| अरुणा राय |
|
.jpg) |
प्यार में पसरता बाजार...
सारे आत्मीय संबोधन
कर चुके हम
पर जाने क्यों चाहते हैं
कि वह मेरा नाम
संगमरमर पर खुदवाकर
भेंट कर दे |
सबसे सफ्रपफाक और हौला स्पर्श
दे चुके हम
पिफर भी चाहते हैं
कि उसके गले से झूलते
तस्वीर हो जाए एक
जिंदगी के
सबसे भारहीन पल
हम गुजार चुके
साथ-साथ
अब क्या चाहते हैं
कि पत्थर बन
लटक जाएँ गले से
और साथ ले डूबें
यह प्यार में
कैसे पसर आता है बाजार
जो मौत के बाद के दिन भी
तय कर जाना चाहता है... |
| |
| हाथ में लेकर तुम्हारा हाथ |
| |
हाथ में लेकर तुम्हारा हाथ
मैंने तब ये जाना
आँख की तो
साख है यूं ही
पर हृदय का द्वारा
खुलता है हथेली से
हाथ में लेकर तुम्हारा हाथ
मैंने तब ये जाना
कैसे उमगते हैं परस्पर
स्नेह के अंकुर
मानस पटल पर
झरते कैसे पुष्प पारिजात के
और खुशबू पसरती है
किस तरह निज व्योम में
हाथ में लेकर तुम्हारा हाथ
मैंने तब ये जाना
जागरण और स्वप्न की
संधि कहाँ है
किस तरह मनुहार करती हैं
परस्पर उंगलियाँ
थमता है
जाकर कहाँ पर
ज्वार अपने स्नेह का
हाथ में लेकर... |
| |
| |
|
| |
|