नवंबर २००९
 
 
 
   
 
 
 
•अमरकांत को इलाहाबाद में ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित• जितेन्द्र श्रीवास्तव को देवीशंकर अवस्थी सम्मान•दिल्ली में विश्व (पुस्तक मेला ;राजकमल प्रकाशन के स्थापना दिवस पर तीन लखटिया पुरस्कारों की द्घोषणामहुआ माजी के उपन्यास 'मरंग गोड़ नीलकंठ हुआ' को तीसरा राजकमल कृति सम्मानविश्वनाथ त्रिापाठी की पुस्तक 'व्योमकेश दरवेश' को पहला सृजनात्मक गद्य सम्मान अमरेन्दु किशोर की कृति 'बादलों के रंग हवाओं के संग' को चौथा कृति सम्मानस्तंभ लेखक भारत भारद्वाज के खिलापफ वारंटद्ध)
 
 
 
कविताएं
अरुणा राय
प्यार में पसरता बाजार...

सारे आत्मीय संबोधन
कर चुके हम
पर जाने क्यों चाहते हैं
कि वह मेरा नाम
संगमरमर पर खुदवाकर
भेंट कर दे

सबसे सफ्रपफाक और हौला स्पर्श
दे चुके हम
पिफर भी चाहते हैं
कि उसके गले से झूलते
तस्वीर हो जाए एक

जिंदगी के
सबसे भारहीन पल
हम गुजार चुके
साथ-साथ
अब क्या चाहते हैं
कि पत्थर बन
लटक जाएँ गले से
और साथ ले डूबें

यह प्यार में
कैसे पसर आता है बाजार
जो मौत के बाद के दिन भी
तय कर जाना चाहता है...

 
हाथ में लेकर तुम्हारा हाथ
 

हाथ में लेकर तुम्हारा हाथ
मैंने तब ये जाना

आँख की तो
साख है यूं ही
पर हृदय का द्वारा
खुलता है हथेली से

हाथ में लेकर तुम्हारा हाथ
मैंने तब ये जाना

कैसे उमगते हैं परस्पर
स्नेह के अंकुर
मानस पटल पर
झरते कैसे पुष्प पारिजात के
और खुशबू पसरती है
किस तरह निज व्योम में

हाथ में लेकर तुम्हारा हाथ
मैंने तब ये जाना
जागरण और स्वप्न की

संधि कहाँ है
किस तरह मनुहार करती हैं
परस्पर उंगलियाँ
थमता है
जाकर कहाँ पर
ज्वार अपने स्नेह का

हाथ में लेकर...

 
 
 
ऊपर जाये...
पिछे जाये...
 
 
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