| डॉ. हरदयाल |
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यह दिल्ली है
यह दिल्ली है
कहते हैं-
'दिल्ली दिलवालों की है'
होगी
मगर मुझे तो विश्वास नहीं होता
दिल तो मेरे भी है
और बहुत कोशिश की है मैंने
दिल्ली को अपना बनाने की
लेकिन वह मेरी नहीं बनी आज तक
अक्सर लगता है मुझे-
दिल्ली दिलवालों की नहीं है
दिल्ली के पास दिल ही नहीं है
उसके पास है सिपर्फ दिमाग़
इसलिए वह हमेशा हुई है उनकी
जो बेदिल हैं
और हैं दिमाग़दार
और जो एक बार बैठे हैं उसकी कुर्सी पर
तो ऐसे चिपके हैं उससे
कि कुर्सी टूट गयी है
लेकिन उनकी चिपक नहीं छूटी है
शायद इसीलिए दिल्ली
टूटी हुई कुर्सियों
और उनसे चिपके हुए बद्दिमाग़ों का
समाधि-स्थल है
शताब्दियों से।
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| ;दोद्ध दिल्ली : एक जंगल |
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दिल्ली
विशाल जंगल है आदमियों का
हर तरपफ उसमें बिखरे हैं
लाखों आदमी
बेतरतीब
बेडौल
भागते चूहों की तरह
बेतहाशा
निर्लक्ष्य
तेली के बैल
निरीह और हिंस्र
क्षुद्र और विशाल
विच्छिन्न
सद्घन और विरल
अनात्म और आत्ममुग्ध
स्थिर और गतिशील
बेजड़ बेझर वृक्ष!
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