| रत्नदीप खरे |
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''मन पराजित....''
डाकिया आये हुए
अरसा हुआ है।
आँच रिश्तों की
हुई ठंडी बरपफ सी,
खत पुरानों के
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किसी धुँधले हरपफ सी,
द्वार दस्तक के लिए
तरसा हुआ है।
खुद सवालों सी
खड़ी दहली८ा जैसे,
मन पराजित क्या
मनाए तीज, कैसे,
कीमतों का मुँह खुला
सुरसा हुआ है।
पफासले कुछ, मील
के पत्थर नये से,
भटकनों को है लगे
कुछ 'पर' नये से,
आजकल वनवास ही
द्घर सा हुआ है। |
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| नदी |
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सह रही धूप बरसात जाड़े नदी।
कुछ न ओढ़े, पड़ी तन उद्घाड़े नदी।
सिपर्फ कर्कट ही आकर मिला हर जगह,
त्राासदी के रही पढ़ पहाड़े नदी।
लग रही है कहीं पर ये गजगामिनी
धावकों को कहीं है पछाड़े नदी।
ये समर्पण, समन्वय का पर्याय है,
ये बनाती नहीं है अखाड़े नदी।
मौन योगी सी निःशब्द है ये कहीं,
है कहीं पर बजाती नगाड़े नदी।
है दुलारे ये 'माँ' की तरह, पर कभी,
है 'पिता' की तरह से लताड़े नदी।
जब भी हमला किया दुश्मनों ने कभी,
राह में आ गई तब ही आड़े नदी।
हर द्घड़ी स्वागतातुर मिली है खड़ी,
बंद करती नहीं है किवाड़े नदी। |
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