नवम्बर २०१०
 
 
 
   
 
 
 
• काशीनाथ सिंह का साहित्य अकादमी • अदम गोंडवी और भारत भूषण का निधन • जयपुर में लिटरेचर पफेस्टिवल में सलमान रुशदी •हिन्दी के कवि कुबेर दत्त और नुक्कड़ नाटक के पितामाह गुरुशरण सिंह का निधनर सम्मान।
 
 
 
संपादकीय/प्रेम भरद्वाज
अयोध्या की व्यथा, राम का गम
हाशिए
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अक्टूबर का महीना 'राम' के नाम। देश भर में रामलीलाएँ। राम का उदात्त चरित्रा। रावण से यु(। अंत में विजयी। दशहरा माने विजय दशमी। अधर्म पर धर्म की जीत। सत्य की असत्य पर। लेकिन केवल रामलीलाओं में ही। रामलीला के मंच
से बाहर असल जीवन में इसका ठीक उल्टा। अधर्म की विजय। सत्य की धरती पर गड़ा असत्य का झण्डा। राम असहाय। लाचार। चारों तरपफ रावण का साम्राज्य। उसकी अट्टहासें। हर साल खत्म हो जाता होगा राम का वनवास। लौट आते होंगे अयोध्या। लेकिन हकीकतन ऐसा है क्या। राम वनवास से लौटे ही कब हैं? अयोध्या पर भी भारत नहीं रावण का शासन है। कब सीता को रावण से मुक्त कराएँगे? कब लौटेंगे अपनी नगरी अयोध्या? किताबों में नहीं मिलता। रामलीला मंचों पर भी आपको दिखाई नहीं देगा। लेकिन राम आज बहुत अकेले हो गए हैं। न लक्ष्मण उनके साथ हैं परछाई की तरह। न हनुमान, न सुग्रीव, न कोई वानर सेना। सीता ने भी उनकी प्रतीक्षा छोड़ खुद को रावण ;हालातद्ध के हवाले छोड़ दिया है। 'जेहि विधि राखे रावण, तेहि विधि रहिये।' चीजें इस तरह से एक दिन बदलेंगी इसका खुद राम को भी इलहाम नहीं था। न समुद्र शीश नवाता है। न केवट पार उतारता है। असहायता का वन समाप्त होने का नाम ही नहीं लेता। माँ-बाप को छोड़ने और सत्ता ठुकराने का क्या यही अंजाम होता है?

राम की विवशता का अंदाजा उनकी जन्मभूमि अयोध्या से भी लगाया जा सकता। उनकी जन्मभूमि का बंटवारा हो गया। तीन खंडों में। राम भक्त परेशान हैं। राम लाचार। यह लाचारी उसी द्घड़ी से शुरू हो गई थी जब राम को देवता का दर्जा दिया गया। 'अपने-अपने राम' में भगवान सिंह लिखते हैं-'किसी मनुष्य की हत्या करने के दो उपाय हैं, उसे देवता या पशु बना देना। दोनों का परिणाम एक ही है- उसे मनुष्य न रहने देना। देवताओं ने ऐसा कुछ भी नहीं किया, जिस पर किसी मनुष्य को गर्व हो सके। वे केवल भोग करते हैं---वे केवल मनुष्य समाज के भार हैं---देवता और ईश्वर पैदा करते रहना कुछ लोगों का धंधा हो गया है।---मैं मनुष्य की रक्षा के लिए मनुष्य के रूप में लड़ते हुए हार जाना चाहूँगा, पर पशु बनकर जीतना नहीं।'
उपरोक्त वक्तव्य राम का ही है। भगवान सिंह वाले राम के। अपने-अपने राम। वह दौर और रहा होगा जब देवता लोगों की रक्षा के लिए आगे आते थे। राक्षसों से यु( किया करते थे। तब देवता ताकतवर थे। राक्षस कमजोर। हमेशा देवता ही जीतते थे। असुरों की पराजय जैसे सुनिश्चित थी। आज की स्थितियाँ विपरीत हो गई हैं। भगवान राम बेबस हैं। अपनी जन्मभूमि ;अगर वो वास्तव में हैद्ध की लड़ाई भी खुद नहीं लड़ पा रहे। उनके भक्तजनों को इस लड़ाई को अपने हाथों में लेना पड़ा। राम को उनका हक दिलाने के लिए। एक लंबा आंदोलन चला। खूनी संद्घर्ष। सांप्रदायिक उद्द्घोष-'हम मंदिर वहीं बनाएँगे' 'जिस हिन्दू का खून न खौले, खून नहीं वो पानी है'। जहर भरा माहौल। मर्सडीज के जमाने में रथ-युग लौट आया। रोटी नहीं, राम जीवन-मरण के प्रश्न बन गए। कुंवर नारायण ने लिखा भी-'हे राम/इससे बड़ा क्या हो सकता है/हमारा दुर्भाग्य/एक विवादित स्थल तक सिमटकर रह गया तुम्हारा साम्राज्य/अयोध्या इस समय तुम्हारी अयोध्या नहीं/यो(ाओं की लंका है/'मानस' तुम्हारा 'चरित' नहीं/चुनाव का डंका है।

एक जरा सी माँ की जिद्द पर सत्ता का वैभव ठुकराकर वन जाने का पफैसला करने वाले राम के भक्तगणों ने बाकायदा रामरथ पर सवार होकर पहले मस्जिद ;कुछ लोग इसे विवादित ढाँचा भी पढ़ सकते हैंद्ध को ध्वस्त किया। पिफर कैसे भी सत्ता तक पहुँचे। सरयू की नदी खून से लाल हुई। कैपफी आजमी को सहसा वनवास से अयोध्या लौटे राम दिखाई देते हैं-'पाँव सरयू में अभी राम ने धोये भी न थे/कि नजर आए वहाँ खून के गहरे धब्बे/पाँव धोये बिना सरयू के किनारे उठे/राम ये कहते हुए अपने दुआरे से उठे/राजधानी की पफजा आई नहीं रास मुझे/छह दिसंबर पर मिला वनवास मुझे।'

जिस राम का व्यक्तित्व विश्वव्यापी था। वह मात्रा कुछ एकड़ की जन्मभूमि तक सिमट गया। जो एक विशाल जनसमूह के अराध्य थे उसे कुछ लोगों के संगठन ने हाइजैक कर लिया। सीता का अपहरण तो त्रोता में हुआ। पिछली सदी के अंतिम दशक में राम का अपहरण हो गया। पिफरौती में जनता से सत्ता मांगी गई। सत्ता मिली भी। लेकिन जनता को शायद वो नहीं मिला जिसका उसे दरकार था। भक्तों के गिरोह को इतने से भी चैन नहीं मिला। वो राम को अदालत में द्घसीट ले गए। उन्हें इंसापफ दिलाने की खातिर। दशकों बाद पफैसला आया तो न वे खुश हैं, न बहुत रंज ही। छोटी सी जगह मिल गई रामलला की। मगर साथ में मस्जिद को भी जमीन। उन्हें अपनी दुकानदारी बंद होती लगी। वे परेशान हैं। न निगलते बन रहा, न उगलते। करें तो क्या? खुश खुदा के कट्टर बंदे भी नहीं हैं। खुदा के द्घर का बंटवारा मंजूर नहीं। दूसरी तरपफ राम की जमीन पर मस्जिद भी। यह राम भक्तों को पसंद नहीं। खुदा या भगवान राम क्या चाहते हैं उस दिशा में कोई नहीं सोच रहा। सोच कोई अयोध्या के बारे में नहीं रहा। जिसने समय के बदलते करवटों को देखा है। दशरथ पुत्रा राम से लेकर मुगलिया दौर और कलयुगी राम भक्तों का उन्माद भी। असल में क्या है अयोध्या? धर्म नगरी। राम जन्मभूमि। इतिहास के शूलों पर टंगा लहूलुहान जिस्म। हिन्दुओं का तीर्थस्थल या अपराधियों का पनाहगाह, जो कानूनी शिकंजे से बचने महंत बन गए। महंती के वर्चस्व को लेकर जारी रहती है खूनी जंग। गद्दी के लिए गद्दारी भी। हत्या भी। पिछले कुछ दशकों से तो बलात्कार की शिकार किसी अबला की तरह सनसनीखेज खबर बनकर रह गई है अयोध्या। सियासतदां के लिए सत्ता तक पहुँचने की सीढ़ी। उन्माद। पफसाद। एक हद तक मनोरंजन भी। वहशी सारथी न जाने समय-समाज के रथ को किस अंधी सुरंग में ले जाना चाहते हैं। महान संस्कृति के बदबूदार शवों को यहाँ देखा तो नहीं मगर महसूसा जरूर जा सकता है। नस्लों के शरीर पर किसी कुबड़ की तरह धर्म उभर आया है। प्रार्थनाएँ विसर्जित हो गई हैं। स्वार्थ की तलवारें हैं। मनुष्य की सर्द क्रूरताएँ। बर्बर वक्त की अपनी तार्किकता। हथियारों से लैस नए जमाने की हिंसक पफौज। हिंस्र, आवाजें। सवालों का सैलाब। अमन की चाहत लिए कुछ अपाहिज पफकीर जो अब गूंगे भी हो गए। सत्ता बहरी। इन सबके बीच अगर आप राम और अयोध्या को ढूँढ़ सकें तो एक बड़ी बात होगी।

पिछली रात एक ख्वाब देखता हूँ। अयोध्या का दुखी चेहरा। राम भी उदास। दोनों मध्य रात्रिा की नीरवता में सरयू किनारे संवाद कर रहे हैं। अयोध्या राम के समक्ष प्रार्थना कर रहा है- 'मुझे बचा लो तात! मेरी पहचान मिट रही है। एक तुम्हारे समय में मेरा रूप था, एक आज है। आगे क्या भयावह समय आएगा पता नहीं।' राम स्थितिप्रज्ञ अवस्था में नहीं रह पाते। उनका काँपता स्वर 'मैं खुद भी बहुत लाचार हो गया हूँ। ---मेरी सुनता कौन है? मैंने असुरों से संग्राम किया था। कर आज भी सकता हूँ। लेकिन सुर-असुर की आज पहचान ही समाप्त हो गई है। सुग्रीव-बाली की तरह दोनों एक ही दिखते हैं।---उस समय सुग्रीव मेरे साथ थे उनके गले में माला डाल उनकी पहचान बनाई थी। आज मेरे साथ कोई नहीं है। बहुत अकेला हँू। आँसू तो पोछ सकता हूँ लेकिन कुछ कर नहीं सकता--- विवशता की नागपाश में हम दोनों पफंसे केवल छटपटा भर सकते हैं।' इसके बाद वे एक-दूसरे के आंसू पोछते हुए इस वादा के साथ विदा लेते हैं कि वे इस नदी किनारे बीच-बीच में मिलकर अपना दुःख साझा करते रहेंगे।

सपना टूटता है। हकीकत सामने है। अयोध्या रूपी द्घोड़े पर सवार राजनीति। कोडे़ बरसाता। वो अयोध्या को दौड़ा रहा है। अपने स्वार्थ महल की ओर। द्घोड़े पर एक से ज्यादा सवार हैं। वे परस्पर उलझे हैं। एक-दूसरे को द्घोड़े पर से गिराने का पराक्रम भी चल रहा है। पास ही बह रही सरयू का पानी जैसे अयोध्या के आंसू में तब्दील हो जाता है। लेकिन पानी और आँसू का पफर्क संवेदनहीन सत्ता न कभी समझी है, न समझेगी। बेहतर यही है कि राम धर्मग्रंथों में ही सिमटे रहें और अयोध्या इतिहास के पन्नों में। राम न कभी अयोध्या लौंटे, न अयोध्या अपने पुराने सुनहरे दिनों को याद कर आँसू बहाये।

सुधी पाठकों ने पिछले नामवर अंक का स्वागत पूरी गर्मजोशी के साथ किया। सप्ताह भर के भीतर राजधानी दिल्ली समेत दर्जनों शहरों में प्रतियाँ समाप्त हो गईं। दोबारा भेजवाना पड़ा। यह उत्साह साबित करता है कि साहित्यिक पत्रिाकाओं की प्रति पाठकों की रुचि में किसी तरह की कमी नहीं आई है जैसा कि कुछ लोग रोना रोते हैं।

इस अंक का विशेष आयोजन वाराणसी में 'पीढ़ियाँ आमने-सामने' का आयोजन है जिसमें युवा कहानी के सामर्थ्य और सीमा पर खुलकर बातचीत हुई। इसमें युवा कहानी का चेहरा कापफी हद तक सापफ हुआ-मगर वह कितना सापफ हुआ है यह आप तय करेंगे।

 
 
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