नवंबर २००९
 
 
 
   
 
 
 
• काशीनाथ सिंह का साहित्य अकादमी • अदम गोंडवी और भारत भूषण का निधन • जयपुर में लिटरेचर पफेस्टिवल में सलमान रुशदी •हिन्दी के कवि कुबेर दत्त और नुक्कड़ नाटक के पितामाह गुरुशरण सिंह का निधनर सम्मान।
 
 
 
ख़बरनामा
संगमन के बहाने कथा साहित्य पर विमश
उदयपुर में २ से ४ अक्टूबर को 'संगमन' का १५वां आयोजन सम्पन्न हुआ। इस कार्यक्रम के आयोजक जनार्दन राय नागर राजस्थान विद्यापीठ व राजस्थान साहित्य अकादमी थे। तीन दिन तक चले इस कार्यक्रम में लगभग ४० कथाकारों एवं साहित्यकारों ने अपनी उपस्थित दर्ज कराई। कथाकारों में

सर्जनात्मक संवाद को सद्घन बनाने, युवा कथाकारों को मंच उपलब्ध् करवाने व जन आंदोलनों में साहित्यकारों की भागीदारी जैसे मुद्दों पर केंद्रित इस राष्ट्रीय संगोष्ठी ने साहित्य और सामाजिक सरोकारों में एक नया आयाम जोड़ा।

तीन सत्राों में आयोजित इस कार्यक्रम में पहले दिन 'नयी सदी का यथार्थ और मेरी प्रिय पुस्तक' विषय पर चर्चा हुयी। चर्चा के प्रारम्भ में आलोचक विजय कुमार ने पोलैण्ड की प्रसि( कवयित्राी शिम्बोर्सका पर केंद्रित अपने वक्तव्य में कहा कि शिम्बोर्सका का जीवन दिखाता है कि एक रचनाकार किस तरह अपने समाज की विद्रूपताओं से जिरह करता हुआ समाज को वैचारिक ताकत देता है। कथाकार वन्दना राग ने राही मासूम रजा के प्रसि( उपन्यास 'आध गाँव' के माध्यम से व्यक्ति की सामाजिक मनोदशा को स्वरूप व दिशा देने वाले कारणों की ओर इशारा किया। उपन्यासकार हरिराम मीणा ने 'आदि र्ध्म' पुस्तक के माध्यम से विकास के नाम पर आदिवासी समाज व जीवन पर आये संकटों की चर्चा की तथा सरकार की जनविरोध्ी नीतियों के कारण आदिवासियों के अस्मिता संकट पर चिंता व्यक्त की।

उन्होंने इस संकट से लड़ने के लिए लेखकों से अपील की। इसी प्रकार समालोचक दुर्गाप्रसाद अग्रवाल ने स्वयं प्रकाश के उपन्यास 'ईंध्न' की चर्चा की तथा इसे भारतीय परिदृश्य में हो रहे भूमण्डलीकरण पर लिखा गया पहला महत्वपूर्ण उपन्यास बताया। 'इतिहास बोध्' के संपादक लाल बहादुर वर्मा ने अपने उद्बोध्न में हार्वर्ड पफास्ट की 'सिटीजन टोम्पेन' के द्वारा अपनी बात कही। उन्होंने कहा कि सृजन व संद्घर्ष में एक अन्तर्द्वन्द्वात्मक रिश्ता होता है, जिसे समझना बेहद जरूरी है। हर सृजन जीवन के संद्घर्ष से उत्पन्न होता है तथा जीवन में ही अपनी सार्थकता को स्थापित करता है। इस चर्चा में कथाकार लता शर्मा, कैलाश बनवासी, डॉ. सर्वतुन्निसा खान आदि ने भी भाग लिया।

दूसरे दिन कहानी पाठ सत्रा में जयपुर के युवा कथाकार राम कुमार सिंह ने अपनी कहानी 'शराबी उपर्फ हम तुझे वली समझते' व मुम्बई से आये वरूण ग्रोवर ने 'डैन्यूब के पत्थर' का पाठ किया। अलग-अलग शैलियों में लिखी गई इन कहानियों पर विशद् चर्चा में यह बात मुखर हुई कि वरुण की कहानी प्रागैतिहासिक काल की होते हुए भी समकालीन सवालों से टकराती है। वहीं रामकुमार की कहानी को भाषायी रचनात्मकता व परिवेश को जीवंत बनाने के लिए उल्लेखनीय माना गया।

तीसरे दिन के अंतिम सत्रा में 'प्रतिरोध्, जन आंदोलन और साहित्य' विषय पर चर्चा योगेन्द्र आहूजा के वक्तव्य से शुरू हुई। कथाकार शिवमूर्ति ने जन आंदोलनों से लेखकों का जुड़ाव व अपनी रचनाओं में कला के संतुलित उपयोग को जरूरी बताया। वरुण ग्रोवर ने जन आंदोलनों को वर्तमान पीढ़ी के लिए अमूर्त विचार कहा। चर्चा में मध्ु कांकरिया, सुभाष चन्द्र कुशवाहा, रत्नकुमार सांभरिया, मनीषा कुलश्रेष्ठ, डॉ. रईस अहमद आदि ने भाग लिया। समापन वक्तव्य में वरिष्ठ कथाकार गिरिराज किशोर ने कहा कि कथाकार वह है जो अमूर्त को आकृति दे। किसी रचना के स्वरूप को अस्वीकार किया जा सकता है किन्तु रचनाकार की ईमानदारी पर अंगुली उठाना अनुचित है। उन्होंने नामवर सिंह के आलोचना कर्म की द्विध पर प्रहार कर इसे वैचारिक जकड़ बताया। कथाकार प्रियंवद के संयोजन में हुए इस आयोजन के अन्य आकर्षणों में पंकज दीक्षित द्वारा लगाई गई कथा पोस्टर प्रदर्शनी, लद्घु पत्रिाका प्रदर्शनी व पं. जनार्दन राय नागर के साहित्य की प्रदर्शनी भी थी। राजस्थान साहित्य अकादमी द्वारा आयोजन स्थल पर पुस्तक बिक्री की व्यवस्था थी।

 
 
मीडिया और जनसंवाद का लोकार्पण
 
दिल्ली में संवाद विशेषज्ञ उदय सहाय और युवा पत्राकार वर्तिका नन्दा द्वारा संयुक्त रूप से लिखित पुस्तक 'मीडिया और जनसंवाद' का लोकार्पण साहित्य अकादमी के सभागार में किया गया। सामयिक प्रकाशन, नई दिल्ली द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम की अध्यक्षता हिन्दी आकादमी के उपाध्यक्ष प्रो. अशोक चक्रध्र ने की। उन्होंने अपने वक्तव्य में कहा कि वर्तिका नन्दा ने अपने विषयों में महिलाओं से जुड़ी समस्याओं को बहुत ही तथ्यात्मक तरीके से पाठकों के सामने रखा है। इस कार्यक्रम के मुख्य अतिथि 'नई दुनिया' के प्रधन संपादक आलोक मेहता थे। यह पुस्तक वर्तिका नन्दा और उदय सहाय के प्रकाशित स्तंभों का संकलन है। उनके ये लेख मीडिया और पुलिस की कार्यप्रणाली पर प्रश्नचिन्ह लगाते हैं। यह पुस्तक पत्राकारिता के छात्राों के लिए उपयोगी साबित होगी। इस कार्यक्रम में साहित्यकार राजेन्द्र यादव, संपादक नीलाभ मिश्र, सुध्ीर सक्सेना, प्रेमपाल शर्मा, महेश दर्पण, गीताश्री उपस्थित थे।
 
प्रयाग को विष्णु प्रभाकर स्मृति सम्मान
 
बरेली में भारतीय पत्राकारिता संस्थान की ओर से कला समीक्षक प्रयाग शुक्ल को विष्णु प्रभाकर स्मृति साहित्य सम्मान दिया गया। ये सम्मान भारतीय पत्राकारिता संस्थान के रजत जयंती समारोह पर साहित्यकारों को दिये गये। इसके अतिरिक्त इस समारोह में साहित्यकार ज्ञानवती सक्सेना को शांति सिन्हा स्मृति साहित्य सम्मान तथा पत्राकार राकेश कोहरवाल की स्मृति में शुरू किया गया सम्मान रंगकर्मी और साहित्यकार राजेंद्र मोहन शुक्ल को दिया गया। इस कार्यक्रम के मुख्य अतिथि प्रयाग शुक्ल ने कहा कि आज अच्छे लिखने वाले लोगों की कमी नहीं है। उनको पाठक वर्ग मिल रहा है। डॉ. वीरेन डंगवाल एवं सुध्ीर विद्यार्थी ने अखबारों के गिरते स्तर पर चिंता जताई।
 
ग़८ाल और न८म के बीच नया रिश्ता
 
कवि और पत्राकार मध्ुकर उपाध्याय के कविता संग्रह 'बात नदी बन आए' का विमोचन २९ सितंबर को वरिष्ठ आलोचक डॉ. नामवर सिंह एवं कवि अशोक वाजपेयी ने किया। इस कविता संग्रह का प्रकाशन लोकमित्रा प्रकाशन ने किया है। इस अवसर पर डॉ. नामवर सिंह ने कहा कि मध्ुकर उपाध्याय ने हिन्दी ग़८ाल के मिजाज को बदल दिया है। उनके काव्य में अवध् की मिट्टी की पेशकश है। कविता में निराला बांकपन है। उन्होंने ग़८ाल और नज्म के बीच एक नया रिश्ता बनाने की कोशिश की है। मध्ुकर उपाध्याय के काव्य संग्रह के विषय में अशोक वाजपेयी ने बताया कि उनका काव्य संग्रह भले ही हिन्दी में है पर उसमें उर्दू की छाया है। उनकी कविताओं की असली जमीन ग़८ाल की है जिसे उन्होंने नया अंदाज दिया है।
 
सम्मानित हुए कवि 'व्योम'
 
मुरादाबाद के युवा कवि योगेन्द्र वर्मा 'व्योम' को भाउफराव देवरस सेवा न्यास, लखनउफ की ओर से पं. प्रताप नारायण मिश्र स्मृति युवा सम्मान ०९ से सम्मानित किया गया। २० सितम्बर को उन्नाव में एक समारोह में 'व्योम' को पाँच हजार की राशि के साथ स्मृति चिन्ह, प्रशस्ति पत्रा तथा पं. प्रतापनारायण मिश्र द्वारा रचित साहित्य देकर सम्मानित किया गया। पुरस्कार चयन समिति के संयोजक प्रसि( साहित्कार डॉ. गणेश दत्त सारस्वत ने बताया कि यह सम्मान उन्हें काव्य विध में उनकी काव्य कृति 'इस कोलाहल में' के लिए दिया गया। इन पुरस्कारों के अतिरिक्त कथा साहित्य के लिए राजेश पुरोहित, बाल साहित्य के लिए सुरेश सौरभ, मैथिली के लिए शंकर देव झा तथा संस्कृत के लिए डॉ. नारायणदास को दिया गया। इस समारोह की अध्यक्षता साहित्यकार सूर्यनारायण शुक्ल ने की।
 
दिविक बाल पुरस्कार से सम्मानित
 
कवि दिविक रमेश को श्रीमती रतन शर्मा बाल साहित्य पुरस्कार से ६ अक्टूबर को त्रिावेणी कला संगम, दिल्ली में एक समारोह में सम्मानित किया गया। दिविक रमेश को यह पुरस्कार '१०१ बाल कविताएँ' पुस्तक पर दिया गया। इस पुरस्कार स्वरूप उन्हें ३१ हजार रुपये, प्रशस्ति पत्रा एवं प्रतीक चिन्ह दिया गया। यह पुरस्कार प्रतिवर्ष डॉ. रत्न लाल शर्मा स्मृति न्यास के द्वारा प्रदान किया जाता है।
 
पंजाब अकादमी पुरस्कारों की द्घोषणा
 
१४ सितंबर को पंजाबी अकादमी ने २००७-०८ के लिए साहित्यिक पुरस्कारों की द्घोषणा की। पंजाबी साहित्य में सर्वोत्तम योगदान के लिये इस वर्ष का पुरस्कार वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. करनजीत सिंह को दिया जाएगा। उन्होंने लोकधरा, कविता, गद्य और समालोचना की १७ पुस्तकों का पंजाबी में अनुवाद किया गया। पंजाबी संस्कृति में योगदान के लिए इस वर्ष का पुरस्कार गायिका पुष्पा हंस को दिया जाएगा। पुष्पा हंस ने जहाँ लोक गायकी और सूपफी गायकी में नाम कमाया है, वहीं पिफल्मों में पार्श्व गायन और अभिनय में भी नाम किया है। इस पुरस्कार में डेढ़ लाख रुपये नकद, प्रशस्ति पत्रा एवं स्मृति चिन्ह प्रदान किया जाएगा। इसके अतिरिक्त इस वर्ष का कथा साहित्य में लेखक दर्शन सिंह की पुस्तक 'बदलां दी पौढ़ी' और गद्य में जसवंत सिंह नेकी की 'सदा विगास' को भी पुरस्कृत किया गया है। इन्हें ५० हजार रुपये नकद, प्रशस्ति पत्रा और अकादमी का स्मृति चिन्ह दिया जाएगा। सभी पुरस्कार पंजाबी अकादमी की ओर से अक्टूबर २००९ में होने वाले विशेष कार्यक्रम में प्रदान किए जाएँगे।
 
कबीर में गहरी प्रश्नाकुलता
 
'कबीर में काल और अकाल का द्वंद्व है। कबीर में गहरी प्रश्नाकुलता है। उनमें बहुवचनात्मकता भी है।' उक्त विचार डॉ. विश्वनाथ त्रिापाठी ने हिन्दी अकादमी द्वारा कबीर पर आयोजित कार्यक्रम में बोलते हुए दिया। उन्होंने निर्गुण भक्ति के एक और महत्वपूर्ण तथ्य की ओर इशारा किया। उन्होंने कहा कि निर्गुण भक्ति के ज्यादातर कवि केवल भक्ति ही नहीं अपनी रोजी-रोटी भी कमाते है। इसीलिए कबीरदास हर उस संप्रदाय की निंदा करते हैं जो अपनी रोजी-रोटी खुद न कमाते हों। उन्होंने भक्ति आंदोलन के एक और पक्ष भक्ति संगीत की भी विस्तार से चर्चा की और स्पष्ट किया कि इतना बड़ा काव्यात्मक आंदोलन पूरे विश्व में कहीं भी नहीं हुआ है। यह अलग बात है कि हमने इसे अब स्वंय ही नष्ट कर डाला है। लेकिन यह अभी भी सबसे ज्यादा गुरुग्रन्थ साहिब में सुरक्षित है। कार्यक्रम के प्रारंभ में अकादमी के सचिव डॉ. रवीन्द्रनाथ श्रीवास्तव 'परिचय दास' ने कबीर को समकालीन कवि की संज्ञा देते हुए कहा कि उनका हद से बेहद में जाना, योगी से गृहस्थ में जाना केवल दिखावा नहीं बल्कि सच्चा विद्रोह है।
प्रो. अशोक चक्रध्र ने कबीर को चेत, चेतना, चेतावनी, चैतन्य का कवि बताया। इसके बाद प्रख्यात नृत्यांगना ज्योति श्रीवास्तव ने कबीर के कई पदों- 'राम रहीम एक हैं दोनों', 'द्घूद्घंट के पट खोल सखी री', 'अरे मोको कहाँ ढूंढे रे बंदे मैं तेरे पास में', 'भजो राम गोविंद हरे' पर उड़ीसी नृत्य प्रस्तुत किया।
 
'क्रांतिकारी' का विमोचन
 

लखनउफ में आयोजित नेशनल बुक पफेयर में एक कार्यक्रम में विचारक के एन गोविंदाचार्य ने पत्राकार एवं साहित्यकार रोशन प्रेमयोगी के उपन्यास का विमोचन किया। इस अवसर पर गोविंदाचार्य ने कहा कि 'क्रांतिकारी' को पढ़ते हुए लगा कि आजाद भारत में जिस क्रांति की जरूरत है, उस ओर यह उपन्यास इंगित करता है। साहित्यकार संजीव ने कहा कि यह उपन्यास क्रांति के नए विचारों को उजागर करता हैं। आजादी के बाद क्रांति की जो अवधरणा ट्यूब में बंद थी, उसे यह उपन्यास सामने लाता है। वहीं रूपनारायण सोनकर ने कहा कि राहुल सांकृत्यायन के बाद कोई ऐसा सवर्ण लेखक सामने आया है जो दलितों पर दलितों की कसौटी पर लिख रहा है। वरिष्ठ कहानीकार और 'हंस' पत्रिाका के कार्यकारी संपादक संजीव समारोह के मुख्य अतिथि थे। दलित साहित्यकार रूपनारायण सोनकर मुख्य वक्ता थे। इस उपन्यास में तीन दोस्तों की कहानी है जो इलाहाबाद में पढ़ने के बाद अपने गाँव के लिए काम करने की सोचते हैं।

 
अहमदाबाद में 'अस्मिता' की स्थापना
 

गुजरात विश्वविद्यालय, अहमदाबाद के भाषा साहित्य भवन में हिन्दी विभाग के सौजन्य से वाइस चांसलर परिमल त्रिावेदी की अध्यक्षता में १४ सितम्बर को एक कवयित्राी सम्मेलन 'स्त्राी स्वयं अपने विमर्श में' आयोजित हुआ। इस कार्यक्रम की सहयोगी संस्था थी-'अस्मिता' बहुभाषी महिला साहित्यिक मंच, बड़ोदरा। इसका संचालन डॉ. नलिनी पुरोहित ने किया। इस अवसर पर विशिष्ठ अतिथि डॉ. मीरा वर्मा ने कविता पाठ किया। इसके अतिरिक्त डॉ. रचना निगम, डॉ. मुखर्जी, डॉ. अंजना संध्ीर आदि ने कविता पाठ किया। 'अस्मिता' बड़ोदरा की संस्थापक नीलम कुलश्रेष्ठ ने अहमदाबाद में डॉ. रंजना अरगड़े के सहयोग से अस्मिता की स्थापना की द्घोषणा की।

 
नहीं रहे कवि-गीतकार हरीश भादानी
 
राजस्थान के जनकवि कहे जाने वाले हरीश भादानी का १ अक्टूबर को निध्न हो गया। वे ७६ वर्ष के थे। जनवादी लेखक संद्घ के शुरू से उपाध्यक्ष रहे भादानी हिन्दी और राजस्थानी दोनों भाषाओं में लिखते थे। उनकी रचनाएँ दो दर्जन से ज्यादा काव्य संकलनों में संकलित हैं। उन्होंने मजदूर-किसानों के जीवन से लेकर प्रकृति और वेदों की आँचाओं पर कविताएँ लिखीं। ६० के दशक में उन्होंने 'वातायन' नाम से साहित्यिक मासिक भी निकाला। कोलकाता से प्रकाशित त्रौमासिक 'कलम' के संपादक मंडल में भी उन्होंने अपना योगदान दिया। उन्हें राजस्थान साहित्य अकादमी का 'मीरा' पुरस्कार और के के बिड़ला पफाउंडेशन का 'बिहारी' सम्मान भी मिल चुका है।
 
चीन के सात हिन्दी विद्वान सम्मानित
 
२१ सितम्बर को भारतीय दूतावास के सांस्कृतिक केंद्र के तत्वावधन में हिन्दी दिवस कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस अवसर पर भारतीय दूतावास केक मिशन के उपमुख्य जयदीप मजूमदार ने चीन के सात वरिष्ठ हिन्दी विद्वानों को सम्मानित किया। इन विद्वानों में पेकिंग विश्वविद्यालय एवं चायना रेडियो इंटरनेशनल के हिन्दी सेवी एवं पत्राकार सम्मिलित हैं। सम्मानित होने वाले चीनी विद्वानों में प्रो. लियोउफ आनवू, पो. यिन होयुवान, प्रो. चिन तिंग हान, प्रो. च्यांग चिंगख्वेइ, प्रो. वांग चिनपफड, प्रो. छघ श्रोपिन, प्रो. चाओ युह्वा थे। इस अवसर पर एक हिन्दी निबंध् प्रतियोगिता का भी आयोजन किया गया।
इस अवसर पर जयदीप मजूमदार ने अपने उद्बोध्न में कहा कि हिन्दी दिवस पर चीनी विद्वानों का यह सम्मान चीन और भारत के प्राचीन संबंधें के सुदृढीकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। इस कार्यक्रम का संचालन सांस्कृतिक सचिव चिन्मय नायक ने किया।
 
नहीं मानते माशुका को आउटसाइडर
 
'दुनिया में जितने भी मानवीय व लोकतांत्रिाक मूल्य रहे हैं उसे बनाने में स्त्राी और पुरुष दोनों बराबर के साझीदार रहे हैं। हम दुनिया में ऐसे किसी आंदोलन का समर्थन नहीं कर सकते जिसमें माशूका को आउटसाइडर माना जाता हो।' यह वक्तव्य प्रख्यात कवि आलोक धन्वा ने पटना में १५ सितम्बर को कही। उन्होंने सांस्कृतिक संस्था 'अभियान' द्वारा आयोजित 'वर्तमान संदर्भ' पत्रिाका के स्त्राी केंद्रित विशेषांक 'स्त्राी मुक्तिः यथार्थ और यूटोपिया' का लोकार्पण किया। आलोक ध्न्वा ने आगे कहा कि हमारी आबादी का ९९ प्रतिशत हिस्सा परंपरागत विवाह से बना है और हम ऐसा नहीं कह सकते कि वे सब के सब प्रेमविहीन दांपत्य की उपज हैं। परंपरागत विवाह की जितनी भी असपफलताएँ और चुनौतियाँ हैं वे सब प्रेम विवाह के साथ भी मौजूद हैं। लोकार्पण के पूर्व 'वर्तमान संदर्भ' की संपादक संगीती आनंद ने पत्रिाका को निकालने के दौरान आई कठिनाइयों को बताया। युवा आलोचक राजीव रंजन गिरि इस अंक के अतिथि संपादक थे। महिला आंदोलन से जुड़ी महिलाओं ने खासकर सरोज चौबे ने बताया यह पत्रिाका महिला आंदोलन के वैचारिक पक्ष को मदद पहुँचाने वाली है। इस समारोह में एडवा से जुड़ी रहीं नलिनी तिवारी, आलोचक तरुण कुमार, पत्राकार निवेदिता झा, सामाजिक कार्यकर्ता गालिब खान, कथाकार ममता मेहरोत्राा सहित विभिन्न छात्रा और सांस्कृतिक संगठनों के प्रतिनिध्ि मौजूद थे।
 
शंभु गुप्त को आलोचना पुरस्कार
 
साहित्य, संस्कृति तथा ललित कलाओं के लिए समर्पित स्पंदन संस्था, भोपाल द्वारा 'स्पंदन आलोचना पुरस्कार ०९' के लिए प्रसि( आलोचक डॉ. शंभु गुप्त का चयन किया। इस पुरस्कार चयन मंडल के सदस्य थे प्रो. शंभुनाथ, डॉ. विजय बहादुर सिंह, डॉ. खगेन्द्र ठाकुर तथा रवीन्द्र त्रिापाठी। शंभु गुप्त की आलोचना पर केंद्रित कई पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी है। पुरस्कार समिति की संयोजक उर्मिला शिरीष ने बताया कि पुरस्कार स्वरूप ११ हजार रुपये, स्मृति चिन्ह तथा शाल आदि से दिसम्बर में एक समारोह में दिया जाएगा। इससे पूर्व स्पंदन संस्था द्वारा लेखिका मृदुला गर्ग, कवि पंकज राग तथा कथाकार प्रियदर्शन को सम्मानित किया जा चुका है।


प्रस्तुति : प्रतिभा कुशवाहा
 
 
 
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