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उस समय उन्होंने यह तो सोचा ही नहीं था कि कभी वो अधिकारी हो जाएँगे। तब जमाना दूसरा था। नौकरी की इतनी मारा-मारी नहीं थी और अपने उस नेक दिल रिश्तेदार की मदद से वो स्वास्थ्य विभाग में क्लर्क की नौकरी पा गए। कुछ दिनों बाद उन्हें सरकारी आवास मिल गया और वह गाँव से अपनी पत्नी को भी ले आए। जैसा कि अमूमन होता है, नौकरी लगते ही गाँव में उनका भी 'बावन बीद्घा पोदीना' सूखने लगा था। मिश्र जी तब रंगदार आदमी हुआ करते थे। भांग का शौक तो गाँव से ही था। यहाँ आने के बाद कभी-कभार सोमरस का सेवन भी कर लेते। पत्नी आई तो पिता भी बनना था। वो एक नहीं, दो-दो पुत्रिायों के पिता हो गए। डी. मिश्रा 'हम दो और हमारे दो' ही चाहते थे। पर पत्नी को एक बेटा भी चाहिए था। बहुत दिनों तक दोनों एकमत नहीं हो पाए। और अंत में मिश्र जी ने एक बार और 'रिस्क' ले ही लिया। उन्हें सपफलता भी मिली। |
उधर देश का झंडा चाँद पर पफहरा रहा था। इधर दामोदर मिसर का लड़का विवाह के लिए तैयार हो गया था। आप सोच रहे होंगे कि चाँद पर झंडा और दामोदर मिसिर के बेटे की शादी में क्या संबंध है? तो भाया संबंध तो कोई भी नहीं है। और है भी...जिस तरह देश का झंडा, जब चाँद पर पफहराया तो जो खुशी, रोमांच..और गर्व का अनुभव देशवासियों ने किया, कुछ-कुछ वैसा ही अनुभव मिसिर दंपत्ति ने भी पुत्रा की विवाह हेतु सहमति के बाद किया।
दामोदर मिसिर यानी श्रीमान डी. मिश्रा... प्रदेश सरकार के एक विभाग में अभी कुछ दिन पहले तक ग्रुप 'बी' अधिकारी थे। चंद महीने पहले ही सेक्सन अधिकारी के पद से सेवानिवृत्त हुए थे। उनका इकलौता पुत्रा शादी योग्य हो चुका था और वो पिछले तीन साल से अपने इस पुत्रा के विवाह की असहमति के कारण कापफी तनाव ग्रस्त थे। तमाम लड़की वाले उन्हें तरह-तरह के ऑपफर के साथ रिझा रहे थे। उनकी हालत उस किसान जैसी थी जिसके खेत में पफसल तैयार हो चुकी हो... और जब द्घर भरने का समय आया तो मौसम ही दगा दे गया।
दामोदर मिसिर.. क्षमा करें उन्हें इस नाम से अब बुलाना गुस्ताखी होगा। तो डी. मिश्रा साहब गोरखपुर से झांसी अपने दूर के एक रिश्तेदार के भरोसे चालीस साल पहले आए थे। उस समय उन्होंने यह तो सोचा ही नहीं था कि कभी वो अधिकारी हो जाएँगे। तब जमाना दूसरा था। नौकरी की इतनी मारा-मारी नहीं थी और अपने उस नेकदिल रिश्तेदार की मदद से वो स्वास्थ्य विभाग में क्लर्क की नौकरी पा गए। कुछ दिनों बाद उन्हें सरकारी आवास मिल गया और वह गाँव से अपनी पत्नी को भी ले आए। जैसा कि अमूमन होता है, नौकरी लगते ही गाँव में उनका भी 'बावन बीद्घा पोदीना' सूखने लगा था। मिश्र जी तब रंगदार आदमी हुआ करते थे। भांग का शौक तो गाँव से ही था। यहाँ आने के बाद कभी-कभार सोम रस का सेवन भी कर लेते। पत्नी आई तो पिता भी बनना था। वो एक नहीं, दो-दो पुत्रिायों के पिता हो गए। डी. मिश्रा 'हम दो और हमारे दो' ही चाहते थे। पर पत्नी को एक बेटा भी चाहिए था। बहुत दिनों तक दोनों एकमत नहीं हो पाए। और अंत में मिश्र जी ने एक बार और 'रिस्क' ले ही लिया। उन्हें सपफलता भी मिली। छोटी बेटी के जन्म के आठ साल बाद एक बार पिफर उनके द्घर में बच्चे की किलकारी गूंजने लगी। पत्नी, बच्चे का नाम रामदुलारे रखना चाहती और मिश्रा जी आकाश । इस बार मिश्रा जी अपनी बात मनवाने में सपफल हो गए। तब वह बड़े बाबू हो चुके थे।
आज यही आकाश मिश्रा बी.टेक. के बाद एक मल्टीनेशनल कंपनी में इंजीनियर था। अट्ठाइस की उम्र पार करने में कुछ माह ही शेष थे और पता नहीं कौन-सा कारण था कि वह शादी के नाम पर इस तरह बिदक जाता... जैसे लाल कपड़े को देखकर सांड...
मिश्राजी चाहे कुछ भी कहें, पर यह लोग मानने को तैयार नहीं हैं-'यह सब झाम मिश्रा जी का बनाया हुआ है। बेटियों के शादी में जितना 'द्घिसे' जब तक उसका हिसाब पूरा नहीं कर लेंगे... लड़की वालों को भी दौड़ाते रहेंगे...'
यह दर्द तो था ही मिश्राजी को। अपनी लायक लड़कियों को उनके स्तर का पति नहीं खोज पाए। न योग्यता के स्तर पर और ना ही सुंदरता के स्तर पर... लेकिन अपने इस दर्द को तो उन्होंने अपनी पत्नी तक से नहीं कहा। जब कभी पत्नी इस संदर्भ में कुछ बोलना भी चाही तो वह उसे अध्यात्म की तरपफ मोड़ देते, 'हम तुम कौन होते हैं करने वाले? जोड़े तो ऊपर से लिखकर आते हैं। जिसके भाग्य में जो होता है, वही मिलता है। सुखी तो हैं न ..रोटी है, छत है... और उनका अपना परिवार है और क्या चाहिए..?
सच उनकी पत्नी को भी मालूम था। न तो मिश्राजी के पास दहेज के लिए पर्याप्त धन था और न वो लड़कियों के विवाह में बहुत ज्यादा धन खर्च ही करने के मूड में थे।
रिश्तेदार अलग नाराज, 'लरिकवा थोड़ा लायक हो गया है... तभी पियाज काट रहे हैं। अरे बूढ़ हो जाएगा, तब बियाह करेंगे का? लड़का तो कब से तैयार बैठा है.. दामोदरे 'भाव' बढ़ाने के लिए पहाड़ा पढ़ रहे हैं।'
बात कुछ-कुछ सच भी लगती। यदि लड़का राजी नहीं है तो पिफर काहे लड़की वालों को उलझाए हुए हैं? ढेर सारा 'बायो-डाटा' इकट्ठा करके रखे हैं। कई लड़कियों को देखकर पेंडिंग में डाल दिए हैं। सबसे मजेदार बात लक्ष्मन बाबू बताते हैं। लक्ष्मन पाठक उसी विभाग के बड़े बाबू हैं, जहाँ से अभी-अभी मिश्राजी रिटायर हुए हैं। बीस साल से एक दूसरे को जानते हैं।
जब डी. मिश्रा साहब उस विभाग में ओ.एस. थे... और अपनी छोटी बेटी की शादी के लिए चार साल से परेशान थे तो एक दिन पाठक बाबू के सामने ही मन की भड़ास निकालने लगे, 'जिसके पास बियाह लायक लरिका है... उहे सार अपने आपको चक्रवर्ती सम्राट समझने लगता है। अगर लरिका थोड़ा पढ़-लिखकर किसी लायक हुआ तो बस पूछो मत... आदमी का पूरा नक्सा ही बदल जाता है। जेकर सारे के मुँह देखना नहीं पसंद करता... ओकर पता नहीं का-का देखना पड़ता है।'
मिश्रा जी को छः महीने से एक लड़के वाला उलझाए हुए था। लड़का-लड़की एक दूसरे को देख चुके थे। अब जब कि उन्हें लग रहा था कि यहाँ बात बन जाएगी तो उन्होंने टका सा जवाब दे दिया, 'का बताएँ मिश्रा जी हम सब तो तैयार ही थे। लड़का राजधानी में रहता है। उसको थोड़ा स्मार्ट लड़की चाहिए। आप मेरी मजबूरी तो समझ रहे हैं? आज कल के लड़कों से हम जबरदस्ती कुछ नहीं कर सकते। पता नहीं क्या कर बैठे..'
मिश्राजी की छोटी बेटी थोड़ा ज्यादा तंदरुस्त थी। मिश्राजी सब समझते थे। उन्हें बुलेट चाहिए था। जब बुलेट वाली पार्टी मिल गई तो इनको धीरे से टरका दिया गया।
लक्ष्मन पाठक उनकी बातें भकुआ जैसे सुन रहे थे। उनकी भी दो बेटियाँ ही थी। हाँ! यह बात दूसरी थी कि अभी उनकी शादी की उम्र नहीं हुई थीं। लेकिन कभी न कभी तो होनी ही थी। डी. मिश्रा के वर्तमान में उन्हें अपना भविष्य दिखाई दे रहा था। जब अपनी भड़ास निकालने के बाद मिश्राजी थोड़ा हल्के हुए तो लक्ष्मन बाबू उनके बगल में सरक आए, 'भाई साहब आपकी परेशानी देखकर मैं दहल जाता हूँ। कल मेरी भी यही हालत होनी है। आप जैसे समझदार आदमी परेशान हो जा रहा है तो हमारे जैसा..'
'का करोगे पाठक... इस ब्राह्मण समाज को गर्त में ले जाने वाला यही दहे८ा है। आदमी खुद कुछ नहीं करना चाहता.. सब कुछ दहेज से पाना चाहता है। पहिले का जमाना तो पिफर भी बढ़िया था। जो कुछ करते... बड़े बुजुर्ग करते थे। लड़के को सिपर्फ सिर झुकाकर आदेश मानना होता। ...और आज के लड़के! सालों को लड़की चाहिए अपने पसंद की और बाकि सब पिता जाने...' मिश्रा जी बोलते-बोलते उत्तेजित होकर हाँपफने लगे।
पाठक बाबू कुछ देर मिश्रा जी को देखते रहे। पिफर कुछ सोचकर हाथ जोड़ते हुए बोले, 'मिश्राजी आपका भी तो एक लड़का है। जो इंटर में पढ़ता है। मेरी बड़ी बिटिया हाई स्कूल में... जब आपका बेटा शादी लायक होगा तो पहली प्राथमिकता आप मुझे देंगे।'
मिश्राजी की भृकुटी थोड़ा तनी। पिफर आँख को सिकोड़ कर अपनी एक हफ्रते से बढ़ी हुई दाढ़ी को खुजाते हुए सोचने लगे।
'सोच का रहे हैं मिश्रा साहब... हम तो बस अपना एप्लिकेशन आप और भाभी जी के दरबार में लगा रहे हैं।' पाठक बाबू जल्दी से हाथ जोड़ते हुए बोले।
'दिया यार... तुम्हें वचन दिया.. तुम भी क्या याद करोगे...। सबसे पहले हम तुम्हीं को मौका देंगे और तुम देखना बिना किसी हील-हुज्जत के चुटकी बजाते शादी हो जाएगी...' मिश्रा जी चुटकी बजाते हुए बोले।
समय के साथ यह बात पुरानी होकर विस्मृत हो जाती और पाठक बाबू इसे कतई न दुहराते। यदि आकाश मिश्रा का सलेक्शन टाप रैंकिंग के कॉलेज में बी.टेक में न हुआ होता। ...यदि आकाश मिश्रा को पैंतिस हजार मासिक यानि चार लाख बीस हजार सालाना का पैकेज न मिला होता।
आकाश की हर सपफलता पर पाठक बाबू एक बार मिश्रा जी को उनका वादा याद दिला देते थे-'भाई साहब मेरी अर्जिया तो है न आपके पास। हम आपकी ही आशा में हैं...'
मिश्राजी भी अपने वादे को याद कर हामी भर देते-'अरे हाँ भाई पाठक जी.. सबसे टॉप पर आपका ही अप्लिकेशन है। आपकी भाभी का बस चलता तो काल्ह ही बियाह पक्का कर देती... पर आप तो सब बूझते ही हैं। अब हम लोग वाला जमाना नहीं रहा। जब लड़का खुदे बियाह के लिए एग्री न हो जाय। तब तक भला का कहा जा सकता है।'
लेकिन यह सब बातें पुरानी हो चुकी हैं और अब इसमें मजा नहीं रह गया है। पाठक बाबू का मिश्राजी से मोहभंग हो चुका है। आज पाठक बाबू की वही स्थिति है जो आज से दस साल पहले मिश्राजी की थी। वैसे भी मिश्राजी रिटायर होने के बाद उनके संपर्क में कहाँ रह गए थे?
भेंट तो तभी होती... जब मिश्रा जी स्वयं किसी काम से ऑपिफस आते। तभी कुछ दिन पहिले जब कुछ बकाया भुगतान के चक्कर में कार्यालय पहुँचे तो पाठक बाबू से मुलाकात होना स्वभाविक ही था, 'अरे पाठक बाबू क्या हुआ? कहीं बिटिया का रिश्ता पक्का हुआ कि नाहीं ...कवनो बात नहीं भाई। आप तो अभी भी लाइन में लगे ही हैं। बस बेटा हाँ भर कह दे ..अभी एक दरोगा जी आए थे। पफोर व्हीलर का रौब दिखा रहे थे। हमने तो सापफ कह दिया-ए दरोगा बाबू बहुत नोट देखा हूँ। हमें दहेज नहीं चाहिए। हम त जबान पर मरते हैं। ...आ कार की बात का कहते हैं ..उ त दुआरे पर पहिले से ही खड़ा है। इहां त चलवैया का अकाल है...'
पिफर डी. मिश्रा खुद ही हँसकर बताने लगे, 'का बताएँ गुरु बहुत दिन से हमारे मन में भी इच्छा थी पफोर व्हीलर की। ले लिया(((... भाय ...दुआरे पर खड़ी है। जब कहीं जाना होता है तो ड्राइवर ले लिया एक ठो..'
बेचारे पाठक जी बस टुकुर-टुकुर देखते हुए सुनते रहे-'हाय रे समय((..!! जब इसकी बेटियाँ जवान थीं तब कैसे विलाप करता था? ...और जब मेरी बेटियाँ जवान हुईं तो मेरी परेशानियों पर मिर्च रगड़ रहा है। अरे नहीं करना है तो मत करो रिश्ता। बार-बार यह एहसास दिलाना कि वो लड़की के पिता हैं... दयनीय हैं.. जरूरी है क्या..? साला पफोर व्हीलर का रौब दिखा रहा है। सारी जिंदगी चौबीस इंच की हर्क्युलिस साइकिल की गद्दी पर बैठ कर पिछौड़ा छिलवाते रहे। अब बन गए हैं बड़का रईस..'
पाठक तो एक उदाहरण थे। श्रीमान डी. मिश्रा जी के पास ऐसे तमाम पाठक, मिश्रा, तिवारी.. पांडे थे.. जो जवान बेटियों के पिता थे और जिन्हें अपनी बेटियों के विवाह की चिंता थी। हर एक के लिए मिश्रा जी के पास पुड़िया थी।
यदि आपकी लड़की साधारण बी.ए. या एम.ए. है तो उन्हें प्रोपफेसनली कवालीपफाइड लड़की चाहिए होती। यदि लड़की बी.एड. या एम.बी.ए. है तो उन्हें बी. टेक चाहिए...। चलिए आपकी लड़की बी.टेक भी है तो उन्हें आई.टी. ब्रांच में चाहिए और यदि आई.टी. भी है तो ...अरे भाई बीस बहाने हैं गोरी ...सांवली..लंबी.. नाटी... वो लड़के वाले हैं उन्हें आपको नचाने का हक बनता है। आपका गरज है तो टेकें नहीं तो द्घंटा द्घर देखें...
मिश्राजी लड़के वालों से एक बात हमेशा कहते, 'भाई एक बात सापफ है। मेरी कोई मांग नहीं है। लड़की सापफ सुद्घड़ हो। ..और आकाश को पसंद आनी चाहिए.. न उसके पास पैसे की कमी है और न मेरे पास... ईश्वर की कृपा से सब कुछ तो हमारे पास है ही। एक ठो शहर में मकान नहीं था तो पच्चीस हजार का एक ठो फ्रलैटो ले लिया गया। पूरा दस लाख हार्ड कैश दिया हूँ। बाकि पंद्रह लाख आकाश भरेंगे ...अरे भाई उन्हीं के लिए तो लिया है। ऊ और उनका पफैमली ही न रहेगा.. कई लोग त इहो कह रहे थे पंद्रह लाख पकड़िए आ रिश्ता पक्का कीजिए... पर हम मना कर दिए। भाई हमारी कोई मांग थोड़े ही है..।' उसके बाद सामने वाले की तरपफ गहरी नजर से देखते। और उसके साँसों का उतार-चढ़ाव नापते।
कई लोग उनके नाते-रिश्तेदारों की सिपफारिश लेकर आते। मिश्रा जी की नजर में वह सब 'कमजोर पार्टी' होते। उन्हें तो द्घास ही नहीं डालते, 'देखिए भाई। आप जो है ..ठीक ही कह रहे हैं। हमारे रिश्तेदार सब अइसे ही हैं। का इ अच्छा लगता है कि लरिकवे की शादी के लिए रोज एक आदमी भेज दे रहे हैं? उस समय कवनो साला रिश्तेदार नहीं था जब हम बेटियों की शादी के लिए भटक रहे थे। भइया आपको हम बेकार परेशान नहीं करूँगा.. आप ओतना दूर से किराया-भाड़ा खरच करके बार-बार आओगे.. हमें जब शादी करनी होगी तो आपको खबर कर दूँगा। बेटी का पफोटो और बयो डाटा भिजवा देना.. अभी तो लरिकवे मना कर रहा है'
आगंतुक जिस उत्साह से उनके पास आया होता उतनी ही निराशा के साथ वापस चला जाता। भाषा के रूखेपन से ही वह समझ जाता-'यहाँ दाल नहीं गलने वाली है..'
कभी-कभी लोगों को यह भी आशंका होती कि कहीं लड़के की जिंदगी में कोई लड़की पहले से तो नहीं है। तभी शादी के लिए ना नुकुर कर रहा है। भाई कहने वालों का कोई मुँह थोड़े ही रोक सकता है।
लेकिन इधर सुनने में आया है कि लड़के ने विवाह के लिए हरी झंडी दे दी है। यह वही दिन था। जब चाँद पर तिरंगा पफहराया गया था और मिश्रा जी न्यूज चैनल पर उसका लाइव प्रसारण देख रहे थे।
तो भाइयों आजकल दामोदर मिसिर मेरा मतलब श्रीमान डी. मिश्रा साहब से है ..और इकलौते पुत्रा के लिए स्वयंवर का आयोजन करने जा रहे हैं। यदि आप भी जवान बेटी के पिता हैं ..और उनके सजातीय हैं ...आपके पास उनके फ्रलैट की बकाया पंद्रह लाख चुकाने का सामर्थ्य है तो आप सादर आमंत्रिात हैं... भगवान आपकी मनोकामना पूरी करे...आमीन.. |