नवम्बर २०१०
 
 
 
   
 
 
 
• मनीषा कुलश्रेष्ठ को 'लमही सम्मान' • निदा फाजली को पद्मश्री सम्मान •देवेंद्र इस्सर नहीं रहे• ओड़िया लेखिका प्रतिभा रॉय को २०११ का ज्ञानपीठ पुरस्कार•चंद्रकांत देवताले को साहित्य अकादमी पुरस्कार • कुणाल सिंह को युवा साहित्य अकादमी सम्मान • तीसरा 'कृष्ण प्रताप कथा सम्मान' (२०१२) गीतांजलिश्री की कृति 'यहां हाथी रहते थे' को • रविशंकर को मरणोपरांत लाइफटाइम अचीवमेंट ग्रैमी पुरस्कार • विनोद कुमार शुक्ल को हिन्दी काव्य साहित्य में रचनात्मक योगदान के लिए 'परिवार' पुरस्कार • वरिष्ठ साहित्यकार कामतानाथ नहीं रहे
 
 
 
पाखी महोत्सव
 
शास्त्रा बिना परंपरा आगे नहीं बढ़ सकता
 
इस साल 'पाखी' महोत्सव परिवर्तित तिथि के साथ १८ सितंबर को वाराणसी में संपन्न हुआ। इस अवसर पर 'शब्द साधक शिखर सम्मान' से नामवर सिंह को सम्मानित किया गया। रणेन्द्र को 'शब्द साधक जनप्रिय सम्मान', निशांत और दिलीप कुमार को 'शब्द साधना युवा सम्मान' मिला। नामवर सिंह पर केन्द्रित 'पाखी' के अक्टूबर अंक का लोकार्पण हुआ। साथ ही 'परंपरा और सृजनात्मकता' विषय-संगोष्ठी का आयोजन भी। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के कला संकाय के प्रेक्षागृह में साहित्यिक अभिरुचि वाले लोगों की भीड़ अति उत्साहित करने वाली थी। नामवर सिंह ने दो बार व्याख्यान दिया। काशी में पुरस्कार पाने पर वे भावुक हुए। दूसरे उन्होंने परंपरा और सृजनात्मकता' पर भी अपने विचार रखे
राधे श्याम दुबे : नामवरजी मेरे दादा गुरु लगते हैं। हाईस्कूल से ही मैं उनके बारे में सुनता आ रहा था। उन्हीं की प्रेरणा से आज मैं यहाँ हिन्दी विभाग का अध्यक्ष हूँ। आज हिन्दी की कड़ी प्रो. नामवर सिंह से जुड़कर आगे बढ़ती है। उनका शिष्य बनने का मौका तो मुझे नहीं मिला पर कई बार उनकी ज्ञानवाणी सुनने का अवसर उपलब्ध हुआ है। प्रो. कमलेशदत्त त्रिापाठी संस्कृत के विद्वान हैं, पर मैं उनको हिन्दी का मर्मज्ञ मानता हूँ। कभी-कभी मन में आता है कि उनसे कहा जाय कि आप हिन्दी में क्यों नहीं आये? उनके हिन्दी कवियों के बारे में जो वक्तव्य है उससे लगता है कि उन्हें हिन्दी में रहना चाहिए। खैर, आप जहाँ है वहाँ आप ने कीर्तिमान स्थापित किया है।
अपूर्व जोशी : मेरे लिए यह एक ऐतिहासिक क्षण है। और आप लोगों के लिए भी। आज मैं विशिष्ट सभा को संबोधित करने का मौका पा रहा हूँ, एक ऐसे विश्वविद्यालय में जिसकी स्थापना महामना मदन मोहन मालवीय जी ने की थी। वे विश्वविद्यालय के कुलपति होने के साथ-साथ पत्राकार भी थे। आज यहाँ कुलपति महोदय के साथ नामवरजी भी उपस्थित हैं। आप सभी हिन्दी के विद्यार्थियों के लिए भी यह क्षण ऐतिहासिक है क्योंकि आप भविष्य में कह सकेंगे कि आपने डॉ. नामवर सिंह को साक्षात देखा। 'हंस' संपादक राजेन्द्र यादव ने सही कहा है कि बाद में पीढ़ियाँ करेगी याद कि हमने नामवर को देखा। इसलिए आप सभी के लिए यह ऐतिहासिक क्षण है कि हमने नामवरजी को देखा वसुना भी। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से निकले कई छात्राों ने देश का नाम रोशन किया। जैसे- डॉ. बीरबल साहनी, हरिवंश राय बच्चन, रामस्वरूप भटनागर, आचार्य चतुर्वेदी, चन्द्रधर शर्मा गुलेरी, भूपेन हजारिका, आचार्य रामचन्द्र शुक्ल आदि। हो सकता है कि जो आज यहाँ उपस्थित हैं आगे चलकर नामवरजी के बराबर ख्याति प्राप्त करें। नामवरजी ने मुझे बताया की मेरे क्षेत्रा कुमाउं से उन्हें विशेष लगाव रहा है। पिछले वर्ष नामवरजी स्वर्गीय प्रभाषजी के साथ मेरे क्षेत्रा रानीखेत आए। वहाँ मुझे नामवरजी का नामाकरण कैसे हुआ पता चला। यद्यपि नामवरजी के पिता उनका नाम कुछ और रखना चाहते थे। नामवरजी का नाम उनकी पड़ोस में रहने वाली एक अनपढ़ महिला ने रखा जिसे 'नामवर' का अर्थ भी पता नहीं था। नामवरजी ने अपने नाम को सार्थक भी किया।
आज नामवरजी पर आधारित 'पाखी' के अक्टूबर अंक का लोकार्पण होने जा रहा है। इसी अंक के लिए मैं नामवरजी का साक्षात्कार लेना चाहता था। हम लोग जितना नामवरजी को जानते हैं वह इतना ही कि उनके सामने जो भी बात की जाय वह बहुत सोच समझकर की जाय। इसलिए मैं उनसे कुछ दुस्साहसिक प्रश्न पूछना चाहता था। जैसे छन्द मुक्त कविता तथा 'पुनीत' नाम से कविता लिखने वाले नामवर सिंह से उन रोमांटिक कविताओं पर प्रश्न पूछना चाहता था। लेकिन मुझे इसकी इजाजत नहीं मिल पायी और नामवरजी ने प्रश्नों को मंगाकर उनके उत्तर दिए। 'पाखी' दो साल पहले शुरू की गयी थी। २३ अगस्त से 'पाखी' तीसरे वर्ष में प्रवेश कर चुकी है। भालचन्द्र जोशी की कहानी पालवा पढ़ने के बाद ही इस 'पाखी' का जन्म हुआ। क्योंकि साहित्य एक ऐसा माध्यम है जिसके द्वारा आप समाज को बहुत कुछ दे सकते हैं। इसलिए हमने 'पाखी' के प्रथम महोत्सव में यह निर्णय लिया कि जेसी जोशी स्मृति में हिन्दी साहित्य के कुछ रचनाकारों को सम्मानित किया जाय। 'पाखी' का प्रथम शब्द साधक सम्मान साहित्यकार विष्णु प्रभाकर को। द्वितीय शब्द साधक सम्मान साहित्यकार श्रीलाल शुक्ल को दिया गया। इस सम्मान के अतिरिक्त अन्य सम्मान जूरी द्वारा तय किया जाता है। इस वर्ष कविता एवं कहानी के जूरी सदस्य ज्ञानेंद्रपति, भागवत रावत, विश्वनाथ प्रसाद तिवारी, संजीव, शिवमूर्ति, हिमांशु जोशी थे।
नामवर सिंह अक्षय ऊर्जा के स्रोत हैं उनके संदर्भ में हरिवंशराय बच्चन की एक कविता पढ़ना चाहता हूँ-
हिम्मत करने वालों की हार नहीं होती/लहरों से डर कर नैया पार नहीं होती/नन्हीं चींटी जब दाना लेकर चलती है/चढ़ती दीवारों पर सौ बार पिफसलती है/मन का विश्वास रगों में साहस भरता है/चढ़कर गिरना, गिर कर चढ़ना न अखरता है/आखिर उसकी मेहनत बेकार नहीं होती/कोशिश करने वालों की हार नहीं होती।/डूबकियाँ सिंधु में गोताखोर लगाता है/जा जा कर खाली हाथ लौट आता है/मिलते न सहज ही मोती पानी में/बढ़ता दूना उत्साह इसी हैरानी में/मुठ्ठी उसकी खाली हर बार नहीं होती/हिम्मत करने वालों की हार नहीं होती/असपफलता एक चुनौती है, स्वीकार करो/क्या कमी रह गयी, देखो और सुधार करो/जब तक न सपफल हो, नींद चैन त्यागो तुम/संद्घर्ष करो मैदान छोड़ मत भागो तुम/कुछ किये बिना ही जय जयकार नहीं होती/हिम्मत करने वालों की हार नहीं होती
नामवर सिंह : अपूर्व जोशी के नाम में ही ऐसा है कि वे जो भी करते हैं पूर्व कृत नहीं करते हैं। कुछ सोच कर ही उन्होंने यह कार्यक्रम उस जमीन पर किया जहाँ पर मैं पैदा हुआ हूँ। जिसे वे सम्मान कहते हैं उसे मैं सिर नीचा करके स्नेह और प्यार के रूप में ग्रहण करता हूँ। मेरे भाई काशी ने लिखा था 'द्घर का जोगी जोगड़ा।' आगे उन्होंने जो छोड़ा वह सही छोड़ा- आन गाँव का सि(। मैं अभी भी जोगी नहीं जोगड़ा ही हूँ। अगर काशी हिन्दू विश्वविद्यालय नहीं होता तो मेरी पढ़ाई समाप्त हो चुकी होती। और मैं एम ए तक नहीं पहुँचता। यहाँ मुझे मुफ्रत में रहने के लिए हॉस्टल मिल गया था। खाने पीने का इंतजाम खुद कर लिया। इसलिए यह विश्वविद्यालय मेरे लिए सब कुछ है। मेरी पहली नौकरी भी यहीं लगी थी। मैं हिन्दी नहीं पढ़ने वाला था। मैं तो एनसिएट कल्चर पढ़ने वाला था। मुझे बनाने में कई लोगों का हाथ है।
डी पी सिंह : आज यहाँ उपस्थित युवाओं की संख्या को देखकर लगता है कि हमें यह कार्यक्रम दूसरी बड़ी जगह में आयोजित करना चाहिए था ताकि और भी अधिक हमारे विद्यार्थी नामवरजी को सुनते और देखते। निश्चित रूप से वे युवा पीढ़ी, जो भविष्य में लेखक, साहित्यकार, आलोचक बनेंगे, उनके लिए नामवरजी को सुनना, देखना और भविष्य में नामवरजी को गुनना इस साहित्य साधना की यात्राा होगी। मुझे लगता है कि आप उनसे कुछ अधिक सुनना व सीखना चाहते हैं। इसलिए मैं अन्य साहित्यकारों से निवेदन करूँगा कि वे अपनी शब्द साधना से युवाओं को लाभांवित करें। मैं अपूर्व जोशी का आभार व्यक्त करता हूँ कि उन्होंने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय को इस सम्मान समारोह के लिए चुना और इसके लिए मैं उन्हें धन्यवाद देता हूँ। मैं जानता हूँ कि नामवरजी ने इसी विश्वविद्यालय से अपनी यात्राा शुरू की जो जेएनयू के माध्यम से और अधिक लोकप्रिय हुए। जो चीज उन्हें इस विश्वविद्यालय की ओर खींच लाती है वह कहीं न कहीं उनके लेखन में भी प्रतिबिंबित होती है।
कमलेश दत्त त्रिापाठी : आज के इस कार्यक्रम में मुझे परंपरा और सृजनात्मकता को केन्द्र में रखकर बातचीत करनी है। एक ऐसा अवसर है जब नामवरजी स्वयं उपस्थित हों तो ऐसे समय में परंपरा और सृजनात्मकता के बिंदु पर विचार करना बहुत ही महत्वपूर्ण है। साथ ही समीचीन भी। परंपरा बनाम आधुनिकता और परंपरा बनाम सृजनात्मकता के प्रश्न पर हिन्दी में पिछले पाँच दशक से ही विचार-विमर्श हो रहा है। परंपरा हमें एक प्रकार के आचार व व्यवहार का ज्ञान कराती है जो रुढ़ि पर आधारित है। इस प्रकार रुढ़ि पर आधारित परंपरा एक निषेधात्मक रूप दिखाती है। परंपरा पर बड़े चिंतक कहते हैं कि परंपरा को तर्क मूलकता के विरोध में व्यवहार करना एवं परंपरा को इस निषेधात्मक रूप से स्वीकार करना ठीक नहीं होगा। परंपरा की भूमि वहाँ से आती है जहाँ हम किसी और को निर्णय लेने की क्षमता को उत्कृष्ठ मान कर बातों को स्वीकार करते हैं। यह हमारी तर्क मूलकता में गहरे से बैठा हुआ है।
रेवा प्रसाद द्विवेदी: इस विषय पर हम अपनी बात बाद में कहेंगे। पहले तो नामवरजी से जो हमारा संबंध है उसे कहते हैं। हम संस्कृत कालेज में पढ़ते थे ये हिन्दी कॉलेज में। लोग कहते थे कि ये नामवर हैं जो इस बार टॉप करेंगे। आपका सम्मान हमारा सम्मान है। हम तो संस्कृत में मुख्यरूप से झाड़ू लगाने का काम करते हैं। जो गलत बात है उसे हटाना, जो सही बात है उसे रखना। नाट्य शास्त्रा में भी अभिनव गुप्त ने यही काम किया। सबसे बड़ी बात है कि वर्तमान में जो हम सब बैठकर परंपरा की बात कर रहे हैं, उसका बड़ा व्यापक पफलक है। उस पर संक्षिप्त रूप से बात करना मुश्किल है।
नामवर सिंह : दो संस्कृत के आचार्य बोल चुके हैं- कमलेश दत्त त्रिापाठी, आचार्य रेवा प्रसाद द्विवेदी। तुलसी दास याद आ रहे हैं। वे लिखते हैं कि राम-सीता के पदचिन्हों पर पैर न पड़े इस चिंता के कारण लक्ष्मण कभी दायें, कभी बायें करते हुए चलते हैं। ऐसी ही डगमग मेरी स्थिति हो गयी है। ...उपहिया शब्द के बारे में कम लोग जानते हैं। आजकल ऐसे उपहिया लोग बहुत दिखाई पड़ रहे हैं। आलोचना में भी सृजनात्मकता होती है। यद्यपि कहा जाता है कि कविता, कहानी और उपन्यास में क्रिएटिव है। अंग्रेजी में आधुनिकता का आरंभ हुआ था तब एक लेख टी.एस. इलियट का 'ट्रेडिशन एण्ड इंडिविजुअल टेरियंसी' बहुत ही मशहूर हुआ था। एक आदमी की परंपरा नहीं होती। वह खिसकता जाता है। काट छांट की परंपरा है। सांस्कृतिक काव्यशास्त्रा दुनिया में श्रेष्ठ माना जाता है। आनंदवर्धन न हुए होते तो अभिनव गुप्त का 'काव्यप्रकाश' न होता। अगर ये दोनों न हुए होते तो पं. जगनाथ भी न होते। इस तरह शास्त्रा में पूर्व पीठिका होती ही है। साइंस तो एक कदम परंपरा के बगैर आगे नहीं बढ़ सकता। उसका विकास तो परंपरा के साथ ही हुआ है। इसलिए जहाँ विज्ञान है, शास्त्रा है वहाँ एक 'समृ(' परंपरा है। साइंस और शास्त्रा में एक समृ( परंपरा है तब कहीं जाकर हम उसमें नया जोड़ते हैं। मौलिकता की जांच परंपरा से ही करते हैं। परंपरा नहीं होगी तो हर चीज मौलिक होगी। शास्त्रा बिना परंपरा एक कदम भी आगे नहीं बढ़ सकता है। यही बात काव्यशास्त्रा व हिन्दी आलोचना के बारे में भी है। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल न हुए होते तो उसके बाद कोई आचार्य नहीं हुआ होता, हजारी प्रसाद द्विवेदी भी नहीं हुए होते। शास्त्रा में यह जरूरी है कि लम्बी परंपरा हो। जहाँ तक सृजन का सवाल है तो सृजन, शास्त्रा से थोड़ा भिन्न है, ज्यादा नहीं। अगर निराला ने मुक्तछंद न लिखा होता तो शायद आज छंद मुक्त कविताएँ नहीं होती। उन्होंने जो छंद बंध तोड़ा तो उसमें लय थी। पर आज वह लय भी गायब है। इसलिए सृजन और शास्त्रा दोनों में परंपरा का रूप और कार्य- व्यापार अलग-अलग होता है।
सृजन अधिक छूट देता है। अगर आप कविता नहीं लिखते हैं तो कहा जाता है कि आपने कोई सृजन नहीं किया है। ज्ञान के क्षेत्रा में परंपरा विच्छिन्न प्रवाह के रूप में होती है। प्रभाव आभास के रूप में होता है। शास्त्रा और ज्ञान की तुलना में पेंटिंग में यह आभास गहरे रूप में दिखाई देती है, जहाँ शब्द नहीं होते। संगीत में भी यही स्थिति होती है। इसलिए परंपरा और सृजन के संबंध में विचार करते समय हमें यह भेद करना चाहिए कि हमें किस क्षेत्रा पर विचार करना है। आज के दौर में खासकर राजनीति में हमने सारी परंपराओं को छोड़ दिया है। नेहरू से लेकर मनमोहन सिंह तक एक लम्बी परंपरा है। इस दौरान कई लोकतांत्रिाक परंपराओं को हमने त्याग दिया है। दरअसल यह दौर राजनीति के उच्छेदवादी होने का है। आजादी के बाद हमने कई नियम, कानून, संविधान बदले हैं। लेकिन सारी परंपराएं हमने लोकतंत्रा को छोड़ दी है। संयुक्त परिवार भी टूट रहे हैं। परिवार, राजनीति, धर्म सभी क्षेत्राों में परंपरा का एक रूप नहीं होता, अलग-अलग होता है। इनका कोई भी सामान्यीकरण न करना ही बेहतर है।
 
 
 
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