नवंबर २००९
 
 
 
   
 
 
 
•अमरकांत को इलाहाबाद में ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित• जितेन्द्र श्रीवास्तव को देवीशंकर अवस्थी सम्मान•दिल्ली में विश्व (पुस्तक मेला ;राजकमल प्रकाशन के स्थापना दिवस पर तीन लखटिया पुरस्कारों की द्घोषणामहुआ माजी के उपन्यास 'मरंग गोड़ नीलकंठ हुआ' को तीसरा राजकमल कृति सम्मानविश्वनाथ त्रिापाठी की पुस्तक 'व्योमकेश दरवेश' को पहला सृजनात्मक गद्य सम्मान अमरेन्दु किशोर की कृति 'बादलों के रंग हवाओं के संग' को चौथा कृति सम्मानस्तंभ लेखक भारत भारद्वाज के खिलापफ वारंटद्ध)
 
 
 
कविताएं
राग तेलंग
सुंदरता

यह बेहद दुःखद है कि
अधिकतर लड़कियाँ ऐश्वर्या होना चाहती हैं
जबकि बची हुई बाकी लड़कियाँ
बिपाशा के होने को गर्व की बात मानती हैं

यह बेहद अपफसोसनाक है कि
साँवली-सलोनियों के अंदर ही अंदर
हर वक़्त हर तरीके से
कुंठा का भाव जागृत किया जा रहा है
क्योंकि उनका चेहरा उजला नहीं है
ऐसे में खुलने ही थे
कृत्रिाम सौंदर्य प्रसाधनों के अड्डे
गली-गली और नुक्कड़ों पर

आप सोच भी नहीं सकते
सुंदर बने रहने की आपकी यह कोशिश
आपको भले ही नैसर्गिक लगती हो
मगर यह वाकई एक पफतवे का आँख मूंदकर पालन करना है
आपके लिए एक धर्म के तहत

आप उनकी
लगातार जारी पुकार को अनसुना नहीं कर पाएँगे
न ही आपको
कभी पता पड़ सकेगा कि
सुंदर होने के भ्रम में
आपने अपने
कितने कीमती लम्हों को बर्बाद कर दिया

दरअसल सुंदरता
पुरुषों और उनकी बनाई व्यवस्था का
सोच-समझकर बनाया
एक यौनिक कुत्सित मूल्य है
जो हमेशा क्रमशः बना रहता है
उनके राज और भोग-विलास के बने रहने के लिए

सतत्‌ सुंदर बने रहने की कवायद और
आत्ममुग्धता के दौर में
आपको इस बात का ८ारा भी इल्म नहीं होता कि
पहले सबसे ८ारूरी है
खुद को अंदर से मांजना और चमकाकर पफैलाई जाए
अपनी हस्ती की रोशनी औरों के लिए

यकीन जानिए जिनके बनाए शीशों में आप
अपना चेहरा देख रहे हैं
उनमें कभी न८ार नहीं आएगी
आपकी असली शक्ल

इस बात को समझिए
कोई नहीं बताएगा आपको
अच्छे लगने-होने और सुंदर होने के बीच के
बारीक पफर्क को

ध्यान रहे
एक दिन जब आपका भी रूप ढल जाएगा
और तब उनके निशाने पर
आपकी अगली पीढ़ी होगी
चाहकर भी तब आप
किसी को समझा नहीं पाएँगे
सुंदरता के अदृश्य और
बेहद महीन और सख्त जाल के बारे में

जब तक यह
जिसको भी समझ आता है
बहुत देर हो चुकी होती है
समय के हिसाब से और
उस एक दिन
आपको महसूस होता है
आप पूरी तरह चुक चुके हैं

तब आपको याद आएगा
आप भी देखा करते थे सपने
ऐश्वर्या और बिपाशा के
अपने दौर में
शामिल थे आप भी उस अंधी दौड़ में
बरबस उस वक़्त आपके मुँह से निकल पड़ेगा
यह बहुत दुःखद बात है!

 
झुकी हुई पीठ
 

उनकी पीठ हमेशा झुकी हुई दिखेगी
जैसे उनकी पीठ ही उनका चेहरा है
इस चेहरे पर चस्पां है एक बोरी
जिसमें हिन्दुस्तान के चिंदी-चिंदी हुए सपने सहेजकर रखे जा रहे हैं

उनकी आँखें गड़ी रहती हैं कचरे के ढेर पर
जहाँ एक भी ची८ा काम की नहीं मानकर पफेंकी गई है
वहाँ पिफर भी कैसे उम्मीद का अंकुर पनपता है
देखकर हैरत होती है

कचरे के ढरे में इन्हें
कभी कुछ मिलता है कभी कुछ नहीं मिलता
कुछ मिलने पर
उसके भीतर की आत्मा को
तलाशने का सामूहिक उपक्रम शुरू होता है
पिफर दिखाई देती है सबकी पीठ ही एक झुंड में

अचानक
आवारा कुत्तों के भौंकने की आवा८ा
बुलाती है इन्हें
पिफर सब पीठ तितर-बितर हो जाती हैं
ये दौड़ पड़ते हैं नए कचरे के उस ढेर की तरपफ
जहाँ अभी-अभी
इस्तेमालशुदा पुरानी सड़ी-गली दुनिया को
धकियाया गया है हिकारत से
पिछले दरवा८ो के रास्ते

जहाँ कतार में खड़े हैं वे बच्चे
जिनके पास चेहरा नहीं पीठ है
जिन्हें न्यौता जाता है
बदबूदार समाज को बीनने-छानने के लिए
रो८ा ब रो८ा अलस्सुबह।

पोस्टमार्टम के वक़्त
मल्टीनेशनल कंपनी का यह विज्ञापन
दरअसल सांस्कृतिक आक्रमण के तहत एक बार है हम पर

इसी तरह इसे प्रतिक्रियाहीन होकर देखना या
इसके आद्घात को समझते हुए भी चुपचाप झेल जाना
एक मौन सहमति है
अपने देश की
विरासत, परंपरा और कला की हत्या में साझीदार होने की

भविष्य में पोस्टमार्टम के वक़्त
जब देखा जाएगा किस-किसके कितने गुनाह दर्ज हैं
इस देश के
रंग-बिरंगे परिधानों पर कालिख पोतने में
तब यह भी ध्यान रखा जाएगा
किस-किसने तटस्थ होकर देखा था
जगमगाता मदमस्त कर देने वाला यह विज्ञापन।

 
 
 
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