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आमतौर पर मैं सवर्णों के लेखन से कोई मतलब नहीं रखता। वह उनकी दुनिया है, जो चाहें करें, जैसा चाहें लिखें। वे अपनी दुनिया में जिसे चाहें नवाजें, जिसे चाहें गरियाएँ, मुझे कुछ भी आपत्ति नहीं है। मुझे आपत्ति तब होती है, जब वे दलित साहित्य और विमर्श पर भी जज बनकर निर्णय देने लगते हैं। इसका मतलब यह नहीं है कि उन्हें दलित सवालों पर बोलने का अधिकार नहीं है। पर, यह उनका बोलना उनके अपने ही साँचे में बोलना होगा। यदि वे हमारे साँचे में आकर बोलना चाहेंगे, तो उन्हें हमारे साहित्य और हमारी परंपराओं का अध्ययन करना होगा। बिना दलित साहित्य और परंपरा का अध्ययन किए, दलित साहित्य पर कोई भी वार्तालाप अंधों का ही वार्तालाप होगा। और, इस स्थिति पर कबीर छह सौ साल पहले टिप्पणी कर चुके हैं-
जाका गुर भी अंधला, चेला खरा निरंध।
अंधा अंधा ठेलिया, सिगरे कूप पड़ंत॥१
'पाखी' के अगस्त २००९ के अंक में नामवर सिंह के साथ प्रभाष जोशी, प्रेम भारद्वाज, शैलेय, चन्दन पाण्डेय और अपूर्व जोशी की बातचीत को पढ़कर ही मुझे उपर्युक्त टिप्पणी करनी पड़ी। यदि इस बातचीत में दलित साहित्य और विमर्श पर कुछ भी न कहा गया होता, तो मेरे लिए कुछ भी आपत्तिजनक न था। लेकिन, जब बात दलित या मुसलमान पर हो और उस बातचीत में कोई भी दलित या मुसलमान शामिल न हो, तो वह सारी बात अधूरी और अलोकतांत्रिाक मानी जाएगी। स्त्राी का प्रतिनिधित्व किसी भी स्त्राी के द्वारा थोड़ा-बहुत चल जाएगा। पर, दलित या मुसलमान का प्रतिनिधि कोई भी ब्राह्मण-ठाकुर नहीं कर सकता। इस बातचीत में ऐसा ही हुआ। यह बातचीत पूरी तरह द्विज वार्तालाप है, जिसमें एक ठाकुर के साथ पाँच ब्राह्मणों ने बात की है। अच्छा होता, यह बातचीत द्विज लेखकों के साहित्य तक ही सीमित भी रहती। पर, ऐसा नहीं हो सका। नामवर सिंह आजकल दलित विमर्श से चिढ़े बैठे हैं। इसलिए, उनके सामने सवाल चाहे जो हो, वह किसी न किसी बहाने दलित विमर्श को अपने उत्तर में ले ही आते हैं और पिफर उसे गरियाने में जरा भी आगा-पीछा नहीं सोचते।
नामवर सिंह ने मेरे संबंध में जो टिप्पणी की है, उसे मैं अपने लिए आलोचना के शिखर पुरुष का 'पुरस्कार' ही मानता हूँ। मेरी कविताओं का संकलन 'तब तुम्हारी निष्ठा क्या होती' नाम से १९९६ में आ गया था। पर, नामवर जी का यह कहना सच है कि मैं कहानी नहीं लिखता।२ लेकिन, सच यह भी है कि आलोचना के शिखर पुरुष भी न कविता लिखते हैं और न कहानी। है न अद्भुत संयोग!
मैं इस पूरी बातचीत में कुछ बिन्दुओं पर अपना मत जरूर व्यक्त करूँगा, क्योंकि यह दलित अस्मिता का भी मामला है, जिसे इस बातचीत ने आहत किया है।
नामवर सिंह ने यह अच्छा किया कि उन्होंने आलोचना को अपने खेमे में रखा है और विमर्श को दलितों के खेमे में। इस तरह आलोचना और विमर्श दो अलग-अलग ध्रुव हैं और दोनों के बीच कोई सेतु नहीं है। विमर्श पर चर्चा करते हुए वे कहते हैं, 'साहित्य में विमर्श के नाम पर अमर्श ज्यादा दिखायी देता है।' और शैलेय 'हाँ' में 'हाँ' मिलाते हैं-'बहुत सही', ठीक रामभक्त हनुमान की तरह या एक अंधे शिष्य की भांति। कोई अध्ययन नहीं, कोई वैचारिकी नहीं। ऐसे ही लोगों के लिए कबीर ने क्या खूब कहा है-
बिन परचै साहब हो बैठे, विषय करै व्यौपारा।
ज्ञान ध्यान का मर्म न जानै, वाद करै अहंकारा॥४
आगे की बातचीत में दलित विमर्श को खारिज करने वाली ये गर्वोक्तियाँ भी देख ली जाएँ। प्रभाष जोशी का कहना है कि दलितों के यहाँ 'क्रिएटीविटी नहीं दिखती जो लीजेंड हो।'५ 'दलित विमर्श सृजन नहीं है, बौ(कि व्यापार है।'६ नामवर सिंह कहते हैं, 'दलित साहित्य को विमर्श ने नुकसान पहुँचाया है।'७ कोई इनसे पूछे, आपसे राय माँग कौन रहा है? दलित विमर्श दरअसल दो कारणों से इनके लिए सृजन नहीं है। पहला कारण, दलित साहित्य पर इनका अध्ययन शून्य है। पिछले पाँच सालों में हिन्दी में लगभग एक दर्जन से भी ज्यादा बहुत अच्छे उपन्यास आए हैं और अनगिनत कहानी संग्रह आए हैं। पर नामवर सिंह और उनके पाँचों वार्ताकारों ने इनमें से एक को भी नहीं पढ़ा होगा। इसलिए ये दलित विमर्श को क्या समझें? 'समझा सोई जानिए जाके हृदय विवेक'८, कबीर कह ही गये हैं। दूसरा कारण, इनका यह अहंकार है कि पढ़ना-लिखना द्विजों का काम है। दलित क्या जानें साहित्य-वाहित्य। दलित लेखन ने इनके सारे साहित्यिक आंदोलनों को ध्वस्त कर दिया। सृजन के नाम पर नामवर सिंह और अन्य लोगों ने अपने खेमे की जितनी कहानियों की चर्चा की है और खासतौर से महेश कटारे की कहानियों की जितनी तारीपफ की है९, वह उनकी अपनी दुनिया है, चाहे जिस तरह देखें। वह दुनिया पेट-भरों की है। वहाँ हमारा कुछ नहीं है। और, सचमुच वे सारी कहानियाँ हमारे विमर्श में आते ही किसी काम की भी नहीं रह जाएँगी। पर, उनकी दुनिया से हम दूर ही रहना चाहते हैं।
दलित और सवर्ण ये दो वर्ग हैं और हमेशा रहेंगे। नामवर सिंह या कोई भी द्विज लेखक अपनी बात एक वर्ग के रूप में ही करता है। पर, तकलीपफ की बात यह है कि दलित को अपनी बात दलित के रूप में नहीं करने दी जाती। यहाँ वे हमारी जाति तलाश करना शुरू कर देते हैं। वे बाबा साहेब को महार, ओम प्रकाश वाल्मीकि को भंगी, धर्मवीर को चमार और अजय नावरिया को खटीक कहने लगते हैं।१० ठीक है, हमारे यहाँ जातियों के झगड़े हैं। क्या आपके यहाँ नहीं हैं? पिफर, आप अपने लेखकों को ब्राह्मण, ठाकुर, बनिया, कायस्थ, भूमिहार क्यों नहीं कहते?
यहाँ मैं लेखक बिरादरी के सारे ब्राह्मणों, ठाकुरों, बनियों, राजपूतों, कायस्थों, भूमिहारों और मुसलमानों से भी एक सवाल पूछना चाहता हूँ कि उनकी कितने दलितों से या दलित लेखकों से स्वाभाविक मित्राता है-ऐसी मित्राता, जिसे दाँत काटी रोटी या लंगोटिया याराना कहते हैं? मुझे ईमेल पर या पत्रा लिखकर बताएँ। और यह भी बताएँ कि पावर में आने के बाद उन्होंने अपने कितने दलित मित्राों को लाभ पहुँचाया? यह मैं इसलिए कह रहा हूँ कि मैंने कुछ पावरपफुल सवर्ण लेखकों से मित्राता बनाए रखने की पूरी कोशिश की। पर, जब वे किसी बड़े प्रतिष्ठान में गये, विश्वविद्यालयों में कुलपति हुए, और वहाँ पहुँचकर जब उन्होंने अपने मित्राों को रेवड़ियाँ बाँटनी शुरू कीं, तो उन्हें अपने दलित दोस्त की बिलकुल याद नहीं आयी। वे सारी रेवड़ियाँ उन्होंने अपने सवर्ण दोस्तों को ही दीं। इसलिए मैं जोर देकर कहता हूँ कि दलित और सवर्ण के बीच मित्राता नहीं हो सकती। यह मित्राता होनी चाहिए, क्योंकि यह समय का तकाजा है। पर, सवर्ण समय को अपनी मुट्ठी में दबाकर रखते हैं।
जैसा कि मैंने कहा, बात किसी भी विषय पर हो, नामवर सिंह उसे दलित की ओर मोड़ ही देते हैं। और, यदि बात न भी चल रही हो, तो भी वे बीच में ही बोलने वाले को रोककर अपनी बात शुरू कर देंगे। बोलने वाले के लिए चुप रहने के सिवा क्या चारा? ऐसे ही एक प्रसंग को बीच में काटते हुए नामवर सिंह बिना किसी प्रसंग के प्रेमचंद पर बोलने लगते हैं। कहते हैं, 'कपफ़न' पाठक को झकझोर देता है।११ ''द्घीसू और माधव 'कपफन' का पैसा पी गये सब। यह विद्रोह था। कपफन न खरीदना बगावत थी।''१२ तरस आता है नामवर सिंह की समझ पर। अपनी पत्नी-बहू का कपफन न खरीद कर उस पैसे की शराब पी जाने को वही व्यक्ति बगावत कह सकता है, जिसकी आँखों का पानी ढल गया हो।
प्रसंग कांशीराम और मायावती का है। पर, नामवर सिंह यहाँ भी दलित लेखकों को गरियाने का मौका नहीं चूकते। कहते हैं, ''नयी पीढ़ी के लिखने वालों का पहला संग्रह आ चुका है जो दलित नहीं हैं और कोई गर्व से कि हम हिन्दू हैं या सवर्ण हैं, ये कहते हुए भी नहीं लिख रहा है।''१३ पर, महेश कटारे की 'तूर्यनाद' कहानी की अंधी प्रशंसा में वे हिन्दुत्व पर गर्व भी करने लगते हैं। वे कहते हैं, ''इसमें एक धानुक जाति का अस्पृश्य व्यक्ति है, इसमें एक बात और दिखायी।
उन्होंने कोशिश की जो हमारी पुरानी व्यवस्था चली आ रही थी। एक-दूसरे का भेद जानते हुए भी सारी जातियाँ सुख-दुख में जिस तरह से शामिल होती हैं। इसका जवाब देते हैं महेश कटारे कि कोई बात तो है इस अत्यन्त आतताई जाति-व्यवस्था में कि इसने छह हजार साल तक सरवाइव किया। बड़े-बड़े समाज सुधारक आए। कुछ तो है इसमें सरवाइवल एलीमेंट।''१४ नामवर सिंह की सारी पढ़ाई यहाँ मिट्टी में मिल गयी है। लगता है, वे सिपर्फ साहित्य में ही डूब-उतरे हैं, इतिहास के पास से भी नहीं गुजरे हैं। यहाँ दो बातें नामवर सिंह भी नोट करें और पाठक भी। एक यह कि ''सारी जातियाँ सुख-दुख में जिस तरह शामिल होती हैं'', इसमें दलितों को बिलकुल भी शामिल न करें, वरना इतिहास पटक-पटक कर मारेगा। इतिहास के किसी भी काल में द्विज दलितों के सुख-दुख में शामिल नहीं हुए हैं। और दूसरे, वह 'साइवाइवल एलीमेंट' है, विदेशी आक्रमणकारियों को चुपचाप रास्ता दे देना और विदेशी शासकों को अपनी बहन-बेटियाँ देकर, उनका मजहब कबूल करके और उनकी अधीनता स्वीकार करके अपनी धर्म-व्यवस्था को बचाए रखना। इसलिए सवाल यह नहीं है कि आपकी जाति-व्यवस्था ने छह हजार साल तक सरवाइव किया, वरन् सवाल यह है कि किस तरह सरवाइव किया। महेश कटारे जैसा द्घोर रूढ़िवादी धर्मभीरू व्यक्ति यदि 'तूर्यनाद' में संद्घ परिवार का दर्शन द्घुसेड़ रहा है, तो नामवर सिंह उसकी प्रशंसा करके अपनी कौन-सी प्रगतिशीलता प्रदर्शित कर रहे हैं? कबीर ठीक बता गये हैं कि सवर्ण और दलित का विचार एक हो ही नहीं सकता, क्योंकि दलित आँखों देखी कहता है, और सवर्ण कागद की लेखी। यथा-
मेरा तेरा मनुआ कैसे इक होइ रे।
मैं कहता हौं आँखिन देखी, तू कहता कागद की लेखी।
मैं कहता सुरझावनहारी, तू राख्यौ उरझाई रे॥१५
सन्दर्भ
१. कबीर-ग्रन्थावली, संपादक : श्यामसुन्दर दास, साखी१/१५
२. पाखी, अगस्त २००९, पृष्ठ ५९
३. वही,
४. कबीर-हजारीप्रसाद द्विवेदी, कबीर-वाणी, पद-१०९
५. पाखी ;उपर्युक्तद्ध, ५९
६. वही,
७. वही,
८. कबीर-समग्र ;प्रथम खण्डद्ध, सं. डॉ. युगेश्वर, पृष्ठ ४५९
९. पाखी ;उपर्युक्तद्ध, पृष्ठ ६१ एवं ६५
१०. वही, पृष्ठ ६०
११. वही, पृष्ठ ६४
१२. वही, पृष्ठ ६५
१३. वही, पृष्ठ ६१
१४. वही, पृष्ठ ६५
१५. कबीर ;उपर्युक्तद्ध, पद-१६३
भारती निवास, एल.आई.जी.-सी-२६०/६, न्यू आवास विकास कॉलोनी, सिविल लाइन्स, रामपुर-२४४९०१ ;उ.प्र.द्ध
मो. ९४१२८७१०१३, ९३५८६७१६८५ |