नवंबर २००९
 
 
 
   
 
 
 
• काशीनाथ सिंह का साहित्य अकादमी • अदम गोंडवी और भारत भूषण का निधन • जयपुर में लिटरेचर पफेस्टिवल में सलमान रुशदी •हिन्दी के कवि कुबेर दत्त और नुक्कड़ नाटक के पितामाह गुरुशरण सिंह का निधनर सम्मान।
 
 
 
लद्घु-कथाएँ
पोषाहार की कहानियाँ, जन्नत : अतुल चतुर्वेदी

स्कूल के प्रांगण में पोषाहार बनाने की तैयारी चल रही थी। पोषाहार प्रभारी शिक्षिका अति व्यस्त थीं। आज दाल-बाटी बनाने की बारी थी। खाना बनाने वाली बाई दाल में छौंक लगाने की तैयारी कर रही थी। दाल की खुशबू से पड़ोस की कक्षा के विद्यार्थियों का मन विचलित हो रहा था। उसकी सुंगध रह-रह कर दीनू और द्घीसू के नथुनों को विचलित कर रही थी। दीनू बोला-'आज तो दो कटोरी दाल पीऊँगा।' द्घीसू ने हँसकर कहा-'क्यों कई दिनों से दाल नहीं खायी क्या?' 'कहाँ यार? बाप की गालियाँ और मार खाने से पफुर्सत मिले तब न।'
द्घीसू ने व्यंग्य करते हुए कहा-'अब भी पीना नहीं छोड़ा तेरे बाप ने?'

'हाँ, सब पैसे उसी में उड़ा देता है स्साला।' इंटरवल की द्घंटी बज उठी और सब बच्चे थाली कटोरी लपकने को दौड़े। दीनू ने दो कटोरियाँं हथिया ली थीं। वह बड़ा खुश था। पेट में चूहे कूद रहे थे। सब बच्चों को दाल-बोटी परोसी जाने लगी। दीनू बेसब्री से अपनी प्रतीक्षा कर रहा था। मास्टरनी जी बहुत सख्त और पैनी निगाह रखे थीं। दीनू की दो कटोरी दाल पीने की हसरत पूरी होती नहीं दिख रही थी। तब ही स्कूल का चपरासी आया और मास्टरनी जी से बोला-'हेडमास्टर साहब खाना खा रहे हैं, एक बड़ा कटोरा दाल भर दो।' दीनू उदास हो गया। उधर पोषाहार प्रभारी शिक्षिका ने एक भगोना भर दाल अलग से बचा ली। कुछ बच्चों को एक-दो चम्मच दाल परोस खानापूर्ति कर दी गयी।

दीनू उदास हो गया। देर तक कटोरी में लगी दाल चाटता रहा। पोषाहार रजिस्टर में दर्ज किया गया-पचास ग्राम प्रति विद्यार्थी दाल वितरित की गयी।
दीनू मन ही मन सोचने लगा इन लागों के होते अपनी दाल नहीं गलनी। वो चुपके से दाल का भगोना ले चंपत हो गया। पोषाहार का वास्तविक अर्थ अब वो भी समझ चुका था।


३८०, शास्त्राी नगर, दादाबाड़ी, कोटा ;राज.द्ध-९
मो. ०९४१४१७८७४५

 
जन्नत: अतुल चतुर्वेदी
 

मैंने टे्रन में अपनी सीट के बगल में बैठे व्यक्ति से स्वाभाविक प्रश्न किया-'आप कहाँ जा रहे हैं?' उसने कहा-'जन्नत, चलोगे?'
'मजाक छोड़िए। सच-सच बताइए'-मैं लगभग खिसियाते हुए बोला। वह बोला-'विश्वास नहीं है क्या?'
उसने कोट के अन्दर लगे डिटोनेटर आर.डी.एक्स. और बैटरी का कनेक्शन दिखा दिया। मैं अन्दर तक काँप गया। तभी ऊपर वाली बर्थ पर लेटी महिला ने पूछा- 'वैसे यह टे्रन कहाँ तक जाती है?' मैं तपाक से बोला-'जन्नत तक।' बमनुमा आदमी कुटिलता से मुस्कुराया। बुढ़िया कुछ बड़बड़ाते हुए चुप हो गयी। डरते-डरते मैंने उससे पूछ ही डाला-'किस संगठन के आदमी हो?' वह गर्व से बोला-'खुदाई खिदमतगार।'
मैं चुपचाप सोचने लगा ऊपर वाले तेरे भी कैसे-कैसे खिदमतगार हैं। जो तेरे द्घर को तो जहन्नुम की शक्ल दे रहे हैं और स्वयं जन्नत जाने का स्वप्न पाल रहे हैं।

 

३८०, शास्त्राी नगर, दादाबाड़ी-कोटा, राजस्थान
मो. ९४१४१७८७४५

 
अखबार : कृष्णकांत
 

प्रभा को पढ़ने का कोई खास शौक नहीं था लेकिन जब वह हामला हुई तो उसे दो बातों की तलब लगती-एक, जौ और चने का सत्तू खाने की और दूसरा, कुछ पढ़ने की। वह दिनभर कुछ न कुछ पढ़ने को ढूँढा करती।
माँ ने कहा-'अच्छी बात है। अच्छा-अच्छा पढ़ा कर तो अच्छे जेहन वाला बच्चा होगा।' यह बात सच हो न हो, पर प्रभा को भी जँची। उसने सोचा-पढ़ने के लिए अखबार से बेहतर क्या हो सकता है? एक ही अखबार में तरह-तरह की बातें, और उसने अखबार लगवा लिया।

पहले दिन अखबार आने का उसने बड़ी बेसब्री से इंतजार किया। सुबह हुई। अखबार वाला अखबार पफेंक गया। उसने दौड़कर अखबार उठाया। आज की खास खबर थी कि किन्हीं नेता जी को कुछ अज्ञात लोग मारकर पेड़ से लटका गये थे। उसका मन खराब हो गया। माँ की बात याद आ गयी-'अच्छा-अच्छा पढ़ा कर तो अच्छे जेहन वाला बच्चा होगा।' वह सिहर उठी। उसने अखबार लपेटकर कोने में डाल दिया। अगले दिन पिफर अखबार आया। आज का अखबार ज्यादा लाल था। राजधानी में बम धमाके से ४० लोगों के चीथड़े उड़ गये थे। उसकी आँखों में जलन होने लगी। मुँह कसैला हो गया। उसने अखबार पिफर से लपेटकर कोने में डाला। उठकर पानी पिया और आँख बंद करके लेट गयी। थोड़ी देर बाद उठी तो उसे बचपन में पढ़ी एक कविता याद आ गयी-अम्मा मुझे किताब मंगा दो मैं भी पढ़ने जाऊँगी....वह सारा दिन यही गुनगुनाती रही।

तीसरे दिन सुबह पिफर अखबार आया, अपने माथे पर मानवता की क्रूरतम तस्वीर चस्पा किये हुए। प्रभा ने जाकर अखबार उठाया और सुर्खी पर निगाह दौड़ाई-' दरिन्दों ने बच्ची का बलात्कार कर सर कुचला।' उसे ८ाोर से उबकाई आ गयी। सीना भारी हो गया। जी में आया कि इतना ८ाोर से खांसकर उल्टी करे कि भीतर का सारा वजन बाहर आ जाये। उसने दौड़कर खिड़की से अखबार पफेंक दिया। मोबाइल उठाकर अखबार वाले को पफोन लगाया-'भैया' कल से पेपर मत देना।'

 

३१७/४ ओम गायत्राी नगर, तेलीनरगंज इलाहाबाद
मो. ९९३६३५६०८

 
बदलाव : सैक्षयद कम्बर अब्बास
 

वर्षों बाद मेरा गाँव जाना हुआ। मेरा गाँव बक्सर से करीब चालीस किलोमीटर दूर है। जैसे ही ट्रेन से उतरा स्टेशन कापफी बदला-बदला सा नजर आया। चीजें कापफी बदल चुकी थीं। आठ साल पहले जब मैं यहाँ आया था तो स्टेशन के आस-पास छोटी-मोटी चाय की दुकान हुआ करती थी पर अब यहाँ अच्छे खासे होटल खड़े थे। द्घर जाने के लिए मुझे वाहन की जरूरत थी। इसलिए मैं सड़क किनारे खड़ा वाहन का इंतजार करने लगा। तभी मेरे पास एक मोटर साइकिल आकर रुकी। शायद बाईक सवार ने मेरी परेशानी को भांप लिया था। वह मेरी मद्द को तैयार हो गया। पर उसने इसके एवज में मुझसे पचास रुपये मांगे। मैं सहर्ष तैयार हो गया। पिफर क्या था मैं सवार हो गया उसकी बाईक पर। रास्ते में मुझे अपनी पिछली यात्राा याद आ गयी जब मेरी सहायता एक पचास वर्षीय व्यक्ति ने की थी। उस जमाने में रोड भी ठीक नहीं थी। उसने मुझे साइकिल पर बिठा कर ऊबड़-खाबड़ रास्तों से गाँव तक पहुँचाया था। बदले में मैं उसे कुछ देना चाहता था पर उसने यह कहकर लेने से इंकार कर दिया कि यह उसका पफर्ज है क्योंकि वह उसी के इलाके का है। मैं सोचने लगा कि पश्चिम से चली आँधी भारत के शहरों से होते हुए गाँव में पहुँच गयी है। यकीनन गाँव बदल गया है।

नौगोल कोठी, पटना-८, बिहार

 
 
 
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