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ऐसी उम्मीद 'पाखी' से बिलकुल नहीं थी। मुझे लगता है कि मेरी ही तरह, हर पाठक ठगा सा महसूस कर रहा होगा।
मुझे यह बिलकुल समझ नहीं आया कि नामवर जी से हुई बातचीत का आधार क्या रहा? नामवर जी जैसे 'दिग्गज' के सामने बिना लम्बी तैयारी के जाना खुद को 'दिक् अज' ;मेढ़ाद्ध बनाना ही होगा। आपने युवा कहानीकार को ऐसा धुनवाया कि लोगों को यह कहने को बल मिल गया कि ये युवा कहानीकार कुछ पढ़ते-वढ़ते नहीं हैं। कहानी लिखना और वह भी बिना परंपरा को जाने, समझे और आत्मसात किए, तो यही नियति होगी। किसी अबोध की तरह, 'अपराध' जैसी कहानी को 'एक बच्चे की याद के रूप में' देखना मानो सारी कथा सृष्टि को 'एक बच्चे की स्मृति से' देखना भी है।
यह तो नामवर जी का शरणागत वत्सल भाव ;?द्ध है कि बार-बार खुद ही बचाते हैं, ओट देते हैं, सहारा बनते हैं, वरना प्रेम भारद्वाज जैसे सचेत और शैलेय जैसे प्रतिब( रचनाकारों ने तो होश ठिकाने लगाकर ही दम लेना था। और प्रभाष जी?..जब यह 'बालक दुर्दशा' देखी न गई तो वे उठकर दृश्य से बाहर चले गए।
यह बातचीत पत्रिाका के चौदह पन्नों में पफैली है पर युवा कथाकार किसी 'एक्सट्रा' की तरह हाशिए पर है। पूरी बातचीत में, नामवर जी का 'अमिताभ बच्चनीय स्टाइल' में, महानायक की तरह, सारी पिफल्म पर कब्जा है। अपूर्व जोशी, प्रेम भारद्वाज और शैलेय जी की भूमिका निर्देशक आदि की है। पर निर्देशक ही अब क्या करेंगे.., ये तो 'कास्टिंग' के वक्त सोचा जाना चाहिए था।
होना यह चाहिए था कि तरुण भटनागर, प्रभात रंजन, पंकज मित्रा, मनीषा कुलश्रेष्ठ या संजय कुंदन जैसे कोई युवा रचनाकार नामवर जी जैसे किसी वरिष्ठ आलोचक के सामने निर्भय होकर बैठता और युवाओं की कहानियों के बोध और विषयों की भिन्नता के साथ-साथ परंपरा पर अपनी टिप्पणी रखता। विचारधारा की जरूरत, गैर जरूरत और आनुपातिक जरूरत पर भी, परंपरा और वर्तमान के परिप्रेक्ष्य में दृष्टि स्पष्ट करना तथा अंतरराष्ट्रीय संदर्भों में बदलते सृजनरत युवा की तस्वीर बनाता।
इससे युवा कहानीकार बेनकाब नहीं हुए हैं क्योंकि उनकी बात वहाँ से कही ही नहीं गई, पर कुछ तो जरूर है, जो 'बेपर्दा' हुआ है, उसी का अपफसोस है।
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