उदय प्रकाश निराले अंदा८ा के रचनाकार हैं। कहानियों में अपने निरालेपन की बदौलत उन्होंने एक विशिष्ट जगह और पहचान बना रखी है। कविताओं में उन्होंने कोई नई जमीन तोड़ी है या नहीं, यह तय होना अभी बाक़ी है लेकिन इतना तय है कि उदय प्रकाश की कविताएँ दूर से पहचान में आती हैं। इधर की कविताओं पर अक्सर आरोप लगता रहा है कि कवि का नाम हटा दीजिए तो सारी कविताएँ एक ही पफर्मे से निकली हुई लगती हैं। उदय प्रकाश की कविताएँ इस आरोप को झूठा साबित करती हैं और अपनी तमाम विलक्षणताओं के साथ उनके नए कविता-संकलन 'एक भाषा हुआ करती है' की शक्ल में पाठकों के सामने हैं।
संग्रह में कुल अड़तीस कविताएँ हैं। इन्हें तीन खंडों में रखा गया है। पहला खंड है-'यह जो किसी क़दर बचा-खुचा जीवन है, धन्यवाद'। दूसरा खंड-'जलते हुए दृश्य में अपने पंख बचाते हुए।' तीसरे खंड में चार कविताएँ हैं, जिन्हें 'भाषा- श्रृंखला की कविताएँ' कहा गया है और नाम दिया गया है 'एक भाषा हुआ करती है'। यूँ शीर्षक या नाम-वाम कई बार 'कॉस्मेटिक' भूमिका-भर निभा रहे होते हैं गिफ्रट-पैक के चमकदार रैपर की तरह बरगलाते हुए, लेकिन यहाँ ऐसा नहीं है। संग्रह की केंद्रीय चिंताएँ इन शीर्षकों में बखूबी ध्वनित हो रही हैं।
सबसे बड़ी चिंता तो खुद कविता को ही लेकर है, कविता की उपयोगिता को लेकर कि 'कविता का एक वाक्य लिखने में दो मिनट लगते हैं/इतनी देर में चालीस ह८ाार बच्चे मर चुके होते हैं/८यादातर तीसरी दुनिया के भूख और रोग से/' ऐसे में कवि के पास 'अब हर बार हारा हुआ यह माथा है अकेला/अपनी आत्मा से लाचारी के साथ क्षमा मांगता हुआ' और यह तीखा अहसास भी कि 'अपनी ही भाषा और अपने ही लोकतंत्रा के भीतर/हम अबुग़रेब के कैदी' हैं। पूँजीवादी व्यवस्था में शोषित वर्ग को जिस 'एलिएनेशन' या 'अजनबियत' का शिकार होते मार्क्स ने देखा था, कमोबेश वैसी ही मनोदशा से आज का कवि भी गुजर रहा है। जो कुछ वह कर रहा है, उसके पीछे कोई आस्था, उत्साह या प्रेरणा नहीं।
उसे मतलब नहीं कि वह मंदिर की ईंटें जोड़ रहा है या कब्रगाह की, मकसद सिपर्फ दिहाड़ी पूरी करना है। इस तरह सेल्पफ-एलिएनेशन से पीड़ित कवि निराश और निरीह न८ारों से अपने भोंथड़े पड़ते औजारों को देखता है और अपने कविकर्म को लताड़ता है-'एक भाषा हुआ करती है/जिसमें जितनी बार मैं लिखना चाहता हूँ 'आँसू' से मिलता-जुलता कोई शब्द/हर बार बहने लगती है रक्त की धार' पता चलता है कि भाषा के लिए 'हुआ करती है' वाला 'कैजुअल अप्रोच' यहाँ यूँ ही नहीं है। 'हो इसी कर्म पर वज्रपात' वाली मनः स्थिति अकारण पैदा नहीं होती, मर्मांतक पीड़ा झेलता हुआ संवेदनशील मन ही इस कदर झुंझलाता है। इस संग्रह की कविताओं में यह झुंझलाहट 'बैकग्राउंड म्यू८िाक' की तरह लगातार सुनाई पड़ती है, कथ्य में भी और स्थापत्य में भी, व्यंग्य में भी और करूण प्रतिकार में भी। संभवतः उदय प्रकाश का जो अपना एक बिंदास अंदाज है उसकी पृष्ठभूमि में भी यह 'झुंझलाहट' ही है।
म८ो की बात यह है कि देखने में ये कविताएँ लापरवाह, बल्कि स्थित-प्रज्ञ सी लगती हैं, जैसे कह रही हों-दुनिया तो भांड़ में जा ही चुकी है, अब मुझे इससे बहुत लेना-देना नहीं है, बात निकली है तो कहे दे रही हूँ। हकीकत ठीक इसके उलट है। उदय प्रकाश न तो अपनी नैतिक जिम्मेदारी से मुँह मोड़ते हैं और न ही अपने समय की तल्ख सच्चाइयों से आँखें चुराते हैं। उनकी कविताएँ समय-सजग कविताएँ हैं, कुछ ज्यादा ही चौकन्नी और बाख़बर। उदाहरण के लिए एक कविता है-'चंकी पांडे मुकर गया है।' ख़बर के भीतर ख़बर, द्घटना के भीतर द्घटना, पूरी कविता में व्यवस्था का 'विसिअस सर्किल' अद्भुत तरीके से उद्द्घाटित हो उठता है और अंत में-'हमारे पास सिपर्फ अपनी आत्मा की आँच है और थोड़ा-सा नागरिक अंधकार/कुछ शब्द हैं जो अभी तक जीवन का विश्वास दिलाते हैं...हम इन्हीं शब्दों से पिफर शुरू करेंगे अपनी नई यात्राा...'
यदि 'आत्मा की आँच' और कुछ जीवित शब्द, 'किसी क़दर' ही सही, बचे खुचे हैं, तो जीवन और कविता की यात्राा में अभी पर्याप्त रोमांच की गुंजाइश है। इसलिए तो इस 'बचे खुचे' का धन्यवाद।
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