'पाखी' के अगस्त अंक में 'पीढ़ियाँ आमने-सामने' आयोजन के तहत नामवर सिंह, प्रभाष जोशी, शैलेय और चंदन पाण्डेय की बातचीत प्रकाशित हुयी थी। उस बातचीत ने बहस के कई सूत्रा दिए। विमर्श का एक नया पफलक खुला। विशेषकर दलित, स्त्राी-विमर्श से जुड़ी नामवर सिंह की अवधारणाओं के प्रति असहमति के तीव्र स्वर उभरे। बातें 'युवापन' को लेकर भी सामने आयी। असहमति की उन्हीं आवाजों को हम विनम्रतापूर्वक यहाँ जगह दे रहे हैं-सं.
लोचना इन दिनों किसी की पीठ थपथपाने तो किसी के द्घुटने तोड़ने की राजनीति बन गई है। शायद कूटनीति भी। कहकर मुकर जाने और लिखकर पलट जाने का पर्याय भी। यहाँ तक तो गनीमत थी। अब वह अपना भाषा-संस्कार छोड़ ऐसे मुहावरों की तरपफ बढ़ रही है जिस पर या तो हँसा जा सकता है या दया की जा सकती है। कभी वह अपशब्दों का प्रयोग करती है तो कभी अपनी सारी जिम्मेदारियों को भूलकर सांस्कृतिक जीवन के आग्रहों के प्रति गैरजवाबदेह हो उठती है। वह शायद यह भूल ही चुकी है कि उसका सबसे पहला काम प्रतिभाओं की पहचान और उनके कर्म की विदग्ध व्याख्या है। आज वह इतनी साम्प्रदायिक और ठस्स हो चुकी है कि अपने इन सद्गुणों ;?द्ध को छिपाने के लिए या तो भभूत बाँटने में लगी है या पिफ़करे कसने में।
यह सिपर्फ वाचालता और व्यवहार-असंतुलन नहीं है। दशकों तक विचारधारा से ही प्रतिभा की गिनती करने वाले लोग अब यह कहते पाए जा रहे हैं कि 'खास नियम के तहत या विचारधारा के तहत कहानियाँ लिखी जाएँ, गलत है। ...कहानी लिखने के लिए पहली अनिवार्य शर्त है कहीं न कहीं का एक छोटा अनुभव।' यही लोग एक ८ामाने में निर्मल वर्मा के सबसे बड़े एडवोकेट हुआ करते थे और निर्मल के पार्टी और विचारधारा छोड़ देने के बाद उनके सबसे कटु आलोचक। यही लोग कल तक मानने को तैयार नहीं थे कि जाति भी भारतीय समाज का एक अहम यथार्थ है और आज मं८ाूर कर रहे हैं कि 'हमलोग राजनीतिक क्रांतिकारिता से अंधे होकर इस समाज-व्यवस्था में व्याप्त तमाम ऊँच-नीच जिसे अम्बेडकर भी नहीं समझ सके, से असहमत होते हैं।'
याद आता है जब भगवान सिंह का उपन्यास 'अपने-अपने राम' आया था तब यह मुहिम चलाई गई थी कि यह जातिगत आधार पर लिखा गया विद्वेषकारी उपन्यास है। जबकि भगवान सिंह वसिष्ठ और विश्वामित्रा को आमने-सामने खड़ा कर अपने पाठकों से यह पूछ रहे थे कि कौन सी परंपरा अधिक क्रांतिकारी और लोकहितकारी है। किसमें जीवन की गति है किसमें जड़ सनातनतावाद और परंपरावाद। कमोबेश उदय प्रकाश को लेकर भी यही सब किया गया। वे सारे लोग जो एक द्घोषित अपराधी को इसलिए बचाने की जी तोड़ कोशिश में लग जाते हैं कि वह उनकी जाति का है, वे ही यह आरोप भी लगाते हैं कि अमुक या तमुक एक जातिवादी लेखक है।
इस विसंगति और विडंबना की कहानी कथाकार संजीव ने अपने उपन्यास 'सूत्राधार' में कही है। काश! भिखारी ठाकुर ब्राह्मण होते। दुर्भाग्यवश बेचारे खवास-द्घर या नाई के यहाँ पैदा हुए।
इस क्न्लेशकारी हकीकत को वाल्मीकि ने शंबूक, वेदव्यास ने कर्ण और एकलव्य की मापर्फत उठाते हुए कर्ण के मुँह से विस्पफोटक और आक्रामक ढंग से यह कहलवा दिया है-
सूतो सूतपुत्राो वा को वा योवा भवाम्यहम
दैवायत्तं कुले जन्म ममायत्तं हि पौरुषम्।
कबीर और प्रेमचन्द भी जाति की इस राजनीति से द्घायल थे और आज तो सारी राजनीति ही यहीं आकर अटक और पफंस गई है। यहाँ तक कि दलित राजनीति भी। पर हमारे साहित्य-चिंतकगण अभी भी शास्त्राीय यथार्थवाद में मड़िया ले रहे हैं और मगन हैं। वहीं से पफूं-पफां कर रहे हैं और पीठ पर जमी कनई को समर्थ पूंछ में लपेट कर दूर-दूर तक पफेंक रहे हैं। इस यथार्थवाद का संबंध प्रेमचंद आदि से कम साहित्य की सत्तावादी राजनीति से ज्यादा है जो पुरस्कारों पर नियंत्राण और सरकारी संस्थाओं पर काबिज हो अपने झण्डे पफहराती है। साहित्य की सत्ता-राजनीति का यह इतिहास भी किसी बस्तर या जगदलपुर में लिखा ही जा रहा होगा।
कहते हैं साहित्य जीवन की नई भाषा-दृष्टि है और आलोचना उसका अंगीकार। किन्तु कभी-कभी रामचंद्र शुक्ल जैसे महान आलोचक भी कबीर की संवेदना का सौंदर्य नहीं पकड़ पाते। यहाँ तक कि गाँधी की राजनीतिक चेतना का सौंदर्य भी। केशव की हृदयहीनता तक तो उनकी निगाह जाती है, तुलसी की भावुकता पर तो वे रीझे ही हुए हैं किन्तु निराला उन्हें एक समय तक असह्य अनुभव होते हैं। दोनों की तत्कालीन लिखा-पढ़ी देखने पर दंग रह जाना पड़ता है। शुक्ल जी की इस चूक का परिमार्जन करने के लिए जो आलोचक आते हैं उनमें से एक का नाम हजारी प्रसाद द्विवेदी तो दूसरे का नन्द दुलारे वाजपेयी है। यह अलग बात है कि निराला की पदस्थापना वाजपेयी जी १९३१-३२ में करते हैं। छायावाद की 'वृहत्त्रायी' बनाकर तो द्विवेदी जी अपना 'कबीर' लेकर आते हैं। हम चाहें तो इसे आलोचना का न्याय-धर्म भी कह सकते हैं। किन्तु आलोचना का काम इतना ही नहीं है। उसका काम उन सामाजिक और सांस्कृतिक अनुभवों की पहचान भी है जो युग-विशेष की रचना में न केवल प्रेरक कारण रहे हैं बल्कि उसकी मंशाओं की अभिव्यक्ति भी कर रहे हैं। क्यों धूमिल जैसे कवियों को कथित भदेसपन पर उतरना पड़ा, क्यों रद्घुवीर सहाय को खबर की भाषा अपने लिए सबसे कारगर लगी, दुष्यंत कुमार जैसों को क्यों नई कविता का रास्ता छोड़ ग़८ाल की राह चुननी पड़ी, इसके कुछ कारण तो होंगे। आलोचना जब तक इन कारणों की पहचान और व्याख्या नहीं करती तब तक उसके सारे दावे, पफैसले और पिफ़करेबा८िायाँ बेमानी हैं। अहो रूपं अहो ध्वनिः का खेल है।
समकालीन आलोचना ने अपना जो चरित्रा विकसित कर लिया है, वह ऐसा है जिससे उनका भी उ(ार होने वाला नहीं है, जिनकी वकालत की जा रही है। जिनको नकारा जा रहा है, वे इस तुलना में अपेक्षाकृत अधिक सुरक्षित हैं। वे आत्मसंद्घर्ष के रास्ते पर हैं। अपने उथल-पुथलकारी समय में रहते हुए वे जिन प्रश्नों को अपने लेखन में उठा रहे हैं, वे प्रश्न हैं या अप्रश्न, इसका पफैसला वह विशाल पाठक समूह कर रहा है जो सचमुच सुपठ है और इतिहास की उन गतियों के प्रति सचेत भी जो नई सामाजिक मर्यादाओं की माँग कर रही हैं। वह ढहता हुआ सामंतवाद जिसकी चर्चा गीतांजलिश्री अपने उपन्यास 'माई' में करती हैं और उसकी वह ऐंठ जिसे मैत्रोयी अपने उपन्यासों में उधेड़ती और मरोड़ती ही रहती हैं, हमारे कई आलोचकों को छलनापूर्ण और वायवीय ही लगता है। न जाने कब वे अपनी इस सोच का आत्म साक्षात्कार करेंगे और इस पर पुनर्चिंतन भी। पिफलहाल तो उनका यह वक्तव्य गौरतलब है-'यूरोप में परिवार टूट चुके हैं। हमारे यहाँ टूट रहे हैं। तमाम चीजों के होते हुए भी संयुक्त परिवार में कुछ था जो हम परिवार के बिना रह नहीं सकते थे। सुरक्षा थी एक परिवार में, अब टूट रहा है। स्त्राी विमर्श वाले परिवार के बारे में बात नहीं कर रहे।'
मेरी अपनी जानकारी के अनुसार स्त्राी विमर्श परिवार-विरोधी विमर्श नहीं है, बल्कि परिवार में स्त्राी को उसका नैतिक और सामाजिक हक दिलाने वाला वैचारिक संद्घर्ष है। परिवार के विरु( न तो 'आवाँ' की चित्राा मुद्गल हैं न 'चाक' और 'गुड़िया भीतर गुड़िया' की मैत्रोयी। पर कैसा परिवार जिसमें स्त्राी भी मनुष्य होकर रह सके। 'माई' की बेजान 'माई' होकर नहीं।
आलोचना अभी भी अपने पुश्तैनी संस्कारों के दुर्भेद्य जंजालों में पफंसी हुई है। कहने को वह बेहद प्रगतिशील जनवादी और अपटूडेट है, किन्तु उसकी सामंती छायाएँ दूर से दिखती हैं। सच तो यह कि उसे प्रतिभाओं का लोकतंत्रा मंजूर ही नहीं है।
कितनी विचित्रा बात है कि क्रांतिकारी सृजनशीलता के नए प्रस्थानों को देखते हुए वह अपने औजारों को अद्यतन करे, द्घिसे-पिटे पुराने औजारों से नई रचनाशीलता को हलाल करने के काम में जुटी हुई है। अब तो वह यह भी कहने लगी है कि दलित आत्मकथाओं ने श्रेष्ठ साहित्य नहीं रचा और हर आदमी की आत्मकथा साहित्य नहीं बन सकती। जिसका जीवन भरा-पूरा हो उसकी आत्मकथा साहित्य बन सकती है। लगभग यही दलील १९३२ में युवा आलोचक नंददुलारे वाजपेयी प्रेमचंद को हंस के आत्मकथांक के विरु( दे रहे थे। प्रेमचंद उन्हें समझाते हुए लिख रहे थे-'साहित्य के कूड़ा-करकट से ही अमर साहित्य की सृष्टि होती है। कोई अमर साहित्य लिखने का इरादा करके अमर साहित्य की रचना नहीं कर सकता। जिस पर ईश्वर की कृपा होती है, वही इस पद को पाता है। हम तो कहते हैं कि एक मामूली मजदूर के जीवन में भी खोजने से कुछ ऐसी बातें मिल जाएँगी जो अमर साहित्य का विषय बन सकती हैं। केवल देखने वाली आँख और लिखने वाली कलम चाहिए।'
आलोचना में प्रेमचंद के इन वारिसों की सोच अब प्रेमचंद से कितनी अलग और दूर राह पर निकल गई है। नंददुलारे वाजपेयी ने तो प्रेमचंद क्या समस्त हिन्दी की पंचायत में मंजूर करते हुए लिखा 'इन दोनों बातों से मेरा कोई झगड़ा नहीं कि आपके द्घर के 'मेहतर' और एक 'मामूली किसान' के जीवन में अमर साहित्य का विषय बनने की क्षमता है।' तथापि मैं यह कहना चाहूँगा 'मेहतर के जीवन-रहस्य से प्रकाश पाने के लिए अपना जीवन भी प्रकाशमय बनाना होगा।' श्री वाजपेयी ने प्रेमचंद की शिक्षाओं को कितना ग्रहण किया, उनके प्रति कैसे भाव विकसित किए इसका प्रमाण इन पंक्तियों में है 'व्यक्तिगत संबंध का विचार कर ऊपर मैं जो कुछ कह चुका हूँ, आशा है, उसके बाद अब मुझे प्रेमचंद जी से क्षमा-प्रार्थना की आवश्यकता नहीं रही। मैं तो उस दिन की प्रतीक्षा कर रहा हूँ जब पिछली बार लखनऊ में दिए हुए अपने वचन के अनुसार प्रेमचंद जी प्रयाग आकर मुझे दर्शन देंगे और मेरे अतिथि बनेंगे।'
यह कम दुर्भाग्यपूर्ण नहीं है कि समकालीन वातावरण में आलोचकों, साहित्यिक संपादकों, लेखक संगठनों के नेताओं की ताकत रचनाकारों की तुलना में ज्यादा अहम और महत्वपूर्ण मान ली गई है। यह तभी होता है जब साहित्य की समझ क्षीण हो उठती है और सृजनात्मक प्रतिभाएँ मारी मारी पिफरती हैं। सत्ता और बाजार का शिकंजा कस उठता है और लेखक-समाज की मूल्यदृष्टि स्खलित और धुँधली हो उठती है। तब बंगला कवि जीवनानंदास के शब्दों में उन सारे लोगों को दूर तक दिखाई पड़ने लगता है, जो वस्तुतः नेत्राहीन हैं। साहित्य के इन वर्गों और समूहों का नार्को-टेस्ट आज बेहद जरूरी है। इससे इनकी प्रतिब(ताओं का खुलासा तो होगा ही, इनकी सामाजिक और सांस्कृतिक समझ भी लोगों की पकड़ में आ सकेगी।
वह उद्यमशीलता भी जो कभी मिश्रित अर्थव्यवस्था वाली संस्कृति की देन थी और आज एकाधिकारवादी उत्तर सभ्यता की नसेनी पर चढ़ उतर रही है। वही यह कह सकती है कि 'ये नए लेखक उखड़े हुए लोग हैं' और 'सारे साहित्यिक विमर्श एक बंद गली में पहुँच चुके हैं, जहाँ नया कोई उजास, नया कोई तथ्य नहीं है।'
ऐसे सारे धुरंधरों के लिए कवि मित्रा स्वर्गीय विनय दुबे की ये पंक्तियाँ उपहार स्वरूप-
दिल्ली की तरपफ़ तो मैं भूलकर भी नहीं देखता हूँ
दिल्ली होने से तो अच्छा है
अपनी रूखी-सूखी खाकर यहीं भोपाल में पड़ा रहूँ
और सच बात तो यह कि-
कविता से बाहर
मैं तुम्हें नहीं कहना चाहता हूँ
मेरा यकीन करो
मैं सच कहता हूँ।
भारतीय भाषा परिषद
३६ ए, शेक्सपियर सरणी, कोलकाता-७०००१७
मो. ९४३२६६७०७७ |