इन्हें मेध पाटकर का सच समझ में नहीं आता, दहेज के लिए ब्लेड से रेत कर मार दी जाने वाली महिलाओं का भी दर्द ये महसूस नहीं कर पाते, इन्हें लतिका रेणु के अकेलेपन के सच का अहसास नहीं होता। लाखों ऐसी महिलाएँ हमारे सामने हैं जिन्हें बलात्कार का सामना भले ही नहीं करना पड़ा हो, लेकिन जिनके संद्घर्ष का सच किसी तरह कमतर नहीं। पिफर भी सिनेमा का विषय वे नहीं हो पाते। सच के नाम पर सिनेमा का विषय बनने की कूवत सीमा परिहार में ही है, जिसने चंबल में खून की होली खेलते आध्ी जिंदगी बिता दी।
एक सच और एक लाख रुपये आपके! सच की बोली लगी है। जितना निजी सच उतनी बड़ी बोली। निजी सच के नाम पर कुछ भी हो सकता है, आपके कच्छे के रंग से लेकर आपकी 'साईज' तक। या पिफर आगे का कुछ ऐसा सच भी जो हमारे आम सौंदर्यबोध् के गले नहीं उतर सकता। सच का 'खेल' बीच में छोड़कर बाहर निकलने की भी सुविध है। थोड़े सच नीलाम कर थोड़े रुपये लेकर भी आप खुशी-खुशी द्घर लौट सकते हैं, लेकिन सामने दिखता करोड़ का आँकड़ा। लोग सच बतलाने के लिए उतावले हो रहे हैं। 'क्या आपने ब्रेस्ट इम्पलान्ट करवाया है? क्या किसी लड़की को एबार्शन की सलाह दी है? क्या आपने अपनी बेटी से कम उम्र की लड़की से शारीरिक संपर्क स्थापित किए हैं? आपके पति को पता न चले तो क्या आप दूसरे मर्द के साथ हमबिस्तर होना चाहेंगी?' जिस सच को हम अपने से भी स्वीकार करने से डरते हैं, अपने परिवार के साथ करोड़ों दर्शकों के सामने स्वीकार किए जा रहे हैं। किसी मजबूरी में नहीं, खुशी से पैसे कमाने के लिए नहीं, करोड़पति बनने के लिए। यह शायद संयोग नहीं 'सच का सामना' में अभी तक खाए-पीए-अद्घाए लोगों को प्रवेश मिल सका है, निश्चय ही प्रायोजकों को जो 'सच' चाहिए वो सच इन्हीं के पास हो सकता है।
क्या वास्तव में इस सच की कोई अहमियत है? आज महात्मा गांध्ी भी होते तो शायद हमारी इस सत्यनिष्ठा से प्रसन्न नहीं होते। हमारी संस्कृति में भी स्पष्ट मान्यता है 'सत्यम ब्रुयात, प्रियम् ब्रुयात, न ब्रुयात सत्यम अप्रियम्।' अप्रिय सत्य का न तो कोई सौंदर्य होता है, और न ही कोई महत्व। लेकिन सच के नए बाजार में अप्रिय सत्य की ही बोली लगी है। ऐसा अप्रिय सच जो किसी भी परिस्थिति में न तो स्वीकार करने वाले के लिए प्रिय हो सकता है, और न ही समाज के लिए। किसी व्यक्ति ने कितने अवैध संबंध बनाए और कितनी कम उम्र की महिलाओं से संपर्क स्थापित किया था। किसी महिला ने कितनी बार 'मेल स्ट्रिपटीज' देखी... जैसे सच को किसी से स्वीकार करवा लेने की क्या सार्थकता हो सकती है? कौन सी अनिवार्यता हो सकती है? सिवा इसके कि इस तरह के अप्रिय सच हमारी कुंठा को कुरेद कर कहीं न कहीं हमें मनोरंजित करते हैं।
भारतीय समाज को सच के प्रति जागरूक करते महात्मा गाँध्ी ने अपनी जिंदगी न्यौछावर कर दी। हमने उनकी बात नहीं मानी। आज प्रायोजकों की बात हम मान रहे हैं। गाँध्ी जी की आत्मा वाक़ई संतुष्ट होती यदि सच के इस नवीनतम अभियान का समाज से रत्ती भर भी सरोकार हुआ होता। यदि किसी राजनीतिज्ञ से उसके काले धन के बाबत जानकारी मांगी जाती, या पिफर किसी उद्योगपति से उसकी टैक्स चोरी के बारे में पूछा जाता या पिफर किसी बाबू से उसकी रिश्वतखोरी पर बात की जाती या पिफर किसी क्रिकेटर से उसकी वास्तविक आमदनी पूछी जाती... लेकिन ये सच प्रायोजकों के एजेंडे पर हो ही नहीं सकते क्योंकि यही तो उनके खरीदार हैं। अपने ग्राहकों को कठद्घरे में खड़ा करने की हिम्मत कोई बाजार नहीं उठा सकता। वास्तव में यह सच परंपरागत मनोरंजन से ऊबे दर्शकों के लिए सनसनी की एक खुराक है। वैसी सनसनी जो दर्शकों को ब्लू पिफल्म से एम.एम.एस. और 'कैमगर्ल्स' की ओर ले जाती है।
टेलीविजन ने सच को सनसनी बनाने की शुरूआत देर से की। हिन्दी सिनेमा के लिए सच को सनसनी बनाना पुरानी बात है। शेखर कपूर ने कुछ वर्ष पहले भारतीय किसानों की आत्महत्या की सच्ची द्घटनाओं पर 'पानी' बनाने की द्घोषणा की थी। एक सामाजिक सरोकार वाली सच की पृष्ठभूमि पर पिफल्म बनाने की शेखर कपूर जैसे अंतरराष्ट्रीय पिफल्मकार की पहल वाक़ई उत्साहवर्(क थी। लगा था सच को समाज के हित में देखने की एक नई शुरूआत हो सकेगी। लेकिन पिफल्म अबतक नहीं बनी, और न ही इस पिफल्म की चर्चा हो रही है। शेखर कपूर की चर्चा भारत में आज भी होती है तो 'बैंडिट क्वीन' से। पूफलन देवी की जिंदगी पर आधरित इस पिफल्म में हिंसा और सैक्स का वीभत्स चित्राण था। हो सकता है पूफलन देवी की जिंदगी का ये हिस्सा रहे हों, लेकिन सवाल यह भी है कि यदि पूरी तरह नग्न पूफलन देवी को परदे पर टहलाने का अवसर शेखर कपूर को नहीं मिलता तो क्या तब भी वे पूफलन के सच को पिफल्माने का निर्णय लेते?
यह अद्भुत विडम्बना है कि तथाकथित सच को अभिव्यक्त करने वाली जितनी भी पिफल्में हिन्दी में बनी हैं, उन सभी के केन्द्र में बलात्कार की द्घटना रही है। 'लज्जा' को रिलीज करते हुए राजकुमार संतोषी ने कहा था, यह उत्तर प्रदेश के एक गाँव की सत्य द्घटना पर आधरित है, जहाँ चालीस साल की एक महिला के साथ पाँच-छह लोगों ने बलात्कार किया, पिफर उसे जिंदा जला डाला। राजस्थान में हुए चर्चित भंवरी देवी बलात्कार कांड पर 'बवंडर' बनाने जगमोहन मूंध्ड़ा विदेश से आते हैं। वास्तव में सच ढूंढ़ते हुए पिफल्मकारों की न८ार वैसे ही सच पर जाती है जहाँ बलात्कार की वीभत्सता हो। हालांकि राजकुमार संतोषी 'लज्जा' को स्त्राी-संद्घर्ष की कहानी कहते रहे। मूंध्ड़ा भी 'बवंडर' को न्यायिक व्यवस्था के खिलापफ एक स्त्राी के संद्घर्ष के सच को प्रस्तुत करने का दावा करते हैं। लेकिन यह कोई स्पष्ट नहीं करता कि सच दिखाने के लिए 'बलात्कार' की ही अनिवार्यता क्यों होती है उन्हें? क्या महिलाओं पर और किसी तरह के अत्याचार नहीं होते? या पिफर सच के पीछे का सच यही है कि वे दर्शकों को वही सच दिखाना चाहते हैं, जो उन्हें सनसनाहट दे, चिंता नहीं।
इन्हें मेध पाटकर का सच समझ में नहीं आता, दहेज के लिए ब्लेड से रेत कर मार दी जाने वाली महिलाओं का भी दर्द ये महसूस नहीं कर पाते, इन्हें लतिका रेणु के अकेलेपन के सच का अहसास नहीं होता। लाखों ऐसी महिलाएँ हमारे सामने हैं जिन्हें बलात्कार का सामना भले ही नहीं करना पड़ा हो, लेकिन जिनके संद्घर्ष का सच किसी तरह कमतर नहीं। पिफर भी सिनेमा का विषय वे नहीं हो पाते। सच के नाम पर सिनेमा का विषय बनने की कूवत सीमा परिहार में ही है, जिसने चंबल में खून की होली खेलते आध्ी जिंदगी बिता दी।
आमतौर पर हिन्दी सिनेमा की प्रवृत्ति यथार्थ से बचने की रही है। सपनों की दुनिया, सपनों के लोग, सपनों जैसी द्घटनाएँ... हिन्दी पिफल्मकार मानकर चलते हैं कि दर्शक तीन द्घंटे उसकी शरण में सिर्पफ सपनों का सुख उठाने आते हैं। शायद यही कारण है कि ऐसे सच में उनकी रुचि नहीं, जो आम आबादी के आम जीवन के करीब हो। लेकिन अपने सपनों की दुनिया में 'पिफट' आने लायक जैसे ही कोई पात्रा था द्घटना उन्हें यथार्थ जिंदगी में दिखती है, वे तुरंत उसे स्वप्निल आवरण में प्रस्तुत करने की कोशिश में जुट जाते हैं, चाहे मध्ुमिता हत्याकांड पर 'अनलिमिटेड नशा' हो या बिहार के चर्चित चंपा विश्वास कांड पर 'इंसापफ-द जस्टिस'। द्घटी होगी मुम्बई की लोकल ट्रेन में किसी स्कूली बच्ची के साथ सामूहिक बलात्कार की हृदय विदारक द्घटना।
यह जीवन का ऐसा क्रूर सच जिसका सिर्पफ अहसास किया जा सकता है, देखा नहीं जा सकता। लेकिन पिफल्मकार मेहुल कुमार अपनी कथित संवेदनशीलता का परिचय देते हुए इस सच पर पिफल्म ही नहीं बनाते, बच्ची पर हुए बलात्कार के दृश्य को इत्मीनान और विस्तार से पिफल्माते हैं। वास्तव में हिन्दी सिनेमा का सच कभी बलात्कार से आगे नहीं बढ़ पाता, चाहे वह शेखर कपूर के लिए हो या मेहुल कुमार के लिए। सच के नाम पर जिस विद्रूपता और वीभत्सता की शुरूआत सिनेमा ने की थी, 'सच का सामना' उसी की कड़ी है। जिसमें चाहे जितना भी सच हो, जीवन का सच नहीं है और निश्चत रूप से ऐसे सच झूठ से भी खतरनाक होते हैं। वह झूठ वाक़ई महत्वपूर्ण है जो परिवार, समाज, संस्कृति के लिए एक कम८ाोर ही सही आधर तो बनाए रखता है।
;लेखक राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित पिफल्म समीक्षक हैंद्ध
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