नवम्बर २०१०
 
 
 
   
 
 
 
• मनीषा कुलश्रेष्ठ को 'लमही सम्मान' • निदा फाजली को पद्मश्री सम्मान •देवेंद्र इस्सर नहीं रहे• ओड़िया लेखिका प्रतिभा रॉय को २०११ का ज्ञानपीठ पुरस्कार•चंद्रकांत देवताले को साहित्य अकादमी पुरस्कार • कुणाल सिंह को युवा साहित्य अकादमी सम्मान • तीसरा 'कृष्ण प्रताप कथा सम्मान' (२०१२) गीतांजलिश्री की कृति 'यहां हाथी रहते थे' को • रविशंकर को मरणोपरांत लाइफटाइम अचीवमेंट ग्रैमी पुरस्कार • विनोद कुमार शुक्ल को हिन्दी काव्य साहित्य में रचनात्मक योगदान के लिए 'परिवार' पुरस्कार • वरिष्ठ साहित्यकार कामतानाथ नहीं रहे
 
 
 
कहानी
 
एक जीवन का उत्कर्ष
 
जन्म : १९६२
हिन्दी के उन रचनाकारों की जमात में शामिल जो पेशे से पत्राकार हैं। छह काव्य-संग्रह और दो उपन्यास प्रकाशित। एक बांग्ला धारावाहिक 'प्रतिमा' में अभिनय। पिफलहाल एक पिफल्म 'राजा बिहारी ऑटोवाला' की पटकथा लिखने में व्यस्त।
४०ए, ओल्ड कलकत्ता रोड, पो. पातुलिया, टीटागढ़, कोलकाता
मो. ०९८३०२७७६५६,
  अभिज्ञात

लाजवंती का उस लड़की से बात करने का खूब मन करने लगा जो जीन्स पहने हुए थी। उसके सवाल इतनी उत्सुकता भरे थे कि उसका जवाब देने में उसे अजब का संतोष मिला। उसे पहली बार लगा कि कोई उसकी जिंदगी के बारे में इतने विस्तार, इत्मीनान और दिलचस्पी से पूछ रहा है वरना उनके सुख-दुःख को कौन गंभीरता से लेता है! कौन पूछता है कि तुम इतनी दुर्गंध मारती बस्ती में कैसे रहती हो? कौन पूछता है कि तुम्हारे सपने क्या हैं

तुम्हारा नाम...?'
-'कुमारी लाजवंती...।'
-'काम क्या करती हो?'
-'मैले की सापफ़-सपफ़ाई। खटा पाखाने का मैला सिर पर ढोने का काम...।'
-'मैला मतलब...?'
-'नाइट साइल कहते हैं बाबू लोग। मुंशीपाल्टी की गाड़ियों पर लिखा हुआ नहीं देखा है 'नाइट साइल'। पाइप से खींचकर उसमें भरते हैं... मगर कई जगह हमें भी सापफ़ करना पड़ता है।'
-'मगर खटा पाखाने की परंपरा तो ख़त्म हो गयी है...।'
-'गोरमेंट कहती रहती है मगर कई जगह तो यह काम चल रहा है अब भी। यह गोरमेंट की साजिश है हमारा काम खत्म करने की। हमारी तरक्की के नाम पर हमारा खानदानी काम गोरमेंट खत्म करती जा रही है।'
-'लेकिन यह तो तुम लोगों को शोषण से मुक्ति दिलाने की कोशिश है।' प्रश्नकर्ता की आँखों में चमक सहसा बढ़ गयी। उसे जो बाइट चाहिए थी यह उससे बेहतर थी। कैमरा लाजवंती पर जमा हुआ था। यह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर काम करने वाली एक एनजीओ संस्था की ओर से हो रहा था।'
-'क्या तुम्हें बदबू से परेशानी नहीं होती?'
-'नहीं। मैं तो पाखाना बगल में पड़ा हो तो भी आराम से खाना खा सकती हूँ। मुझे तो उन लोगों पर हँसी आती है जो पाखाने की बदबू से परेशान हो जाते हैं। अरे जब इतनी ही परेशानी है, तो अपने पेट में इसे लेकर कैसे द्घूमते पिफरते हैं! मैं तो बचपन से ही पाखाने की सपफाई की अभ्यस्त हूँ। मेरी माँ को भी लोग अपने पाखाने की सपफ़ाई के लिए बुलाकर ले जाते थे और वह हमारी कमाई का जरिया है। मैं भी इस काम में बचपन से लग गयी थी और देखो उसी की व८ाह से मुझे मुंशीपल्टी में नौकरी मिल गयी।'
लाजवंती के काम-काज व जीवन पर शूट चल रहा था। खुद लाजवंती को नहीं पता था कि उसके साथ क्या हो रहा है, लेकिन वह दो दिन से पूरे मोहल्ले में चर्चा का विषय बन गयी थी। अपने मोहल्ले में सबसे खूबसूरत मानी जाने वाली लाजवंती को नगरपालिका वाले बाबू ने अपने कमरे में बुलाया था और अपने दफ्रतर में बैठे लोगों से परिचय कराया था, उनमें दो महिलाएँ भी थीं-'लाजो... यह लोग एक बहुत बड़ी संस्था से आये हैं। तुम्हारे काम-काज और जीवन पर एक टीवी प्रोग्राम बनाएँगे।'
-'...साहब, उसमें क्या होगा?'
-'क्या तुमने बिग बॉस प्रोग्राम देखा है...?'
-'नहीं।'
-'अब तुमको क्या समझाएँ। कितना पढ़ी हो?'
-'कक्षा आठ तक...।'
-'ठीक-ठीक है ठीक है, हम तुम्हारे बाबूजी को सब कुछ समझा देते हैं।'
और पिफर लाजवंती के पिता को समझा दिया गया कि उसकी बेटी की जिंदगी अब बदलने वाली है। उसे भी और तुम्हें भी कापफी रुपये मिलेंगे। लाजवंती एक रियलिटी टीवी शो का हिस्सा बनने जा रही है। उसका बाप खुश था। बेटी की शादी के खर्च का इंतजाम होने की उसे आशा बंध गयी थी। वह नगरपालिका में सपफाई विभाग में काम करता था। उसी की सिपफारिश पर दो माह पहले ही अठारह वर्षीय कुमारी लाजवंती को नगरपालिका के सपफाई विभाग में काम पर रख लिया गया था और वह खटा पाखाने विभाग में पिफलहाल बाहर खाता में काम करने लगी थी और यह आश्वासन भी मिला था कि जल्द ही कुमारी लाजवंती की नौकरी परमानेंट हो जाएगी। अब साल-दो साल तो बाहर खाता में काम करना ही पड़ेगा।

अब लाजवंती दो दिन से कैमरे का सामना कर रही थी। उससे तरह-तरह के सवाल किये जा रहे थे, जिसके जवाब उसे अपने मन से देने थे। लाजवंती को पहले तो झिझक हुई पिफर जब मोहल्ले के लोग उसे विशेष महत्व देने लगे और उसके दरवाजे पर भीड़ लग गयी तो उसे जवाब देने में म८ाा आने लगा। उसने तो बेझिझक यह भी कह दिया कि वह पाखाने की गंध के आधार पर यह भी बता सकती है कि वह बच्चे का है या बड़े का। वह स्वस्थ व्यक्ति का है या किसी बीमार का। आदमी चाहे तो पाखाने की गंध का स्वाद ग्रंथियों से संबंध टूट सकता है और पिफर गंध प्रिय या अप्रिय नहीं रह जाएगी। अभ्यास से गंध एक गंध भर बनकर रह जाती है। जिसकी विशेषताएँ और अंतर सूंद्घने वाला बता या समझा सकता है, उसे प्रिय या अप्रिय की सरणियों से बाहर रखकर। हालांकि भंगियों की बस्ती में कई ऐसे लोग भी हैं जिनकी सूंद्घने की क्षमता खो जाती है और वे किसी भी गंध को महसूस नहीं कर पाते। कुछ लोग कहते हैं कि यह एक बीमारी है किंतु यह मैले की सापफ-सपफाई से जुड़े व्यक्ति के लिए वरदान साबित होती है। कुछ ऐसे भी हैं जो गंध से तालमेल नहीं बिठा पाते तो नशे का सहारा लेते हैं। यह जरूर है कि दुनिया की गंदगी सापफ करते-करते वे गंदगी से बेपरवाह हो जाते हैं और थोड़ी बहुत गंदगी उन्हें गंदगी ही नहीं लगती। उन्हें तो लगता है कि उनकी बस्ती सापफ सुथरी है लेकिन बाहर वालों को उसमें खामियाँ ही नजर आती हैं और कहते हैं कि वे अपनी बस्ती को सापफ नहीं रखते।
लाजवंती का उस लड़की से बात करने का खूब मन करने लगा जो जीन्स पहने हुए थी। उसके सवाल इतनी उत्सुकता भरे थे कि उसका जवाब देने में उसे अजब का संतोष मिला। उसे पहली बार लगा कि कोई उसकी जिंदगी के बारे में इतने विस्तार, इत्मीनान और दिलचस्पी से पूछ रहा है वरना उनके सुख-दुःख को कौन गंभीरता से लेता है! कौन पूछता है कि तुम इतनी दुर्गंध मारती बस्ती में कैसे रहती हो? कौन पूछता है कि तुम्हारे सपने क्या हैं?

उसका पहनावा देख लाजवंती के मन में भी जीन्स पहनने की इच्छा जगी थी। अपने सपनों के बारे में बात करते हुए उसने जीन्स पहनने की इच्छा भी जाहिर की थी। तीसरे ही दिन लाजवंती मुंबई के लिए रवाना हो गयी। मोहल्ले में विशेष चर्चा थी। लाजवंती हवाई जहाज से मुंबई ले जायी गयी है। अखबारों में खबर थी एक विशेष रियलिटी शो के लिए मैला ढोने वाली कुमारी लाजवंती का चयन हुआ है। अगर वह चयनकर्ताओं के साँचे में ढल पायी तो न्यूयार्क में एक अंतरराष्ट्रीय शो में भाग लेगी और जीत गयी तो मालामाल हो जाएगी।

लाजवंती का यह पाँचवां महीना था। लगातार व्यस्त जिंदगी रही पिछले दिनों। मुंबई पहुँचने के बाद उसे आधुनिक जीवन के तमाम तौर-तरीके सिखाये गये। कैसे कांटे-चम्मच से प्लेट में खाना है। कैसे पानी पीना है। वह लेटेस्ट डिजाइन के कपड़े पहनने लगी थी और उनके अजीबोगरीब नाम भी याद हो गये थे। उसे अच्छी हिन्दी ही नहीं सिखायी गयी बल्कि वह अंग्रेजी बोलना भी सीख गयी थी क्योंकि उसके साथ कई और लड़कियाँ भी थीं जिनसे केवल अंग्रेजी में ही बातचीत करने की इजाजत थी। अन्य लड़कियाँ देश के अलग-अलग क्षेत्राों से लाई गयी थीं और उन्हें भी वही प्रशिक्षण दिया जा रहा था जो उसे। उन्हें कोरियोग्रापफर ने चलना सिखाया। कैसे हँसना है, कैसे कितनी ते८ा आवा८ा में बात करनी है, यह भी उसके प्रशिक्षण का हिस्सा रहा। उसके बाल सलीके से कटवाये गये। वह पिछले महीनों लगातार एसी में रह रही थी और एसी कारों में सपफर करती थी। मुलायम बिस्तरों पर सोती। अब वह ऐसी अवस्था में पहुँच चुकी थी जहाँ पिछली जिंदगी दुःस्वप्न से कुछ अधिक नहीं लगती थी। वह चाहती थी कि यह सपने जैसी लगती जिंदगी हमेशा बनी रहे। पिफर भी कभी उसके द्घर से पफोन आता तो उसका अतीत उसके सामने आ जाता, जिससे वह वास्ता नहीं रखना चाहती थी। हालांकि वह एक बार वहां जरूर लौटना चाहती थी। यह दिखाने के लिए कि वह क्या थी

और अब क्या हो गयी है।
पिफलहाल तो वह उस अनजान लक्ष्य को पाने की ओर बढ़ रही थी जिसके बारे में उसे कुछ भी पता नहीं था कि उसका क्या होने वाला है? यह जो लाखों रुपये उस पर खर्च किए जा रहे हैं उसकी भरपायी वह कैसे करेगी? उसे बस इतना पता है कि उससे कुछ-कुछ दिनों के अंतराल में एक टीवी इंटरव्यू लिया जाता है कि अब वह कैसा महसूस करती है। अपनी जिंदगी के तौर तरीकों में आये बदलावों के बारे में उसे तपफसील से बताना पड़ता था और यह उसे अच्छा लगता था। उसके मन में क्या चल रहा है और क्या महसूस कर रही है। सच कहा जाए तो उसे तब ही पता चलता जब वह स्वयं उस इंटरव्यू में कहती। रोज बदलती जिंदगी के बीच उसे टीवी साक्षात्कारों का भी इंतजार रहता। उसे लगता कोई है जो उसकी जिंदगी के बारे में गंभीर है और क्या चल रहा है जानना चाहता है। उसके पास बताने के हर बार कई नयी बातें और नये अनुभव होते। वह टीवी कैमरे के सामने नये-नये कपड़ों और लह८ो में पोज देती। उससे कुछ ऐसे भी सवाल पूछे जाते जिनका उसकी जिंदगी से कोई संबंध नहीं था, किंतु उसकी समझने की काबीलियत जांची-परखी जाती थी और हर इंटरव्यू के अंत में उसे कहना पड़ता था कि मुझे जिताने के लिए एसएमएस के जरिए वोट दें। उसे बताया गया कि जहाँ वह रखी गयी है वहाँ चारों तरपफ कैमरे लगे हैं और वह जो भी बातचीत करती है वह देश भर के लोग देख सुन रहे हैं। धीरे-धीरे परिसर में रह रही युवतियों की संख्या कम होती जा रही थी। जो विदा होता था वह सबसे मिलकर खूब रोता था। उसके मन में भी यह भय लगातार बना रहता था कि वह इस रहस्यमय खेल से आउट न हो जाए क्योंकि वह पिछली जिंदगी में नहीं लौटना चाहती थी। उसके लिए जीत कोई माने नहीं रखती थी किंतु वह हारकर इस सुखद माहौल से बाहर नहीं निकलता चाहती थी। और अंत में उसे बताया गया कि वह यह रियलिटी शो जीत गयी है।

कुमारी लाजवंती अब न्यूयार्क में थी। उसे यहाँ आकर पता चला कि दुनिया के नामचीन कोरियोग्रापफर उसे प्रशिक्षण दे रहे हैं और उसके साथ रैम्प पर दुनिया भर की पफैशन की दुनिया की हस्तियाँ होंगी। उनमें से कुछ तो अभ्यास के दौरान उनके साथ होतीं। उसे उनके बीच कत्तई नहीं लगा कि वह उनसे किसी मामले में कमतर है। उसे यह इ८ााजत नहीं थी कि उनके सामने अपने दिल की बात करे या अपनी निजी जिंदगी के बारे में कोई बात करे। उसे बस इतना ही बताना था कि वह इंडिया से है। बाकी निजी सवालों के जवाब उसे टाल जाना था। अलबत्ता सामान्य देश-दुनिया की जितनी बातें करनी हों, वह कर सकती थी। वह इतना जान चुकी थी कि यह वे लोग हैं जो दुनिया भर में पहले से ही मशहूर हैं क्योंकि उनकी तस्वीरें और इंटरव्यू अखबारों में उसने देखा था। उसे बताया गया कि अमुक तिथि को अमुक बजे उसका टीवी पर लाइव शो आने वाला है, जो पूरी दुनिया में एक साथ प्रसारित होगा। जिसके प्रसारण का अधिकार एक सौंदर्य प्रसाधन व पफैशन के उत्पादों से जुड़ी एक कंपनी ने लिया है, जिसका अपना टीवी चैनल भी है। लाजवंती ने अपने द्घर भी पफोन कर दिया था कि वे लोग उस कार्यक्रम को देखें कि उनकी लाजवंती क्या से क्या बन गयी है!
और वह शुरू भी हुआ तय समय पर। उसकी उपलब्धियों का सीधा प्रसारण हो रहा है यह जानकर उसमें एक रोमांच पैदा हुआ। इस कार्यक्रम के लिए पूरी दुनिया से न्यूयार्क पहुँचे थे सेलिब्रिटी। जिनके साथ उसने हाथ मिलाया। हाय-हैलो की। दावत का आनंद लिया। वह पूरे कार्यक्रम के केन्द्र में थी। यह अपनी तरह का सबसे बड़ा रियलिटी शो था, जो सोशल काज और नारी उत्थान से जुड़ा था। कार्यक्रम में दुनिया के कई विख्यात लोगों ने उससे हाथ मिलाया। कुछ के वह गले मिली। कुछ को उसने चुम्बन दिए। उसने दुनिया के विख्यात माडलों के साथ रैम्प पर कैट वाक किया।
और पिफर मंच से द्घोषणा की गयी कि इस साल की वह विशेष महिला चुनी गयी है, जो वास्तविक जिंदगी में नारी उत्थान के प्रतीक है। तालियों की गूंज के बीच उसे मंच पर बुलाया गया। उसे हीरा जड़ित मुकुट पहनाया गया। एक देश ने उसे अपने देश की मानद नागरिकता दी। कुछ बड़े पिफल्म डॉयरेक्टरों ने उसे अपनी-अपनी पिफल्म में हिरोइन लेने की द्घोषणा की। एक अंतरराष्ट्रीय संस्था ने उसे ब्रांड एम्बेसडर द्घोषित किया। उसकी स्पीच हुई और उसने संक्षिप्त से अपने भाषण में आयोजकों का आभार माना कि उसके विकास का उन्होंने समुचित अवसर दिया, वह बहुत मामूली परिवार से है। बोलते समय उसकी आँखों में खुशी के आँसू थे। उसे लग रहा था कि वह जागी आँखों से एक ख्वाब देख रही है। वह जिंदगी में वह सब पाने में कामयाब हो गयी है जिसे कोई भी स्त्राी पाना चाहे। उसकी स्पीच के बाद द्घोषणा की गयी-'यह जो नारित्व के तमाम गुणों से लैस नारी है, उसके जीवन-संद्घर्ष को व्यक्त करने वाली एक छोटी सी पिफल्म अब दिखायी जाएगी।'
हॉल की बत्तियाँ गुल कर दी गयीं और अब बड़े से स्क्रीन पर दिखायी दे रही थी खटा पाखाने का मैला सिर पर रखे मुस्कराती हुई चल रही कुमारी लाजवंती। यह बताती लाजवंती कि वह बदबू की परवाह किए बिना आराम से खाना खा सकती है। वह लाजवंती, जिसे हिन्दी भी सही ढंग से बोलनी नहीं आती। वह लाजवंती जिसे चलना और खाना-पीना तक सिखाया जा रहा है। वह रैम्प पर कैटवाक सीख रही है। वह लाजवंती, जो कह रही है कि अब वह अपना नाम बदलना चाहती है और वह अपना नाम रखेगी 'कुला'। लाजवंती जैसे पहाड़ से गिरी। हॉल में चल रहे पचासों एसी के बावजूद वह एकाएक पसीने से तरबतर हो उठी। पिफर एकाएक हाथ पैर ठंडे होने लगे। हॉल की बत्तियाँ पिफर जल उठीं, इस द्घोषणा के साथ कि लाजवंती जैसी दीन हीन और जहालत की जिंदगी जी रही औरतों के जीवन के उत्थान के लिए महिला विकास से जुड़ी संस्था को संयुक्त राष्ट्र के अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार के लिए नामित किया गया है। कार्यक्रम आयोजित करने वाली संस्था के सदस्य हवा में हाथ लहरा रहे थे, अपने पराक्रम पर। उनमें से एक ने लाजवंती के जीवन में हुए परिवर्तनों पर कहा कि उन्होंने एक औरत की जिंदगी बदल दी है। उसे नयी पहचान दी है 'कुमारी लाजवंती' से 'कुला' बनाकर। कार्यक्रम खत्म हुआ तो लोग उससे हाथ मिलते हुए झिझक रहे थे... शायद उसके अतीत को जानकर। इधर लाजवंती को पहली बार एक तेज दुर्गंध आती महसूस हुई। लगा उसका सिर चकरा रहा है उस दुर्गंध से। हर और पाखाने की तीखी दुर्गंध। पहली बार उसे दुर्गंध से उबकाई जैसी आने लगी। वह तेजी से वाशरूम की तरपफ बढ़ गयी। तबीयत नहीं संभली को वह होटल में अपने कमरे में चली गयी। कपड़े बदले और लेट गयी। एकाएक उसने टीवी चालू कर दिया। देखा टीवी पर यह बताया जा रहा था कि कुला के व्यक्तित्व के विकास पर दो करोड़ रुपये खर्च हुए हैं। यह आंकड़े भी दिये जा रहे थे कि उसकी हँसी पर कितने रुपये खर्च हुए और उसकी चलने के तरीके पर कितना खर्च हुआ है।
कुछ द्घंटे बाद उस तीस मंजिला होटल के बाहर पुलिस वैन खड़ी थी और एक लाश का पंचनामा हो रहा था। अगले दिन के अखबारों के मुखपृष्ठ पर खटा पाखाना सापफ करने वाली एक नारी के विकास के किस्से थे और किसी कोने में उसी होटल से कूदकर एक महिला की खुदकुशी की भी खबर थी। जिसका चेहरा ऊँचाई से गिरने के कारण विकृत हो गया था और पहचान में नहीं आ रहा था।

विभिन्न टीवी चैनलों पर कुला की जिंदगी के उत्थान का रियलिटी शो आते रहे। मैला पफेंकने से पेज थ्री की दुनिया में प्रवेश की दास्तां उसमें दिखायी गयी। हालांकि कुला की मौत को लेकर भी खबरें टीवी और अखबारों में छायी रहीं और अटकलबाजियों का दौर चलता रहा कि मौत की वजहें क्या हैं। एक मीडिया हाउस का कहना था कि वह बेशुमार शोहरत हजम न पायी और दिमागी संतुलन बिगड़ गया जिसके कारण वह होटल की तीसवीं मंजिल से गिर पड़ी।

 
 
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