| इतना डिपफेंसिव होने की जरूरत... : डॉ. रजनी गुप्त |
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पाखी' का नया अंक देखा.., साक्षात्कार पढ़ते-पढ़ते नई पीढ़ी के विचार पता चले। न जाने क्यों चंदन बार-बार अपने साथियों को बचाते नजर आते हैं? हम सभी जानते हैं कि लेखक को जीवन की सच्ची अनुभूतियों को वाणी देना चाहिए है। लेखक जो जीवन के निकट जाकर जीवन से प्रतिब( हो तो उसे किसी और के साथ प्रतिब( होने की क्या जरूरत है? साहित्य सृजन एकांत क्षणों की वाणी होकर सीधे अपने पाठक तक जाता है और पाठक सीधे-सीधे लेखक तक..
न किसी वाद, न आंदोलन, न सभा-सोसाइटी, न गुटबंदी-बल्कि विज्ञापन या प्रचार-प्रसार द्वारा दो-चार-छह लोगों को थोड़ी देर के लिए उभार-उछाल भले ही दिया जाए पर सृजन का आंतरिक मूल्य निर्धारित करने के लिए काल जिस मानदण्ड का प्रयोग करता है उसे बनाने में वे योग नहीं देते। आंदोलन या गुटबंदी का उपयोग चंद लोग ही कर पाते हैं जबकि उनमें प्रतिभा का होना जरूरी है।
मेरा मानना है, साहित्य के क्षेत्रा में मनुष्य किसी के गिराने से नहीं बल्कि अपनी कृतियों की कमजोरी से उठता है या गिरता है। किसी का नाम न लेकर सिपर्फ इतना कहना चाहूँगी कि यह पीढ़ी अपनी रचनात्मक क्षमता को मजबूत करती रहे तो निश्चित रूप से अपनी उपस्थिति दर्ज करा पाएगी वरना... रब ही राखे।
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