नवंबर २००९
 
 
 
   
 
 
 
•अमरकांत को इलाहाबाद में ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित• जितेन्द्र श्रीवास्तव को देवीशंकर अवस्थी सम्मान•दिल्ली में विश्व (पुस्तक मेला ;राजकमल प्रकाशन के स्थापना दिवस पर तीन लखटिया पुरस्कारों की द्घोषणामहुआ माजी के उपन्यास 'मरंग गोड़ नीलकंठ हुआ' को तीसरा राजकमल कृति सम्मानविश्वनाथ त्रिापाठी की पुस्तक 'व्योमकेश दरवेश' को पहला सृजनात्मक गद्य सम्मान अमरेन्दु किशोर की कृति 'बादलों के रंग हवाओं के संग' को चौथा कृति सम्मानस्तंभ लेखक भारत भारद्वाज के खिलापफ वारंटद्ध)
 
 
 
मीमांसा
क्वांरी ग़८ाल लिखने की प्रतिब(ता : पुष्पपाल सिंह

डॉ चन्द्र त्रिाखा का कवि ऐसी ग़८ाल लिखना चाहता है जिससे 'नस्लें कभी उदास न हों', वह 'आधे सच' से कतराकर 'पराई पीर' लिखने का संकल्प लेकर ऐसी क्वांरी ग़८ाल लिखना चाहता है जिससे नानक की 'नाम खुमारी' का आनंद बरसे, जो दिन रात चढ़ी रहे ;'नाम खुमारी नानका, चढ़ी रहै दिन रात'द्ध और जिसे पढ़-सुनकर 'मीरो ग़ालिब पफ़ करें' वस्तुतः चन्द्र त्रिाखा की इन ग़८ालों को पढ़कर ऐसी ही नाम खुमारी चढ़ती है और सुकून-सा, एक सब्र-सा पूरे व८ाूद को बाँध लेता है। वर्तमान की संद्घर्ष-संकुल ८िांदगी और आपाधापी में उसकी क्वांरी ग़८ालें रोशनी की एक लकीर लेकर उपस्थित है जो जिंदगी के अंधेरों में एक राह दिखाती हैं। बिना किसी प्रतिदान की अपेक्षा के वह दूसरों की जिंदगी को उजालों से भर देने की पेशकश इस रूप में करता है-
सूरज चाँद सलामी दें
ऐसा भी कुछ किया करो
भले वसूली ८ाीरो हो
सुख के कर्८ो दिया करो।
यह उसका सहज ८िांदगी जीने के लिए एक संदेश है और वर्तमान की विषम जीवन-स्थितियों में सार्थक हस्तक्षेप जिससे सूरत-ए-हाल बदल सके। यह उसका '८िांदगी की अनवरत तलाश का एक छोटा-सा प्रयास है।' ८िांदगी को बदलने में कविता जो सार्थक भूमिका निभाती है, कवि को उस पर पूर्ण विश्वास है, तभी तो समस्त भूमंडलीय चमत्कारों और सूचना-प्रौद्योगिकी के विस्पफोट के बीच भी कविता के जीवंत बने रह आने पर उसका अखण्ड विश्वास है-
कभी नहीं मरती कविता
वह सदैव रहती है जीवंत
बोधिवृक्षों से काल सेंटर
व संख्यातीत वैब साइटों
से झीलों के काँपते चेहरों तक
कविता सदैव जीवित
रहती है
जीवंत रहती है।
आशा और आस्था कि इन किरणों के बावजूद कवि को यह मुगालता नहीं है कि शब्द या कविता कोई बहुत बड़ी क्रांति कर सकने की क्षमता से युक्त हैं-
कुछ नहीं बदलेगा
इन कविताओं से
न परिवेश
न देश, न विदेश
इन कविताओं के माध्यम से कवि ८िांदगी की सार्थकता की तलाश का एक प्रयत्न-भर करता है। इसीलिए वह हर दुखी का हर दुख में साथ दे उसका सम्बल बन जाना चाहता है, उसे धीरज बँधाता हुआ उसके लड़खड़ाते क़दमों को एक पुख्तापन देना चाहता है-
अंधेरों से रहें लड़ते
दुखी मत हो मेरे भाई
अगर छूट ही गई
संभावना की आखरी बस भी
इसीलिए कवि दलितों-शोषितों की पाँत में खड़ा हो उनके साथ क़दम मिलाकर आगे के रास्तों पर बढ़ निकलना चाहता है। मन की विषम स्थितियों को भली-भाँति जानता हुआ भी वह उनका प्रतिरोध अपने ढंग से रचना चाहता है-
''कुछ ऐसे सिरपिफ़रे माहौल में
लम्बे सपफर पर हैं
मगर तय है कि हम
इस वक्त की दीवार पर खूँ से
लिखेंगे दास्तां उनकी
जो अब तक हाशिए पर हैं।''
८िांदगी में दुख तो रहेंगे ही, उनसे निजात नहीं मिल सकती किंतु बड़ा सवाल यह है कि इन विषमताओं के बीच हम अपना रास्ता कैसे बनाएँ। संभावनाओं की खिड़की तब नहीं खुल सकती जब हम दिन-रात अपने दुखों-पीड़ाओं का रोना रो रहें।
आवश्यकता मन की शांति किसी और ही रूप में तलाशने की है, जब चित्त को दुखों से हटाकर सुख की तलाश में व्यक्ति स्वस्थ सोच द्वारा कुछ अलग हटकर जीवन जिये-
मन का बोझिलपन धो लें
चलो नई वैबसाइट खोलें।
राख बनी रिश्तों की जुम्बिश
आओ थोड़ा-थोड़ा रो लें
बहुत हुआ, अब चैनल बदलो
तुम भी सो लो हम भी सो लें।
टी.वी. और कम्प्यूटर के इन बिम्बों से वर्तमान के दुखों की बात करना कवि की सृजनशील मनीषा के वर्तमान के भावबोध से जुड़ने का कौशल दर्शाता है। व्यक्ति भीड़ में रहकर भी भीड़ का अंग न बने इसको संग्रह की शीर्षक कविता 'ये और बात' में बख़ूबी दर्शाया गया है। आदमी अपनी ख़ाम-ख्याली से जिन निर्माणों-मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारों को ढाता है, इससे मानवता और संस्कृति पर कोई प्रभाव नहीं पड़ताऋ ध्वंस करने वालों से निर्माण की शक्तियाँ सदैव सबल रही हैं, कवि को मानव की जय-यात्राा में ऐसा ही विश्वास है-
जब तलक हाथ में कलम है
८ोहन उजला है
जब तलक सृजन का लोहू
मेरी रगों में है
सिलसिला इनको पिफ़र बनाने का
किसी भी हाल में हो, जारी
रखा जाएगा
ये अलग बात है
तुम देख नहीं पाए
मैं हाशिए पे नहीं था
जुलूस में ही था
मैं भीड़ में भी था
और भीड़ से अलग भी था
ये और बात है
तुम देख ही नहीं पाए।
कवि हर हाल में ८िांदगी को संवारने का प्रयत्न संवेदन के स्तर पर करता है। नववर्ष पर उसकी कामना और प्रार्थना है कि ''इस बरस कम हादसे हों/इस बरस बरसें अधिक सुख/इस बरस हम कम मुखौटे/पहन कर निकलें द्घरों से'' मोनालिसा को केंद्रित कर लिखी गयी ग़८ाल, 'काली नदी', रूडयार्र्ड किपलिंग की 'इपफ़' का 'अगर' शीर्षक भावानुवाद, 'आने वाले कल की पिफक्र...', 'सूरदास के नाम', 'प्रेमचंद के नाम', 'क्यों नहीं स्वीकारते तुम', आदि सभी कविताओं में ८िांदगी को सहज रूप में जीने और तराशने की एक विकलता का आस्थावादी स्वर कविता में एक नयी बयार-सा है।
संकलन की प्रस्तुति, उम्दा काग़८ा, गैट-अप, ग्रापिफक्स और रंगों की पृष्ठ-दर-पृष्ठ बिखरती आभा इसे बहुत पठनीय बना देती है।

६३, केसरबाग निकट एनआईएस, पटियाला, पंजाब
मो. ०९४१७८६५६५१

 
 
 
ऊपर जाये...
पिछे जाये...
 
 
  Copyright 2009 | All right reserved Powered by : Innovative Web Ideas
(A division of Innovative Infonet Private Limited)