मार्च २०१२
 
 
 
   
 
 
 
• मनीषा कुलश्रेष्ठ को 'लमही सम्मान' • निदा फाजली को पद्मश्री सम्मान •देवेंद्र इस्सर नहीं रहे• ओड़िया लेखिका प्रतिभा रॉय को २०११ का ज्ञानपीठ पुरस्कार•चंद्रकांत देवताले को साहित्य अकादमी पुरस्कार • कुणाल सिंह को युवा साहित्य अकादमी सम्मान • तीसरा 'कृष्ण प्रताप कथा सम्मान' (२०१२) गीतांजलिश्री की कृति 'यहां हाथी रहते थे' को • रविशंकर को मरणोपरांत लाइफटाइम अचीवमेंट ग्रैमी पुरस्कार • विनोद कुमार शुक्ल को हिन्दी काव्य साहित्य में रचनात्मक योगदान के लिए 'परिवार' पुरस्कार • वरिष्ठ साहित्यकार कामतानाथ नहीं रहे
 
 
 
कविता
 
 
पावस नीर
 

दिल्ली विश्विविद्यालय से स्नातक। पिफलहाल दैनिक भास्कर में कार्यरत। साहित्यिक और सामयिक विषयों पर ब्लॉग लेखन।
इंटरनेट की कविताओं के संग्रह 'संभावना डॉट कॉम' में कविताएँ प्रकाशित।
डी-८९ए गणेश नगर पांडव नगर कांप्लैक्स, दिल्ली- ९२
मो. ९९९००८८२९८

 
सपना
 

वो सपना जो आज आया है, जरूर शुक्रवार को चला होगा
इतना वक्त तो लग ही जाता है
द्घर से यहाँ तक आने में

रास्ते भर उसने सुनी होगी कहानियाँ
बांटी होगी पूरी-सब्जी जो माँ ने बांधी होगी
उसके बिस्तरे में
कई अनजान सपनों से,
ऐसा भी हो सकता है किसी सपने के खर्राटों ने
उसे रातभर जगाए रखा हो

द्घर पहुंच कर दरवाजे पर द्घंटों इंतजार किया होगा
मेरे सोने का
पिफर आ गया होगा दबे पाँव

ऐसा नहीं है कि वो सपना बहुत खास ही था
या उसमें कोई अजीब खुशबू या रंग ही था
एक सपने से ज्यादा उसमें कुछ था भी नहीं
सच कहूँ, तो अब याद भी नहीं रहा
हाँ, इतना तो तय है कि
उसपर एक कविता जरूर लिखी जा सकती थी

क्योंकि उस सुबह देर तक सोता रहा था मैं
और जगा था मुस्कुराते हुए

क्या होता अगर सपने कर देते हड़ताल
कितनी चुप्प सी हो जाती हमारी नींद
गूंगी रह जाती याद
उन सपनों के बिना जो सुबह याद भी नहीं रहते ठीक से

हे देव
इतना करना कि
जब शहर का शोर गूंगा कर दें हर आवाज़ को
तब भी नींद में न मिले शांति
जब हमारी समझदारियां काट-छांट कर
सांचे में पिफट कर रही हों हमारा होना
कुछ बेतरतीब से मेहमान आते रहें दबे पांव
जारी रहे सपनों का सपफर

 
गुमला के सर्कस में
 

'आइए, आइए.. तमाशा देखिए
अजी, तमाशा क्या, पूरा इतिहास है..
मौका मत छोड़िए, आइए, आइए..'

सुबह से गायत्राी साउंड से लाउडस्पीकर बुक करा कर
शहर भर में आवाज़ लगा गया है कोई

कहने वाले का दावा था कि
एक पूरा समय जो खो चुका था
उसका भग्नावशेष मिला है उसे
जीता-जागता, सांस लेता पुरातत्व
जो बस उसी के पास है

बस पच्चीस रुपल्ली के बदले में
दे रहा था वह हमें इतिहास साझा करने का निमंत्राण

'जी हाँ, हुजूर, कोई ठगी नहीं है
जिस पीढ़ी की किमियागीरी से हम बने हैं,
उसका आखिरी चश्मो-चिराग है
टिकट खरीदिए, आइए..आइए
जब पूरी दुनिया को सभ्य बना रहा था
काले कोट वाला वह जादूगर

तब ये शख्स जंगल में चुन रहा था बेर
जी हाँ, सच है..
यह बाजार तक कभी पहुंच ही नहीं पाया
अजूबा है न
आइए, देखिए, सुनिए
जब सारी दुनिया नक्शा बदलकर ग्लोबल हो रही थी
तो कैसे ये नादान बेच रहा था अपना कुतुबनुमा
तीन रोटियों और एक सेर चावल के बदले'

आइए. आइए.. देखिए
आखिरी इंसान'

बस २५ रुपए में मजे लीजिए, द्घर जाइए और सो जाइए

 
 
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