नवंबर २००९
 
 
 
   
 
 
 
•अमरकांत को इलाहाबाद में ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित• जितेन्द्र श्रीवास्तव को देवीशंकर अवस्थी सम्मान•दिल्ली में विश्व (पुस्तक मेला ;राजकमल प्रकाशन के स्थापना दिवस पर तीन लखटिया पुरस्कारों की द्घोषणामहुआ माजी के उपन्यास 'मरंग गोड़ नीलकंठ हुआ' को तीसरा राजकमल कृति सम्मानविश्वनाथ त्रिापाठी की पुस्तक 'व्योमकेश दरवेश' को पहला सृजनात्मक गद्य सम्मान अमरेन्दु किशोर की कृति 'बादलों के रंग हवाओं के संग' को चौथा कृति सम्मानस्तंभ लेखक भारत भारद्वाज के खिलापफ वारंटद्ध)
 
 
 
कविताएं
डॉ. हरदयाल
यह दिल्ली है

यह दिल्ली है
कहते हैं-
'दिल्ली दिलवालों की है'
होगी
मगर मुझे तो विश्वास नहीं होता
दिल तो मेरे भी है
और बहुत कोशिश की है मैंने
दिल्ली को अपना बनाने की
लेकिन वह मेरी नहीं बनी आज तक
अक्सर लगता है मुझे-
दिल्ली दिलवालों की नहीं है
दिल्ली के पास दिल ही नहीं है
उसके पास है सिपर्फ दिमाग़
इसलिए वह हमेशा हुई है उनकी
जो बेदिल हैं
और हैं दिमाग़दार
और जो एक बार बैठे हैं उसकी कुर्सी पर
तो ऐसे चिपके हैं उससे
कि कुर्सी टूट गयी है
लेकिन उनकी चिपक नहीं छूटी है
शायद इसीलिए दिल्ली
टूटी हुई कुर्सियों
और उनसे चिपके हुए बद्दिमाग़ों का
समाधि-स्थल है
शताब्दियों से।

 
;दोद्ध दिल्ली : एक जंगल
 

दिल्ली
विशाल जंगल है आदमियों का
हर तरपफ उसमें बिखरे हैं
लाखों आदमी
बेतरतीब
बेडौल
भागते चूहों की तरह
बेतहाशा
निर्लक्ष्य
तेली के बैल
निरीह और हिंस्र
क्षुद्र और विशाल
विच्छिन्न
सद्घन और विरल
अनात्म और आत्ममुग्ध
स्थिर और गतिशील
बेजड़ बेझर वृक्ष!

 
 
 
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