नवम्बर-२०११
 
 
 
   
 
 
 
• मनीषा कुलश्रेष्ठ को 'लमही सम्मान' • निदा फाजली को पद्मश्री सम्मान •देवेंद्र इस्सर नहीं रहे• ओड़िया लेखिका प्रतिभा रॉय को २०११ का ज्ञानपीठ पुरस्कार•चंद्रकांत देवताले को साहित्य अकादमी पुरस्कार • कुणाल सिंह को युवा साहित्य अकादमी सम्मान • तीसरा 'कृष्ण प्रताप कथा सम्मान' (२०१२) गीतांजलिश्री की कृति 'यहां हाथी रहते थे' को • रविशंकर को मरणोपरांत लाइफटाइम अचीवमेंट ग्रैमी पुरस्कार • विनोद कुमार शुक्ल को हिन्दी काव्य साहित्य में रचनात्मक योगदान के लिए 'परिवार' पुरस्कार • वरिष्ठ साहित्यकार कामतानाथ नहीं रहे
 
 
 
मूल्यांकन
 
 
चुनौती या समाधान


सुधा उपाध्याय

तो
शैलेय
परिकल्पना प्रकाशन लखनऊ
मूल्य : ७५ रुपये, पृष्ठ : ११९

शैलेय के सभी कविता संग्रहों से मैं गुजरी हूँ पर कह सकती हूँ उनके लिए कविता से उपेक्षा वस्तुतः जीवन से उपेक्षा है। क्योंकि आज की विसंगतिपूर्ण विकृत जीवन शैली की तमाम व्याधियों की औषधि है यह कविता। कविता क्या है? शब्द की साधना या आराधन। जीवन की आवश्यकता या शक्ति। इस जकड़बंदी को जिन्होंने भोगा है वे ही इसके छुटकारे के सुख को समझते हैं। क्योंकि वो कहते हैं न... देह न पाये तो भटके है बवंडर सी कविता। शैलेय बार-बार सवाल उठाते हैं हम क्यों लिखते हैं कविता। क्या हम जिनके लिए लिखते हैं उन तक पहुँच रही है कविता। ऐसे विकट दुर्जन समय में जैसे सब कुछ हाथ से छूटता सरकता जा रहा हो। ऐसे में मानवीय संवेदनाएँ, पहाड़ झरने, नदियाँ, गाँव, कस्बा, चौपाल, संगी साथी रिश्ता परिवार 'तो' कविता संग्रह में एक साथ पकड़ने की कोशिश करते हैं शैलेय।
शैलेय की यह खूबी है कि न केवल उनके कविता संग्रह ने एक पहाड़ी जिजीविषा दिखती है बल्कि गहरा मानवीय सरोकार भी स्पंदित होता है। तभी तो ऐसे समय में छूटते सरकते दरकते समय और समाज को उसकी जटिलता को आंतरिक सूत्रा की तरह आदि से अंत तक शैलेय थामे रहते हैं। शैलेय के भाव और भाषा में भी गजब का सामंजस्य दिखलाई पड़ता है। वस्तुतः उनकी यही कला उनके समकालीनों से उन्हें अलग करती है। सूत्रा से सूत्रा पकड़ते हुए वे एक मजबूत कड़ी तक पहुँचते हैं और सीधा दूसरे के मन में प्रवेश कर उसकी दुनिया को जानने, दर्द को समझने और खुशी के स्रोतों को पहचानने में सहायक होते हैं। इस कविता संग्रह में जिस कविता की ओर सबसे पहले मेरी उत्सुकता बढ़ी वह 'तो' नामक कविता ही थी। जब ये कहते हैं... पिफलहाल मुझे मनोचिकित्सक के पास ले जाया जा रहा है
पता नहीं वह मेरा क्या इलाज करेगा
कहीं उसने मुझमें से भरोसे का भाव ही मिटा दिया तो?
'तो' पर यह प्रश्न चिन्ह संपूर्ण संवेदना जगत पर भारी है। ये कविताएँ किसी कारखाने में तैयार नहीं हुई हैं। इसलिए इनकी रॉनेस मुझे अपील करती है। क्योंकि जो अनुभव जिए जाते हैं और महसूसे जाते हैं उनकी अभिव्यक्ति प्रायः कठिन होती है। प्रत्येक कविता से गुजरते हुए मुझे यही लगा कि एक गहरी संवेदना शून्यता किस कदर हावी है भीतर भी और बाहर भी। बिजूका कविता इसका सशक्त प्रमाण है...
जिन्हें कभी भींगने से सख्त परहेज रहा है
वे भी, ढह-ढह कर बहे जा रहे हैं...
मैं रहा पिफर भी सूखा का सूखा बिजूका जो हूँ।
समय तेजी से बदल रहा है। लोगों को अपने-अपनों का भी दुःख दिखाई नहीं देता। जो सामने है, दायरे में दिखता है, वही सच है। उससे इतर दुनिया है तो जरूर, लेकिन बिना मतलब की। जानकार भले ही इसे उत्तर आधुनिकता के सांचे में ढालें। लेकिन सच्चाई यही है कि अब माँ-बाप भी नजरों से ओझल, दायरे से बाहर दिखलाई पड़ते हैं...
आखिर इस द्घर को यह क्या हो गया है
मुझे वे रंग खोजने ही होंगे
जिनमें इस द्घर की मिट्टी उगी थी
शैलेय की 'तो' संकलन में जो सबसे खास बात है हम उस पर बात किए बिना कैसे रह सकते हैं। बखूबी सही स्थान पर सही शब्दों का चुनाव और वह भी सही भावों के साथ जो तालमेल बिठाया गया है कि लगता है कि एक भी शब्द कहीं से खींच लिया तो पूरी कविता भरभराकर गिर पड़ेगी। मसलन एक कविता है 'उम्मीद'...
अंजुरी भर जल तलुवे भर ओस
आँख भर सपना, नींद भर लोरी
हौसले को जुगनू भर
हिकमत जुटी ही लेनी चाहिए
वस्तुतः कविता कह भर देने के बाद किसी भी अतिरिक्त बयान की जरूरत रह नहीं जाती। पिफर भी जैसे यह सच है कि हर दर्द को चीन्हने पहचानने का हर किसी के पास अपना-अपना नजरिया है वैसे ही यह भी तो सच है कि कुछ एक दर्द ऐसे भी होते हैं जो अलग-अलग जिंदगियों में भी पलकर एक जेसे ही रहते हैं। कहीं पढ़ा था... कोई दर्द इतना बांझ भी नहीं होती कि उसे हमजुबां या हमसपफर न मिले। कोई सड़क ऐसी भी नहीं होती कि जिस पर केवल एक ही मुसापिफर गुजरा हो। यह सब अगर सच है तो शैलेय की यह कविता उतनी ही सच है-एक दिन नामक कविता में कहते हैं...
कोई कुंठा कोई उदासी
कोई विद्रोह जिंदगी के महज चित्रा हैं
जिसके लिए उसी के हाथों में सजी है किताब

देखना सारे ईनामों के साथ
तुम्हें भी जला गला डालेगा कि
इतने के लिए ही कवि कथाकार बने थे
प्रायः कविता की भावभूमि तैयार करने में कवि के भीतर बहने वाली अंतः सलिला से भी अधिक महत्वपूर्ण उसका बाह्य परिवेश होता है। वही नेपथ्य जिसे सभी नजरअंदाज कर देते हैं। आखिर बिना आधार के तो कोई बात नहीं होती। उसका सोता कहीं हमारे संस्कारों में रहन-सहन आचार व्यवहार में उदद्घाटित हो ही जाता है और यहाँ तो खुद ही शैलेय खुद को हिमालय का वशंज कहते हैं। पहाड़ी होने के नाते न जाने कितनी नदियाँ, कितने झरने, कितने रंग, कितनी सुंगध और कितने उजास वे देख चुके होंगे। तभी तो उनकी कविता विद्रोह करती है और जवाब मांगती है जीवन से खत्म होती सरलता, तरलता, हिरण, शेर सारस गौरया की धीरे-धीरे खत्म होते जाना और बड़ी तादाद में सांप मगरमच्छ उदविलाव का बढ़ना सबकुछ खतरनाक है। आने वाली सदी के लिए कवि की ये जवाबदेही निस्संदेह उसे समकालीनों से अलगाती है।
ठीक इसी प्रकार कविता शीर्षक पर लिखी गई कविता इस संग्रह की सर्वोत्तम कविता है। जिसमें एक साथ भविष्य की प्रासंगिकता, अतीत की जवाबदेही और वर्तमान की प्रतिब(ता उदद्घाटित हो रही है। इस संग्रह में जहाँ जमाने भर की अदाबतों मीन मेख और टीसते जख्म हैं वहीं यह कविता अपना हौसला संभाले हुए अपने विद्रोह की आंच पर पूरी चुनौती के साथ खड़ी है। प्रतिस्पर्धा के दौर में अपनी संवेदना बचाए हुए है। कविता विद्रोहियों की जुबान है उनका सबल कमान है। कविता अपने सीधेपन में ही कुटिल से कुटिल विमर्शों और साजिशों को तहस नहस करने में समर्थ हैं। इसलिए कविता केवल मन बहलाव भर नहीं जोखिम भी उठाती है और शैलेय गर्व करते हैं अपनी कमिटमेंट पर, अपनी सहजता पर और इस संवेदनहीन दुनिया में सीधी सपाट बयानबाजी पर। क्योंकि कविता उनके लिए कोई प्रचार नहीं उदद्घाटन है। आयोजन भी नहीं अभियान है।
शैलेय की 'तो' संग्रह में एक आंतरिक धुन भी पकड़ में आती है जो लगभग सभी कविताओं को पिरोए हुए है। आम लोगों की जिंदगी और उनके सरोकार, उनकी जरूरतें, उनके संद्घर्ष जिसे आज का साहित्यकार नजरअंदाज कर देता है शैलेय उन्हीं धड़कते विषयों, राग रंग को अपनाते हैं जो अबोले होकर भी अनूठे हैं। उस स्पंदन को उनकी प्रत्येक कविता जैसे पैरवी करती सी नजर आती है। पत्थरों से बने महानगरों में पहाड़ी, नदियाँ, झरने पोखर, गधेरों द्घाटियों को समझना हो, भीतर तक महसूसना हो तो शैलेय ;हिमालय के वंशजद्ध को छूकर देखना ही पड़ेगा।

प्रभारी, हिन्दी विभाग, जानकी देवी मेमोरियल कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालयद्ध नई दिल्ली-११००६०
मो. ९९७१८१६५०६

 
 
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