नवंबर २००९
 
 
 
   
 
 
 
•अमरकांत को इलाहाबाद में ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित• जितेन्द्र श्रीवास्तव को देवीशंकर अवस्थी सम्मान•दिल्ली में विश्व (पुस्तक मेला ;राजकमल प्रकाशन के स्थापना दिवस पर तीन लखटिया पुरस्कारों की द्घोषणामहुआ माजी के उपन्यास 'मरंग गोड़ नीलकंठ हुआ' को तीसरा राजकमल कृति सम्मानविश्वनाथ त्रिापाठी की पुस्तक 'व्योमकेश दरवेश' को पहला सृजनात्मक गद्य सम्मान अमरेन्दु किशोर की कृति 'बादलों के रंग हवाओं के संग' को चौथा कृति सम्मानस्तंभ लेखक भारत भारद्वाज के खिलापफ वारंटद्ध)
 
 
 
मीमांसा
प्रतिद्घात केवल शब्द भर नहीं : डॉ. सुधा उपाध्याय

अपनी कहानियों में शैलेय पूरी जीवंतता और संलग्नता के साथ पहाड़ी जीवन की विषमताओं और विसंगतियों को उकेरने में सपफल रहे हैं। कहीं-कहीं पूरा परिवेश और कहानी में आने वाले पात्राों से आत्मीय लगाव उनकी पक्षधरता को भी बयान करती चलती है। पहली ही कहानी देखिए-'रौखड़' प्राकृतिक आपदा की कम और मानवीय विसंगतियों की अधिक व्यथा कथा लगी। यह कहानी कुछ वैसा ही आस्वाद दे रही थी जैसा प्रेमचंद की कुछ कहानियों का तानाबाना अपने पूरे होशोहवास में गंवई संस्कार समेटे रहती है। शैलपुत्रा शैलेय स्वयं भी कई कहानियों में साक्ष के तौर पर मौजूद मिले। जैसे बेहद निकट से उस पूरे रूप-रंग-गंध को अपने में समोये हुए पहाड़ी प्रदेशों पर होने वाले वृष्टिपात, अतिवृष्टि और अनावृष्टि को धड़कता हुआ दिखाना, किसी कुशल कथाकार का ही दायित्व होता है। निस्संदेह उसे निबाहने और हमारी संवेदना को झकझोर देने के लिए ये पंक्तियाँ जरूरी हैं--''सरकारी गैरसरकारी राहतों से अधिकारियों के कलेजे खिलेंगे और हम तो ठहरे पफूटी करम के निकम्मे सूखी द्घास पफूस, ८ारा सी आँच आई धूं-धूं कर जल गए। पानी के दो छींटे पड़े तो दो पल में गल गए।

इसके अलावा और कहना सुनना रह ही क्या गया है? चाहे 'राम नाम सत है' कहो 'चाहे जिंदगी कुकरगत है' एक ही मतलब है रौखड़ और मौत।''
भंवर कहानी केवल विस्थापितों के दुख और संद्घर्ष को ही उजागर नहीं करती बल्कि बेरोजगारी से तंग आकर पहाड़ी युवकों के आत्मसम्मान, मान प्रतिष्ठा यहाँ तक कि ८िांदगी भी दाँव पर लगा देने की कहानी है। दिल्ली जैसे भीड़-भाड़ भरे शहर में आकर अजनबियत और बेगानगी कौन महसूस नहीं करता। भीड़ में तन छिल रहा पर हाय! मैं कितना अकेला। यह ऐसी ही भंवर है जो ह८ाारों ८िांदगियाँ लील चुकी है। उन्हें उनके द्घर परिवार समाज कुनबे से दूर ला पटकती है। जहाँ कहने का सबकुछ है ८िांदगी नाम भर भी नहीं। न कोई शहर अपना है न इनकी जडं़े गाँव से जुड़ी हैं न कोई संबंध अपना है न कहने को कोई अपना है।

प्रतिद्घात केवल शब्द भर नहीं दिनों-दिन बढ़ते जा रहे पुलिस तंत्रा, थाने, कचहरी के मकड़जाल को भी स्पष्ट करता है। देश का प्रतिभाशाली युवा वर्ग केवल इसलिए दिशाहीन और भ्रम का शिकार हो रहा है क्योंकि व्यवस्था उसे ऐसे चक्रव्यूह में द्घेर कर खत्म करने पर आमादा है। युवा पीढ़ी का आक्रोश भयंकर तबाही ला सकता है। यह व्यवस्थाधारियों को समझने की जरूरत है। नहीं तो उनके समक्ष केवल हिंसा और तोड़पफोड़ ही एकमात्रा विकल्प बच जाता है। इस कहानी में भी बड़ी चतुराई से पाँचों नौजवानों को सुरक्षा और संरक्षण का छलावा देकर एक हत्या जैसे जुर्म में पफंसा दिया जाता है। जो उन्होंने किया ही नहीं उसका इल्जाम उन पाँचों की पूरी ८िांदगी भविष्य, चरित्रा, सामाजिक प्रतिष्ठा यहाँ तक कि आमदनी के सारे रास्तों को दागदार कर देने की साजिश भी रची गई। पूरा गाँव प्रधान प्रिंसिपल साहब एकजुट होकर भी वकीलों और थानेदार का अन्याय न रोक पाए। सबके लिए यह एक मनोरंजन प्रहसन बनकर रह गया और एक बार पिफर पाँच होनहार प्रतिभाशाली सीधे ईमानदार नौजवान व्यवस्था की न्यायपालिका के अन्याय की सूली चढ़ गए।

'यहीं कहीं से' कहानी पढ़ते हुए, जो संग्रह का शीर्षक भी है कभी साही का 'लद्घुमानव' और कभी रद्घुवीर याद आए-''कुछ होगा कुछ होगा अगर मैं बोलूँगा/न टूटे न टूटे तिलिस्म सत्ता का/मेरे अंदर का कायर टूटेगा'' इसी आस्था और विश्वास को लेकर शैलेय की यह कहानी आशावादी स्वर के साथ मुखरित होती है। खासकर इस दौर में जबकि चुनौतियों से बेहतर अवसर को माना जाने लगा है। क्षुद्र भीड़ में नारों की बहुलता है प्रखर व्यक्ति और विचारधारा का अभाव है। लोग बोलते हैं। बड़ी शिद्दत से बोलते हैं पर कब और क्या बोलना चाहिए नारे लगाने में भूल जाते हैं। मार्क्सवाद मार्क्सवाद चिल्लाने वाले यह तक नहीं जानते कि किसी भी संगठन के लिए स्वस्थ बहस, सवाल, अध्ययन, सर्वेक्षण कितना जरूरी है। हम टूटते हैं। कायर कहलाते हैं क्योंकि हममें पारस्परिकता का अभाव है। मार्क्सवाद यह नहीं कहता कि विरोध करने के लिए विरोध किया जाए। वस्तुतः पारस्परिकता, स्वस्थ बहस, मानसिक उठा पटक मार्क्सवाद है। और गाँधी भी तो यही चाहते थे। जन-गण-मण का एकसूत्रिात होना इस कहानी का प्राण भी है और संदेश भी।

नासूर कहानी जाति क्षेत्रा संप्रदाय वर्ग वर्ण में विभाजित समाज के उस नासूर की ओर हमारा ध्यान दिलाती है जिसके कारण अपना सबकुछ खो देने की पीड़ा अपमान की ८िांदगी तिरस्कार और बेगानेपन से तंग आकर ब्राह्मण कुलगोत्रा परिवार में उत्पन्न पेशे से पंडित वंशीधर पूरी मानव जाति और उसकी अमानवीयता से तंग आकर एक नए समाज की आस लगाए रखते हैं। सामाजिक कुरीतियां जाति धर्म की आड़ में पनपते झंझावात पूरी मानव जाति के लिए नासूर ही तो है जो पीढ़ी दर पीढ़ी कई-कई जिंदगियों को सड़ा देती है।
'यह कोई लीला नहीं है' कहानी अन्य कहानियों से थोड़ी कमजोर लगी। जिस तरह कहानी शुरू से मध्य तक अपने में बाँधे रही इसका अंत थोड़ा हल्का पड़ गया। अपनी माँ को नचनिये की भूमिका में ठुमके लगाते देख जब वह ग्लानि और शर्म से गड़ा जा रहा था, अगर कहानी वहीं खत्म हो जाती तो शीर्षक की सार्थकता थी। उसकी लाश के पास पिता का लौट आना, बेटी के विवाह के लिए चिंतित होना थोड़ा कृत्रिाम लगा।

जेब कहानी तत्कालीन समय और समाज के बदलते रूप और मापदण्डों के लिए याद की जा सकती है। एक मध्यमवर्गीय बुजुर्ग इन जेबकतरों के भवसागर में हतप्रभ, ठगा हुआ, क्षोभ ग्लानि, द्घृणा और क्रोध एक साथ उगल देने को तैयार है। इन परिस्थितियों में आत्मविश्वास डांवाडोल होना स्वाभाविक ही है। ऐसे समाज में जहाँ कदम कदम पर द्घूसखोर रिश्वतखोर भरे पड़े हैं। हर मोड़ पर पूरी यात्राा के दौरान टिकट कटाने से लेकर टी.टी., खलासी, चायवाला, सहयात्राी, वेटिंगरूम की चौकसी करती औरत और तो और वहीं पर मौजूद शराबी पुलिस सब के सब उसे जेबकतरे ही नजर आ रहे हैं। यात्राा प्रारंभ होने से पूर्व जो पैसों को सहेजने और जेब को बचा सकने की जद्दोजहद बुजुर्ग की थी वो असपफल ही रही। अंतिम पंक्तियाँ झन्नाटेदार तमाचा है इस पूरी व्यवस्था और व्यवस्था के रखवालों पर--''खिसियाए हुए से वे उदास भारी कदमों से इस तरह किनारे हो लिए मानों वे अभी-अभी अपनी ही जेब से यकायक धम्म से गिर पड़े हों। बीच सड़क पर चारों खाने चित।''

'ढलान' कहानी बहुत कुछ मनोवैज्ञानिक है। वस्तुतः हम में से हरेक आदमी अपने चेहरे को ढकने के लिए कई चेहरों को पहने हुए मिलता है। और वास्तविक चेहरा खुल न जाए या कह लें कलई खुलने का भय, कहने और न कह पाने की दुविधा हम जैसों को किंकर्तव्यविमूढ बना देती है। समाज भरा पड़ा है ऐसे ही दोगले चरित्राों से जो केवल और केवल परनिंदा में लीन और आत्मरति में तल्लीन हैं। वे सबसे अवसर के अनुसार संबंध रखते हैं यह वस्तुतः चरित्रा के साथ-साथ मानवीय सोच विचार का भी ढलान है जो समूचे वातावरण को भी तनावपूर्ण बना देता है।
'मैं द्रौपदी नहीं हूँ' कहानी में दो संदेश छुपे हुए हैं। एक तो आत्मसम्मान से बढ़कर कुछ भी नहीं। क्योंकि जहाँ इसे ठेस लगी तो धन का लोभ, पौरुष का द्घमंड और कुतर्क की क्षमता जैसे सब के सब चकनाचूर होकर मुँह छिपाने का ठौर खोजने लगते हैं। दूसरा संदेश इस कहानी का प्राण तत्व है। एक महिला का प्रतिकार सांकेतिक भी है और नई सदी का शुभारंभ भी। जीवन भर सब कुछ सह चुकने के बाद भी उस महिला का स्वाभिमान आत्मसम्मान ही उसका आखिरी सहारा है, जो उसे बल दे रहा था। लगातार चुप रहकर दो पुरुषों को झौंझियाते झपटते झगड़ते देखकर भी अंत में झन्नाटेदार थप्पड़ के साथ दोनों के अहम को और उस परिवेश में पसरी अशांति को शर्मिंदगी तक पहुँचा देती है।

आखिरी किंतु बेजोड़ 'कोई है?' कहानी निम्न मध्यम वर्ग के लगातार टूटते जाने, किसी साजिश के शिकार होने, बेइज्जत हो जाने 'कमजोर को हरदम बस खुद ही मरना है' समझौतापरस्त हो जाने की मर्मांत गाथा है। गरीब के पास गुस्सा है पर भोंथरा। जुबान है पर हकलाहट से भरी। आँखें और गर्दन झुकी हुई। बदहवासी और बदनीयती यही दो असलियत उसके हिस्से आई हैं क्योंकि 'पद्म' जैसे लोगों को न मुआवजा मिलता है, न पफैसला, न ८िांदगी मिलती है न किसी प्रार्थना का उनकी बदकिस्मती पर असर पड़ता है।

 

बी-३, स्टॉपफ क्वार्टर्स, जानकी देवी मेमोरियल कॉलेज, सर गंगा राम अस्पताल मार्ग, नई दिल्ली-११००६०
मो. ९९७१८१६५०६

 
 
 
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