चतुरंग' 'चलो दोस्त सब ठीक है' जैसे उपन्यासों और 'इस जुनून में' 'मकान ढह रहा है' 'माटी' 'आमीन' सरीखे कहानी संग्रहों के बाद शैलेन्द्र सागर का नया संग्रह 'प्रतिरोध' ;२००८द्ध एक सार्थक रचना यात्राा का नया मोड़ है। यह अचानक नहीं है कि शीर्षक कहानी 'प्रतिरोध' के साथ आठ अन्य कहानियाँ भी अलग-अलग रंगों में महत्वपूर्ण हैं और वे एकाधिक पाठ की माँग करती हैं। 'आधी दुनिया, आधा सच, आधे सपने', 'स्खलन', 'क्यों लौट आती हैं चिड़ियाँ' 'प्रस्थान' 'सपफर' 'धुंध' 'संक्रमण' 'कुछ और भी' अपनी अंतर्वस्तु की विविधता में चकित करती हैं। पर इसमें संदेह नहीं कि शीर्षक कहानी 'प्रतिरोध' एक अलग तरह के द्वन्द्व और तनाव की कहानी है। स्त्राी-पुरुष संबंधों के भीतर की जटिलताएँ नंदिता और दीपंकर के प्रेम और प्रतिरोध को मार्मिक प्रसंग बना देती हैं।
हमारे समय में अब पुरुष-वर्चस्व संदिग्ध शब्द है। पारंपरिक ढंग से पति-पत्नी चाहकर भी रह नहीं सकते। 'स्खलन' इस दृष्टि से एक छद्म संबंध-निर्वाह को तीखे तनाव के बीच लक्ष्य करती है। कहानी का एक अंशः 'ऐसा लगा जैसे कोई दुःस्वप्न उसके अंतरंग को चीरता चला गया है याकि द्घुप्प अँधेरे में चमगादड़ की उद्विग्न पफड़पफड़ाहट कहीं अंदर तक दहशत पैदा कर गई है।' या 'वास्तविकताएँ पफैंटेसी के आवरण में जकड़ी दिखलाई देती हैं।' नींद में अलमस्त सोती स्नेह से उसे वितृष्णा लगती है। वह स्नेह के चरित्रा पर संदेह करता है। एक तरह से 'नीच' 'क़मीनी' 'बेहया' 'छिनाल' कहकर टूट पड़ता है। स्नेह जानती है कि जॉब करना पति को अच्छा नहीं लगता। तनख्वाह ८ारूर हर महीने उसके कब्जे में आनी चाहिए। स्नेह साहसपूर्वक कहती है-'तुम सोचते हो औरत और मर्द के बीच संबंध का हर सूत्रा उन्हें बिस्तर तक ले आता है। हर पुरुष लम्पट और व्यभिचारी है और हर औरत सिपर्फ़ देह।' पति के लिए यह चोट असह्य है। पति मनोज पर जैसे पागलपन सवार है। 'उसका चेहरा हिंसक हो चला था।
आँखों में क्रूरता आग के मानिंद दहक रही थी।' एक ओर स्नेह की देह लुभाती है, दूसरी ओर वह संदेह से बेचैन है। एक कोई डायरी उसकी न८ार में है जिसमें स्नेह के इश्क के कारनामे दर्ज हैं। स्नेह एक अच्छे कॉलेज में पढ़ा रही थी। उसे लगता है स्नेह रिश्ते को कलंकित कर रही है। शायद स्नेह उसे पागल कर देना चाहती है। इस तनाव का अंत नहीं है। स्नेह सात दिनों का छात्रााओं का टूर लेकर नैनीताल कुमाऊँ गई थी। उसकी सहमति थी। वह भी साथ जा सकता था। बच्चे साथ हो सकते हैं-यह भी अच्छी संभावना थी। पर मनोज को छुट्टी नहीं मिली। स्नेह गई तो इस वादे के साथ कि तीन दिन बाद मनोज बच्चों के साथ रानीखेत में साथ हो लेगा। स्नेह के जाते ही मनोज का पफ़ोन कि वह पफ़ौरन वापस आए। दूसरी टीचर नयी थी। इसलिए बीच में स्नेह आ नहीं सकती थी। लौटने पर मनोज आक्रामक था। डायरी उसके हाथ में थी। वह पिट रही थी और सपफाई दे रही थी कि जो प्रेम प्रसंग हैं, वे नोट्स हैं। अब स्नेह पर पाबंदियाँ थीं। पफ़ोन रिसीव करना, पफोन करना, स्कूटर चलाना सब मना था। द्घर का कलह कॉलेज तक जा पहुँचा था। स्नेह एक सप्ताह के लिए बिना बताये माँ के यहाँ चली गयी। मिलने पर पिफर आक्रमण। शेष है-विलाप, पछतावा। ऐसा लगता है, स्नेह ठूँठ हो चली है।
'पर यह तलाश एक अंतहीन भटकाव'-यह वाक्य संग्रह की पहली ही कहानी 'आधी दुनिया, आधा सच, आधे सपने...' में है। कहानी में बैंककर्मी रेखा मनी से कहती है-बस में जाने-अनजाने धक्के क्यों झेलती है, कायनेटिक क्यों नहीं ले लेती। लोन का इंतजार है। रेखा दो मित्राों के बीच स्पफूर्ति पाती है। वर्ना द्घर का रुटीन है। बच्चों को तैयार करना, पति को भी। आकाश दीपक कभी एक साथ मिलने का संकेत करते हैं। पर यह तो संभव नहीं। रेखा मनीषा से कहती है-आज वह आकाश के साथ चली जाए। रेखा जानती है, आकाश मनीषा को पसंद करता है। 'आई डोंट माइन्ड'-मनीषा के शब्द हैं। लंच पर आकाश को बुला ले ताकि वह दीपक के साथ समय बिता सके। व्यंग्य में मनीषा कहती है-'यू मीन मैं उससे फ्रलर्ट करूँ'। रेखा को तो आपत्ति नहीं। वह आकाश को कह दे-रेखा रीजनल ऑपिफ़स की मीटिंग में पफंस गयी है। उधर नेहा का इधर-उधर जाना मनीषा को चिंतित करता है। नेहा जीवन को इन्जॉय करना चाहती है। शादी से बचना चाहती है। वह कम्प्यूटर, पफैशन टेक्नॉलॉजी में डिप्लोमा कर सकती है।
बैंक मैनेजर चोपड़ा मनीषा को लंच के लिए ले जाता है। लिफ्ऱट में उसे चूम लेता है। मनीषा लेट कमर है। तो चोपड़ा से छूट मिल सकती है। उसी दोपहर रमेश का पफ़ोन-एक्सीडेंट में नितिन को मामूली चोट। चोपड़ा पूछता है-पति कैसे हैं। चोपड़ा मनीषा को साथ चाहता है। नेहा की हरकतें-मनीषा का रक्तचाप बढ़ा है। नेहा के पर्स में एक दिन दो कंडोम मिलते हैं। आख़िर जब वह सीधे कह देती है तो नेहा अन्यत्रा शिफ्ऱट कर लेती है। रेखा तनाव में है। दो दिनों से छुट्टी पर है। रेखा चिंतित है कि आकाश का किसी से अपफ़ेयर चल रहा है। मनीषा आधे दिन के अवकाश पर है। अपनी पुरानी मित्रा अनुभा से मिलना तय है। अनुभा जे एन यू में पढ़ा रही है। रीडर है। अनुभा शादी में यकीन नहीं करती। अपनी शर्तों पर जीती है। एक पफ़ेलोशिप पर स्टेट्स जा रही है। उसके अनुसार जो भी 'जे एन यू' में पढ़ा रही हैं या तो डाइवोर्सी८ा है या लिविंग टुगेदर के अनुसार पार्टनर के साथ हैं। नेहा ने उसी के निर्देशन में रिसर्च ज्वाइन की है। नेहा किसी ेंड के साथ रह रही है, पिफर हॉस्टल में आ जाएगी। मनीषा की भतीजी ने स्वतंत्रा जीवन चुन लिया है। मैनेजर चोपड़ा रेखा से भी छूट ले चुका है। नेहा की शॉपिंग, ेंडशिप, डांस का भेद खुल चुका है। इस दुनिया में जो सच है, वह सपना भी है।
'प्रस्थान' में तनु की विदेश यात्राा का प्रसंग है। आरती, विवेक, अम्मा। पिता की हिदायते हैं-पासपोर्ट वीजा का ध्यान रखना। तनु का जवाब है-कम ऑन पापा...आई एम नॉट ए चाइल्ड। तनु हॉस्टल में थी। इंजीनियरिंग करते ही इंपफोसिस में चयन हो गया। बधाइयाँ तो माँ आरती को भी मिल रही हैं। अम्मा के कहने से तनु लड्डू-मठरी तो ले नहीं जा सकती। चेन्नई से फ्रलाइट है। अतः अकेले जाना है। अंधेरे में सबके अपने-अपने डर हैं। 'सपफर'-में अम्मा चाहकर भी कुछ नहीं कर सकतीं। पचहत्तर छूने जा रही है। तैयारियाँ हैं। बीच-बीच में बहू को डर है-अम्मा छह महीने से ऊपर यहाँ रह चुकी हैं-अब और कितना रहेंगी! और दो बेटों के पास क्यों नहीं रहतीं। हरिद्वार आँषीकेश क्यों नहीं रहतीं। 'ओल्ड एज होम्स' में भी तो रह सकती हैं। कहीं महीना भर ही रहना स्वीकार नहीं है। बहू अपने माँ-बाप के पास जाने की धमकी देती है। अम्मा जानती हैं कि वह अपनी परिक्रमा के पहले पड़ाव की ओर बढ़ रही हैं। पहला और बेस पड़ाव... जहाँ से एक वर्ष की यात्राा आरंभ होकर वहीं समाप्त होती है। इस बीच बाबा चले गये। बाऊ जी भी। दादी भी नहीं रहीं। बहू के शब्द हैं-'अम्मा न हुईं कि मेरे लिए मुसीबत हो गईं। द्घर कौन, किसके नाम! यह तो अम्मा ही तय करेंगी। देखें तो अम्मा का अपना द्घर तो लखनऊ में है। वहाँ क्यों नहीं रहती। अम्मा का द्घर का लगाव ख़त्म नहीं हुआ। मुकेश के नाम यह द्घर करना चाहती हैं। अम्मा इतनी सिकुड़ क्यों गयी हैं।
'क्यूं लौट आती हैं चिड़ियाँ' कहानी में एक सूत्रा है-'पति-पत्नी के बीच ये छोटे-छोटे सुख कितने अहम हैं। इन्हीं मीठे पलों से उनके रिश्ते में सदाशयता और कोमल अहसास भर जाता है। बच्चे छोटे थे- तो स्कूल जाने का नियमित क्रम था। अब आरती अरविन्द अकेले हैं, तो अरविन्द बेड टी बनाकर पत्नी आरती को सर्व करते हैं। अरविन्द देर-देर तक अखबार पढ़ते हैं। आरती पूजा-पाठ में लगी रहती हैं। 'सुबह का वक्त काटने के दोनों के अपने-अपने ढंग हैं। शायद दोनों में एक गुप्त किस्म की होड़ भी है, कौन अपने काम में ज्यादा वक्त गु८ाार ले।' अब बा८ाार जाना कम हो गया। अजनबियत कचोटती है। मनु से बातचीत या चैट रो८ा का नियम है। मिनी चेन्नई में है-आई बी एम में साफ्रटवेयर इंजीनियर। पति बंगलोर में है-एक मल्टीनेशनल में। विवाह के दो साल हुए। व्यवहारिक है। तीज-त्यौहार की औपचारिकता से बरी। ससुराल-द्घर के बीच संतुलन। यहाँ तो ख़ाली द्घर है, ख़ाली वक्त है। 'क्या मनु और मिनी को अपने इस द्घर की याद नहीं आती होगी।' बाबा, अम्मा, बाऊ जी चले गये। सभी संगी-साथी कारवाँ में जुड़-जुड़ कर किस पल जुदा हो जाते हैं, पता ही नहीं चलता। भइया इंजीनियरिंग पढ़ते हॉस्टल क्या गये, बाहर के ही हो गये। छोटी बहन गुड़िया अपने द्घर चली गयी। अब आरती-अरविन्द के पास अकेलापन है। पौधों में पानी देना है तो पति-पत्नी दोनों को। मिनी की व्यस्त ८िांदगी में अकेलापन है। देर रात का आपिफ़स। लौटना है तो अकेले। डाइनिंग टेबुल का उजाड़। खाने में ब्रंच या खिचड़ी। अकेलेपन से अकेलेपन तक।
'संक्रमण' के सतीश बाबू मामूली क्लर्क हैं। पफ़ाइलों में डूबे रहते। बच्चे पढ़ रहे हैं तो उनकी माँगें तो है ही, वे पिता जी को भी बदलना चाहते हैं। सौरभ ने यूनिपफ़ार्म के नये स्वेटर की माँग की। पुराने टी.वी. सेट को बदलकर कलर टीवी। वाशिंग मशीन, कूलर, सौरभ की बाइक। आशा ने जयपुरिया में प्रवेश लिया, तो हजार रुपये महीने की पफीस, चार सौ बस का अलग। गुजरात त्राासदी के लिए बेटे-बेटी को चंदा देना था। टूर पर नहीं जा सका, तो कोई बहाना न था। पापा बीड़ी न पिएँ, पिएँ तो सिगरेट। चप्पल पहनकर ऑपिफस न जायँ। बेटे को पचास के दो पैन लेने हैं। हॉपफ क्वार्टरली में सर्वोच्च अंक पाकर सुरभि को ेंडस को ट्रीट देनी है। चलो बस और खर्च इस महीने न करना। यही है संक्रमण। आगे-पीछे का द्वंद्व। जीवन स्तर का बदलाव।
'कुछ और थी' में अविनाश की पत्नी प्रिया को लाइलाज कैंसर है। जानती है कि वह चली गयी, तो माँ का ही दबाव होगा कि अविनाश दूसरा विवाह कर ले। प्रिया कोमा में चली गई। बाल झड़ चुके थे। मेहमान देखने आने लगे। मनु मम्मी की तकलीपफ़ जानता। नौकरानी के काम बढ़े। प्रिया नहीं रही। वाशिंग मशीन आ गई। मनु का खाना। किचन का काम बढ़ गया। प्रिया पिफजिक्स में एम एस सी थी। मनु को पढ़ा सकती थी। अविनाश अंग्रेजी पढ़ा सकता था। अब ट्यूटर लगे। अकेलापन। माँ ने दूसरी शादी के लिए अविनाश को तैयार किया। अब बेटे से पूछना था-दूसरी माँ आए, तो कैसा लगेगा। 'ठीक है पापा-मम्मी के आने से द्घर में अच्छा लगेगा। विवाह में बेटे के आग्रह पर अविनाश ने मैरिज में जोधपुरिया कुर्ते पाजामे पहने। मनु मम्मी-पापा के पास सोता था। अविनाश की उलझन बेकार थी। मनु ने दूसरे कमरे में बिस्तर लगाया, स्टडी टेबल लगा ली। नई मम्मी रागिनी ने मनु से पूछा-'मम्मी की याद तो आती ही होगी।' 'हाँ, मेरी मम्मी मुझे बहुत प्यार करती थीं। पर आप उससे कम तो नहीं।' यह भावुक क्षण था। अविनाश-रागिनी कृतज्ञ थे।
अंत में, 'प्रतिरोध' कहानी संग्रह की सबसे महत्वपूर्ण कहानी है। सुबोध से विवाह सालभर भी चल नहीं पाया। अब बेटा नितिन हॉस्टल में है और नंदिता का अकेलापन भयानक है। 'कभी लगता है कि उम्र गुजरती कहाँ है। उम्र यों जैसे लौटे-लौट आती है। दीपंकर का प्रेम। वह रात-बिरात पफोन करता है। आता है तो चुम्बनों से भर देता है। दीपंकर की सीमाएँ हैं। पास पत्नी हैं, बच्चे हैं। दीपंकर से सेमिनार में भेंट हुई। पूरे शरीर में उत्तेजना की लहर-सी प्रवाहित होने लगी। पूरा बदन शिथिल होने लगा। नंदिता हर समय दीपंकर के सपने देखती है। गर्माहट का अहसास। आग बुझने में कम वक्त नहीं लगता। जैसे उनकी ८िांदगी की पहली डेट हो। नंदिता वर्किंग लेडी। रेस्त्राां का बिल वही पे करना चाहती। अंदर काँटे चुभते हैं। पफ़ोन नम्बर ले लिया है। नंदिता चाहे भी तो दीपंकर से अलग नहीं हो सकती। 'मेरे बंद जीवन में खुली खिड़की की तरह हो तुम। सालों से मैं कितनी अकेली और अपने में बंद रही हूँ।' उसे सिर रखने के लिए दीपंकर का कंधा चाहिए। दीपंकर इस संबंध को चाहे भी तो नाम नहीं दे सकता।
सुबोध चिड़चिड़ा था। संवादहीनता का दौर है। वह पापा के पास चली आई। नितिन के जन्म पर भी सुबोध नहीं आया, तो संभावनाएँ ख़त्म हो गईं। अब दीपंकर का स्पर्श ही आश्वासन है। देह से ८यादा मन का प्यार चाहिए। सन्नाटा खिंचा हुआ था। नंदिता जैसे नये ढंग से सजना चाहती थी। पफैशियल, मैसा८ा, हेयर ट्रिमिंग, आई व्रो८ा, मिनी व पैडी क्योर और वेक्सिंग। नये परिधान। 'लाज से उसकी आँखें झुकी जा रही थीं।' दीपंकर ने नंदिता को बाँहों में खींच लिया था। वे देर तक गुंथे पड़े थे। आँखें, कान, गर्दन, पिफर होंठ, चुम्बनों की बुहार। 'कब वे पलंग पर थे, पता ही नहीं चला।' वर्जनाएँ टूट रही थीं। 'दीपंकर प्ली८ा'-वह मुक्त होने के लिए छटपटा रही थी। जैसे नंदिता व्यर्थता-बोध से ग्रस्त थी। वह पिफर दीपंकर को चाहने लगी थी। एक बार पिफर वही गहरा आलिंगन। नंदिता शिथिल पड़ गयी थी। बाँहों में जकड़े वे बिस्तर पर लुढ़क गए। अब पिफर अचानक अवरोध।
एक दिन दीपंकर आने को है। वह अकेली हो, तो सारी वर्जनाएँ टूट सकती हैं। पर वह मेड सर्वेंट लक्ष्मी को रोक लेती है कि कोई आने वाला है। यह प्रतिरोध था। अपने ही चुप-चुप उद्याम प्रेम का प्रतिरोध। कहानी में अगर नंदिता दीपंकर से संबंध बना लेती ;जो कहीं भीतर की चाहत भी थीद्ध, तो कहानी साधारण होती। 'प्रतिरोध' में कहानी एक ट्रैजिक मोड़ लेती है और एक महत्वपूर्ण कहानी बन जाती है। शैलेन्द्र सागर की भाषा कई बार काव्यात्मक है। द्वंद्व और तनाव कहानी को अर्थवान बनाते हैं। कोई दो कहानियाँ एक-सी नहीं हैं। द्घर-परिवार, सुख-दुख, अकेलापन-'प्रतिरोध' संग्रह की कहानियाँ देर तक विचलित करने वाली हैं।
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