नवंबर २००९
 
 
 
   
 
 
 
•अमरकांत को इलाहाबाद में ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित• जितेन्द्र श्रीवास्तव को देवीशंकर अवस्थी सम्मान•दिल्ली में विश्व (पुस्तक मेला ;राजकमल प्रकाशन के स्थापना दिवस पर तीन लखटिया पुरस्कारों की द्घोषणामहुआ माजी के उपन्यास 'मरंग गोड़ नीलकंठ हुआ' को तीसरा राजकमल कृति सम्मानविश्वनाथ त्रिापाठी की पुस्तक 'व्योमकेश दरवेश' को पहला सृजनात्मक गद्य सम्मान अमरेन्दु किशोर की कृति 'बादलों के रंग हवाओं के संग' को चौथा कृति सम्मानस्तंभ लेखक भारत भारद्वाज के खिलापफ वारंटद्ध)
 
 
 
कहानियां
एक रात नींद की तलाश में : इतालो काल्विनो
हर सुबह काम पर जाते हुए माकेविल्डो चौक के सरसब्८ा बागीचे के पास से गु८ारता। वहाँ चार गलियाँ आकर मिलती थीं। लोगों की सैर के लिए एक अलग-थलग छोटा-सा कोना। वो शाह बलूत के दरख़्त की उन बड़ी शाख़ों के बीच अपनी न८ारें उठाता, जहाँ वो द्घनी थीं और सूरज की किरणों को भी कम-कम दमकने देती थीं। उसे शाख़ों और पत्तों में छुपी हुई चिड़ियों का शोर-शराबा

सुनायी देता। उसे जैसे वो बुलबुलें दिखायी देतीं। वो अपने आप से कहता-आह! ८िांदगी में एक ही बार, काश! मैं परिन्दों की चहचहाह से जाग सकता, न कि द्घड़ी के अलार्म या नन्हें पावलिनों के रोने की आवा८ा से या पिफर बीवी दोमतला की चीखों या इसी तरह की आवा८ाों से। काश! मैं यहाँ सो सकता।

अकेला, इन ठंडे, द्घने, सब्८ा छतनारों के नीचे, न कि अपने छोटे-से गर्म कमरे में जहाँ कुन्बे के ख़र्राटे थे, बड़बड़ाहटें थीं और गली में दौड़ती हुई ट्रामों का बेपनाह शोर था और चुंधिया देने वाली हैड लाइट्स की रोशनियाँ थीं। यहाँ कैसा कु़दरती अंधेरा है। काश! मैं जगते ही हरी पत्तियाँ और नीला आसमान देख सकता। इन्हीं ख़यालों में डूबा बेहुनर म८ादूर मार्को अपने दिन की शुरूआत करता। आठ द्घंटों की हाड़तोड़ मेहनत के बाद भी उसे ओवरटाइम करना पड़ता। चौक के एक दूरदरा८ा कोने में शाह बलूत के गुम्बदनुमा छतनारों के नीचे एक अधछुपी बेंच थी। मार्को ने उसे अपने लिए चुन रखा था। गर्मियों की उन रातों में, जब कमरों में वे पाँचों सोया करते थे, वो नींद के लिए उस बेंच के ख़्वाब देखा करता। एक महल में किसी शाह छपरखट जैसा ख़्वाब।

एक रात जब उसकी बीवी ख़र्राटे ले रही थी और बच्चे नींद में डूबे हुए थे, वो चुपके से बिस्तर से उठा, कपड़े पहने और तकिया बग़ल में दबाए चौरास्ते की तरपफ़ आया। सुकून, ठंडक और ता८ागी ने बढ़कर उसका स्वागत किया। वो अपनी ख़ास बेंच के खय़ाल में डूबा हुआ था। उसे मालूम था कि वो लकड़ी की बेंच उसके स्प्रिंगदार बिस्तर के गर्म गद्देदार से बहरहाल नर्म और आरामदेह थी। बस, वो एक पल के लिए सितारों पर न८ार डालेगा, पिफर अपनी आँखें बंद कर लेगा और उसके बाद... एक गहरी, शांत नींद। ठंडक और सुकून का तो एहसास हुआ, लेकिन बेंच ख़ाली नहीं थी। उस पर एक प्रेमी जोड़ा बैठा हुआ था, जो दुनिया-जहान से बेगाने एक दूसरे में गुम थे इन्हें कैसे उठाया जाए? ख़ैर कोई बात नहीं। ये लोग सारी रात तो यहाँ रहेंगे नहीं। अभी चुंबन-आलिंगन में व्यस्त हैं। प्यार का खेल आख़िर अंजाम तक भी पहुँचेगा और ये चलते बनेंगे, लेकिन उसकी उम्मीद के बरअक्स वे आपस में झगड़ रहे थे। दो मुहब्बत करने वाले जब आपस में झगड़ते हैं, तो कह नहीं सकते कि वह झगड़ा कितना लंबा चलेगा।
प्रेमी कह रहा था, ''तुम यह क्यों नहीं मान लेती कि जब तुमने कहा कि 'क्या कहा तुमने?' तुम जानती हो, तुमने मुझे कितना सदमा पहुँचाया है? तुम्हारा बात करने का ढंग, यह रवैया, झूठमूठ ही सही... मगर मुझे इससे कोई खुशी नहीं हुई... समझी तुम?''
''मैं इसे कभी नहीं मानूँगी।'' लड़की कह रही थी।

'लानत है तुम पर।' मार्को ने दिल में कहा और आगे बढ़ गया। कुछ दूर चल कर उसने चाँद की तरपफ़ देखा। वो जोबन पर था-ख़ूब बड़ा और रोशन। दरख़्तों और छतों से कापफ़ी ऊँचा। वो वापस बेंच की तरपफ़ आया, हौले क़दमों से ताकि प्रेमी जोड़े को विघ्न न पड़े अलबत्ता दिल में यह उम्मीद भी थी कि उसे देख कर ये शायद उठ जाएँ। लेकिन उनकी बहस ख़त्म होने में नहीं आ रही थी।
''तो पिफर तुम इसे मानती हो ना।''
''नहीं नहीं, मैं इसे बिल्कुल नहीं मानती।''
''लेकिन अगर तुम इसे मान ही लो, तो कौन-सी कय़ामत आ जाएगी?''
''अच्छा ठीक है, अगर मैं कोई ची८ा मान भी लूँ, तो मैं यह नहीं जान पा रही हूँ कि आख़िर तुम मुझ से क्या मनवाना चाहते हो?''
झल्ला कर मार्को चाँद को देखने वापस पलट गया। पिफर वो ट्रैपिफ़क-सिग्नल देखने चला गया, जो वहाँ से ८ारा सी दूरी पर था। पीली रौशनी थोड़े अंतरालों से लगातार झपक रही थी। मार्को ने चाँद की ट्रैपिफ़क-सिग्नल से तुलना की। चाँद भी अपनी रहस्यमयी पीलाहट से ८ार्द था, लेकिन कहीं-कहीं हरा भी था और नीला भी, जबकि ट्रैपिफ़क-सिग्नल की बत्ती मामूली और पीली थी। चाँद बिना किसी हड़बड़ी के अपनी किरणें बिखेर रहा था और शांत था, जबकि ट्रैपिफ़क-सिग्नल जल-बुझ, जल-बुझ के बेचैनी दिखा रहा था, सिसकियाँ लेता हुआ, थका हुआ और पाबंद।

मार्को पिफर प्रेमी जोड़े की तरपफ़ गया, यह देखने के लिए कि अब शायद लड़की मान गयी होगी। लेकिन वो लगातार इन्कार किये चली जा रही थी। उल्टा लड़के से, मान लेने की ८िाद ठान रखी थी-''तो पिफर तुम मानते हो ना?''
''नहीं।'' लड़का भी अपनी जगह पर अड़ा हुआ था। एकाध द्घंटा इसी तरह गु८ार गया। अाख़िर में वो मान गया या शायद लड़की ने हार मान ली। मार्को ने उन्हें हाथ में हाथ डाले जाते हुए देखा। वो ते८ाी से बेंच की तरपफ़ लपका और अपने आप को उस पर पटक दिया, लेकिन पफ़ौरन ही उसे द्घर का ख़याल आ गया, जहाँ नर्म-गर्म बिस्तर था। उसने इस ख़याल को झटका और अपना सर तकिये पर टेक कर सोने की कोशिश करने लगा। वो ऐसी नींद सोना चाहता था जैसी बरसों से उसे नसीब नहीं हुई थी।
अब उसे निहायत ही आरामदेह जगह मिल गयी थी। इसके ख़ातिर अब वो दुनिया के नि८ााम में ८ारा भी बदलाव नहीं चाहता था। उसके ऊपर खुला आसमान था, लेकिन दरख़्तों के झुंड में उसने अपने आप को द्घिरा हुआ पाया। यही नहीं, उसे किसी जनरल की मूर्ति दिखाई दे रही थी जिसके हाथ में तलवार थी, मूर्ति के पीछे एक दरख़्त, पिफर एक और दरख़्त, एक नोटिस बोर्ड, पिफर तीसरा दरख़्त और पिफर ८ारा पफ़ासले पर ट्रैपिफ़क-सिग्नल की पीली, मुरझाई हुई बत्तियाँ-जल बुझ, जल बुझ करती हुईं।

वो थकन से चूर था, पिफर भी उसे नींद नहीं आ रही थी। उसे लगा, कोई ऐसी ची८ा है जो उसको ग़ुस्सा दिला रही है। शायद सिग्नल लाइट जिसकी लग-बुझ, लग-बुझ से वो परेशान हो गया। उसने सोचा, अगर वो सिग्नल लाइट न होती तो कितने आराम से सो सकता था! उसने अपनी आँखें बंद कर लीं, लेकिन सिग्नल लाइट की लग-बुझ उसे अपने पपोटों के अंदर महसूस होने लगी। ८ारा-८ारा देर बाद वो अपनी आँखें खोलता, तो हर तरपफ़ यही सब कुछ दिखायी देता।
वो उठ खड़ा हुआ। वो चाहता था कि सिग्नल-लाइट और अपने दरमियान कोई आड़ कर ले। वो जनरल की मूर्ति तक गया और आसपास कुछ तलाश करने लगा। मूर्ति के क़दमों में एक मुकुट रखा था, खूबसूरत और भारी जिस पर लिखा था : '१५ वाँ भाला-सवार, शानदार पफ़तह के मौके़ पर'। मार्को मूर्ति के पाये पर चढ़ गया और मुकुट उठाकर उसने जनरल की तलवार में लटका दिया।

इतने में चौकीदार साइकिल पर गश्त करता हुआ उधर से निकला। मार्को मूर्ति के पीछे छिप गया। चौकीदार ने मूर्ति के साये को ८ामीन पर हरकत करते हुए देखा, तो उसे कुछ शक गु८ारा। वो ठिठक गया। उसने देखा कि मुकुट तलवार पर लटक रहा है। उसे महसूस हुआ कि कोई ची८ा अपने ठिकाने पर नहीं है, लेकिन वो क्या ची८ा हो सकती है। उसने टॉर्च की रोशनी उधर डाली और इबारत पढ़ने लगा। पिफर उसने अपना सर हिलाया और चलता बना।
मार्को चौकीदार के लौट जाने तक चौक के चक्कर लगाता रहा। एक कऱीबी गली में म८ादूरों की एक टोली ट्राम लाइन की एक कैंची की मरम्मत कर रही थी। रात के वक़्त सुनसान गलियों में लोगों की ये छोटी-छोटी टोलियाँ वेल्डिंग की टॉर्चों में लाल रोशनी में नहाई हुई थीं। उनकी आवा८ों गूँज रही थीं और पिफर पफ़ौरन ही ओझल हो गयीं। एक रहस्यमय दृश्य था जिस तरह ये लोग ची८ाों को तैयार कर रहे थे, दिन के वक़्त मुक़ामी लोग हरगि८ा इस रहस्य को नहीं जान सकेंगे। मार्को वहाँ पहुँचा और खड़े-खड़े शोलों और वेल्डर की हरकतों को परेशानी के आलम में देखने लगा। उसकी उनींदी आँखें ते८ाी से मुंदती जा रही थीं। उसने सिगरेट के लिए अपनी जेब को टटोला, पर उसके पास माचिस नहीं थी।
''कोई माचिस देगा?'' उसने कारिंदों से पूछा।

''इससे जलाओगे?'' एक वेल्डर ने चिंगारियों की हड़बड़ा देने वाली पफुहार मारते हुए कहा। दूसरा कारिंदा खड़ा हुआ। उसके हाथ में जलता हुआ सिगरेट था, ''क्या तुम भी रातों को काम करते हो?''
''नहीं, मैं दिन में करता हूँ'', मार्को ने कहा।
''तो पिफर रात को, इस पहर, तुम यहाँ क्या कर रहे हो? हमलोग तो बस अब जाने ही वाले हैं।''
वो बेंच की तरपफ़ वापस आ गया और पाँव पसार कर लेट गया। सिग्नल लाइट अब उसकी आँखों से ओझल थी। आख़िरकार उसे नींद आ ही गयी।
इससे पहले उसने शोर पर ध्यान नहीं दिया था। अब उन हल्की-पफल्की सुरीली आवा८ाों, खौपफ़नाक गहरे-गहरे कश लेने की-सी, कभी न ख़त्म होने वाली, लगातार खुरचने और रगड़ने की मिली-जुली, नागवार-सी डरावनी आवा८ाों से उसके कान पूरी तरह भर गये। कोई आवा८ा, वेल्डिंग की आवा८ा से ८यादा दहलाने वाली नहीं, जैसे ढाटा बंधे मुँह की द्घुटी हुई चीख़। बग़ैर हरकत किये।

मार्को का चेहरा मुड़े हुए तकिये की विपरीत दिशा में था। उसने देखा कि निजात का कोई रास्ता नहीं है। लगातार शोर से पिफर उसे वेल्डिंग वाले याद आ गए। उसने अपनी आँखें खोलीं, बेंच पर करवट ली और शाख़ों के बीच से सितारों को देखने लगा। बेहरकत चिड़ियाँ पत्तों में छुपी हुई बेख़बर सोयी हुई थी।
एक परिंदे की तरह सोने के लिए चाहिए एक पंख, जिसके नीचे आप छुपा सकते हों अपना सर। अब मार्को को सोने के लिए किसी ची८ा की तलाश थी, लेकिन उस ची८ा के बारे में वो ख़ुद भी नहीं जानता था। उसके ८ोहन में एक ख़याल आया और वो खड़ा हो गया।
यह ख़याल स्पष्ट नहीं था। यूँ भी उस पर उनींदापन हावी था। उसे लग रहा था कि कहीं आसपास ही पानी से संबंधित कोई ची८ा है ८ारूर।
दरअसल वहाँ कऱीब ही एक पफ़व्वारा था, पनदेवियों और पनदेवताओं से सजा हुआ। पफ़व्वारों की धारों से बंधा हुआ एक झरना। संगतराशी का एक नमूना, पानी का एक तिलिस्मी तमाशा... लेकिन वो ख़ुश्क था। रात के वक़्त गर्मियों में महराबी नाला काम नहीं कर रहा था, क्योंकि उसे बंद कर दिया जाता था। मार्को नींद में चलने वाले शख़्स की तरह यूँ ही इधर-उधर पिफरता रहा।

उसने नल को खोल दिया। द्घोंद्घा मछलियों के मुँह से, देवताओं की दाढ़ियों से, द्घोड़ों के नथूनों से ते८ा धारे बह निकले। कृत्रिाम गुपफ़ाएं चमकीले जल धारों में छिप गयीं। इस जल-संगीत से सुनसान पड़ा चौक गूंजने लगा था। चौकीदार अपनी स्याह साइकिल पर एक बार पिफर उसी तरपफ़ उड़ा चला आ रहा था। जब उसने देखा कि पफ़व्वारा अपनी पूरी रफ्ऱतार से चल रहा है, तब वो साइकिल से गिरते-गिरते बचा। चौकीदार को देखते ही मार्को लपक कर बेंच की तरपफ़ गया और लेट गया। इस बार उसे ऐसा लगा, जैसे वो नदी के किनारे दरख़्तों की छांव में लेटा हुआ है। थोड़ी देर में उसे नींद आ गई।
अब उसने एक ख़्वाब देखा। एक डिनर का ख़्वाब, एक प्लेट इस तरह ढकी हुई है जैसे उसमें ख़ास तौर पर गर्म 'पास्ता' रखा गया हो। उसने बेसब्री से ढक्कन उठाया, तो प्लेट में मुर्दा चूहा न८ार आया जिसमें से बदबू के भभके उठ रहे थे। उसने बीवी की प्लेट में झांका, तो उसमें भी एक मुर्दा चूहा था। बच्चों की प्लेटों में और कई चूहे, निस्बतन छोटे, मगर उतने ही सड़े हुए। उसने डोंगे का ढक्कन उठाया, तो एक बिल्ली को पाया जिसकी तौंद पफूल कर कुप्पा हो रही थी। सड़ांध से उसकी आँख खुल गयीं।

कुछ दूरी पर एक गंदगी ढोने वाला ट्रक खड़ा था, जो रात के वक़्त कूड़ा-करकट भर कर ले जाता था। वो हैड लाइट्स की म(म रौशनी में भी दूर से देख कर अंदा८ाा लगा सकता था कि क्रेन खड़खड़ा रही है। लोग सायों की तरह कूड़े के ढेर पर खड़े हैं। उनके हाथ चर्ख़ी से बंधी कूड़े की छोटी ट्राली को संभाल रहे हैं, जो ट्रक में ख़ाली होती है और जिसे वो अपने बेलचों से पफ़ौरन ही पिफर भर देते हैं। बेपनाह शोर है... 'हाँ' ऊपर... अब जाने दो ...लानत हो तुम पर ...एक कुंद द्घंटाल जैसी झनझनाहट से इंजिन की सुस्त उठान जो ८ारा की ८ारा रुकता और पिफर वही धूम-धड़ाका दोबारा शुरू हो जाता।
लेकिन अब मार्को ने अपने आप को साध लिया था। उसने भौंडी आवा८ाों को न८ारअंदा८ा करना शुरू कर दिया। लेकिन बदबू का वो क्या करे? बदबू बढ़ती जा रही थी। वो बदहवास हो गया। बदबू से पीछा छुड़ाने के लिए कल्पना में पफूलों की खुशबू महसूस करने की नाकाम कोशिश में लग गया।

चौकीदार ने जब देखा कि एक साया चारों हाथों-पाँवों पर पफूलों की क्यारियों के कऱीब दौड़ता पिफर रहा है, तो वो द्घबरा गया। वो साया मक्खन के कुछ ख़ाली काग८ाी कप पफाड़ रहा है। वो अचानक ग़ायब हो गया। चौकीदार ने सोचा, यह ८ारूर कोई कुत्ता रहा होगा। कुत्ते पकड़ना उसकी ८िाम्मेदारी नहीं है। कुत्ते पकड़ने वाले जानें या पिफर प्राणी-विशेषज्ञ का सरदर्द है। हो सकता है, यह चाँदनी रातों में निकलने वाला कोई भेड़ियानुमा भूत हो। उसे क्या? उनका पीछा करना या पकड़ना उसकी ८िाम्मेदारियों में शामिल नहीं है। इसलिए वो एक मोड़ पर द्घूम गया।
उसके जाते ही मार्को वापस अपने ठिकाने पर आया और कीचड़ में लिथड़े हुए मक्खन के कपों को नाक के पास लाकर निचोड़ने लगा। लेकिन उनमें ख़ुशबू कहाँ थी। उनमें ओस की, मिट्टी की और रौंदी-कुचली द्घास की बास आ रही थी। पिफर भी ग़नीमत थी। बदबू का एहसास अब कुछ कम हो गया था। उसे नींद आने लगी और वो सो गया। सुबह कऱीब ही थी।
अचानक वो हड़बड़ा कर उठा। तीखी धूप धमाके की तरह उसके सर पर थी।

वो द्घबराकर सरकारी नल की तरपफ़ दौड़ा, जिसका इस्तेमाल माली पफूलों की क्यारियों में पानी देने के लिए करते थे। नल की ठंडी बौछारों से उसके कपड़े भीग गये। चारों तरपफ़ ट्रामें शोर मचाती पिफर रही थीं। ट्रक मार्केट जा रहे थे। ठेले, पिक-अप और मोटर साइकिलों पर सवार कारिंदे अपने-अपने काम पर भागे जा रहे थे। दुकानों के शटर धड़ाधड़ उठाए जा रहे थे और द्घरों की खिड़कियों से पर्दे लपेटे जा रहे थे और शीशे चमक रहे थे। उसका मुँह और आँखें चिपचिपा रही थीं। उस वक़्त वो सख़्त उलझन में था। कमर अकड़ी हुई थी और कूल्हे छिल गए थे, गोया रातभर वो एक इम्तिहान से गु८ारा था।
वो बजाय द्घर जाने के, ते८ा-ते८ा क़दमों से अपने काम पर रवाना हो गया।

;अनुवादक : हसन जमाल
पाँच कहानी संग्रह प्रकाशित। बच्चों के लिए भी गंभीरतापूर्वक लेखन। दो जुबानों की पत्रिाका 'शेष' का संपादन।द्ध, पन्ना निवास ;साइकिल मार्केटद्ध के पास, लोहारपुरा, जोध्पुर-३४२००२, राजस्थान, मो. ९८२९३१४०१८

 
 
 
ऊपर जाये...
पिछे जाये...
 
 
  Copyright 2009 | All right reserved Powered by : Innovative Web Ideas
(A division of Innovative Infonet Private Limited)