नवंबर २००९
 
 
 
   
 
 
 
• काशीनाथ सिंह का साहित्य अकादमी • अदम गोंडवी और भारत भूषण का निधन • जयपुर में लिटरेचर पफेस्टिवल में सलमान रुशदी •हिन्दी के कवि कुबेर दत्त और नुक्कड़ नाटक के पितामाह गुरुशरण सिंह का निधनर सम्मान।
 
 
 
नाटक
साँप का बिल : स्नेहलता रेड्डी

यह नाटक पहले एक गोल दायरे में खेला गया था लेकिन इसे पारंपरिक मंच पर भी प्रस्तुत किया जा सकता है। इसमें कोई दृश्य नहीं है। अधिकांश दृश्यों का संकेत अभिनय द्वारा दिया गया है। एक मात्रा पफर्नीचर एक तख्त और एक स्टूल।द्ध
कथावाचकः यह कहानी है स्नेहलता रेड्डी की, जिन्हें इंदिरा गाँधी द्वारा २६ जून १९७५ को लगाई गई इमरजेंसी में मीसा कानून के अंतर्गत गिरफ्रतार किया गया था और बंगलोर जेल में रखा गया था। यह कहानी उन स्थितियों की नहीं है जिन में उन्हें बंदी बनाया गया। चूंकि उन पर कभी कोई अभियोग नहीं लगा, इस बात पर बहस करना असंभव है कि वह दोषी थीं या निर्दोष। मृत्यु तक उन्हें बताया भी नहीं गया कि उन्हें किस अपराध के लिए बंदी बनाया गया है। यह कहानी उनके जेल-जीवन की और जेल में उनकी मित्रा बनी अन्य महिलाओं के जेल-जीवन की है। नाटक का शीर्षक है 'साँप का बिल।'
;अभिनेत्राी स्नेहलता दो महिला कैदियों के साथ प्रवेश करती है जिनके पीछे दो वर्दीधारी पुरुष जेलगार्ड जेल की कोठरी के किनारे तक आते हैं। असली चाबी से अदृश्य दरवा८ो को खोला जाता है और स्नेह को अंदर किया जाता है। अभिनेत्राी परेशान और अविश्वास की मानसिक स्थिति में है जो किसी भी महिला की मानसिक स्थिति हो सकती है जिसे अबूझ कारणों से जेल में ठूंस दिया गया हो।द्ध
अभिनेत्राी : यहाँ तो कोई दृश्य ही नहीं है।
कथावाचक : दृश्य की कोई ८ारूरत ही नहीं है।
अभिनेत्राी : जेल की दीवारें भी नहीं।
कथावाचक : इतना कापफी है कि तुम अपने को जेल के भीतर महसूस करो।
अभिनेत्राी : लेकिन मेरा 'मेकअप'...?
;इसी क्षण चार अन्य अभिनेत्रिायाँ प्रवेश करेंगी जिन्हें अन्य महिला कैदियों की भूमिका अदा करनी है। ये अभिनेत्रिायाँ आगे बढ़कर स्नेह का मेकअप करती हैं। एक आइना पकड़ती है, एक मेकअप बॉक्स को। तीसरी उस का चेहरा पोतती है और चौथी बाल संवारती है।द्ध
पहली महिला कैदी : यहाँ बैठो।
दूसरी : हम तुम्हें उम्र से पहले ही बूढ़ी बनाएँगी।
तीसरी : अपना चेहरा उठाओ।
चौथी : ऐसे आदमी का चेहरा जो साँस नहीं ले रहा हो।
पहली : और न ही सूरज को देख रहा हो।
दूसरी : आँखों के नीचे के गड्ढे मत भूलना।
तीसरी : ऐसे व्यक्ति की आँखें जो दिल टूटने के कारण मर रहा हो।
चौथी : और बाल...?
पहली : सपफेद, सपफेद।
दूसरी : उम्र के कारण धूल भरे।
तीसरी : उस का मुँह?
अभिनेत्राी : मुँह के कोनों पर झुर्रियाँ।
;मेकअप पूरा होने के बाद चारों उसे पकड़कर खड़ा करती हैं।द्ध
पहली : उसके कंधे बूढ़ी औरत की तरह झुके होने चाहिए।
दूसरी : साँस लेने की कोशिश करते हुए तुम कोठरी का चक्कर लगाओगी।
तीसरी : पाँव द्घसीटते हुए।
चौथी : लाश की तरह चलते हुए।
;अभिनेत्राी ऊपर बताए गए अनुसार कोठरी में चलती है। अन्य चारों उसे देखते हुए मंच के पीछे चली जाती हैं।द्ध
;मंच के दूसरे भाग से उद्द्घोषक माइक्रोपफोन से तीखी-कठोर आवा८ा में बोलता है।द्ध
उद्द्घोषक : आठ महीने से इसने इन चार नंगी दीवारों से बाहर की दुनिया नहीं देखी है। उसकी जेल की साथिनें देह-व्यापार, हत्या और चोरी-डकैती की दोषी हैं। यही दीवारें और सीमेंट की छोटी-सी पट्टी इन सबकी भी जगह है। साँप का बिल जिसमें रागी और चावल की धूल है, द्घीसें और चूहे हैं, खटमल और तिलचट्टे हैं।
;स्नेह ;अभिनेत्राीद्ध निराश स्वर में बोलती है जो धीरे-धीरे तीव्र होता है। वह पिंजरे में बंद व्याकुल पशु की तरह दीवार पर सिर मारती है।द्ध
स्नेह : यह दीवार है, यह दीवार है, दीवार है।
;चार कैदी महिलाएँ वास्तव में प्रवेश करती हैं। प्रत्येक पानी की बाल्टी उठाने का अभिनय करती है जो काम वे महिला वार्डर के सीटी बजाने पर करती हैं। वे चार दिशाओं से धीरे-धीरे कोठरी की ओर बढ़ती हैं। कोठरी के किनारे से एक और सीटी बजती है। वे रुकती हैं। एक और सीटी। वे मुड़ती हैं और बाल्टी नीचे रखती हैं। जब वे बाल्टी नीचे रख रही होती है तभी कथावाचक की आवा८ा सुनाई पड़ती है, ''उसका काम सिपर्फ पानी ढोना है।'' इसके बाद चारों स्नेह को चारों ओर से द्घेर कर तख्त पर बैठ जाती हैं और रागी-चावल सापफ करने लगती हैं।द्ध
कथावाचक : जब किसी औरत को दाखिल किया जाता है तो उसे सबके सामने नंगा किया जाता है। उसे जेल में जो भोजन दिया जाता है उसमें न प्रोटीन होते हैं और न खनिज पदार्थ। उसे पफल-सब्जियाँ नहीं मिलतीं, कॉपफी-चाय भी नहीं मिलती। यहाँ नल नहीं है इसलिए उसे निर्धारित समय में कुएँ का कच्चा पानी दिया जाता है। उसके लिए कोई मनोरंजन नहीं, कोई पिफल्म-शो नहीं। उसके साथ पशु जैसा बर्ताव किया जाता है, निर्धारित समय पर अंदर-बाहर ले जाया जाता है। अंदर जो कोठरी है उसमें चार अन्य कैदी महिलाएँ रहती हैं। बाहर सीमेंट की सँकरी पट्टी है जाे दस पफुट चौड़ी है। इसके अलावा कोई पेड़ या द्घास का टुकड़ा नहीं है।
उद्द्घोषक : उसका काम सिपर्फ पानी ढोना, कोठरी में झाड़ू-पोछा करना और दिन भर रागी-चावल सापफ करना है, खाने के समय को छोड़कर। कभी-कभी उसे रुई बीननी होती है।
;यहाँ महिला वार्डर ;संतरीद्ध पहली कैदी के पैरों के पास एक मुट्ठी सपफेद पाउडर पफेंकती है जो हवा में पफैल जाता है। बारी-बारी सभी महिला कैदियों पर इसी तरह सपफेद पाउडर पफेंका जाता है जो हवा में पफैलता है। यह रुई सापफ करने के काम का द्योतक है।द्ध
स्नेह : मेहरबानी करके कैदियों को रुई सापफ करने का काम मत दो। मुझे दमे की बीमारी है। रागी और चावल की धूल का मुझ पर बुरा असर होता है। रुई की धूल तो दमे के लिए द्घातक है। मैं यहाँ साँस नहीं ले सकती। और रुई के कणों से मेरा दम द्घुट जाएगा।
;ड्रम्स आपफ इंडिया ईएमआई रिकार्ड के पहले कट का संगीत ८ाोर से बजाया जाता है। अभिनेत्राी अस्थमा अटैक का अभिनय करती है। अन्य कैदी महिलाएँ अपने काम में लगी रहती हैं। वह छोटी-सी मेज के पास जाती है जिस पर बहुत सी दवाईयाँ रखी हुई हैं। पहले वह इनहेलर लेती है, पिफर गोलियाँ। वह मदद के लिए बुलाना चाहती है लेकिन उसकी आवा८ा नहीं निकलती है। वह द्घंटी बजाती है। कोई मदद नहीं आती। हताश होकर वह अपने को इंजेक्शन देने की कोशिश करती है लेकिन पिफर पीछे हट जाती है। महिला वार्डर ;संतरीद्ध अपना सामान लेकर आती है, कोठरी का ताला खोलती है। पिफर कुछ देर बाद डॉक्टर के साथ लौटती है। अब भी वह अपना काम समय लेकर धीरे-धीरे आराम से करती है। डॉक्टर उसकी नाड़ी देखता और पिफर बिना जल्दबा८ाी या चिंता दिखाए इंजेक्शन देता है। अभिनेत्राी अभी बेहोश होती है कि डॉक्टर बाहर जाता है। संतरी अन्य कैदियों की ओर मुड़ती है।द्ध
संतरी : ;कैदी महिलाओं सेद्ध क्या तुम्हारे पास इससे बेहतर काम करने के लिए है?
पहली कैदी : हाँ, हाँ, है क्यों नहीं?
संतरी : मैं बताती हूँ कि वह क्या है। तुम सीधे सजा-द्घर की तरपफ जाओगी और वहाँ पूरा दिन अकेली बैठी रहोगी। ;दूसरी कैदी सेद्ध तुम्हें क्या हुआ है?
दूसरी कैदी : ऐसे बैठकर तो मेरी पीठ टूटने लगी है। क्या मैं थोड़ी देर आराम कर सकती हूँ?
संतरी : तुम्हारी पीठ? मुझे तो यह तुम्हारा पेट दिखाई देता है जिसमें तुम बच्चा लिए द्घूम रही हो। तुम किसी ऐसे वक्त यहाँ आ सकती थी जब तुम पेट से न होती?
दूसरी कैदी : मुझे यहाँ आना ही नहीं चाहिए था। सच्चाई तो यही है। मैं आठ महीने से ऊपर हूँ। इस का खयाल है तुम्हें?
संतरी : मेरी बला से। अपना काम करो। ;तीसरी सेद्ध तुम क्या छिपा रही हो?
तीसरी : कुछ नहीं।
संतरी : कुछ नहीं? दिखाओ तो यह कुछ नहीं क्या है? खाना...?
तीसरी : थोड़ी-सी रोटी है। उस दिन मेरी सहेली मिलने आई थी वह दे गई है। क्या कुछ गलत है इसमें?
संतरी : गलत तो है अगर मेरा हिस्सा नहीं दोगी?
तीसरी : लेकिन यह तो थोड़ी-सी है देख लो।
संतरी : अगर यह थोड़ी-सी है तो लाओ सारी मुझे दे दो। ;छीनती हैद्ध
तीसरी : तुम ऐसा नहीं कर सकती। इसे लौटाओ मुझे।
संतरी : मुझे हाथ मत लगाना रंडी। मैं तुम्हें ऐसा सबक सिखाऊँगी कि कभी भूलोगी नहीं।
;संतरी कैदी को डंडे से बेरहमी के साथ पीटने लगती है। कैदी चिल्लाने लगती है। स्नेह की नींद टूटती है।द्ध
स्नेह : ये क्यों चीख रही है। मैं बर्दाश्त नहीं कर सकती।
चौथी कैदी : उसे पिटाई बंद करनी होगी। मैं उसे मार डालूँगी। छोडूँगी नहीं
;चौथी कैदी महिला पागलों की तरह संतरी को खींचने लगती है, उसे पफर्श पर पटक देती है और उसका गला द्घोंटने लगती है। दूसरी कैदी महिलाएँ उसे छुड़ाने लगती हैं और छुड़ा भी लेती हैं। संतरी अपना गला पकड़े रहती है। उसकी साँस पफूलती है।द्ध
संतरी : मैं तुम्हें स८ाा-द्घर ले जाऊँगी और नंगाकर उनसे पिटवाऊँगी। सब अपनी-अपनी जगह जाओ नहीं तो मैं तुम्हें एक हफ्रते के लिए एकांत कोठरी में डाल दूँगी।
स्नेह : वह पागल है। वह पागल है।
;संतरी कोठरी के दरवा८ो तक जाती है, उसे खोलती है। सामने सुपरिटेंडेंट और आईजी खड़े दीखते हैं। वह उन्हें अंदर लाती है।द्ध
आई जी : मिसेज रेड्डी, आप हमसे मिलना चाहती थीं।
स्नेह : हाँ, आने के लिए धन्यवाद। मैं चाहती थी कि आप सुपरिटेंडेंट की उपस्थिति में यहाँ आएँ और मेरी बात सुनें।
आई जी : अच्छा बोलिए।
स्नेह : सुपरिंटेंडेंट साहब, मैं आपको बताना चाहती हूँ कि तीन रात पहले मुझे जो दमे का अटैक हुआ था, उसमें मैं करीब-करीब मर ही गई थी।
सुपरिंटेंडेंट : मिसेज रेड्डी, दमे, से कोई नहीं मरता।
स्नेह : मैं पिफर कह रही हूँ मैं करीब-करीब मर गई थी और डॉक्टर एक द्घंटे के बाद आया था।
सुपरिंटेंडेंट : ठीक सात मिनट बाद।
स्नेह : यह झूठ है छबलानी साहब। जब से मैं इस जेल में डाली गई हूँ मैंने बार-बार आपसे निवेदन किया है कि मुझे अस्पताल भेज दो और आपने लगातार मना किया है। मैं बीमार हूँ, निराश-हताश हूँ और मैं मर ही गई थी। क्या आप को इसकी परवाह नहीं है? आप बहुत बेरहम और संगदिल आदमी हैं। मैं देख रही हूँ कि आप इन तौर-तरीकों को कैसे चलाए रखना चाहते हैं। बाहर के आदमी कभी इन बातों पर विश्वास नहीं करेंगे। आप मेरे साथ भी वैसा ही व्यवहार कर रहे हैं। डॉक्टर कहते हैं कि मेरा दिल कभी भी अचानक सिकुड़ सकता है। इससे मेरी मौत हो सकती है।
आई जी : मैडम, चिंता मत कीजिए। अस्पताल में भर्ती होने की आपकी प्रार्थना पर ८ारूर विचार होगा।
स्नेह : आप देख रहे हैं, यहाँ का डॉक्टर मुझे कॉर्टिजोन की बड़ी खुराकें दिए जा रहा है। कॉर्टिजोन दिल को बहुत नुकसान पहुँचाती है अगर उसे बड़ी खुराक में लिया जाए।
आईजी : मैं देखूँगा कि सुपरिटेंडेंट साहब आपकी प्रार्थना पर हर संभव विचार करें।
;आई जी सुपरिटेंडेंट के साथ जाने लगता है। स्नेह के भावना-विस्पफोट से दोनों परेशान-से हैं। वह छोटी मे८ा से काग८ाों का एक बंडल उठाती है।द्ध
स्नेह : और इन महिलाओं की जो हालत है क्या उस पर भी करेंगे विचार आप? मैंने पूरी रिपोर्ट लिखी है।
;आईजी आधे रास्ते जा चुका होता है।द्ध
आई जी : ८ारूर।
स्नेह : उन्हें इतनी मेहनत करनी पड़ती है। पानी पीने लायक नहीं है। उन्हें पीटा जाता है।
आई जी : ठीक वक़्त पर सब होगा मिसेज रेड्डी। सब अच्छे वक्त पर।
उद्द्घोषक : २९ जुलाई १९७६ को वह अपने संबंधियों से मिलने का इंत८ाार करती रही। कोई नहीं आया। सारी शाम और रात मानसिक पीड़ा रही। भोजन और वस्त्रा तो आए लेकिन मिलने वाले नहीं।
स्नेह : क्या हुआ? कोई बीमार है? किसी के साथ कोई दुर्द्घटना। हे भगवान, मेरी मदद करो । वो सब क्यों नहीं आए? क्यों...क्यों?
कथावाचक : वह दो दिन इंत८ाार करती रही। उसने सुपरिटेंडेंट से बार-बार पूछा कि मेरे लोग क्यों नहीं आए?
स्नेह : कहीं मेरे पिता को हार्ट अटैक तो नहीं हुआ। मेरे बेटे का एक्सीडेंट तो नहीं हुआ? मेहरबानी करके पता लगाओ।
अधिकारी : मैडम, सुपरिटेंडेंट ने मुझे आपको यह बताने का आदेश दिया है कि आप अगली सूचना तक अपने परिवार से नहीं मिल सकतीं क्योंकि आपने आई जी के सामने उनसे दुर्व्यवहार किया है।
स्नेह : लेकिन मैं अपने बेटे से मिलना चाहती हूँ। अगले कुछ दिनों में उससे बहुत बातें करना चाहती हूँ। मेरा बेटा अमरीका जा रहा है। जाने से पहले मैं उससे मिलना चाहती हूँ। मैं उसमें उसका बालक ढूंढ़ना चाहती हूँ। मुझे उससे मिलने दो। सिपर्फ उससे। प्ली८ा, प्ली८ा।
उद्द्घोषक : उस क्षण से लेकर तब तक, जब तक उसका पति और उसकी बेटी उससे मिलने नहीं आ गई, उसने भोजन-पानी ग्रहण करने से इंकार कर दिया। नौ दिन हो गए। इस बीच उसका बेटा अमरीका जा चुका था। वह उसे पिफर नहीं देख सकी।
;रात का समय। सभी कैदी नींद में हैं। अचानक गर्भवती कैदी महिला दर्द से कराहने लगी। एक अन्य कैदी महिला जाग गई।द्ध
तीसरी : क्या हुआ?
पहली : मेरा बच्चा बाहर आना चाहता है। उई माँ...।
दूसरी : हे भगवान! अरी जागो जागो। शांति कहती है उसका बच्चा आ रहा है।
तीसरी : यहाँ। यहाँ नहीं हो सकता। बिल्कुल नहीं हो सकता।
तीसरी : यहाँ सब हो सकता है। उठो उठो। शांति को बच्चा होने वाला है।
चौथी : तुम क्या बात कर रही हो?
दूसरी : उसको देखो।
पहली : उई माँ, मैं मर गई। डॉक्टर को बुलाओ।
चौथी : मैं कुछ नहीं कर सकती। मैं दाई का काम नहीं जानती।
तीसरी : मैं भी नहीं।
चौथी : और आधी रात को हम डॉक्टर कैसे बुलाएँगी?
;दूसरी कोठरी के दरवा८ो को पीटने लगती है।द्ध
दूसरी : अरे मदद करो, मदद करो।
पहली : उई माँ। मेरी जान निकल जाएगी।
चौथी : उसे बच्चा होने वाला है। हम क्या करें?
;चौथी को मिरगी का दौरा जैसा पड़ने लगता है।द्ध
तीसरी : चुप करो चुप करो। स्नेहाजी, स्नेहाजी जल्दी उठिए। शांति को बच्चा होने वाला है। उन्हें उसे यहाँ नहीं रखना चाहिए था। तुमने कहा था उसे अस्पताल भेजो। क्या नहीं कहा था?
स्नेह : क्या हालत खराब है?
पहली : हाँ...
स्नेह : दर्द लगातार हो रहा है?
पहली : कुछ-कुछ सेकेंड के बाद।
स्नेह : तब तो जल्दी ही होगा। दरवा८ाा पीटना बंद करो। द्घंटी बजाओ। ;वह उस दरवा८ाा पीटने वाली का हाथ पकड़ती हैद्ध जाओ कुछ पानी ले आओ। यह शोर बंद करो। उसे बिस्तर पर लिटाने में मेरी मदद करो। उसे बहुत से कपड़ों की ८ारूरत पड़ेगी। मेरे पास बिस्तर की चादर है। इसे पफाड़ने में मेरी मदद करो।
;गार्ड डॉक्टर के साथ आता है। दो गार्ड गर्भवती को उठाकर स्ट्रैचर पर लिटाते हैं।द्ध
दूसरी : यहाँ से बाहर निकलने का यह भी एक रास्ता है।
तीसरी : यह वापस आएगी।
चौथी : और बच्चा?
तीसरी : बच्चे के साथ।
;चारों कैदी महिलाएँ सोने लगती हैं। तभी एक गार्ड अंदर आता है और तीसरी के पास जाता है और जब वह लेटी है तो उसे पैर से ठेलता है।द्ध
गार्ड : क्या विचार है?
तीसरी : किस ची८ा का विचार?
गार्ड : वही, जो होता है।
तीसरी : आज रात बहुत थक गई हूँ।
गार्ड : इसका मतलब?
तीसरी : ८ारा सोचो, मैं तुम्हें बहुत झेल चुकी हूँ।
गार्ड : ए रंडी कान खोल कर सुनो। मैं इतनी दूर ऐसे ही नहीं आया हूँ।
तीसरी : चले जाओ, मुझे अकेला छोड़ दो।
गार्ड : इस तरह बोलती जाओगी तो तुम्हें पिफर द्घटिया खाना मिलेगा और काम का पूरा कोटा।
तीसरी : हफ्रते में एक बार तुम्हारा नरक भोगने से तो वही अच्छा है।
गार्ड : लगता है तुम्हें सबक की ८ारूरत है।
;वह दरवा८ो तक जाता है और दो अन्य गार्डों को ले आता है। सब अंदर आते हैं।द्ध
गार्ड : इस रंडी को थोड़ा सबक सिखाना है। इसे पकड़ो तो मेरे लिए। मैं जिस काम के लिए आया था उसके बगैर तो जाऊँगा नहीं।
;दो अन्य गार्ड उस भयभीत औरत की तरपफ बढ़ते हैं। वे उसे पकड़ कर ८ामीन पर लिटाते हैं और इस बीच हँसते जाते हैं। वे उसकी टाँगों को चौड़ा पफैला कर उस पर बैठ जाते हैं। दूसरा गार्ड अपनी पेटी निकालकर पेंट खोलता है। वह चीखती हुई औरत की तरपफ बढ़ता है। इस बीच अन्य दो औरतें जाग जाती हैं। सारा दृश्य देखकर गार्ड को उस औरत के ऊपर से खींचती हैं।द्ध
दूसरी कैदी : ओह! यह तो पूरी पार्टी है।
;वे तीसरी कैदी को छोड़ उनमें से एक को पकड़कर पफर्श पर लिटाते हैं। वे इसे बड़े म८ााक की तरह लेते हैं। इसी बीच औरतों के चिल्लाने से स्नेह की नींद टूटती है।
स्नेह : जंगली जानवरों, निकलो यहाँ से।
स्नेह ८ाोर से अपनी द्घंटी बजाती है। गार्ड द्घबराकर बाहर भागते हैं।
उद्द्घोषक : जनवरी १९७७ तक उसकी आत्मा उसके शरीर की तरह ही टूट चुकी थी। पिफर भी उसने कैदी औरतों में खेलों की प्रतियोगिता आयोजित कर अपनी रुचि को ८िांदा बनाए रखा।
;स्नेह इसके बाद अपने लंबे एकालाप के दौरान अपने तख्त को खिसकाकर उसे मंच का रूप देती है और कैदी महिलाओं को अपना श्रोता समूह बनाती है। वह कहानी को अभिनय में प्रस्तुत करती है, गोया वह बच्चों के लिए नाटक में कहानी प्रस्तुत कर रही हो। वह सैनिक बनकर आगे पीछे मार्च करती है और सीता बनकर अपने बालों में कंद्घी करती है और नाटक की सारी पंक्तियों को अभिनय में प्रस्तुत करती है। कहानी के साथ-साथ वह उत्तरोत्तर उत्तेजित होती है और श्रोता कैदी औरतों को भी उत्तेजित करती है। एकालाप में कम से कम तीन बार बाधा पड़ती है। एक बार तब जब वह ते८ाी से पफूलती सांस को सम्हालती है। दूसरी बार जब उसे खाँसी का दौरा पड़ता है और तीसरी बार जब उसे अपना दिल ८ाोर-८ाोर से धड़कता लगता है। दृश्य के अंत में जो कुछ द्घटता है उसके मद्देन८ार ये महत्वपूर्ण क्षण हैं। जब सुपरिटेंडेंट पैरोल का नोटिस लेकर दाखिल होता है तो उसके अपने शब्द सीता के शब्दों के साथ गुत्थम-गुत्था हो जाते हैं। दो चरित्रा मिलकर एक बन जाते हैं।द्ध
स्नेह : नहीं, मैं उन्हें अपने को पीटने नहीं दूंगी। बताऊँ हम क्या करेंगी? हम अपने को होश-ओ हवास में बनाए रखेंगी। हम एक नाटक खेलेंगी। मैं एक एक्ट्रेस हुआ करती थी। लेकिन यहाँ ८ महीने रहने के बाद मैं इतनी बूढ़ी और बीमार हो गई हूँ कि अभिनय कर ही नहीं सकती। लेकिन तुम मेरे लिए अभिनय कर सकती हो। मैंने सीता नाम का एक नाटक लिखा था। यह राम और सीता के बारे में है। हाँ, इसका अंत अलग तरह का है।
ओह! लेकिन तुमने तो कभी थियेटर में काम किया ही नहीं। बेचारी, इस काल कोठरी में बंद रहीं। लेकिन चिंता मत करो। मैं तुम्हारे लिए थियेटर बनाऊँगी। लो इस काम में मदद करो। इसे यहाँ से हटाओ। ;वे तख्त को एक तरपफ करती हैंद्ध। यह हमारा स्टेज है। अब तुम सब यहाँ बैठो। थियेटर का मतलब एक बड़ा हाल जिसमें बहुत से लोग बैठे हों। यह सब तरपफ आदमी के सिरों का समुद्र जैसा होता है। सबकी न८ारें स्टेज पर होती हैं। लेकिन इस पर बड़ा पर्दा पड़ा होता है। द्घंटी बजती है और पर्दा खींचा जाता है। स्टेज पर ते८ा रोशनियाँ पफैल जाती हैं। अभिनेता अपने-अपने स्थान पर होते हैं। पहला दृश्य है यु(भूमि में शिविर का। सैनिक ऊपर-नीचे मार्च कर रहे हैं ;ओह! मैं सांस नहीं ले पा रही हूँ।द्ध उन्होंने पुरानी किस्म की अजीब वर्दियाँ पहन रखी हैं, जिसमें पैड वाले कोट, लोहे के टोप और तलवारें हैं। वे उसके साथ सीता को लाने जाते हैं जो अब भी श्रीलंका में है और दृश्य समाप्त हो जाता है।
पर्दा पिफर उठता है। अब दृश्य कोई और है। सीता खुशी से उत्तेजित राम से मिलने के लिए तैयार है। वह दासियों से कहती है, ''जल्दी करो, राम मुझे ले जाने के लिए जल्दी ही आने वाले हैं।'' लेकिन राम नहीं आते हैं। हनुमान आते हैं सीता दुःखी और निराश है। वह पूछती है, ''राम कहाँ हैं? राम कहाँ हैं? वे क्यों नहीं आए'' ;खाँसती हैद्ध हनुमान उन्हें सांत्वना देने की कोशिश करता है। पर्दा गिरता है।
अगला दृश्य पिफर यु( भूमि का है। लक्ष्मण राम पर बरस पड़ा है, ''हनुमान को भेजा? राम, तुम खुद क्यों नहीं गए? क्या तुम उससे मिलने के लिए बेचैन नहीं हो? तुम यहाँ खड़े इंत८ाार कैसे कर सकते हो?'' पिफर सीता प्रवेश करती है और दौड़कर राम के पास जाती है, ''राम, राम, ओ स्वामी! ईश्वर का धन्यवाद आप ठीक-ठाक हैं। मुझे थाम लो, अपनी बाहों में थाम लो। मैं तुम्हारे लिए कितना तड़पी हूँ। ;ओह! मेरा दिल धड़क रहा हैद्ध। लेकिन राम का रवैया ठंडा बना हुआ है। वह शु(किरण किए बिना उसे वापस ग्रहण नहीं करना चाहता। सीता को इसका विश्वास नहीं होता। सीता को गुस्सा आता है-''तुम ऐसा कैसे कर सकते हो? तुम मेरे प्यार का अपमान कैसे कर सकते हो? तुम मेरे साथ यह बरताव कैसे कर सकते हो?'' लेकिन राम कहता है, ''मेरी इ८८ात का सवाल है। धर्म मेरा कर्त्तव्य है।'' लेकिन सीता अग्नि-प्रवेश से इंकार करती है क्योंकि वह निर्दोष है। सब लोग आश्चर्य चकित होते हैं। गुरु वशिष्ठ को सदमा लगता है, वह तो ईश्वर पर प्रश्न-चिह्‌न लगा रही है।''
इस स्थान पर जो दृश्य का चरम बिंदु है, सुपरिटेंडेंट महिला संतरी के साथ प्रवेश करता है।
सुपरिटेंडेंट : मिसेज रेड्डी मुझे आपको सूचित करना है कि होम कमिश्नर ने आपको स्वास्थ्य के आधार पर एक महीने की पैरोल-छुट्टी देने की पुष्टि कर दी है।
;स्नेह जो तख्त यानी मंच पर खड़ी थी धम से बैठ जाती है। वह बहुत निराश दीखती है।द्ध
स्नेह : एक महीना, सिपर्फ एक महीना। ये लोग सोचते हैं कि इन हालात से एक महीना दूर रहने पर मैं ठीक हो जाऊँगी। और जो मानसिक तनाव तथा परेशानी मैंने भोगी उसका क्या? मैं इस साँप के बिल में वापस आने के इंत८ाार में ही दिन-रात द्घुलती रहूँगी।
;उसने अपने सिर को दोनों हाथों के बीच दबा रखा था। थोड़ी देर तक रुक कर उसने झटके से अपना सिर उठाया और बोली-द्ध
स्नेह : मुझे नहीं चाहिए तुम्हारी पैरोल छुट्टी!
सुपरिटेंडेंट : लेकिन आदेश...
स्नेह : मैं तुम्हारे आदेश पर थूकती हूँ। सरकार का पफर्८ा है कि वह सोचे कि मैं इस हालत में क्यों हूँ। अगर वह ईमानदार है, तो उसे सोचना चाहिए कि हम सब इस हालत में क्यों हैं। मुझ पर कोई चार्ज नहीं लगाया गया है। मैं यहाँ मीसा के तहत बंद हूँ। मेरी रिहाई बिना शर्त होनी चाहिए।
;अब वह सुपरिटेंडेंट के अधिकार को चुनौती देने के लिए खड़ी हो गई थी। सुपरिटेंडेंट ने अपमानित महसूस किया लेकिन वह कुछ बोला नहीं। वह सिपर्फ मुस्करा कर बाहर निकल गया। स्नेह ने लंबी सांस ली और अपने गिर्द साथी कैदी महिलाओं पर सरसरी न८ार डाली और नाटक खेलने का क्रम जारी रखा। लेकिन अब वह सीता के रूप में नहीं स्वयं अपनी बात कहने लगी। जब वह कहती है कि मैं तुम्हारा आदेश नहीं मानूँगी तो वह सुपरिटेंडेंट पर, जो बाहर जा रहा होता है, ८ाोर से चीखती है और सत्ता को संबोधित सारे शब्द उसके प्रस्थान के दिशा में मुखातिब होते हैं।द्ध
स्नेह : ;अपनी बात जारी रखते हुएद्ध और सीता उठ खड़ी हुई और सब लोगों के सामने राम से बोली-तुम जिसे सही मानते हो मैं उसके आगे नहीं झुकूँगी। मैं अपने कर्म को चुनने के लिए स्वतंत्रा हूँ और मैं विद्रोह को चुनती हूँ।
;श्रोताओं सेद्ध मैं आप सबसे विनती करती हूँ कि आप इस अन्याय से लडं़े। इसके आगे समर्पण न करें। मेहरबानी करके मेरी पीड़ा को, मेरे तिरस्कार को और मेरे अपमान को भूलिएगा नहीं। क्योंकि वे इसे चुप्पी की कब्र में दपफना देंगे। मुझे अपने आत्मसम्मान के लिए लड़ती एक निहत्थी स्त्राी के रूप में याद रखें। इतिहास ने कभी समूचे सच को दर्ज नहीं किया है-उसने हमेशा सत्ता में बैठे आदमी को ही प्रस्तुत किया है। दबे-कुचले को कभी नहीं, हमेशा शक्तिशाली को। जिन्होंने अन्याय के खिलापफ लड़ाई लड़ी उनकी हमेशा उपेक्षा हुई। इसलिए इन हुकमरानों से सावधान रहो जिन्हें भावी इतिहास ऐसे गुणों से विभूषित करेगा जो इनमें कभी नहीं रहे। यह इतिहास मेरे कष्टों को, मेरी तपस्या को अनदेखा करेगा और अपने अपराधों को मेरे भीरूपन और मेरी दुर्बलता से छिपाएगा। ...मैं तुम्हारा त्याग करती हूँ और खुशी से अपने अंत की ओर जाती हूँ। शान को लिए दिल में।
;दिल शब्द के उच्चारण के साथ ही उसे ८ाोर का हार्ट अटैक पड़ता है। उसकी छाती दर्द से पफटने लगती है। उसकी हालत भयानक हो जाती है। वह मंच ;तख्तद्ध पर गिर पड़ती है और मर जाती है। कैदी महिलाएँ सोचती हैं कि यह सीता के नाटक का अंत है और वे तालियाँ बजाती हैं। इतने में कोठरी का द्वार खुलता है और स्नेह का पति तथा बेटी अंदर आते हैं।द्ध
बेटी : माँ... माँ... तुम पैरोल पर रिहा हो गई हो।
पति : ;उसे हिलाते हुएद्ध स्नेहा, हम तुम्हें द्घर ले जाने आए हैं। तुम्हें पैरोल मिल गया है। ;वह उसे द्घुमाता है और उसका सिर अस्वाभाविक रीति से लुढ़क जाता है।द्ध
पति : स्नेहा...
;वह अपनी बेटी की तरपफ लाचार देखता है। बेटी माँ की लाश पर गिर पड़ती है।द्ध
बेटी : माँ... माँ...
;अभिनेता इस दृश्य को अचल झाँकी की तरह बनाए रखते हैं। तभी कथावाचक प्रवेश करता है।द्ध
कथावाचक : वास्तव में, स्नेहलता रेड्डी का निधन बंगलोर जेल से रिहा होने के दो हफ्रते बाद हुआ। लेकिन जो उसे जानते थे उनके लिए वह जेल में ही मर गई थी। निश्चय उसका हृदय वहीं रहा अपनी सहेलियों के साथ जो, हम सब जानते हैं, अब भी उस सांप के बिल में पड़ी होंगी।
;पर्दा गिरता हैद्ध
;स्नेहलता रेड्डी को १९७५ में इंदिरा गाँधी द्वारा लागू की गई इमरजेंसी में गिरफ्रतार किया गया था।द्ध
'टुवार्ड न्यू मैन काइंड' से साभार

;अनुवादक : मस्तराम कपूर-साहित्य की कई विधाओं में लेखन। प्रखर लोहियावादी चिंतक। राम मनोहर लोहिया रचनावली का संपादन भी।द्ध

 
 
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