नवंबर २००९
 
 
 
   
 
 
 
•अमरकांत को इलाहाबाद में ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित• जितेन्द्र श्रीवास्तव को देवीशंकर अवस्थी सम्मान•दिल्ली में विश्व (पुस्तक मेला ;राजकमल प्रकाशन के स्थापना दिवस पर तीन लखटिया पुरस्कारों की द्घोषणामहुआ माजी के उपन्यास 'मरंग गोड़ नीलकंठ हुआ' को तीसरा राजकमल कृति सम्मानविश्वनाथ त्रिापाठी की पुस्तक 'व्योमकेश दरवेश' को पहला सृजनात्मक गद्य सम्मान अमरेन्दु किशोर की कृति 'बादलों के रंग हवाओं के संग' को चौथा कृति सम्मानस्तंभ लेखक भारत भारद्वाज के खिलापफ वारंटद्ध)
 
 
 
कहानियां
जादू : प्रकाश मनु
खैर, आप नहीं मानते, तो उस नन्ही-सी जान...यानी चिड़िया के उस नन्हे शरीर बच्चे को ही कहानी का नायक मान लेते हैं!...पर अब मेहरबानी करके थोड़ा पीछे चलें।...अतीत के उस छोर पर, जब चिड़िया का बच्चा अभी अस्तित्व में नहीं आया था...चिड़िया ने द्घोंसला बनाया है नंदू के छोटे से द्घर में...और नंदू खुश है। इतना खुश, इतना खुश, मानो उसके पंख उग आए हों और वह जब चाहे आसमान की सैर कर सकता है।

इए, पहले इस कहानी के नायक से मिलते हैं। हमारी इस कहानी का नायक है-नंदू। एक बड़ा ही नटखट, चपल-चंचल, गोल मुटल्ला नंदू। शाम के समय वह खेल के मैदान से तेजी से भागता हुआ द्घर आ रहा हो, तो आप धेखा खा जाएँ। लगेगा, यह नंदू नहीं, आकाश से बाल सूर्य उतरा है, चमकती आँखों और सुर्ख टमाटर जैसे लाल-लाल गालों वाला...। बच्चे तो बहुत होते हैं और सभी प्यारे-प्यारे होते हैं, पर नंदू तो भई, नंदू ही है, इसलिए कि वह हमारी कहानी का नटखट, चपल-चंचल, गोल मुटल्ला नंदू है...जिसकी आँखों में हर वक्त उत्साह की चमक दिखाई देती है।

मगर भई, कहानी का नायक वह नन्ही-सी जान...यानी वह जरा-सा, शरीर, उध्मी चिड़िया का बच्चा भी तो हो सकता है, जो अपने नन्हे-नन्हे रोएंदार भाई-बहनों से झगड़ते हुए एकाएक द्घोंसले से निकलकर बाहर आ गिरा था और...और...उसने एक नन्ही-सी कहानी को जन्म दिया था! पफर्श पर इध्र-उध्र बिखरे तिनकों के साथ, एक बेहद मासूम, रोएंदार नन्हीं शख्सियत महसूस की जा सकती थी।...और वह नन्ही कहानी भी, जो मैं सुनाने जा रहा हूँ।...
खैर, आप नहीं मानते, तो उस नन्ही-सी जान...यानी चिड़िया के उस नन्हे शरीर बच्चे को ही कहानी का नायक मान लेते हैं!...पर अब मेहरबानी करके थोड़ा पीछे चलें।...अतीत के उस छोर पर, जब चिड़िया का बच्चा अभी अस्तित्व में नहीं आया था...चिड़िया ने द्घोंसला बनाया है नंदू के छोटे से द्घर में...और नंदू खुश है। इतना खुश, इतना खुश, मानो उसके पंख उग आए हों और वह जब चाहे आसमान की सैर कर सकता है।

बेशक जब से उस चिड़िया और चिड़े ने उसके द्घर के आंगन में, दीवार की खोखल में अपना द्घोंसला बनाया है, तभी से उसकी यह हालत है। जब देखो, वह उड़ा-उड़ा-सा दिखाई देता है।

नंदू की मम्मी यानी मिसेज आनंद हैरान हैं, आंगन की दीवार में एक ईंट की जगह न जाने कैसे खाली रह गई थी। बस, चिड़िया को द्घोंसला बनाने के लिए वह जंच गई। और अब तो दिन में पचासों चक्कर उसके लगते हैं। ....कभी तिनके ला रही है, कभी द्घास, कभी सुतली, कभी पफूस, कभी कुछ और। नंदू को मानो दिन भर का काम मिल गया। दिन में बीसियों दपफा मेज पर चढ़कर, उचक-उचककर देखता है, चिड़िया के द्घोंसले में कितनी 'प्रोग्रेस' हुई?...क्या-क्या नई चीजें आ रही हैं। और उन्हें कहाँ-कहाँ जंचाया जा रहा है।
और यह सब देखकर वह दौड़ा-दौड़ा मम्मी के पास जाता है तथा सारा हाल और द्घोंसले के बारे में 'ताजा समाचार' मम्मी को बताता है। और पिफर खोद-खोदकर मम्मी से सवाल पूछता है कि मम्मी, चिड़िया यह क्यों करती है? वह क्यों करती है? और चिड़िया के द्घोंसले में अंडे कब आएँगे? कब आएँगे चिड़िया के बच्चे?

मिसेज आनंद पफुर्सत में होती हैं, तो थोड़ा-बहुत बता देती हैं। मगर कभी काम में लगी हों, तो गाल पर हल्की-सी चपत लगाकर कहती हैं-''जा भाग, तुझे और कोई काम नहीं है?...दुष्ट कहीं का!''
मगर क्या करे नंदू? उसका मन तो चिड़िया के द्घोंसले से हटता ही नहीं। और उसे लगता है कि उसे तो इतना बड़ा खजाना मिल गया है, इतना बड़ा कि कुछ न पूछो। स्कूल में अपने दोस्तों को भी यह सब बताता है, तो वे हैरानी से ताकते रह जाते हैं। और आस-पड़ोस के बच्चे तो द्घर तक चले आते हैं-''दिखा तो नंदू, कहाँ है चिड़िया का द्घोंसला?'' और नंदू एकदम राजाओं वाली शान और अकड़ से वह चिड़िया का द्घोंसला दिखाता है और उसके बारे में एक-एक छोटी से छोटी बात भी बताना नहीं भूलता।

''एक दिन ऐसा हुआ...ऐसा कि चिड़िया हमारे द्घर आई...साथ में अपने चिड़े को भी लाई। उसने यहाँ देखा, वहाँ देखा...इध्र उड़ी, उध्र उड़ी...और पंखे की टोपी के ऊपर वाले हिस्से में द्घोंसला बनाने लगी कि मैंने उसे टोका। पिफर दरवाजे के ऊपर वाले रोशनदान पर उसने रखने शुरू किए तिनके। सारा पफर्श गंदा हो गया, तो मम्मी ने रोका...मुश्किल से हटाया। पिफर चिड़िया को भा गई यह जगह।...देख रहे हो ना दीवार के बीच छूटी यह छोटी-सी जगह। बस, अब तो चिड़िया और श्रीमान चिड़ा सारा दिन तिनके ला रहे हैं, ध्र रहे हैं, द्घोंसला बना रहे हैं...वो मार-तूपफान इन्होंने मचाया कि क्या कहने। मगर भई, पिफर द्घोंसला बना, बनकर रहा। और अब तो अंडे भी आएँगे, पिफर चिड़िया के बच्चे...।'' नंदू की कहानी हमेशा यहीं से श्ाुरू होती और पफैलते-पफैलते इतनी पफैल जाती कि खुद को कुछ सुध्-बुध् न रहती।
नंदू के दोस्त हैरान होते हैं-आजकल यह नंदू को क्या हो गया है?...बात कहीं की हो, उड़ते-उड़ते कहाँ से कहाँ जा पहुँचता है! अब यही लो। बात तो हो रही थी चिड़िया के द्घोंसले की, मगर यह तो ऐसा लगता है, जैसे महादेवी वर्मा की कविता सुना रहा हो!...

...पिफर कुछ रोज बाद चिड़िया ने अंडे दिए। और अब तीन-चार दिनों से, जब से चिड़िया के बच्चों की आवाजें सुनाई देने लगी है, नंदू की उत्सुकता का कोई पार नहीं रहा है। वह उछलकर मेज पर चढ़ता है, बड़े गौर से चिड़िया को अपने बच्चों के मुँह में दाना डालते देखता है और कूदकर पिफर नीचे। पढ़ते-पढ़ते उसका ध्यान उचटता है और वह झट मेज पर खड़ा होकर चिड़िया के बच्चों को देखने लगता है।
सुबह उठते ही उसका पहला काम यही होता है। मेज पर खड़ा होकर चिड़िया के बच्चों को 'चीं-चीं' करते देखता है और पिफर खुश होकर अपने काम में लग जाता है। स्कूल जाने से पहले चिड़िया के बच्चों को 'टा-टा' कहना भी नहीं भूलता। शाम को स्कूल से आते ही बस्ता पफेंककर सीध मेज पर आ खड़ा होता है और चिड़िया के द्घोंसले के आगे ऐसे खड़ा हो जाता है, मानो अभी-अभी दुनिया का सबसे नया, नायाब तमाशा यहाँ होने जा रहा हो।

रोज स्कूल से आकर वह मम्मी से यह पूछना भी नहीं भूलता-''मम्मी, चिड़िया आई थी अपने बच्चों के लिए दाना लेकर?...कहीं भूल तो नहीं गई?...वे कहीं भूखे तो नहीं होंगे?...हैं मम्मी?''
सुनकर द्घर और दफ्रतर के ख्यालों के बीच उलझी मिसेज आनंद खिलखिला कर हँस देती हैं। एक हल्की-सी चपत नंदू के गाल पर लगाकर कहती हैं-''तू क्यों चिंता करता है नंदू? चिड़िया खुद अपने बच्चों की चिंता कर लेगी।''
या कभी-कभी उसे टालते हुए कहती हैं-''यह सब बाद में...पहले तू अपना खाना तो खत्म कर।''
मगर नंदू जब तक बीसियों बातें चिड़िया के बारे में नहीं पूछ लेगा और जब तक बीसियों दपफा मेज पर चढ़कर खुद अपनी आंखों से चिड़िया के बच्चों का हाल-चाल नहीं पता कर लेगा, तब तक उसे चैन नहीं।

कई बार मिसेज आनंद खीझ भी जाती हैं। कुछ बरस पहले मि. आनंद का तबादला बंगलौर हो जाने के कारण, द्घर की दोहरी जिम्मेदारियों से लदी-पफंदी मिसेज आनंद जब गुस्से को जज्ब नहीं कर पातीं, तो डपटकर कहती हैं-''तू तो बड़ा उतावला है नंदू। देखना, किसी दिन तू चिड़ियों के बच्चों को हाथ लगाएगा और पिफर चिड़िया इन्हें यहीं छोड़ जाएगी। ये भूखे कलपते रहेंगे-याद रखना।''
तब से डर के मारे नंदू ने चिड़िया के बच्चों को हाथ तो नहीं लगाया, लेकिन उन्हें बार-बार देखने की खुदर-बुदर तो मन में मची ही रहती है। उसे लगता है, दुनिया का सबसे बड़ा खजाना उसके हाथ में है। हीरे और रत्नों से भी बड़ा। भला वह उसे देखने से अपने आपको कैसे रोके?

यों ही एक-एक कर दिन बीतते जाते थे। मानो पंख लगाकर उड़ रहे हों। और नंदू की प्रसन्नता का कोई अंत नहीं था।

लेकिन आज तो कुछ ऐसी अजीब-सी हरकत हो गई कि उसकी समझ में नहीं आ रहा था-वह क्या करे, क्या नहीं।...चिड़िया के बच्चों का क्या हाल है, यह तो देखना चाहिए।''
उसने मेज पर चढ़कर देखा, तो जी ध्क से रह गया। चिड़िया के चार बच्चों में से तीन ही थे। चौथा कहाँ गया! कहीं चील तो झपट्टा मारकर नहीं ले गई, या बिल्ली...?
नंदू ने द्घबराकर इध्र-उध्र देखा और उदास होकर मेज से नीचे उतर आया...
मगर मेज से नीचे आते ही वह चौंका। आंगन के एक कोने में वही चिड़िया का बच्चा था...एकदम वही! डर के मारे एकदम सिकुड़ा हुआ-सा बैठा था।
देखते ही नंदू की सारी उदासी गायब हो गई। एकबारगी तो उसे इतनी खुशी हुई कि वह मारे खुशी के चीख पड़ने को हुआ। पिफर अचानक उसका ध्यान इस बात की ओर गया कि चिड़िया का बच्चा डरा हुआ है...इतनी देर से भूखा-प्यासा भी होगा।...कहीं इसे पानी की जरूरत तो नहीं है?
वह एक कटोरी में पानी भर लाया और उसे चिड़िया के बच्चे के पास रखा। मगर वह छुटका-सा चिड़िया का बच्चा पानी पिए कैसे?

नंदू उलझन में है। मगर ठीक समय पर उसे गुपलू की याद आई।...नंदू को यकीन था, गुपलू से ज्यादा इस दुनिया में चिड़िया और चिड़िया के बच्चे के बारे में कोई और नहीं जानता। इसीलिए क्लास के ज्यादातर बच्चे चाहे उसके शेखीखोर होने से चिढ़ते थे, पर नंदू उसे बर्दाश्त करता था। यहां तक कि प्यार भी करता था।
''गुपलू कह रहा था-अगर रुई भिगोकर चिड़िया के मुँह में पानी डालो, तो वह पी लेगा।'' नंदू को याद आया, तो उसकी निराशा कम हुई। वह झट रुई लेने के लिए अंदर गया।
अभी वह रुई लेकर बाहर आया ही था कि आंगन में अमरूद के पेड़ पर से चीं-चीं-चीं की इतनी आवाजें आईं कि वह चौंक गया...
''कौआ...मुटल्ला, काला!...उपफ!!'' उसके माथे पर मारे भय के पसीना छलछला आया।
इसमें शक नहीं कि वह दुष्ट खलनायक कौआ नीचे आकर चिड़िया के बच्चे को हड़पना चाहता था। अमरूद के पेड़ पर बैठीं चिड़ियां इसीलिए आवाजें कर रही थीं।

''हे राम, चिड़िया को तूने इतना भोला, इतना मासूम क्यों बनाया?''
नंदू चिंता में। नंदू पसीने-पसीने। नंदू इस समय-जरा गौर कीजिए-दुनिया का सबसे बड़ा दार्शनिक है।

नंदू परेशान हो गया। वह क्या करे, क्या नहीं! उसने रुई से दो बूंद पानी चिड़िया के बच्चे के मुँह में डाला था। मगर द्घबराहट के मारे वह भी उसने पिया नहीं। इध्र यह दुष्ट कौआ न जाने कहाँ से चला आया!

नंदू की सारी खुशी कापफूर हो चुकी थी। और वह डर-सा गया था-कहीं चिड़िया के इस बच्चे का अनिष्ट न हो जाए।
''जब तक मम्मी नहीं आती, तब तक मैं यहीं रहूँगा।'' सोचकर वह दीवार से टेक लगाकर बैठ गया। और प्यार से चिड़िया के बच्चे को पुचकारने लगा।
कुछ देर बाद उसे भूख लगी, लेकिन कहीं वह पाजी कौआ पिफर न आ जाए! सोचकर वह वहाँ से नहीं हिला।

'...ट्रिन्न...ट्रिन्न्...न।'
दोपहर को कालबैल की आवाज सुनाई दी, तो नंदू समझ गया, जरूर मम्मी आईं हैं। अरे, मम्मी के आने का आज पता ही नहीं चला।
वह दिन भर के अपने भीषण कुरुक्षेत्रा यु( के मैदान से निकलकर दरवाजा खोलने गया।...दरवाजा खोलते ही नंदू पिफर दौड़कर आंगन की ओर भागा।
''क्या है नंदू?...आज तो तुमने मुझसे बात ही नहीं की!'' मम्मी ने लाड़ से कहा।

''मम्मी, चिड़िया का बच्चा!...'' नंदू के मुँह से बस इतना ही निकला। वह रुआंसा हो चुका था।
''क्या हुआ चिड़िया के बच्चे को?'' मम्मी तब तक आंगन में आ चुकी थीं।
आंगन के कोने में डरे, सिकुड़े चिड़िया के बच्चे और नंदू को देखा, तो मिसेज आनंद का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुँच गया। आज आपिफस में बॉस ने कुछ ऐसा कह दिया था कि वे अंदर-ही-अंदर तिलमिला गई थीं...पर चाहते हुए भी जवाब नहीं दे पाई थीं। असल में कभी-कभी नंदू की वजह से उन्हें दफ्रतर में वक्त से कुछ पहले उठना पड़ता था। पर वे रोज का सारा काम रोज निबटाती थीं नियम से और कुछ भी पैंडिंग नहीं छोड़ती थीं। लिहाजा बॉस को भी कोई परेशानी न थी, पर आज पड़ोस से भेंगी आंखों वाले मिस्टर अरोड़ा ने कुछ ऐसा कह दिया...ऐसा कि बॉस के अंदर हवा भर गई। भरती गई और पिफर उन्होंने कह ही दिया कि मिसेज आनंद, देखिए यह रोज-रोज की बात...ऐसे तो चलेगा नहीं!
'तू...तू...तेरा परिवार नहीं है! तू नहीं जानता किस तरह मैं अपने बच्चे को पाल रही हूँ, जबकि मेरे हसबैंड, तू अच्छी तरह जानता है कि यहाँ नहीं...! तुझ पर कभी कुछ बीते तो पता चले!'
कहना तो चाहती थीं, पर कहतीं कैसे! यह नौकरी जरूरी थी उनके लिए, वरना तो...

लेकिन रास्ते भर हवा में उंगलियाँ हिला-हिलाकर मानों वे बॉस को यही सब सुनाती आई थीं। उनका ब्लड प्रेशर बढ़ गया था और सिर चक्कर खाने लगा था। वे द्घर आते ही लेटना चाहती थीं। और...और... अब द्घर पर लाडले ने यह दृश्य क्रिएट कर दिया। चिल्लाकर बोलीं-''मुझे मालूम था, तू ये शरारत करेगा...मुझें मालूम था।''
''नहीं मम्मी, मैंने कुछ नहीं किया, मैं तो...'' नंदू कुछ कहना चाहता था, पर मम्मी को सख्त नजरों से अपनी ओर देखते देखा, तो चुप हो गया।

''मम्मी, मैं तो इसे कौए से बचा रहा था।'' कुछ देर बाद नंदू ने पिफर ध्ीरे से कहा।
''मगर...यह नीचे आया कैसे, गिरा कैसे?'' मिसेज आनंद ने गुस्से से बिपफरकर पूछा।
''मुझे नहीं पता मम्मी...मैंने तो इसे आंगन में गिरा हुआ देखा था। पिफर मैं रुई लाया, इसे पानी पिलाने के लिए।...कौआ इसे खाना चाहता था, इसलिए मैं सुबह से यहीं बैठा हूँ...नाश्ता भी नहीं किया।''
सुनते ही एक क्षण में मिसेज आनंद का गुस्सा कापफूर हो गया। उन्हें नंदू पर बहुत लाड़ आया। बोली-''अरे नंदू, तू तो बहुत अच्छा है रे! मैं तो यूँ ही तुझ पर बिगड़ रही थी।''
''मम्मी...मम्मी, यह चिड़िया का बच्चा...? इसका अब क्या करेंगे?''
मिसेज आनंद हँसीं-''अरे, करना क्या है? मैं इसे पिफर से द्घोंसले में रख देती हूँ।''

उन्होंने बहुत प्यार से पुचकारकर चिड़िया के बच्चे को हथेली पर लिया और आहिस्ता से द्घोंसले में रख दिया।
रखते समय लगा, मानो 'खुल जा सिम-सिम' करते हुए, बचपन के जादुई करिश्मों से भरे अजायबद्घर का दरवाजा खुल गया है। और भीतर...इतनी ललचाने वाले दृश्य, और चीजें और खेल हैं कि...अगर उन्होंने खुद को नहीं रोका तो अभी बच्ची बनकर नंदू के साथ खेलने और बतियाने लगेंगी।
नंदू ने भी देखा सोचा-आज मम्मी कितनी अच्छी लग रही हैं..सचमुच कितनी अच्छी, कितनी प्यारी...।
उध्र चिड़िया और चिड़ा भी यह देख रहे थे। उनकी एक साथ चीं-चीं की आवाज सुनाई दी। मानो दोनों मिलकर नंदू और उसकी मम्मी को ध्न्यवाद दे रहे हों!

कहानीकार का ध्यान अभी चिड़िया, चिड़े और चिड़िया के बच्चे की सम्मिलित चीं-चीं की ओर था कि अचानक उसने देखा, नंदू और उसकी मम्मी भी चिड़िया और चिड़िया के बच्चे में बदल गए हैं। शाम के डूबते सूरज की म(मि रोशनी में उनके खूब बड़े, रोंएदार सुनहले पंख चमक रहे हैं...ठीक चिड़िया की तरह। और पिफर चिड़िया, चिड़ा, चिड़िया के बच्चे और नंदू और नंदू की मम्मी सभी एक सुनहले आसमान की ओर उड़ने लगते हैं। वे उड़ रहे हैं-उड़ते जा रहे हैं...यहाँ तक कि उड़ते-उड़ते नजरों से ओझल हो जाते हैं।

 
 
 
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