मैं वहाँ से बोल रहा हूँ, जहाँ मोहनजोदड़ो के तालाब की आखरी सीढ़ी है, जिस पर एक औरत की जली हुई लाश है और तालाब में इंसानों की हड्डियाँ बिखरी पड़ी हैं। ...मैं सोचता हूँ, और बहरहाम सोचता हूँ कि आखिर क्या बात है कि प्राचीन सभ्यताओं के मुहाने पर एक औरत की जली हुई लाश और इंसानों की बिखरी हुई हड्डियाँ मिलती हैं। एक औरत जो माँ हो सकती है, बहन, बेटी हो सकती है। मैं कहता हूँ हट जाओ मेरे सामने से कि मेरा खून टकरा रहा है, कलेजा जल रहा है-मेरी माँ, बहन, बेटी, को मारा गया है। ...बेटी कहती है-पापा हम बेटियाँ तो लकड़ियाँ होती हैं जो बड़ी होने पर चूल्हे में झोंक दी जाती हैं। ...और इंसानों की बिखरी हड्डियाँ-ये रोमन गुलामों की भी हो सकती हैं और पश्चिम बंगाल के जुलाहों की भी। साम्राज्य आखिर साम्राज्य होता है वो चाहे रोमन साम्राज्य हो या ब्रिटिश साम्राज्य। उसका एक ही काम होता है इंसानों की हड्डियाँ बिखेर देना...। मैं इन प्रतिज्ञाओं में जीता हूँ कि साम्रज्यवाद को खत्म करने के लिए दुनिया के सारे गुलामों को इकट्ठा कर एक दिन रोम आएगा जरूर... लेकिन हम कहीं नहीं जाएँगे।''
उपरोक्त कथ्य है एक ऐसे व्यक्ति का जो बेहद संवेदनशील है। बेचैन। जनता की चिंता से जुड़ा। परिवार होते हुए अपरिवारिक। जिसका जीवन, आचरण मौजूदा व्यवस्था के प्रति विद्रोह है। लोग उन्हें सम्मान से 'विद्रोही जी' कह संबोधित करते हैं। नाम है-रामनाथ यादव विद्रोही। पता है जेएनयू कैंपस का गंगा ढाबा। कुछ लोग जो नासमझ हैं-नहीं समझते भावनाओं की 'भाप' को। तराजू में तौलते हैं हर भाव। आदमी को उसकी कामयाबी और धन बल से। ये वही चंद लोग हैं जो विद्रोही जी को 'विक्षिप्त' नहीं भी तो अर्(विक्षिप्त के दायरे में द्घसीट लाते हैं। नए जमाने के सोचने का अपना ढंग है। एक अलग किस्म की मतलबपरस्त्त-समझौतावादी मानसिक बुनावट। जो व्यवस्था के भ्रष्ट पाये का अवयव है, वो प्रतिष्ठित। समाज की सम्मानित हस्ती। जो व्यवस्था के सड़े-गले हिस्से पर ऊंगली उठाए वो विद्रोही। कभी आधा पागल, तो कभी पूरा। केवल हम ही नहीं, विद्रोही जी भी जानते हैं कि वो दौर और था जब-''सच कहना अगर बगावत है तो कह दो कि हम बागी हैं' का नायकत्वपूर्ण जुमला उछाला जाता था। कई लोग सच की राह पर चलते हुए बागी बन गए थे। बगावत तो अब भी होती है। द्घर-परिवार और सबसे ज्यादा सियासी दलों में-मगर वह सच के लिए तो कतई नहीं। हर बार सत्ता के लिए ही होती है। सत्ता और संद्घर्ष की राहों का पफर्क जानते-समझते हुए भी विद्रोही जी का एक अभिनव ढंग का विद्रोह जारी है।
ऊपर के वक्तव्य में विद्रोही जी ने एक सच बात कही है कि वो चाहते तो थे दुनिया भर के मजदूरों को एक कर रोम जाना, मगर वे कहीं नहीं जाएँगे। विद्रोही जी तो 'विद्रोह' करते हैं। वे सत्ता के व्याकरण के विरु( भी है। मगर उनकी भौगोलिक दुनिया बहुत छोटी है। वो आपको दिल्ली जेएनयू कैंपस गंगा ढाबे के इर्द गिर्द मिल जाएँगे। किसी जलते मसले पर विचारोत्तेजक बातें करते। कविता पढ़ते। उसे जीते-बुनते। किसी जनपक्षीय मुद्दे पर हो रहे प्रदर्शन में भाग लेते। किसी सभा जुलूस में। नहीं तो गंगा ढाबे के एक किसी उदास कोने में चुपचाप चाय पीते.. छात्राों के हर इंसापफपरस्त इंकलाब के साथी। जब तक गंगा ढाबा बंद नहीं हो जाता तब तक वहीं रहते हैं। ढाबा बंद हो जाने के बाद ऐसा नहीं है कि वो द्घर ही लौटेंगे। द्घर लौटे तो उन्हें हफ्रता तो अमूमन, कभी-कभी तो महीना भी हो जाता है। पत्नी है-स्कूल में पढ़ाती है। बेटा है। बेटी है। वो भी इसी जेएनयू में पढ़ना चाहती हैं। लेकिन पिता की तरह नहीं।
आपका सवाल हो सकता है। विद्रोही जी कब से जेएनयू में इस तरह से अपना ठिकाना बनाए हुए हैं। ढाई दशक से ज्यादा समय तो जरूर हो गया होगा। वे यहाँ पढ़ने आए थे। हिन्दी विभाग के छात्रा थे। पिफर पढ़ाई के दौरान ही कुछ ऐसा हुआ जिसने उन्हें अतिसंवेदनशील कर मन के शीशे में किरचें डाल गया। वो द्घटना क्या थी। उसके बारे में कयास है। किंवदंतियाँ हैं। सच्चाई सिपर्फ विद्रोही जी जानते हैं। मगर वे कभी नहीं बताते। बहुत कुरेदने पर भी नहीं। प्रथम किंवदंती के अनुसार उनके छात्रा-जीवन के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्राी इंदिरा गाँधी आने वाली थीं-रामनाथ यादव ;तब तक विद्रोही जी उपनाम नहीं पड़ा थाद्ध ने उसका विरोध किया था। विश्वविद्यालय प्रशासन के आदेश को भी उन्होंने नहीं माना। नतीजतन सजा के तौर पर उन्हें विश्वविद्यालय से रेस्टिकेट कर दिया गया। एक अन्य किंवदंती के मुताबिक उन्होंने टर्म और सेमिनार पेपर लिखने की जगह बोलने का हठ पकड़ लिया और प्रोपफेसरों को कहा कि उनके 'बोलने' पर ही मूल्यांकन किया जाए। विश्वविद्यालय प्रशासन ने इसकी इजाजत नहीं दी। ऐसे में होना क्या था-विद्रोही जी अमूल्यांकित ही रह गए। हकीकत चाहे जो हो। किसी भी द्घटना ने उनके मन को ठेस पहुँचाई है। मगर द्घनानंद या किसी और की तरह पलायन नहीं किया। उन्होंने देश की राजधानी के इस सबसे बड़े वैचारिक केन्द्र में अपना बथान बना लिया। एक स्थायी ठिकाना। वे द्घर-परिवार के पास उसी तरह लौटते हैं जैसे कोई किसान कभी-कभार किसी काम से शहर जाता है। जीना इसी गली में-मरना इसी गली में। जाएँ तो जाएँ कहाँ वाला भाव। छात्रा कहते हैं यहाँ के वे नागरिक भी हैं। राष्ट्रपति भी। अद्घोषित।
अतिशय भावुकता पागलपन की ओर ले जाती है। ज्यादा संवेदनशीलता दुनियावी सपफलता में सबसे बड़ी बाधा बन जाता है। विद्रोही जी का जीवन ही कविता है। कविता ही जीवन। दोनों में भेद नहीं। कुछ जिंदगियाँ ऐसी होती हैं जो व्यवस्था के प्रति विद्रोह का शक्ल अख्तियार कर लेती हैं। बड़ी बात है किसी जीवन का विद्रोह बन जाना। विद्रोही जी का जीवन बन गया है। ये किसी के भी नहीं हैं-माँ, पत्नी, बेटा, बेटी, मित्रा यहाँ तक कि खुद के भी नहीं। पूरी तरह से देश के भी नहीं। अलबत्ता देश में रहने वाले शोषित, वंचित, उपेक्षित जन के हैं। और उसी के बारे में हर पल सोचते हैं। बोलते हैं। सभा जुलूस में भाग लेते हैं। क्या ऐसे लोग दूसरी आजादी के अथक यो(ा नहीं हैं?
मौजूदा तंत्रा का हिस्सा न बनना। उसके खिलापफ अदृश्य पंक्ति में बैठना ही अपने आप में बगावत है। देखने में ये चीजें मामूली लगती हैं। होतीं नहीं। बड़ा जिगरा चाहिए। अपना द्घर जलाने का जिगरा। कबीर किताबों में अच्छे लगते हैं। पढ़ते हुए। बहुत कठिन है कबीर बनना। लेकिन कबीर की अपनी परंपरा है। वह विद्रोही जी जैसे लोगों में आज भी बरकरार है। सब तुलसी, सूर, केशवदास ही बनते हैं। भक्ति में सराबोर। चाहे दास भाव हो चाहे सखा भाव, दरबारी व्यवस्था के प्रति बगावत का बिगुल पफँूकने वाले ही कबीर बनते हैं। कबीर के भीतर नाराजगी थी। आक्रोश था। कविता लिखते नहीं, जीते थे। राजकमल चौधरी, धूमिल, आलोक धन्वा की परंपरा को आगे बढ़ाते हैं विद्रोही जी। कविता के प्रतिमान पर नहीं, भाव के स्वर पर। राजकमल चौधरी लिखते हैं।
''आदमी को तोड़ती नई लोकतांत्रिाक प(तियाँ/केवल पेट के बल/उसे झुका देती हैं/धीरे-धीरे नपुंसक बना लेने के लिए/उसे शिष्ट राजभक्त/देश प्रेमी नागरिक बना लेते हैं/आदमी को इस लोकतांत्रिाक संसार में/अलग हो जाना चाहिए''
नाराज आलोक धन्वा भी कम नहीं हैं जो कहते हैं-
''मेरा गुस्सा/जनमत की चढ़ी हुई नदी में/ऐसे पड़ा हुआ काठ है/लेखन और न्यूयार्क को द्घुण्डीदार तसमो से/डमरू की तरह बजता हुआ मेरा चरित्रा/अंग्रेजी का ८ ही।''
विद्रोही जी की अपनी जिद है। हठ है। वे आसमान में धान बोने की जिद पर बरसों से अड़े हुए हैं-
मैं किसान हूँ/आसमान में धान बो रहा हूँ/कुछ लोग हैं जो कह रहे हैं कि/पगले आसमान में धान नहीं जमा करता/मैं कहता हूँ गेगले-गोगले पगले/अगर जमीन पर भगवान जम सकता है/तो आसमान में धान भी जम सकता है/और अब तो दोनों में से कोई होकर रहेगा।/या तो जमीन से भगवान ऊखडेग़ा/या आसमान में धान जमेगी।
कहा जा सकता है कि विद्रोही जी बहुत जिद्दी हैं। जिद हमेशा तार्किक हो जरूरी नहीं। वहाँ भावना प्रबल होती है। कई बार अहं की वजह से। जिद का दिमाग से नहीं, दिल से रिश्ता हुआ करता है। संवेदनशीलता की राह में जिद्द के कई 'माईल स्टोन' आते हैं। विद्रोही जी ने कैंपस न छोड़ने की जिद पकड़ी। कैंपस को उन्होंने कैरियर का पायदान नहीं बनाया जैसा सभी छात्रा बनाते हैं। बनाना भी चाहिए। उसमें कोई बुराई नहीं। लेकिन उन्होंने इस कैंपस से रिश्ता जोड़ लिया। आज के दौर में जहाँ हर रिश्ते इतनी जल्दी टूट जाते हैं। या उसमें शिथिलता आ जाती है। बेहद कमजोर पड़ जाते हैं। वे नहीं मानते कि हर रिश्ते की उम्र होती है। एक अवधि के बाद रिश्ता टूट जाता है-या उसकी पालकी ढोयी जाती है। अधिकतर लोग रिश्तों की पालकी ढोते हैं। कंधा दुखता है। छिल भी जाता है कभी-कभी। वे दुःखी रहते हैं। मगर पालकी ढोना मजबूरी है। विद्रोही जी का कैंपस से पिछले ढाई दशक से रिश्ता है। समय के रथ के नीचे दबकर वह तनिक भी कमजोर नहीं पड़ा है। यहाँ उन्होंने कई पीढ़ियाँ देखी हैं। क्रांतिकारी विचारों के मशाल को सुविधाओं के राजमहल में रोशनदान के रूप में, सजावट की वस्तु में तब्दील होते देखा है। छात्राों को विचारों के लिए मरते, पिफर उनके ही विचारों को पफना होते भी देखा है। उन्होंने देखा है कि कैसे एक छात्रा यहाँ से निकलकर बिहार के बाहुबली सांसद शहाबुदीन के इलाके में खम ठोंकता है और मार दिया जाता है। एक चन्द्रशेखर नाम का यह शख्स लोगों के जेहन में महपफूज है।
लेकिन हर साल सैकड़ों-हजारों की संख्या में यहाँ से िनकलने वाले छात्रा क्रांति, जनसरोकार और विचारों की गठरी लेकर कौन सी दुनिया में जाकर कहाँ, उन्हें नहीं मालूम, मर-बिला जाते हैं। इस कैंपस से बाहर निकलते ही वे यहाँ की बातें क्यों इतनी जल्दी भूल जाती हैं। यहाँ की बातें, कसमे-वादे, दुनिया को बेहतर बनाने के सपने। सब कुछ क्या कोई लक्ष्मण रेखा है जिसको पार करते ही हर विद्रोही व्यवस्थावादी यानी सुविधाभोगी में तब्दील हो जाता है। क्या जाने यही सोचकर विद्रोही जी ने कैंपस को भी न छोड़ने का निर्णय लिया हो। वे यहीं रहकर अलख जगा रहे हैं भले ही उनके सत्ता का तिलिस्म न टूटे मन का कायरपन तो दूर होता ही है। इसी में उनकी सार्थकता है। सार्थकता, जो सपफलता से ऊंची और बड़ी होती है। |