नवंबर २००९
 
 
 
   
 
 
 
• काशीनाथ सिंह का साहित्य अकादमी • अदम गोंडवी और भारत भूषण का निधन • जयपुर में लिटरेचर पफेस्टिवल में सलमान रुशदी •हिन्दी के कवि कुबेर दत्त और नुक्कड़ नाटक के पितामाह गुरुशरण सिंह का निधनर सम्मान।
 
 
 
बीज
अब न बसौं एहि गाँव : धीरज सार्थक

गाँव के दखिन में चमर टोली है। इसमें लगभग चालीस द्घर हैं। पर दूसरी बिरादरी के लोग चमरटोली को अपने गाँव का हिस्सा नहीं लगाते। उनका कहना है कि गंदा चीज के अपनावे से दिक्कत बढ़ जा हइ। चमरटोली के आधे से ज्यादा लोग अब यहाँ नहीं रहते। चमरटोली के कुछ लड़कों की एक बैंड बाजा पार्टी है। प्रदीप बैंड। आस-पड़ोस के गाँवों की शादी में अक्सर प्रदीप बैंड बाजा का ही साटा होता था। अनचीन्ह से पैसे तो ये लोग खूब बनाते थे पर अपने गाँव की बात हो तो सिपर्फ दो पसेरी चावल या गेहूँ पर भी बात बन जाया करती थी।

आगे... इ कुइंया से पानी लेवे के तोहर हिम्मत कैसे होलउ? भाग हिंया से। ठकुराइन की आवाज सुनकर कड़री अपना तसला लेकर भागी। हड़बड़-तड़बड़ में कुएँ पर रखे डोल से वो टकरा भी गई। उसे चोट भी आई पर ठकुराइन के खौपफ के सामने ये सब छोटा था। उसको भागते देख ठकुराइन ने कहा-आज से तोरा इ कुइंया पर देखलिअउ त समझ के रखिहं। ठकुराइन की कर्कश आवाज सुनकर उसका बेटा वसंत ठाकुर दालान से भागता कुएँ की तरपफ आया।
माई का होलइ? के हलइ?
बेटा, उ चमर टोली से एगो लड़की पानी भरे आइल हलइ। का जानी सबके हमरे कुइंमा पर केतना मीठा पानी मिल हइ। बड़ जात तो बड़ जात... डोम चमार सब हिएँ आके पानी पियहइ।
चिंता न कर माई। अब कुछे दिन के बाद हइ। छोटी के शादी के पहले पूरा के पूरा कुइंया के गेंड देबइ। पिफर देखल जइतइ। केकर हिम्मत होब हइ इ कुइंया से पानी लेबे के।
ठकुराइन का पूरे अकबरपुर गाँव में खौपफ है। वजह है उनकी जुबान। सबको पता है कि ठकुराइन किसी की भी बखिया उधेड़ सकती है। हालांकि अब जमीन जायदाद इतनी नहीं बची जिसकी वजह से उन्हें ठकुराइन कहा जाए। पर अकड़ अब भी वही जमीनदारों वाली ही है। दरअसल, खौपफ ठाकुर साहब की वजह से बना है। ठाकुर साहब के डर से गाँव वाले थर्र काँपते हैं। ठाकुर साहब बात-बात पर बंदूक निकाल लेते हैं। जो भी हो ठाकुर साहब गाँव के बूढ़े बुजुर्गों की इज्जत करते हैं पर ठकुराइन के मन में किसी के लिए कोई इज्जत नहीं है। ठाकुर साहब का बेटा वसंत अपने पिता और माता की आदतों से परेशान रहता पर वो डरता है कि कहीं कुछ ऊँच नीच हुआ तो उसके माँ-बाप उसे जमीन जायदाद से बेदखल कर देंगे। इसलिए न चाहते हुए भी वो खुद को शांत रखता था।
अकबरपुर में लगभग सवा सौ द्घर हैं। जिनमें सबसे ज्यादा संख्या भूमिहारों की है। भूमिहार मानते थे कि ये गाँव उनका है। और यहाँ सबकुछ वैसा ही होगा जैसा उनकी बिरादरी चाहेगी। गाँव में पंडित, राजपूत और कुर्मी भी हैं।
गाँव के दखिन में चमर टोली है। इसमें लगभग चालीस द्घर हैं। पर दूसरी बिरादरी के लोग चमरटोली को अपने गाँव का हिस्सा नहीं लगाते। उनका कहना है कि गंदा चीज के अपनावे से दिक्कत बढ़ जा हइ। चमरटोली के आधे से ज्यादा लोग अब यहाँ नहीं रहते। चमरटोली के कुछ लड़कों की एक बैंड बाजा पार्टी है। प्रदीप बैंड। आस-पड़ोस के गाँवों की शादी में अक्सर प्रदीप बैंड बाजा का ही साटा होता था। अनचीन्ह से पैसे तो ये लोग खूब बनाते थे पर अपने गाँव की बात हो तो सिपर्फ दो पसेरी चावल या गेहूँ पर भी बात बन जाया करती थी। लेकिन इन्हीं बैंड पार्टी के लड़कों की वजह से पुलिस प्रायः गाँव में आती रहती है। गाँव वालों का ऐसा मानना है कि बाजा बजाने वाले ये लड़के नक्सली हैं। गाँव वालों का ये भी कहना है कि चमरटोली में अक्सर नक्सलियों की बैठक होती है और इस बैठक में कई ऐसे लोग आते हैं जिन पर कई नरसंहार करने का आरोप है। सबके सोने के बाद बैठक शुरू होती है और पौं पफटने से पहले लोग गायब हो जाते।
रामखेलावन इसी चमरटोली में पैदा हुआ। आज कलेक्टर है। ओहदे की वजह से उसको बड़े-बड़े अपफसर सलाम बजाते हैं। गाँव के लिए जितना जब बन पड़ता जरूर करता। एक बार पूरा गाँव बड़ी मुसीबत में पफंस गया था। सिंचाई के लिए पोखर से पानी निकालने पर पड़ोसी गाँव दबौल से जबरदस्त झगड़ा हो गया। इस झगड़े में ठाकुर साहब ने अपनी आदत के अनुसार बंदूक निकाल ली। गोली भी चला दी और दबौल के एक ग्वाले की मौत हो गई। थाना पुलिस कचहरी की नौबत आई। ठाकुर साहब समेत गाँव के कई लोगों का जेल जाना तय था। किसी को जब कोई रास्ता समझ नहीं आया तो लोग रामखेलवान के पास पहुँचे। रामखेलावन ने बड़ी दौड़ धूप की। जज से कह-कहाकर मामले को रपफा दपफा कराया। उसके बाद से गाँव में रामखेलावन की इज्जत बढ़ गई। गाहे बगाहे जब भी रामखेलावन की चर्चा निकलती, सब एक ही बात कहते...ऊ तो देवता आदमी है। पता न कइसे नीच जात में जनम ले लेलकइ हे। ओकर तो सब लछन हमनी जइसन है।
रामखेलावन की लगातार बढ़ती इज्जत से ठाकुर साहब चिढ़ने लगे। इसका अंदाजा गाँव के कई लोगों को होने लगा। सकलपदारथ, गिरेस, रौना सिंह जैसे लोग इसी ताक में थे। उन्होंने सोचा ठकुराइन की बदसलूकियों का बदला लेने का इससे अच्छा मौका दुबारा नहीं मिलेगा। इसलिए अपने स्वार्थ के हिसाब से ये लोग ठाकुर साहब से जुड़ गए। रामखेलावन को गाली देते रहे और ठाकुर के विश्वासपात्रा बनते गए। एक दिन सकलपदारथ ने ठाकुर का कान भरा...
भइया, इ रामखेलावन चमरवा सब पर जादू कर देलकइ हे। एकर तो उपाय खोजे पड़तई। हमनी से बढ़कर चमार हो जयतइ। अपने के रहते हमनी चमार के सामने हाथ पसारवइ। लानत हइ गाँव के भूमिहारन पर। सपफलपदारथ की बात ने ठाकुर के गुस्से में द्घी का काम किया। गिरेस ने देखा लोहा गरम है। हथौड़ा मार दिया जाए। उसने ठाकुर से कहा-कक्का, रामखेलावन और ओकर चमचन के दिमाग से मारे परतई। कोइ के पता भी न चले और काम भी हो जाय। साँप भी मर जाए अउ लाठी भी न टूटे।
इन लोगों ने कानापफूसी कर ठाकुर साहब से प्लान बनवाया। प्लान के मुताबिक अगले दिन गाँव के बुजुर्गों को ठाकुर साहब ने अपने पास बुलवाया। ठाकुर ने सबके सामने देवी स्थान के पास एक भव्य मंदिर बनाने का प्रस्ताव रखा। गाँव के लोग अक्सर धर्मभीरू होते हैं। धरम के काम में ये लोग कभी पीछे नहीं हटते। सबने एक स्वर में हामी भर दी। पर ठाकुर साहब ने एक शर्त रखी...इ मंदिर के बनवावे में गाँव के हर आदमी के पैसा लगे के चाही और सब के साथ देवे परतइ। लेकिन सर्त एही है कि चमरटोली के ए गो पइसा इमें न लगे के चाही। अगर एइसन होलो तो समझ... हमनी पर पुन के बदले पाप चढ़ जयतो। सब ने एक साथ कहा... ठीक कह हू ठाकुर साहब। मंदिर बनवाना तो पुन के काम है इमें छोट जात के पइसा न लगे के चाही। ठाकुर ने गिरेस की तरपफ देख कर धीरे से कहा... हमनी पहला दाँव तो जीत ले ली गिरेस। गिरेस ने बनावटी हँसी बिखेरकर इस बात का समर्थन किया।
ठाकुर साहब के दालान पर हुई बैठक की चर्चा पूरे गाँव में आग की तरह पफैल गई। धुंआ चमरटोली में भी पहुँचा। प्रदीप बैंड के लड़कों ने भी इसकी सराहना की। उन लोगों ने तय किया... पइसा के बदले जेतना देहन मदद होतइ करवइ। अपनी मंशा जाहिर करने के लिए चमरटोली के लड़के ठाकुर साहब के दालान पर पहुँचे। अपनी हैसियत का खयाल रखते हुए इन लोगों ने ठाकुर साहब के सामने अपने मन की बात रखी। लेकिन ठाकुर साहब भड़क उठे। उन्होंने कहा... इ मंदिर चमार और दुसाध लागी न हइ। हिंया खाली हमनी पूजा करे जयवइ। इसलिए एकरा बनावे में भी खाली हमनिए के बाल बच्चन हाथ बटयतइ। धमकी भरे स्वर में ठाकुर साहब ने कहा... कान खोल के सुन ले, अगर कोई छोट जात मंदिर के आस पास भी नजर अइलं तो पिफर ओकर खैर न रहतउ। प्रदीप बैंड के मास्टर प्रदीप्पा ने ठाकुर साहब को बीच में टोका... मालिक इ तो ठीक बात न हइ। भगवान के द्घर में तो सब बराबर हइ मालिक। का ठाकुर का चमार। इस बात पर ठाकुर साहब का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुँच गया... साले, जनम ले ल हें छोट जात में और सपना देख हथ ठाकुर के मंदिर में पूजा करे के। भागल हिंया से रे साला... हमरा से मुँह लड़ाव हं रे... मा... चो...। इतना बोलते बोलते ठाकुर ने हाथ उठाया और प्रदीप्पा को धक्का दीया। प्रदीप्पा दूर जाकर गिरा। प्रदीप्पा के साथ आए लड़के एकदम से ठाकुर साहब की तरपफ लपके। लेकिन ठाकुर ने खुद को बचा लिया। जल्दी से उठकर प्रदीप्पा ने लड़कों को संभाला और चमरटोली चलने के लिए डाँटने लगा।
बात कापफी बढ़ गई। इसी के मद्देनजर ठाकुर साहब ने गाँव के हर द्घर के मालिक को अपने दालान पर बुलाया। उन्होंने प्रदीप्पा से हुई झड़प का वाकया सबके सामने रखा। ठाकुर साहब ने लोगों से कहा-आज हमरा साथे, कल तोहरा साथे, परसों ओकरा साथे इ द्घटना द्घट सक हइ। इसलिए सबके चेतना जरूरी हइ। ठाकुर ने मंदिर बनाने की बात को और मजबूती से सबके सामने रखा। न चाहते हुए भी गाँव के लोग ठाकुर की बात से सहमत हुए।
मंदिर बनाने का काम अगले दिन ही शुरू हो गया। चूंकि मंदिर बनना अब ठाकुर की इज्जत पर बन आई थी इसलिए इसका पूरा होना एक चुनौती बन गई। तय हुआ कि मंदिर बनाने के लिए पानी ठाकुर साहब के कुएँ का इस्तेमाल होगा। हालांकि ठाकुर साहब के द्घर से मंदिर दूर नहीं था। पर मजदूर कुएँ से पानी निकालते और कंधे पर लादकर ले जाते। दिन भर पाँच मजदूर इसी काम में लगे रहते। हैरानी की बात ये है कि जिन कारीगरों और मजदूरों के हुनर से मंदिर बन रहा था उनकी जाति का किसी को अंदाजा तक नहीं था। मंदिर स्थल पर गाँव के हर शख्स की हाजिरी जरूर लगती। सुबह से लेकर शाम तक बच्चे से लेकर बड़े तक वहाँ जरूर नजर आते। ठीक इसी समय प्रदीप्पा की औरत रमपिरितिया मंदिर की तरपफ आते हुए दिखी। रमपिरितिया को देख शुरू में कई लोगों को लगा कि वो कहीं और जा रही है। लेकिन जब उसके तेज कदम मंदिर की तरपफ बढ़े तो लोग आश्वस्त हो गए कि वो मंदिर ही आ रही है। ठीक इसी समय ठाकुर साहब ने अपनी छत से रमपिरिितया को देख लिया। उन्होंने वहीं से जोरदार आवाज में भद्दी सी गाली दी...
अगे एकरी मईया के... मादर...तोरा आज न छोड़वउ। उ दिन प्रदीप्पा बच गेलउ हल हमरा से। आज तू न बचे सक हें।
इतना बोलते हुए ठाकुर साहब छत से नीचे उतरकर कमरे में गए और बंदूक लेकर मंदिर की तरपफ भागे। रास्ते में ही उन्होंने एक आसमानी पफायर किया। ठाकुर का ये रूप नया नहीं था लेकिन ऐसे मौके पर इस कदर ठाकुर के भड़कने से लोग सहम गए। ठाकुर के इस रूप को देखकर रमपिरितिया समझ नहीं पाई कि उससे गलती क्या हुई। इसलिए वो मंदिर की तरपफ बढ़ती गई। हट्टे-कट्टे ठाकुर साहब दौड़े और मंदिर पहुँचने से पहले प्रदीप्पा की औरत को पकड़ लिया। बाल पकड़कर ८ाोर से उठाया और ८ामीन पर पटक दिया। रमपिरितिया दुहाई सरकार करने लगी। जैसे ही उसने अपनी गलती के बारे में पूछा कि ठाकुर साहब ने ८ाोरदार थप्पड़ उसके मुँह पर दे मारा। रामपिरितिया ८ाोर-८ाोर से रोने लगी। तमाशबीनों की संख्या पचास तो होगी ही, पर किसी ने हिम्मत नहीं जुटाई रोकने की। ठाकुर साहब ने अपने बेटे को बुलाया...
वसंत एकर सब कपड़ा उतार के एकरा लंगटे कर।
एक मिनट के लिए वसंत ठिठका। पर इतनी ही देर में ठाकुर ने पिफर से आवाज लगाई। वसंत सकपका कर सामने आया और साड़ी खींचने लगा। रमपिरितिया ने वसंत के पैर पकड़ लिए। मापफी मांगने लगी। लेकिन मापफी मिलने की कोई गुंजाइश नहीं थी। वसंत को हिचकिचाते देख ठाकुर साहब खुद उसके कपड़े पफाड़ने में लग गए।
आखिरकार हिम्मत जुटाकर भीड़ से निकलकर वैद्य जी बाहर आए। उन्होंने ठाकुर साहब से कहा... छोड़ देहू ठाकुर साहब। इ हमरा बुलावे हिंया आ रहलइ हल। एकर बेटा बीमार है। हमही एकरा कहली हल की अगर तबीयत जादे खराब हो जयतउ त हमरा बुला लिहं। हम देवी स्थान जा हियउ। बोलने के साथ-साथ वैद्य जी बचाने की भी कोशिश करते रहे। वैद्य जी को देख और लोग भी आगे आए। उन्होंने ठाकुर को रोकने की कोशिश की। तब जाकर ठाकुर शांत हुए। लेकिन ठाकुर ने ये भी धमकी दी... अगर अब चमरटोली के कोई भी आदमी इधर देखाइ देलकउ तो देख लिहं।
इधर रमपिरितिया गिरते-बजड़ते चमरटोली पहुँची। चमरटोली में एकदम हाहाकार मच गया। ऐसे मौके पर प्रदीप्पा ने संयम से काम लिया। उसने सबको शांत कराया। किसी ने थाने में जाने की सलाह दी। पर प्रदीप्पा ने सापफ इनकार कर दिया। कहने लगा... अइसन बात के पफइसला पुलिस काहे करतइ। एकर पफइसला तो हमनी खुद करवइ। आपस में मंत्राणा के बाद इस बात की जानकारी रामखेलावन को दी गई। रामखेलावन ने प्रदीप्पा को ढाढस दिलाया कि सब ठीक हो जाएगा। उसने ये भी कहा कि अगले रविवार को वो अकबरपुर जरूर आएगा। लेकिन शांत स्वभाव वाले रामखेलावन के आश्वासन से चमरटोली के लोगों को सुकून नहीं मिला। बैंड बाजा बजाने वाले लड़कों में खास तौर से असंतोष था। शाम ढलने के बाद इन लड़कों की एक बैठक हुई। प्रदीप्पा ने अपने मन की बात उनके सामने रखी... जब तक इ साला ठकुरवा से बदला न ले लेबउ न तब तक हमरा अब चैन न मिलतउ। सब के सामने ओकरो इजत उतारना बहोत जरूरी हो गेलउ हे। लड़कों ने भी कहा... भइया तू चिंता मत कर, हमनी इंतजाम कर देवइ। जौन दिन मौका मिल जयतइ उ दिन देखा देवइ गाँव वालन के। बस मौका मिले देहु।
मंदिर बनाने का काम जारी था। लेकिन गाँव का उत्साह एकदम ठंडा पड़ गया था। इक्का-दुक्का लोग मंदिर के पास नजर आते। दरअसल, गाँव में बात आग की तरह पफैली कि प्रदीप्पा और उसके लड़के ठाकुर साहब से बदला लेने की तैयारी कर रहे हैं। लोग अटकलें लगाने लगे कि प्रदीप्पा ने बाहर से नक्सलाइट को बुलाया है। ये किसी भी दिन गाँव पर हमला कर सकते हैं। बस यह खौपफ गाँव में तनाव बढ़ाने के लिए कापफी था। एक अजीब सा सन्नाटा गाँव में पसर गया। शाम होते ही लोग हमले की आशंका के साथ अपने-अपने द्घरों में द्घुस जाते।
ठाकुर साहब भी और लोगों की तरह जल्दी ही द्घर का पफाटक बंद कर लेते। उनके इस रवैये को देख ठकुराइन चिंता में पड़ गईं। उन्होंने ठाकुर साहब से पूछा... एतना चिंता काहे कर हथिन? कोइ के हिम्मत हइ कि हमनी के छू देइ। इस पर ठाकुर ने कोई जवाब नहीं दिया। ठकुराइन ने पिफर कहा... अगर कोइ बात हइ त कुछ दिन लागी रामअवध भइया के हिंया बोला लेथ। गोलियो चलावे के जरूरत पड़तइ त भइया सबसे आगे रहतइ। न काहे लागी रामअवध भइया के इ लड़ाइ में द्घसीटियइ। कुछ हो हवा गेलअइ त और झमेला। वसंतवा हइ न। इस पर तपाक से ठकुराइन ने कहा... न वसंतवा बोकड़ हो। जरूरत पर ओकरा से हाथ कांपे लगतो... बंदूक न उठतो।
अगले दिन सुबह-सुबह रामखेलावन गाँव पहुँचा। रामखेलावन सबसे पहले ठाकुर साहब के पास पहुँचा। अब तक पूरे गाँव में इस बात का हल्ला उड़ गया था कि रामखेलावन आ गेलथीन हे। बस क्या था पूरा गाँव ठाकुर साहब के दालान पर। क्या बड़े क्या बच्चे। सब के सब। रामखेलावन ने ठाकुर साहब से पूरा मामला जानना चाहा। ठाकुर ने समझदारी से काम लिया सारी बातें बताई। ठाकुर की बातों पर रामखेलावन ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। पिफर उस ने प्रदीप्पा के लिए बुलहटा भेजा। चमरटोली में रहने के बावजूद प्रदीप्पा ने आने से इनकार कर दिया। रामखेलावन को एकदम से समझ में आ गया कि गाँव का माहौल ठीक नहीं है। किसी भी वक्त खून खराबा हो सकता है। रामखेलावन ने मामले को शांत करने की कोशिश की। ठाकुर साहब से कहा... प्रदीप्पा के तरपफ से अगर कोइ गलती हइ तो मापफ कर दियहु। हम ओकरा तरपफ से मापफी मांग हिओ। इतना कहकर रामखेलावन वहाँ से उठा और चमरटोली चल पड़ा।
रामखेलावन के चमरटोली पहुँचते ही रमपिरितिया उसके पैरों पर गिरकर रोने लगी। इंसापफ की गुहार लगाने लगी। पिफर सामने आया प्रदीप्पा। कापफी गुस्से में था। उसने रामखेलावन से पूछा... इ बताब तू हमनी के तरपफ से ह या उ ठकुरवा के साइड से। अगर तू हमनी के तरपफ से न ह त पिफर हमरा तरपफ से काहे ला मापफी मांग अयलहु। हमनी के का गलती है? बताव? हमनी गलती करती हल त दू थप्पड़ मार लेत हल। लेकिन गलती भी भूमिहरवन करे और मापफी भी हमनिए मांगियइ? इ कहाँ के इंसापफ हइ? प्रदीप्पा के किसी सवाल का रामखेलावन के पास कोई जवाब नहीं था। रामखेलावन ने कहा... अरे भाई, लड़ाई करके कोई बात के हल निकल सकहइ का। ठीक हउ। अगर तोरा एही लग हउ त कर ले मारपीट। गोली बंदूक उधर भी हउ और तोहनियो दने हउ। रामखेलावन जानता था कि उसकी बातों का किसी पर कोई असर होने वाला नहीं है। पिफर भी बोलता रहा। अंत में उसने कहा... एक बात सुन ले तोहनी भाई। लड़ाई-झगड़ा करके तोहनी हमरा भीर न अइहं। जे करे के हउ कर। जब हमर बात के कोइ मतलब ही न हइ त पिफर काहे ला हमरा बोलावहं। गुस्से में रामखेलावन शहर लौट गया।
वैसाख का महीना आया। गाँवों में बैसक्खा का दौर चलने लगा। ;गाँवों के लिए बैसक्खा का मतलब ताड़ी पीने का महीना। चमरटोली के लोगों के लिए सबसे अच्छा समय। लेकिन भूमिहारों के लड़के इसमें शामिल नहीं होते। वो तो ताड़ी से ऊपर उठ चुके हैं।द्ध खेतों के बीचों बीच उगे ताड़ के पेड़ों से लड़के ताड़ी उतारते। खुद भी पीते और अपने दोस्तों को भी पिलाते। जब सामने कोई भूमिहार दिख जाता तो ताड़ी के नशे का बहाना कर जोर जोर से ये गाने लगते
ताड़ी पियो तरन भये
खुस भयो जगदीश
जेकर द्घर में ताड़ी न पिए
ओकर बंस निरबंस
भूमिहारों का मन कचोटता। कई बार झगड़े की नौबत तक आ जाती। लेकिन किसी तरह से मामला शांत किया जाता। ताड़ी पीने वाले लड़कों ने इसका पफायदा उठाना शुरू कर दिया। गाहे बगाहे उन्होंने ताना भी कसना शुरू कर दिया। एक दिन छोटी ;ठाकुर साहब की बेटीद्ध अपनी दोस्त के साथ खलिहान से लौट रही थी। तभी चमरटोली के लौंडों ने ताड़ी का नशा दिखाना शुरू किया। प्रदीप्पा ने सबको इशारे से समझा दिया। छोटी जैसे ही उनके पास से गुजरने लगी कि एक लड़के ने उस पर भद्दा सा ताना मारा... रानी तनी हमनियो के देखअ। हमनी छोट जात के हियइ ओकरा से का... हिजड़वन से जादे मजा देवइ। इतना सुनकर छोटी एक पल के लिए रुकी और जवाब देने का मन बनाया। पिफर उसकी दोस्त ने इशारा किया आगे बढ़ते रहने का। जैसे ही छोटी आगे बढ़ी कि एक लड़का एकदम सामने आ गया। उसने छोटी को दोनों हाथों से पकड़ लिया। तभी दूसरा पीछे से आया। उसने उसकी कमर पर हाथ रखा... वाह, केतना पतला कमर हइ। छोटी ने जोर से हाथ मारा...छोड़ छोड़ हमरा कुता। लेकिन तभी सामने वाले ने उसके गाल पकड़ लिए। छोटी चिल्लाने लगी... बाबू जी, भइया... बचाव हमरा, बचा ल बाबू जी। सामने बैठा प्रदीप्पा हँसने लगा। कहा... हमरो औरतिया ऐसही रोव हलइ। तोर बप्पा-भइवा के दया न अयलइ हल। ले जयसन के तइसन। छोटी ने सामने वाले को जोर से मारा। इतने पर एक तीसरा आया और उसने छोटी की कमीज में हाथ डाला और जोर लगाकर पफाड़ डाला। छोटी की दोस्त से रहा नहीं गया। उसने सामने रखी ईंट उठाकर उसके सिर पर दे मारा। जैसे ही पकड़ ढीली हुई कि छोटी ने लात से धक्का दिया और भागने लगी। उसकी दोस्त भी भागने लगी। दोनों ने द्घर आकर ही साँस ली। सीधा ठाकुर साहब के पास गईं और उनसे गले लगकर रोने लगी। छोटी का ये हाल देखकर ठाकुर साहब समझ गए... कुछ गड़बड़ हो गया है। छोटी ने रोते-रोते ठाकुर साहब से सारी बातें कह डाली। अपनी बेटी का ये हाल देखकर ठाकुर साहब के सिर पर मौत सवार हो गई। बंदूक उठाकर खलिहान की तरपफ भागे। ठाकुर साहब को भागते देख गाँव के और लोग भी साथ हो लिए। कुछ तो तमाशबीन के नाते दौड़ने लगे और कुछ ठाकुर के शुभचिंतक बनकर। चूंकि मामला बेटी से बदतमीजी का था इसलिए गाँव को न चाहते हुए भी साथ देना था। धीरे-धीरे ठाकुर साहब के साथ दौड़ने वालों की संख्या बढ़ती गई।
प्रदीप्पा और उसके साथियों ने जैसे ही भीड़ को अपनी तरपफ आते देखा वो भागने लगे। लेकिन भीड़ से बचकर कहाँ तक भागते। पकड़ लिए गए। लोग पागल की तरह उन पर टूट पड़े। ईंट से, पत्थर से, जिसको जो मिला उसी से मारा। उसके बाद उन्हें पेड़ से उल्टा लटका कर उनके पैर टहनी से बाँध दिए और हाथों को आपस में बाँध दिया। उसके बाद लोगों ने उनके मुँह पर पेशाब किया। बीच-बीच में जब जिसका मन करता लाठी से पीटने लगते। पाँचों को रातभर पेड़ से लटकाए रखने का प्लान बनाया गया और तय किया गया कि पौं पफटते ही इनको गोली मारकर नदी में पफेंक दिया जाएगा। इसके लिए लोग बाकायदा हथियारों के साथ वहाँ पहरा देने लगे।
चमरटोली का परिंदा भी इधर पर मारने नहीं आया। देर रात अचानक एक गाड़ी की आवाज आई। पहरा दे रहे लोगों को लगा रामखेलावन आ गए। लेकिन जब गाड़ी और पास आई तो लोगों के होश उड़ गए। एक ने पफुसपफुसाकर कहा... अरे भाग, इ पुलिस गाड़ी हउ। वहाँ मौजूद सभी लोग भागने लगे। सिपाही गाड़ी से कूद गए और इनके पीछे हो लिए। लेकिन गाँव का अंधेरा और सिपाहियों को रास्ते की जानकारी न होने की वजह से कोई हाथ नहीं आया। कुछ लोग भागकर ठाकुर साहब के पास पहुँचे। उन्होंने बताया कि द्घर पर रहना खतरे से खाली नहीं है। लेकिन ठाकुर ने भागने से इनकार कर दिया। पुलिस थोड़ी ही देर में ठाकुर के पास पहुँची। पहले तो ठाकुर से कापफी बकझक हुई। पर बाद में पुलिस ने ठाकुर समेत पाँच और लोगों को गिरफ्रतार कर लिया। पुलिस ने ठाकुर को आश्वासन दिया कि आप पैसा पफेंकेंगे तो एक्के द्घंटा में द्घरे आ जाएँगे। चिंता मत न कीजिए। हम हैं न। ठाकुर ने ठकुराइन से पैसे का इंतजाम करने को कहा और पिफर पूरी जमात पुलिस जीप में बैठ गई।
जब ठाकुर वगैरह थाने पहुँचे तो पता चला कि प्रदीप्पा सहित तीन की मौत हो गई है। मामला और गंभीर हो गया। ठाकुर को उम्मीद थी कि थानेदार कुछ पैसे लेकर केस रपफादपफा कर देगा। लेकिन मामले की गंभीरता को देखते हुए थानेदार ने बीस लाख रुपए की मांग की। सब सन्न रह गए।
ठाकुर ने कहा... बीस लाख रुपइया। का बात करते हैं थानेदार साहब। एतना पैइसा कांहे से लाबेंगे हमलोग। सब खेत बेच भी देंगे तब भी एतना पैसा नहीं जुटेगा। थानेदार ने नहले पर दहला पफेंका... केस एतना उलझा दिए हैं आप लोग कि ऊपर से नीचे तक सबको देना पड़ेगा। अगर नहीं देंगे तब जान लीजिए कि पफांसी से नीचे नहीं रुकेगा मामला।
ठीक इसी समय एसपी का पफोन आया। जब बात पूरी हो गई तो थानेदार ने ठाकुर से पूछा... डीएम साहब रामखेलावन जी आपके गाँव के हैं? ठाकुर ने उम्मीद भरी निगाहों से हामी भरी-हाँ-हाँ... हाँ। थानेदार ने तपाक से कहा... एसपी साहब से उन्होंने कहा है कि सारे आरोपियों को सजा मिलनी चाहिए। उन्होंने एसपी साहब से ये भी कहा कि अगर बचना चाहते हैं तो तीस लाख रुपया से कम नहीं लगेगा। थानेदार के मुँह से ये सुनकर ठाकुर साहब बोलने लगे...साला, हम कह हली त इस सब रामखेलावन-रामखेलावन रट्ट हलइ। ले सुन उ चाहे जेतना बड़ा आदमी बन जयतइ तो चमरटोलिए के न।
साल भर बाद। ठाकुर साहब की जमीन जायदाद का बड़ा हिस्सा द्घूस देने में चला गया। जो जमीनें उन्होंने बेची वो रामखेलावन ने खरीद लीं। गाँव में अब पहले से ज्यादा तनाव बढ़ गया है। लेकिन मुश्किल की द्घड़ी में कोई किसी का साथ देने के लिए दरवाजा नहीं खोलता। यहाँ तक की शादी विवाह में भी गाँव में कोई उत्साह नहीं दिखता।
भूमिहारों का ग्यारहवाँ परिवार रामसुआरथ शर्मा आज गाँव छोड़कर हमेशा के लिए बिहारशरीपफ जा रहा है। लोगों ने उन्हें रोकने की खूब कोशिश की। एक ने कहा... का भइया इ चमरन से डर गेलअ? सब का कहतो कि देख डर के गाँव छोड़ रहले हे। इस पर रामसुआरथ शर्मा ने कहा... इ न समझअ की हमनी चमार और भूमिहार, छुआछूत, गरीबी के कारण अपन जनम अस्थान छोड़ रहली हे। बल्कि इ गाँव के सबसे बड़ी महमारी है पोलटिकस। पोलटिकस गाँव के खोखला करिथइ। अपन पफयदा के राजनीति। एही वजह है बाबू कि अब गाँव में कोइ न रहल चाह हइ। चाहे ठाकुर साहब हथ या रामखेलावन सब मौका के यार हथ। जेकर जे दाँव लग गेल उ राजा। अब गाँववालन के बीच अपनापन न रह गेलो हे। इतना कहकर रामसुआरथ शर्मा आगे बढ़ गए... नई तरह की मुसीबतों से लड़ने।

 
 
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