'
 
 
 
नवंबर २००९
 
 
 
   
 
 
 
•अमरकांत को इलाहाबाद में ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित• जितेन्द्र श्रीवास्तव को देवीशंकर अवस्थी सम्मान•दिल्ली में विश्व (पुस्तक मेला ;राजकमल प्रकाशन के स्थापना दिवस पर तीन लखटिया पुरस्कारों की द्घोषणामहुआ माजी के उपन्यास 'मरंग गोड़ नीलकंठ हुआ' को तीसरा राजकमल कृति सम्मानविश्वनाथ त्रिापाठी की पुस्तक 'व्योमकेश दरवेश' को पहला सृजनात्मक गद्य सम्मान अमरेन्दु किशोर की कृति 'बादलों के रंग हवाओं के संग' को चौथा कृति सम्मानस्तंभ लेखक भारत भारद्वाज के खिलापफ वारंटद्ध)
 
 
 
गीत/ग़ज़ल
अशोक 'अंजुम'

सबकी अपनी ही चाल है द्घर में
खिंचती सपनों की खाल है द्घर में

किस तरह उसको द्घर कहें यारो
प्यार का जब अकाल है द्घर में

 

आदमी बच के जाएगा भी कहाँ
लौट आएगा जाल है द्घर में

चोर करने लगे वे पफ़ाक़ाकशी
सोचते थे कि माल है द्घर में

बच्चा लड़-भिड़ के द्घर को दौड़ लिया
हाँ वहाँ माँ की ढाल है द्घर में

यार, सर्विस में आ गया जबसे
मेरी भी देखभाल है द्घर में

हाथ अनगिन तरसते रहते हैं
रेशमी इक रूमाल है द्घर में

स्वाद सबके जुदा-जुदा 'अंजुम'
रोज बापू हलाल है द्घर मे

 
 

कितना कहता हूँ पर नहीं जाता
द्घर से डर के वो द्घर नहीं जाता

रो८ा अहसां जता ही देता है
ये न करता तो मर नहीं जाता

जोड़ने वाले तोड़ते न अगर
तो मैं ऐसे बिखर नहीं जाता

उसने वर्दी के रंग देखे हैं
उसके ८ोहन से डर नहीं जाता

प्यार के नाम पे दिखावा था
ये नशा यूँ उतर नहीं जाता
अअअ

जबसे हुई सियानी बिटिया
भूली राजा-रानी बिटिया

बा८ाारों से आते-जाते
होती पानी-पानी बिटिया

जाना तुझे पराए द्घर को
मत कर यूँ मनमानी बिटिया

किस द्घर को अपना द्घर समझे
जीवन-भर कब जानी बिटिया

चॉकलेट भैया को भाए
पाती है गुड़धानी बिटिया

सारा जीवन इच्छाओं की
देती है कुर्बानी बिटिया

चौका, चूल्हा, झाडू, बर्तन
भूल गई शैतानी बिटिया

हल्दी, बिछुए, कंगन, मेंहदी
पाकर हुई बिरानी बिटिया

 
 
 
ऊपर जाये...
पिछे जाये...
 
 
  Copyright 2009 | All right reserved Powered by : Innovative Web Ideas
(A division of Innovative Infonet Private Limited)