य द्घोटालों, आश्वासनों और उससे जनित मोहभंगों के बीच अपना अस्तित्व आने वाले कल तक के लिए बचाकर रखना... आदमी की कमजोर आर्थिक-
दीवार में देश-विदेश के बा८ाार की दिन-दहाड़े पड़ती सेंध से आत्मरक्षा के वास्ते यह ''सर्वाइवल ऑपफ दि पिफटेस्ट'' के सि(ांत के आधार पर एक अनिवार्यता बन रही थी कि, वह 'बचा रहे'! 'न्यूनतम अनिवार्यता' की मानिंद।
सेन दा खलनायक नहीं थे... बल्कि, इस समय सारी परिस्थितियाँ बेईमान होने के लिए मुपफीद थीं! यदि कक्षा में अध्यापक ईमानदारी से पढ़ाते... यदि दफ्रतरों में कर्मचारी ईमानदारी से अपना काम निपटा कर नाक की सीध में देखते हुए सिपर्फ़ द्घर पहुँचते... चिकित्सक 'मेडिकल रिप्रेजेंटेटिवों' को खुश करने और उनके जबर्दस्ती थमाए गए 'ब्रांडों' को खपाने के लिए मरीज की जान पर ही 'प्रयोग' न कर डालते... यदि जनता के सभी नुमाइंदे ईमानदारी से वही काम करते, जिसे करने के लिए जनता उन्हें चुनती है... इत्यादि-इत्यादि... तब बेईमानी के धंधे अपने-आप झर जाते... परंतु ऐसा नहीं हो रहा था और इसके बारे में जनता सोचकर भी बहुत कम सोच रही थी... पफुर्सत कहाँ थी? बहुत सारी किताबों में, बहुत सारी जगहों पर ये सब लिखा गया है, मगर उन्हें जनता कभी नहीं पढ़ती। अपने पेट और कमर के 'सुखों' के लिए मरती-मारती जनता लोकप्रिय भाषणों, समकालीन कहानी- कविताओं,
अकादमिक प्रतिवेदनों आदि-इत्यादि का विषय बन रही थी... बस...
इसलिए सेन दा बचे थे, क्योंकि जिस तंत्रा में वह एक मजबूत कड़ी के रूप में अपना 'पार्ट' अदा कर रहे थे वह, इस देश की स्वातंत्राोत्तर पनपी महान अनैतिकताओं- भ्रष्टाचार, असंतोष,
मोहभंग, चरित्रा-क्षरण, अपराधीकरण, दमन-शोषण, आस्थाहनन और कई 'वादों'-परिवारवाद, अवसरवाद, भोगवाद, हिन्दुत्ववादी राष्ट्रवाद, क्षेत्रावाद, अलगाववाद, छआ और पक्षपाती
विकासवाद, बाज़ारवाद, खंडित
आदर्शवाद..., जो स्वतंत्राता के बाद के संक्षिप्त इतिहास में पनपी और पुष्ट हुई थीं... में से एक थी!

राखी ने गोपेश का हाथ मुट्ठी में ऐसे दबाया कि सिवाए उन दोनों के कोई नहीं जान पाए! बोली, ''इस बार ठीक नं. आ जायें, पास हो जाऊँ तो जान सांसत से छूटे... वरना पार्ट थ्री से पहले शादी समझो... द्घर पर इतना प्रेशर कि पूछो मत!'
''तुम्हारी जान बचानी पड़ेगी... उसमें मेरी जान की भी हिस्सेदारी है भाई!'' गोपेश मुस्करा रहा था...
''मजाक नहीं है।'' राखी ने उसका हाथ छोड़ दिया।
''मजाक कौन कर रहा है?''
''सेन दा से बात हुई है? क्या बोले हैं?''
''रुको बात करता हूँ... कल तो दफ्रतर के काम से बाहर गए थे।'' गोपेश जेब से मोबाइल निकाल कर सेन दा का नं. पफोनबुक में ढूंढ़ने लगा।

''धीरज रखो भाई... हड़बड़ाने से नहीं होगा।'' सेन दा उधर से चिल्लाये थे, शायद पहले ही किसी बात या आदमी से उखड़े हुए बैठे थे!
गोपेश ने राखी की ओर देखा और अपनी कॉपी से उसके सिर पर हल्का सा धौला मारते हुए बोला, ''हंडरेड परसेंट हो जाएगा...''

बेईमानी, लूट और दबंगई का तंत्रा कैसे काम करता है, यह सेन दा ने एक बार स्पष्ट किया था, ''जब यू जी सी की तरपफ से ;वहाँ के सरकारी कॉलेज केद्ध रिनोवेशन के लिए पैसा आया था, तब एक बार वहाँ के बर्सर दास बाबू कमरे में आये, हम वहीं बैठे थे, उन्होंने मुझे देखा नहीं था, बोले-दस ह८ाार इसमें से निकाल कर रख दो, मेरा और गुप्ता बाबू का उसमें हिस्सा है!'' सेन दा अपने कॉलेज के निदेशक जो, उसी कस्बे के उसी सरकारी कॉलेज के प्रिंसिपली से अवकाश पा कर यहाँ आये थे, से बोले, ''दास बाबू आप ही के समय में ज्यादा कमाए ना?''
अमरेश सिंह तपाक से ख़ारिज करते हुए बोले, ''मेरे समय में कहाँ अवनि बाबू के टाइम में कमाया...''
सेन दा खिसियाकर हँसते हुए सहमत हुए... और निदेशक अमरेश सिंह आगे कहते गए, ''उस कॉलेज में जानते हो, एक दरवाजा का खर्चा, आठ हजार बीस रुपया और एक खिड़की का छह हजार दस रुपया दिखाया है। विश्वास करोगे।''

इस समय लार्ड मैकाले द्वारा पैदा की गई शिक्षा प्रणाली में द्घूस, लंपटवादी राजनीति, बच्चों का आदर्शहंता
अंधमशीनीकरण, विचारशून्यता और अतिशय विशिष्ट होने का दम्भ इत्यादि-इत्यादि विडंबनाएँ और अपफ़सोस करने के राष्ट्रीय मसौदे लायक तमाम गड़बड़ियाँ तो थीं ही, जैसे कॉन्वेंट विद्यालयों में सारा सिलेबस अंतिम परीक्षा के पहले के एकाध महीने में ही पूरा करवा दिया जाता, साल भर बच्चों को या तो तमाम मदों हेतु चंदे की रसीद धराई जाती, या पिफर उन्हें अपने पास ट्यूशन पढ़ने के लिए पफुसलाने, धमकाने से लेकर, कक्षा में नीचा दिखाने के सारे तरीके आजमाए जाते और बहुधा सपफल भी हो जाते!
महाविद्यालयों में हालत यह थी कि यहाँ कक्षायें होती हैं, विद्यार्थी यह बात लगभग भूल चुके थे। वे या तो केवल नोटिस पढ़ने आते, प्रवेश या परीक्षा आदि के पफार्म भरने या पिफर विपरीत लिंगी से हेल-मेल करने! पढ़ाई कहीं नहीं हो रही थी...!
सारे स्कूलों और कॉलेजों के शिक्षक-व्याख्याता पद पर सुशोभित ज्ञानी महापुरुष और महादेवियाँ ट्यूशन में ही बकायदा ज्ञान के प्रसाद बेच रहे थे और या तो कक्षाओं में इक्के-दुक्के उपस्थित छात्राों से गप्पें मारते, उन्हें भी अपनी गंदी राजनीति का ककहरा सिखाते, पिफल्म और क्रिकेट की बतरस का मजा लेते, विपक्षी गुट के शिक्षक के खिलापफ उनका 'ब्रेन-वाश' करते हुए दिखाई देते थे, और महिला शिक्षक सिलाई-
बुनाई-कढ़ाई के नुस्खों का आदान-प्रदान करतीं, साड़ी की पफाल या ब्लाउज के कट पर विमर्श छेड़ा जाता या किसी के 'केलि-प्रसंग' की चटखारेदार मीमांसा द्घटित होती हुई पाई जाती... कोई इनका कुछ नहीं बिगाड़ सकता था! छोटे और मध्यम दर्जे के ऐसे विद्यादायी संस्थान पूरी तरह से गैरजिम्मेदार हो चुके थे... अध्यापक पूछता, 'कितने लोग हैं?' यदि दस या बीस से कम हुए तो कक्षा नहीं ली जायेगी! यानी जो पढ़ने के भरोसे आये हैं, वे या तो बैरंग द्घर लौट जावें या पिफर पढ़ाई के अलावा बाकी सब कुछ करें!
ये सभी शिक्षक-शिक्षिकाएँ सर्दियों में कैम्पस की लान में धूप सेंकते और दूसरे मौसमों में स्टापफ रूम की कुर्सियाँ द्घिसते हुए द्घटिया राजनीति की कार्यशाला चलाते रहते थे...
जहाँ विज्ञान की प्रयोगिकी की उत्तर-पुस्तिकाएँ विज्ञान शिक्षक या
डेमोनस्ट्रेटर के द्घर ;क्लास में नहींद्ध जाकर सौ-दो सौ रुपये में हस्ताक्षरित कराई जाती थीं। इंटर्नल बना शिक्षक 'वाइवा-बोस' ;मौखिक प्रश्नोत्तरीद्ध में डर से दबिया गए और बड़बोंग छात्रा-छात्राा से पूछता, ''तुमको कितना नं. देवें कि पास कर जाओ?''
राखी और नवनीत जब कैम्पस के नीम के नीचे खड़े थे, बगल में
इंटरमीडिएट के वार्षिक परीक्षापफल से
संबंधित एक खबर देखते और हँसते हुए लड़कों में से कोई कह रहा था, ''गजब है भई। एक ही लड़का दो-दो कॉलेज से पंजीकृत हो कर परीक्षा में बैठा...और एक से स्टेट-टॉपर भी हो गया। कौंसिल की दाद दो यार...ऐसा कारनामा सिपर्फ इसी प्रदेश की कौंसिल कर सकती है।''
दया मुखोपाध्याय ने अपने कार्यकाल में इसी 'दुर्द्घटना' के मद्देनजर यह द्घोषणा आगे चलकर करवा दी कि, मैट्रिक-इंटर के टॉपर्स की कॉपियाँ सार्वजनिक की जायेंगी और इससे पहले उनकी दोबारा जाँच होगी, क्रॉस-चेकिंग...! परंतु, सेन दा के हिसाब से सोचें तो, रिटायर्ड दया जी इस नौकरशाही में कब तक टिकेंगी। उनका कार्यकाल खत्म होगा तीन साल में, पिफर उसके बाद भ्रष्टाचार का बेताल ढप्प से आकर व्यवस्था के कंध्ें पर चढ़ बैठेगा... और पिफर यही कहानियाँ दोहराई जाएँगी...।
राखाी ने कांध्े से लटकते नए किस्म के बैग से वाईब्रेशन पर कांपते मोबाइल को निकाला और स्क्रीन पर देखते हुए कान से लगाकर बोली, ''लक्ष्मी...बोल''
पिफर उसकी बातें कुछ यूँ होने लगीं,
''ओहो...। कब रे, कैसे?''........
''क्या कह रहे हैं, सुसाइड किया है...एं, छोटे भाई को नक्सली बोल रहे हैं...हाँ, आजकल मुसलमान सब आतंकवादी और आदिवासियों को तो ऐसा नक्सली बोलकर...'' उधर से कुछ कहे जाने पर बीच में ही काटकर दूसरी बात...''नहीं यार, कहाँ काम हुआ? सेन दा कल चाईबासा जा रहे हैं...इसके बाद अभी तो रिजल्ट आने तक इंतजार करना है... वैसे सेन दा बोल दिए हैं तो, टेंशन नहीं है....''
''क्या... नहीं, अभी ढाई दी हूँ... और नहीं दूँगी...''
''ओके, वहीं मिलते हैं. हाँ-हाँ, तू थोड़ा जल्दी निकल लेना...अच्छा बाय''.......
मोबाइल पर कॉल खत्म हो गया, वह गोपेश से कहने लगी, ''लक्ष्मी पूछ रही है, मेरा काम हो गया?''
गोपेश दूसरी बात जानना चाहता था, ''और वह सुसाइड? नक्सली? कौन, किसकी बात कर रही थी तुम?''
''गोपू...जानते हो, होपना ने सुसाइड कर लिया है... बढ़िया स्टूडेंट था, नहीं नवनीत? तुम्हारे साथ उसकी बड़ी दोस्ती थी ना...। गोपू, इसी का जिगरी दोस्त हुआ करता था। वह कॉलेज को छोड़कर राँची गया... इस बार पार्ट थ्री में कैसे कम नं. मिला। पिफफ्रटी परसेंट से सिपर्फ २ नं. कम। एसटी लोग को पीजी करने के लिए इतना न्यूनतम चाहिए। इसी सब के टेंशन में, सेंट जेवियर्स के होस्टल के चौथे तल्ले से कूद गया। अस्पताल ले जा रहे थे, पर रास्ते में मौत हो गयी...
स्टुपिड। कम मार्क्स आने से क्या मर जाते हैं?''
''मगर वह मर गया...'' नवनीत सर को थोड़ा उठाकर किसी अलक्षित को तकते हुए धीरे से बोला।
''तुम्हें मालूम था?''
नवनीत चुप रहा...
गोपेश भी एकदम चुप हो गया था.
''तो तुम क्यों मुँह लटका रहे हो?''
''क्योंकि, ऐसा किसी के साथ भी हो सकता है।'' नवनीत पफट पड़ा, ''तुम लड़कियों का क्या है? जिस भी डिवीजन और क्लास से पास करो, मतलब पास करने से है, ताकि ढंग से, कम दहेज में, शादी हो जाये। सारी लड़कियों की नहीं कह रहा, मगर तुम और तुम्हारी जैसी ज्यादातर लड़कियों की तो बात यही है। पिफर वही चूल्हा-बरतन, बच्चे और मध्यवर्गीय नोंच-खरोंच वाली ज़िंदगी जिए जाओगी... और संतुष्ट रहोगी...क्योंकि इसके बाहर की दुनिया तुम लोगों ने ना देखी है, ना देखने की इच्छा और योग्यता है। जहाँ तुम हो, वहाँ तुम लोगों में से तो विरली ही वह होती हैं, जो वर्किंग वूमेन बनती हैं। वह भी अंतिम उपाय के तौर पर। सो भी शादी का पुछल्ला लगाने के बाद ही...इसी कॉलेज में देखो, १४-१५ साल की लड़कियाँ कल ते अच्छी-भली थीं, अचानक दन्न से माथे के बीचों-बीच सिन्दूर पोतकर आ जाती हैं... किसी को डाक विभाग वाला आसामी मिल गया, तो किसी को सिंचाई विभाग वाला तो किसी को सरकारी स्कूल का मास्टर और किसी को बिजनेस वाला... तर्क एक ही, अच्छा द्घर मिल रहा था, तो छोड़ते या इंतजार क्यों करते? अब पढ़ती रहो, अगर पढ़ सको। तो इनकी पढ़ाई की वैल्यू क्या है? मगर लड़के का तो सारा आगा-पीछा अच्छे मार्क्स पर टिका हुआ है। उसमें भी सिपर्फ अच्छा नंबर ही नहीं, टॉप करना पड़ेगा....'' तब कैम्पस सेलेक्शन, चाहे बाकी जगहों पर सहूलियत मिलेगी...इसलिए दो क्या, एक नं. से भी पफर्क पड़ता है। बॉस....। ''तो क्या उनके हिस्से का मार्क्स मैं खा जा रही हूँ? राखी चिढ़कर बोली।''
''सेन दा वालों के धंध्े में तो और क्या हो रहा है?'' नवनीत इतने व्यंग्य से बोला कि राखी गोपेश की तरपफ तिलमिलाकर देखने लगी, कुछ कह नहीं सकी। नवनीत बक रहा था, 'सिस्टम हर ओर से तुमको चपेट में ले रहा है सर...। इसके साथ चलना चाहो तो द्घेर कर पिफसड्डी बना दिए जाओगे और यदि पिफसड्डी बना दिए गए तो आत्महत्या जैसा द्घटिया विकल्प है। यदि इसके विरु( गए तो 'नक्सली'' का लेबल माथे पर सांट कर गोली मार दी जायेगी....'
गोपेश ज्यादा देर वहाँ नहीं बैठ सका... और राखी तो दस मिनट पहले ही तुनककर अपने बैग और किताबें समेट कर जा चुकी थी। सेन दा रोज की तरह अपने टेबुल के गिर्द खड़ी लड़की को समझा रहे थे कि, कैसे उसका पंजीकरण उन्होंने उसके आये बिना खुद ही कर दिया था, ;उसकी यानी अपने एक छात्रा की मदद के ध्येय सेद्ध ''साला नंबर तुमको दे दिया गया है देखो, तुम परीक्षा नहीं दी, तब भी क्रोस लिस्ट में तुम्हारा नंबर है उस विषय में...
....देखा, हमारा काम कच्चा नहीं होता बाबू...!
''
इस द्घटित होते समय में....
तो, इस द्घटित होते समय में, हर चीज़ की एक कीमत है, कीमत चुकाओ, हासिल कर लो। सत्ता, शक्ति या पिफर सम्मान... अरे, परीक्षापफल में मार्क्स तो दो

 
कौड़ी की बात है। इज्जत आंतक के साथ आती है... आतंक कायम करने की क्षमता इस वक्त जिनके पास है... और जो धेखे और नाजायज कृत्यों के उस्ताद हैं, वह 'उस दुनिया' के आदमी तो कतई नहीं हैं, जो भूगोल की किताबों में, ''हमारी ध्रती'' अध्याय में, सूर्य के चारों तरपफ और अपनी ध्ुरी पर द्घूमती हुई बताई जाती है। ऐसे लोग बंदूकों से, पुराने ग्रंथों के जोरदार मिथ्या हवाले से, अपने पद के वजन, कई नाजायज तिकड़मों और राजनीतिक गुरों और पैंतरों आदि से
तुमको 'प्रसन्नचित' कर सकते हैं, तो चारों-खाने 'चित्त' भी कर देंगे...सारा कारोबार उनके ही कांख में दबा है। 'भ्रष्टाचार' ही उनका सद्-आचरण है, मगर यह सि( करने की जिम्मेदारी लेने हेतु बने किसी भी संस्थान में इसे सि( करने का नैतिक साहस और इच्छाशक्ति इसलिए नहीं हैं, क्योंकि हर जगह आदमी का निजी स्वार्थ प्राथमिक है। हमारी इस कहानी के तमाम पात्राों की तरह इस देश के बाकी सभी नागरिक ऐसी ही आबोहवा में २१वीं सदी में, माननीय भूतपूर्व राष्ट्रपति डॉ.एपीजे अब्दुल कलाम द्वारा किए गए सपने-''विजन-२०-२०'' की ओर अग्रसर हैं। और, सेना दा की जुबान में, 'ये लोग खाने में विष नहीं, गू में विष देने वाला है।' अब आप इस उलटबाँसी का अर्थ लगाने के लिए स्वतंत्रा हैं। लगाते रहिये...।
 
 
ऊपर जाये...
पिछे जाये...
 
 
  Copyright 2009 | All right reserved Powered by : Innovative Web Ideas
(A division of Innovative Infonet Private Limited)