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| सामने आया नया लेखक |
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संजीव पर केंद्रित 'पाखी' का अंक पढ़कर मेरा मोहभंग हुआ। इसे मोहभंग कहें या कुछ और संज्ञा दें। बहरहाल, जो हुआ उसे बयान कर रहा हूँ। मेरे मन में संजीव की जो तस्वीर थी वह छिन्न-भिन्न हो गई और एक नया ही लेखक |
संजीव पर केंद्रित 'पाखी' का अंक पढ़कर मेरा मोहभंग हुआ। इसे मोहभंग कहें या कुछ और संज्ञा दें। बहरहाल, जो हुआ उसे बयान कर रहा हूँ। मेरे मन में संजीव की जो तस्वीर थी वह छिन्न-भिन्न हो गई और एक नया ही लेखक सामने आया। मैंने सोच रखा था कि राजेंद्र यादव के प्रभामंडल वाले लेखक उनकी तरह ही अत्याध्ुनिक और दिलपफेंक होंगे। आपके पहले समारोह में जब उन्होंने अपना परिचय मुझे दिया था तब भी मैं उन्हें 'हंस' के संजीव से नहीं जोड़ सका था। 'पाखी' का यह अंक पढ़ने के बाद बहुत शर्मिंदा हुआ। इच्छा हुई कि उनके द्घर जाकर उनसे मिल आउफँ।
मस्तराम कपूर, मयूर विहार पफेस-१, दिल्ली |
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| सहानुभूति के पात्रा संजीव |
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'पाखी' वाले भइयन आप सबने मिलकर संजीव की अभिशप्त जिंदगी को 'पाखी' के पन्ने-पन्ने पर बिखेरकर, उड़ेलकर, उलीचकर और भी अध्मरा कर दिया। एक अजीब सी टीस उठ रही है मेरे भीतर- जो मुझे और मेरे मन-प्राण को विचलित कर रही है। इतना विचलित कर रही है कि जैसे साँस उखड़ जाएगी। संजीव की कहानियों को एक किनारे रख दूँ और जिंदगी को दूसरे किनारे तो एक में 'संजीवन' दिखेगा और दूसरे में 'संजीव'। परंतु संजीव की जिंदगी को भाग्य ठोकर मारता रहता है और संजीव की कहानियों में 'समय' एक अपराध्ी की तरह है।
यानी एक अपराध् की भांति है। ...और संजीव स्वयं भी अपनी जिंदगी को ठोकर मारता रहता है इसलिए जिंदगी उसे विकलांग बनाने पर तुली है। संजीव ईश्वर को नहीं मानते इसलिए ईश्वर उन्हें और उनके पूरे परिवार पर कहर बरपाता रहता है। ईश्वर की सत्ता को ठुकराने और नकारने वाला कभी आनंदित नहीं रह सकता। इस संसार को संजीव ने नहीं बनाया है, ईश्वर ने बनाया है। संजीव में इतनी भी शक्ति नहीं है कि वह जिंदादिली दिखाएँ और सूरज को उगने से रोक दें। संजीव की कहानियाँ पफूलों को खिलने से रोक दें, तो जानूँ। केवल शब्दों की जुगाली भर कर लेने से कोई लेखक नहीं बनता, 'कायर' अवश्य बन जाता है। भले ही संजीव ने दो-चार अच्छी कहानियाँ लिखी होंगी लेकिन इसका मतलब यह नहीं हुआ कि वह ईश्वर की सत्ता को यूँ ही पूरी तरह नकार दें। ईश्वर की लाठी में इतना बल है कि अच्छे-अच्छों को पस्त कर देता है।
'पाखी' के पन्ने-पन्ने पर संजीव का व्यक्तित्व 'दया' और 'सहानुभूति' के पात्रा के सिवा कुछ नहीं दिखता। लेखक वही 'कायर' होता है जो द्घर-परिवार की जिम्मेदारियों से भागता है। संजीव एक ऐसे ही लेखक और कायर इंसान हैं। शिवमूर्ति और सृंजय ने संजीव की जिंदगी की तस्वीर को खूब-खूब व्यंजनों की तरह परोसा है। पफटकारा और दुत्कारा है। संजीव की पत्नी की हिम्मत देखिए। एक ग्रामीण औरत ने भी अपने महान लेखक पति की खूब-खूब गरिमामयी आरती उतारी है। इतनी हिम्मत तो पढ़ी-लिखी औरतों में भी नहीं होती।
भाई प्रेमपाल शर्मा जी की भी आंतरिक विकलता और संवेदनशील भावनाओं का उपफनता ज्वार देखा-पढ़ा और महसूस किया है मैंने। प्रेम भारद्वाज की कलम की अभिव्यक्ति भी संजीव के लेखकीय व्यक्तित्व के प्रति भीगी-भीगी है। मगर प्रेम भाई आपकी और आपकी टीम में भी २४ कैरेट वाली शु(ता नहीं है क्योंकि कोई भी किसी की किस्मत नहीं बदलता। हाँ, सहानुभूति और यथासंभव सहयोग देने वाले उदार दुनिया के हर कोने में हैं। मेरा कर्म और अभिशप्त जीवन उदाहरण है। मैं तो सातवीं पास भी नहीं हूँ। कीचड़ से निकला एक कमल हूँ मैं। मैं अपनी खुद की औकात जानता हूँ पर आप सबने मिलकर संजीव को 'दया और सहानुभूति' का पात्रा बना दिया। 'पाखी' की यह 'संजीवनी' शायद संजीव को अमृत प्रदान करे।
मुझे भी 'अपराध्' कहानी बेजोड़ ओर बेमिसाल लगती है। नामवर जी का कथन भी सही है कि अच्छी-भली कहानियों में जबरदस्ती अंग्रेजी के रोड़े-पत्थर और कहीं-कहीं कंकड़ भी भर देते हैं संजीव। हमारी हिन्दी इतनी कंगाल और भिखारिन नहीं है कि उसे किसी के सामने हाथ पफैलाना पड़े। संजीव शायद अपने आपको 'ज्यादा जीनियस' साबित करना चाहते हैं। इस ध्रती पर झूठ-सच और पाप-पुण्य का खेल सदियों से चल रहा है और चलता रहेगा। जीवन और मृत्यु, विष और अमृत, सुख और दुख, स्त्राी और पुरुष, जीव-जन्तु सभी ईश्वर की रचना और 'कर्मण्येवाध्किारस्ते' की लीलामय अभिव्यक्ति हैं। यह सब जानते हुए भी विद्वान और महान भैया संजीव की सोच और विचारात्मक अभिव्यक्ति पर रोष भी होता है और हँसी भी आती है।
सुरंजन, गाजियाबाद, उ.प्र. |
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| लेखक समुदाय का अपमान |
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'पाखी' का संजीव पर केंद्रित विशेषांक देखा। इसके मुखपृष्ठ पर लेखक का यह कथन कि 'लेखक कायर होता है' संदर्भ से काटकर छापा गया है। यह संजीव के साथ तो अन्याय है ही सारे लेखक समुदाय का अपमान भी है। पत्राकारिता के क्षेत्रा में व्याप्त 'सनसनी प्रेम' के रोग से मुक्त होकर ही 'पाखी' साहित्य के क्षेत्रा में कुछ हासिल कर सकेगी। 'पाखी' के विमोचन समारोह के दौरान नामवर सिंह के मुख से यह सुनकर बहुत निराशा हुई कि वे अभी तक संजीव की मात्रा एक कहानी 'आरोहण' ही पिछले दिनों पढ़ सके हैं। अपने भाषण के दौरान उन्होंने संजीव से यह अपेक्षा भी की थी कि वे आगे 'आरोहण' जैसी चार-छः और कहानियाँ लिखें। इससे स्पष्ट होता है कि उन्हें आज भी यह पता नहीं है कि संजीव के पास 'आरोहण' जैसी या उससे भी सशक्त एक दर्जन से अध्कि कहानियाँ हैं। यद्यपि उन्होंने संजीव को पहले न पढ़ पाने के लिए अपफसोस जाहिर किया है लेकिन उससे क्या? यदि हिन्दी का वरिष्ठतम आलोचक हिन्दी के इतने वरिष्ठ और सशक्त लेखक की आठ-दस श्रेष्ठ कहानियाँ भी तीस साल की लम्बी समयावध्ि के दौरान नहीं पढ़ पाया तो इसे हिन्दी साहित्य का दुर्भाग्य नहीं तो और क्या कहेंगे?
शिवमूर्ति, नोएडा, उत्तर प्रदेश
;शिवमूर्ति का यह कथन कि 'लेखक कायर होता है' संदर्भ से काटकर छापा गया है, स्वीकार्य नहीं है। किसी अन्य कथन के साथ भी ये ही लागू होता है। लेखक की कायरता के विषय में संजीव जी ने स्पष्टता के साथ अपने विचार रखे हैं। यह उनका कथन है। लेखक समुदाय का अपमान करना हमारा अभीष्ट नहीं। हाँ, सच को आईना दिखाना जरूर माना जा सकता है-सं.द्ध |
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| लेखक कायर नहीं होता |
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जीते जी किसी पत्रिाका के कवर पर रचनाकार की छवि का दर्शन रचनाकार के लिए सच में एक दुर्लभ अवसर होता है और पाठकों की दृष्टि के केन्द्र में स्वतः ही रचनाकार उपस्थित हो उठता है। 'पाखी' ने यह अवसर कथाकर संजीव को प्रदान किया है सितंबर अंक में। ठीक अगस्त अंक में नामवर सिंह की हँसमुख छवि के उपरांत। इस हेतु आप सभी को हार्दिक बधई। आवरण से नामवर दर्शाते हैं कि नये लेखक उखड़े हुए लोग हैं और संजीव बतलाते हैं कि लेखक कायर होता है। उखड़े-उखड़े जीवन की स्थितियों के मध्य नये लेखक नयी-नयी सामाजिक चुनौतियों के मध्य 'उखड़े हुए लोग' तो हो सकते हैं, मगर तमाम तरह की विसंगतियों के मध्य जोखिमपूर्ण लेखन प्रस्तुत कर लेखक और सबकुछ भले हो लेखक 'कायर नहीं होता'। 'कायर' शब्द हताशा से प्रेरित होकर जन्म लेता है और हताशा तभी द्घेरती है एक लेखक को जब लेखक के मनमापिफ़क़ नहीं हो पाता। बहरहाल! 'पाखी' का एक साहसिक प्रयास है संजीव पर केंद्रित अंक। संजीव एक शोध् छात्रा की तरह परिश्रम करके ध्ैर्य के साथ लेखन करते हुए तीन दशकों से पाठकों के हृदय में द्घर बनाये हुए हैं।
पहली बार उनकी कविताएँ आम पाठकों के समक्ष प्रस्तुत हुई हैं। पत्रा एवं संस्मरण कई तरह की नयी जानकारियों से परिचय कराते हैं। स्वयं प्रकाश का कथन सही है कि संजीव हमारी पीढ़ी के सबसे मेहनती कहानीकार है। शिवमूर्ति का संस्मरण रेखांकन योग्य है। इसी क्रम में सृंजय, प्रेमपाल शर्मा, भोला सिंह और शिवकुमार यादव के श्रम भी सराहनीय हैं। गौतम सान्याल, रामदेव सिंह, आनंद बहादुर और दिनेश कुशवाहा जो संजीव के अति निकटतम हैं उनकी अनुपस्थिति हमें बहुत खली।
'सूत्राधर' उपन्यास पर डॉ. दीनबंध्ु तिवारी का आलेख लेखन के तल तक जाकर प्रेमचंद के उपन्यास 'गोदान' से तुलनात्मक अध्ययन करते हुए राजेंद्र यादव के इस कथन को पुष्ट करता है कि अगर प्रचलित अर्थों में प्रेमचंद की परम्परा का कोई कथाकार है तो वह निश्चय ही संजीव हैं। इस क्रम में विश्वनाथ त्रिापाठी, रोहणी अग्रवाल, भालचन्द्र जोशी, गोपेश्वर सिंह, सुरेन्द्र स्निग्ध्, सत्यकाम, राम विनय शर्मा, राकेश बिहारी, अशोक मिश्र, डॉ. रानी कुमारी, रमेश प्रजापति, डॉ. रविशंकर सिंह, राकेश श्रीवास्तव, प्रेम भारद्वाज और गुंजन कुमार की भूमिकाएँ भी पठनीय हैं। संजीव का साक्षात्कार तो महत्वपूर्ण है ही, सबसे अध्कि मार्मिक साक्षात्कार है संजीव की पत्नी प्रभावती देवी का। जब वे कहती हैं कि 'तारीपफ सुन लेने भर से द्घर परिवार नहीं चलता। किसी काम के पीछे इतना भी विभोर नहीं होना चाहिए कि बाद में उस काम को करने की स्थिति में ही न रहो। जब मैंने उन्हें कभी लिखने से नहीं रोका तो पिफर उन्हें भी पूजा-पाठ से नहीं रोकना चाहिए। सिपर्फ सम्मानित होने से द्घर-परिवार नहीं चलता।'
प्रभावती देवी की बातें, द्घर में लेखक की क्या स्थिति होती है और द्घर एक लेखक से क्या चाहता है, को रेखांकित करती हैं। संजीव की पुत्रावध्ू को जैसे संजीव की पुत्रावध्ू होने का गर्व है, उसी तरह से हमें भी संजीव का पाठक होने का गर्व है और गर्व यह भी है कि 'पाखी' ने संजीव के समग्र पहलुओं से हमारा परिचय करवाया। और संपादकीय के बहाने कई ज्वलंत प्रश्नों को पाठकों के समक्ष रखा।
राजेंद्र आहुति, वाराणसी, उप
;गौतम सान्याल, रामदेव सिंह जो संजीव के अति निकटतम हैं, के अतिरिक्त 'पाखी' ने रविशंकर सिंह, रविभूषण, नरेन, वीरेन्द्र यादव एवं आर डी सिंह से भी संजीव जी पर लिखने का अनुरोध् किया गया था पर वे अपने व्यस्त समय से समय निकालकर नहीं लिख पाये। जिसका हमें दुख है। सं.द्ध |
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| सर्वथा नयी जैसी चीज नहीं होती |
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'पाखी' अगस्त ०९ अंक का संपादकीय पढ़ा। आपने योगी आदित्यनाथ के द्वारा उदयप्रकाश के सम्मानित होने तथा अशोक चक्रध्र को दिल्ली राज्य हिन्दी अकादमी का उपाध्यक्ष बनाए जाने पर साहित्य बिरादरी में मची हलचल पर कलम चलाई है। पहली बात तो यह कि यह हलचल साहित्य बिरादरी के जिन्दा होने का सबूत है। मैं इसे जायज बहस मानता हूँ। ये दोनों मसले कापफी गंभीर हैं तथा साहित्य के साथ खुद लेखक तथा सत्ता द्वारा किए जा रहे खिलवाड़ को बयान करते हैं। आपने उदय प्रकाश के हवाले से लिखा है कि उनकी एक चूक को सामने रखकर उनके पूरे व्यक्तित्व व कृतित्व को खंडित किया जा रहा है।
यह कहकर उदय प्रकाश ने खुद ही अपने कृत्य की गंभीरता को मान लिया है और अपनी साख को बचाने के लिए असल मुद्दे से ध्यान हटाने के लिए इस मुद्दे को उठाने वालों पर हमला बोल दिया है। उदय प्रकाश बहुत अच्छे से जानते हैं, जब बचने का कोई रास्ता नहीं होता है तो सब कुछ दांव पर लगाकर हमला बोलना ही अच्छी रणनीति होती है। मेरे ख्याल से उनके कृतित्व पर कोई सवाल नहीं उठा रहा है। न ही उठाना चाहिए। क्योंकि अगर कृतित्व पर सवाल उठाया जाएगा तो गालिब का बहुमूल्य खजाना हमें खारिज करना पड़ेगा। बताने की जरूरत नहीं है कि गालिब ने अपने जीवन में किस-किस तरह के समझौते किए थे। लेकिन व्यक्तित्व पर सवाल तो उठाना ही पड़ेगा। क्या वजह है कि एक रचनाकार जो शोषण, उत्पीड़न तथा आम आदमी की पक्षध्रता की बात करता है, वही एक दिन उस आम आदमी के रास्ते में कांटे बोने वालों के आगे नतमस्तक हो जाता है ? पूंजीवाद, साम्प्रदायिकता तथा साम्राज्यवाद इस समय की सबसे बड़ी बुराइयाँ हैं। यह ठीक है कि हम सब इनके साथ जी रहे हैं। कुछ लोगों की इनकी वजह से मौज भी हो रही है, लेकिन अस्सी प्रतिशत लोगों के जीवन के नारकीय होने के पीछे यही हैं। बेहतर दुनिया का सपना देखने वालों को इनके प्रतिपक्ष में खड़ा होना ही होगा। वरना हमारी सक्रियता का कोई अर्थ नहीं है।
आपने अशोक चक्रध्र के बहाने हिन्दी कवियों पर सवाल उठाया है। अशोक चक्रध्र अच्छी हिन्दी बोलते हैं। तुक जोड़ने और हाजिरजवाबी में उनका कोई जवाब नहीं है। लेकिन अपूर्व जोशी जी क्या कविता आज भी सूरदास, तुलसीदास के पास ही अटकी रहेगी। यह तय है कि भाषा, कथ्य तथा शिल्प के स्तर में वह आगे बढ़ती चली जाएगी। जैसे हमारे इर्द-गिर्द की कई चीजों का रूप बदला है। उसका भी चेहरा बदलेगा। कम्प्यूटर, मोबाइल, मेट्रो की तरह उसकी रचना भी पहले से जटिल होगी। अब पाठक वहाँ पर नहीं पहुँच पा रहा है तो इसके लिए कवि क्या कर सकता है? दिल्ली आने पर मेट्रो की जटिलता से द्घबराकर अगर मैं ६ रुपये की जगह १०० रुपये खर्च करता हूँ तो यह मेरी ही कमी मानी जाएगी।
'पीढ़ियाँ आमने-सामने' में प्रेम भारद्वाज ने महत्वपूर्ण सवाल उठाया है कि आज के कहानी परिदृश्य की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि सारी चर्चा कुछ खास प्रायोजित लोगों के इर्द-गिर्द सिमटकर रह जाती है। जबकि कई महत्वपूर्ण रचनाएँ बीच में आती रहती हैं। मुझे लगता है इसके पीछे आलोचना जगत की परिश्रम से बचने की मानसिकता काम करती है। इसलिए जिन गिने-चुने लोगों के नाम उछाले जाते हैं, वे अपनी मीमांसा उन्हीं को लेकर शुरु कर देते हैं। पिछले कुछ समय में कई महत्वपूर्ण रचनाएँ आयी हैं, पूरन हार्डी की 'बुड़ान', योगेन्द्र आहूजा की 'खाना', प्रेमरंजन अनिमेष की 'लड़की जिसे रोना नहीं आता', विद्यासागर नौटियाल की 'पफट जा पंचधर', शैलेन्द्र सागर की 'ब्रंच', प्रियंवद की 'कलंदर', जितेन ठाकुर की 'विक्रम-बेताल', नवीन कुमार नैथानी की 'पारस', भालचन्द्र जोशी की 'पालवा' और 'लौटा तो भय', मनीषा कुलश्रेष्ठ की 'रंग-रूप-रस-गंध्', मनोज कुमार पांडेय की 'शहतूत', अल्पना मिश्र की 'रहगुजर की पोटली', दूध्नाथ सिंह की 'तू पफू', सुभाष पंत की 'धरमदास के पास एक रास्ता ज्यादा है', प्रत्यक्षा की 'शिकार' और अरूण कुमार असपफल की 'पाँच का सिक्का'।
इसके अलावा और भी कई रचनाएँ हो सकती हैं जो मेरी नजरों से न गुजर पायी हों। अगर इन सब को आप लेंगे तो आप देखेंगे हिन्दी में बहुत अच्छी कहानियाँ आ रही हैं। हिन्दी कहानी लगातार समृ( हो रही है। लेकिन विडंबना यह है कि इन पर चर्चा करने के बजाय जिसे देखो वो नए की तलाश में है। आज की कहानी में अगर कुछ नया है तो वह है, उसकी भावभूमि और अनुभव क्षेत्रा का विस्तार। दुर्भाग्य यह है कि लेखक अपने निजी अनुभव की दुनिया से बाहर नहीं झांकना चाहता। लेखक में कितनी ही प्रतिभा क्यों न हो अगर वह खुद को डीक्लास नहीं करता तो एक समय के बाद उसकी कलम स्वतः सूखने लगती है। प्रेमचंद, जैनेन्द्र, मोहन राकेश, भीष्म साहनी, रेणु, कमलेश्वर, अमरकांत, मटियानी, दूध्नाथ सिंह, रविन्द्र कालिया, संजीव, शिवमूर्ति, स्वयं प्रकाश जैसे रचनाकार अगर बहुविध कहानियाँ दे पाए तो इसकी वजह उनका जीवन से जुड़ा रहना रहा है। सवाल यह है कि अच्छी रचना चाहे नई या वरिष्ठ पीढ़ी किसी की भी क्यों न हो, उस पर चर्चा क्यों न की जाए। वैसे भी एजाज अहमद के शब्दों में कहूँ तो नयापन सृजनशीलता में ही अंतर्निहित होता है...सर्वथा नयी जैसी कोई चीज नहीं होती। अगर होगी तो वह संपे्रषित ही नहीं हो पाएगी।
पीढ़ियाँ आमने-सामने में आप लोगों ने 'लाल बहादुर का इंजन' पर चर्चा की है। दरअसल यह कहानी हमारे वहाँ चल रहे लाफ्रटर शो की तरह हर बात पर हँस देने की मानसिकता की कहानी है। क्या कहानी यह नहीं संप्रेषित करती है कि निम्न मध्य वर्ग का जीवन कनिंगनैस ;मक्कारीद्ध के साथ ही संभव है? लालबहादुर कनिंग ;मक्कारद्ध नहीं था, इसलिए वह कामयाब नहीं हो पाया। क्या कामयाब होना ही व्यक्ति के जीवन की उपलब्ध्ि है? लालबहादुर हवा से इंजन बनाने के एक अद्भुत आइडिया पर काम कर रहा था। सब उसका मजाक उड़ाएँ ठीक है, यही यथार्थ है, इससे भी सहमत। लेकिन कम से कम लेखक तो उसकी सृजनशीलता को समझता, उसका सम्मान करता। तब कुछ नयापन होता। इस प्रसंग पर नागार्जुन की तथाकथित असपफल लोगों पर लिखी कविता 'उन्हें प्रणाम' याद आती है। दुनिया को बदलने वालों का जो रूप लेखक ने दिखाया है, उससे निराशा होती है। विचारधारा पर बहस हो सकती है। संद्घर्ष के तरीकों पर सवाल उठाया जा सकता है। मैं खुद हिंसा से लड़ी जाने वाली लड़ाई का पक्षधर नहीं हूँ। लेकिन ऐसे समय में जब हर आदमी एक का दो और दो का चार के खेल में लगा है तब दो-चार शातिर लोगों को उदाहरण बनाकर बेहतर दुनिया के लिए अपने-अपने तरीके से काम कर रही धरा का मखौल उड़ाकर लेखक क्या संदेश देना चाहता है, मेरी समझ में नहीं आया?
दिनेश कर्नाटक, नैनीताल, उत्तराखंड |
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| नए लेखक उखड़े हुए हैं |
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'पाखी' के अगस्त अंक में आलोचकों को जज मानकर... परिचर्चा का आयोजन विचारोत्तेजक था। लेकिन उन आदरणीय विद्वानों से असहमति के कई अवसर थे। उनमें से एक आदरणीय नामवर जी का कहना कि 'नये लेखक उखड़े हुए हैं'। असल में वे सभी लेखक उखड़ जाते हैं, जैसे ही वे सरकारी बैंक या प्रोपफेसर के पदों से हट जाते हैं। वे लोग जो साहित्य लिखते हैं, वे नौकरी के क्षणों से मिले वक्त में साहित्य की सर्जना करते हैं। उनकी पहली प्राथमिकता वह नौकरी होती है जिसके लिए सुबह से ही मानस बनाने लगते हैं और पाँच बजे तक उसके ही बारे में सोचते हैं। जबकि साहित्य लेखन किसी भी देश में या किसी भी भाषा में जोखिम उठाने जैसा काम है।
आज विश्व में मुस्लिम देशों के आध दर्जन लेखक जैसे सलमान रूश्दी, मोनिका अली, ओरहन पामुक और तस्लीमा नसरीन लेखक होने की सजा भुगत रहे हैं। महपफूज नजीब पर तो एक कट्टरवादी ने चाकू से इतने वार किए थे कि उनको पक्षाद्घात हो गया। ओरहन पामुक की हत्या के लिए आध्ुनिकतम हथियार खरीदते समय भाड़े का हत्यारा पकड़ लिया गया। अब आप बताएँ हिन्दी के कितने लेखक हैं जो समाज और सरकार के खिलापफ कलम उठाने को तैयार हैं? जो हैं उनकी पहुँच आदरणीय नामवर जी तक नहीं है, और जब नामवर जी तक नहीं है तो प्रकाशकों तक कैसे होगी? इसलिए जो नया साहित्यकार है वह आज भी जमीन से जुड़ा है कभी उखड़ नहीं सकता क्योंकि वह वास्तव में लेखक है। किसी नौकरी के साथ लेखक बनने की मजबूरी नहीं है। साहित्य लिखना अपने आप में एक पूर्णकालिक साध्ना है जो आज बहुत कम लोग करते देखे जाते हैं।
दूसरी बात, आदरणीय नामवर जी के अनुसार कुछ पत्रिाकाएँ केवल ध्ंध कर रही हैं। ऐसा कहना आपत्तिजनक है। किसी विश्वविद्यालय में नौकरी करने से लेकर शरीर बेचने तक हर प्रकार का काम ध्ंध है। जिसे बेचने से आपका पेट पलता है या जीवनयापन होता है वह ध्ंध है। पत्रिाका निकालने के लिये बिल गेट्स के पास भी इतना ध्न नहीं है कि बिना बाजार को देखे विश्वविद्यालीय साहित्यकारों के लिए पत्रिाकाएँ निकालता रहे और उनके पास एक मुफ्रत प्रति भेजता रहे। कम से कम एक पुस्तक तो ऐसी निकालकर दिखलाएँ जिस पर मूल्य न छापा गया हो और जो सिपर्फ साहित्य के नाम पर बाँटने के लिए छापी गई हो। नामवर सिंह की एक भी पुस्तक आज तक ऐसी नहीं देखी जिस पर उसकी कीमत नहीं छापी गई हो। उनकी पुस्तकें भी तो प्रकाशक अपने धंधे के लिए छापता है।
लेखकों की हर पुस्तक पर मूल्य लिखा होता है और वे चाहते हैं कि उनकी पुस्तकें भी बिके लेकिन लोग बाजारवाद को सौ-सौ गालियाँ देते हैं। जब आपके जीवन में व्यवहार और विचार में इतना बड़ा अंतर है तो साहित्य क्या लिखा जाएगा खाक? मुझे विश्वास है कि आनेवाली पीढ़ी संपन्न विश्वविद्यालीय सरकारी साहित्य और वास्तविक साहित्य में अंतर जरूर करेगी और उसे थोक के भाव से छपते इस प्रकार के साहित्य पर गर्व नहीं होगा। हिन्दी में धनाढ्य और खुशहाल लोगों ने साहित्य लिखकर इतना कूड़ा-कचरा जमा कर दिया है कि इसे सापफ करने में बहुत जोर लगाना पड़ेगा।
राध्ेश्याम तिवारी, जयपुर, राजस्थान |
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| दलित साहित्यकारों के बीच संवादहीनता |
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'पाखी' जुलाई ०९ के अंक में छपे पत्रा में शिवबाबू बनाम शिवबाबू मिश्र बनाम ओमप्रकाश वाल्मीकि द्वारा मेरे उफपर की गई टिप्पणी पढ़कर पीड़ा पहुँची। हालांकि ऐसे बयानों पर प्रायः मैं कम ध्यान दिया करता हूँ। लेकिन मेरी इंसानियत पर की गई इस टिप्पणी पर साथी साहित्यकारों के पफोन जब आए तो मेरी पीड़ा बढ़ गई। 'अपेक्षा' के अक्टूबर-दिसंबर ०८ के जिस अंक के संपादकीय का हवाला मिश्र बनाम वाल्मीकि ने यहाँ दिया है उसमें बस इतना सा है कि जयपुर के अंबेडकरवादी लेखक डॉ. डी आर जाटव की मृत्यु की सूचना मैंने अपेक्षा के संपादक डॉ. तेज सिंह को देने की बजाय 'बयान' के संपादक मोहनदास नैमिशराय को दी।
डॉ. जाटव की चिता तैयार करवाने के बाद जब उनकी पार्थिव देह अग्नि को समर्पित कर दी गई तो श्मशान द्घाट से ही मैंने श्री नैमिशराय को यह कहते कि मेरे मोबाइल में बैलेंस खत्म हो गया है, कृपया दिल्ली के अन्य साथियों को भी यह शोक समाचार दे देना और 'बयान' के संपादकीय में भी श्र(ांजलि अर्पित कर देना। इन दो बड़े दलित साहित्यकारों के बीच संवादहीनता का जो आलम रहा, उसके बारे में मेरा पत्रा अपेक्षा के जनवरी-मार्च ०९ के अंक में 'संवादहीनता के लिए खेद है' छपा है। अपनी काक प्रवृत्ति के अनुसार मिश्र बनाम वाल्मीकि ने वही बिन्दु लिया जो मेरी आलोचना के लिए उपयुक्त पाया। वाल्मीकि स्वयं कैसे इंसान हैं उन्होंने डॉ. जाटव के द्घर आज तक अपना शोक संदेश नहीं भेजा।
ओम प्रकाश वाल्मीकि और मेरे बीच जो मतभेद हैं, उसके तीन हेतु हैं-
१. मेरे दिल्ली प्रवास के दौरान दलित साहित्यकारों के बारे में चली चर्चा में जब यह बात आई कि ओमप्रकाश वाल्मीकि ने आजकल यह कहते अपनी वाल्मीकि बस्तियों में जाना छोड़ दिया है कि जिस गंदगी से मैं निकल आया हूँ उसमें अब दुर्गंध् आती है। मैंने उन्हें पफोन पर सलाह दी कि आप अपनी जड़ों से नपफरत करने लगे हैं, बिना जड़ के पेड़ को अपना अस्तित्व मालूम है? आप में तो दलित साहित्यकार क्या, लेखक होने की भी गुण ग्राह्यता नहीं रही। मेहरबानी करके अपने नजरिए को बदलिए। २. 'शवयात्राा' सहित उन्होंने अपनी ज्यादातर कहानियाँ अखबारों की कतरनों पर लिखी हैं। वे स्वयं भी अपनी लेखन प्रक्रिया में यह सच्चाई स्वीकारते हैं। मैंने उनको ताकीद की कि कतरनों पर लिखने के कारण आपका सृजन पाठकों को अविश्वसनीय और अप्रासंगिक लगता है। लोगबाग तो अब गाहेबगाहे यह आरोप भी लगाने लगे हैं कि आपकी आत्मकथा 'जूठन' न जाने कितनी कतरनों का जोड़ है।
३. वाल्मीकि मेहतर समाज से हैं। उनकी 'शवयात्राा', 'खानाबदोश' जैसी कहानियों का एकमात्रा लक्ष्य चमार जाति को लांछित करना भर है। मैं उनसे निवेदन करता रहा हूँ आप उम्र में बड़े हैं। अतः आपको स्नेह, समन्वय और सौहार्द का परिचय अपने सृजन में देना चाहिए। 'पाखी' दिसंबर ०८ में छपे मेरे लेख 'पूस की रात और प्रेमचंद की अज्ञानता' प्रकाशित करने से परहेज करने की सलाह शिवबाबू बनाम ओमप्रकाश वाल्मीकि ने 'पाखी' के संपादक को दी है। श्री अपूर्व जोशी का साहस काबिले तारीपफ है कि उन्होंने बंद मेहराब में वातायन सरीखे इस लेख को प्रकाशित करके प्रेमचंद की चूकों की ओर पाठकों का ध्यान केंद्रित किया।
रत्नकुमार सांभरिया, जयपुर, राजस्थान |
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| गढ़वाली भाषा का अच्छा प्रयोग |
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आपको पत्रा लिखने का मन तब बना जब आपके बारे में 'पाखी' में पढ़ा बहुत अच्छा लगा। अक्सर आपकी रचनाएँ पढ़ती रहती हूँ लेकिन इतने नजदीक रहते हैं मालूम न था। 'पाखी' में पूरा पता तो न था, एक दिन पूछते-पूछते ठीक उस दरवाजे पर पहुँच गई जहाँ लिखा था 'संजीव हंस' । मन तो हुआ कि यहाँ तक आकर बिना मिले लौटना ठीक नहीं। पिफर बिना बताए द्घर में द्घुसना उचित न समझकर पत्रा लिख रही हूँ।
'आरोहण' कहानी बहुत अच्छी लगी। क्योंकि मैं भी गढ़वाली हूँ। आपने गढ़वाली भाषा का अच्छा प्रयोग किया है। मैं छोटी उम्र से ही शहर-शहर, मुल्क-मुल्क रहती बसती रही इसलिए जहाँ-जहाँ रही वहाँ अपने दिल का छोटा सा टुकड़ा भी छोड़ती गई। बिहार में बहुत रही हूँ। मेरे पिता बॉटनी के प्रोपफेसर थे। दरभंगा, भागलपुर आदि जगहों में रही। झारखण्ड में शिक्षा पायी। ब्याह के बाद पति के साथ विदिशा में रहना। मुझे किसी एक स्थान का नागरिक होने का विशेष अहसास भी नहीं। उन सभी स्थानों से प्यार है जहाँ रही। एक गढ़वाली ही लिख सकता था ऐसी कहानी। आपने लिखी और कमाल कर दिया। गढ़वाली भाषा में एक बिंदासपन व खिलंदड़ा भाव है। एक ही शब्द को दो तरह से इस्तेमाल किया जा सकता है। प्यार में कहेंगे तो पेट को पोटणी बोलेगे वर्ना गुस्से में वही चीज पोटणो बन जाती है। गढ़वाली 'मानुष' बहुत ही अनाड़ी, सहज, सबल व स्वाभिमानी होता है। आपने उसके दर्द को बखूबी दर्शाया है। अन्य कहानियाँ भी दिल को छूती हैं। 'पाखी' का यह अंक सहेजकर रखा है व आराम से थोड़ा-थोड़ाकर पढ़ती हूँ।
पिछले साल मेरे पति का देहांत हुआ। लम्बे समय तक मैं बीमार रही। मेरी सभी रचनाएँ वे टाइप करते थे। इष्ट मित्राों के समझाने पर पिफर जिंदगी की ओर लौट रही हूँ। पत्रा का उत्तर देंगे या पफोन करेंगे तो अच्छा लगेगा। प्रभावती जी से भी मिलना चाहूँगी। एक लेखक, कथाकार को जो झेले वो मामूली इंसान नहीं हो सकता। मैंने तो द्घर-गृहस्थी से समय चुराकर ही अपने सारे काम किए हैं। जैसे कि कोई अपराध् कर रही हूँ।
चमेली जुगरान, मयूर विहार, दिल्ली
;यह पत्रा चमेली जी ने व्यक्तिगत तौर पर साहित्यकार संजीव जी को लिखा था संजीव जी ने ये पत्रा छपने के लिए 'पाखी' को दिया। सं.द्ध |
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