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पीढ़ियाँ आमने-सामने'' को एक नहीं कई बार पढ़ा तो पाया कि यहाँ भी कहीं ठेकेदारी का भाव निहित है विद्वजनों में। नामवर सिंह जी कहते हैं-''पहले तो इन विषयों पर लिखा जाता था अब तो दलित विमर्श आ गया है। एक दर्जन से अधिक दलित लेखक आ गये हैं।'' तो उन्हें पीड़ा क्यों हो रही है? वक्त के साथ परिस्थितियाँ बदल जाती हैं और पिफर समाज का दर्पण कहलाने वाला साहित्य युगानुरूप चीजों को ही दर्शाता है। अगर दुखित पीड़ित व्यक्ति की आवा८ा निकलने लगी है तो इन्हें यह भी बर्दाश्त नहीं है। क्या साहित्य किसी की बपौती है? यदि उसमें रचनात्मकता नहीं है तो आप उन्हें साहित्य ही क्यों कहते हैं और वो भी ''दलित साहित्य''। पिफर तो शशिकला रॉय के अनुसार-''कल तो चमार साहित्य, धोबी और ब्राह्मण साहित्य अलग-अलग होना चाहिए।''
क्या अपने आप को साहित्य का विद्वान कहने और समझने वाले यह भूल गये हैं कि साहित्य वही है जो देश, काल और निज की सीमाओं से भी परे होता है और तभी वो अमर होता है। अगर राजेन्द्र यादव दलित साहित्य की मुहिम चलाने की जगह इसे करूण साहित्य कहते तो कैसा रहता? और जैसा कि नामवर सिंह उसे आक्रामक कहते हैं तो उचित यही होगा कि इसे विद्रोही चिंतन या विद्रोही साहित्य कहकर हिन्दी साहित्य में जगह ही नहीं दी जाए क्योंकि कदाचित् यह उनके लिए ही उपयोगी हो सकता है जो इसके भुक्तभोगी हैं और जिन्हें लड़ने की जरूरत है।
क्यों कि भारतीय समाज में तो यह धर्मानुसार ही है कि समाज के इस वर्ग से केवल उसकी आखिरी बूंद तक चूसकर उसकी सेवाएँ ली जाएँ लेकिन उसको बराबरी और सम्मान से जीने के मानवतावादी अधिकार से वंचित रखा जाए। तो पिफर उस वर्ग के इसे पढ़ने या न पढ़ने से क्या पफ़र्क पड़ता है। प्रभाष जोशी भी इस हाँ में हाँ मिलाते हैं। रचनात्मकता के अभाव का तथ्य यदि ठीक भी है तो विचारों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्राता तो सभी को है। आप क्यों परेशान हो रहे हैं? यदि उसमें वजन नहीं तो शोर की बात ही क्यों हो?' अखबारों और पत्रा-पत्रिाकाओं में रोज सैंकड़ों कहानी-कविताएँ और अनेक रचनाएँ छपती रहती हैं, उनकी गिनती और चर्चा किस साहित्य जगत में होती है। बता सकते हैं? नामवर जी कहते हैं दलित विमर्श शुरू करने वाले न तो कहानीकार हैं न कविता लिखते हैं।
क्या वो नहीं जानते कि कितने ही ऐसे बड़े-बड़े आलोचक हुए हैं जो कहानी-कविता या साहित्य की किसी भी विधा में नहीं लिखते। और पिफर वास्तविक आलोचक तो पाठक होता है जो सब नहीं लिखते। प्रेमचंद सचमुच एक महान लेखक थे किंतु वो दलित विमर्श की अवधारणा को लेकर तो कतई नहीं लिख रहे थे। वे तो तात्कालिक समाज का यर्थाथ चित्राण कर रहे थे। चाहे सद्गति, कपफ़न अथवा गोदान हो, उनके पात्रा परिस्थितियों में मरते ही नजर आते हैं, विद्रोह करते दिखाई नहीं देते। यूँ तो पिफर इस तथ्य को प्रेमचंद में खोजने से पूर्व कबीर में देख लेना कहीं अधिक पारदर्शी होगा जहाँ वे कहते हैं ''हमारे कैसे लहू तुम्हारे कैसे दूध।'' ऐसी एक नहीं कई उक्तियाँ आपको मिल जाएगी जहाँ वे समाज के दलित शूद्र कहे जाने वाले लोगों के साथ खड़े विद्रोह करते न८ार आए। लेकिन उन्हें इन सब अवधारणाओं में नहीं द्घसीटना चाहिए क्योंकि उनका उद्देश्य राजेन्द्र यादव की तरह दलितों या स्त्रिायों का मसीहा बनना नहीं था। वो सच्चे इंसान थे और एक महान इंसान की दृष्टि जितनी व्यापक होनी चाहिए वो उनके पास थी चाहे उसकी अभिव्यक्ति का माध्यम जो भी हो साहित्य अथवा वैचारिक लेख।
''कपफ़न'' कहानी में नामवर सिंह विद्रोह दर्शा रहे हैं-''द्घीसू और माधव कपफ़न का पैसा पी गये यह विद्रोह है'' यह विद्रोह तो कहीं से नहीं लगता। जिस परिस्थिति में यह किया जा रहा है उसे तत्कालीन भारतीय समाज में हुए मानवीयता के हृास के रूप में देखना चाहिए कि किस तरह मानव समाज के एक वर्ग को शेष समाज ने मानवीय संवेदनाओं से शून्य करके पाशविक स्थिति में जीने के लिए मजबूर कर दिया है।
इस आयोजन में विद्वत्जन साहित्य क्षेत्रा छोड़कर भटकते हुए नजर आए हैं। और पिफर चन्दन पाण्डेय को द्घेरते हुए न८ार आते हैं। एक साहित्यकार या कलाकार कैसे अपनी कृति को अन्य से श्रेष्ठ या बेहतर कह सकता है? वो कैसे तुलना कर सकता है? कला का मूल तत्व संवेदनाओं की अनुभूति और अभिव्यक्ति है। वो कोई टेक्नीशियन या वैज्ञानिक नहीं है कि दूसरों की भूलों का सुधार करता पिफरे। अगर आपको बहस करवानी थी तो आप सभी आलोचकों के बीच करवाते। निर्मल वर्मा अपनी ''दस प्रतिनिधि कहानियाँ'' की भूमिका में लिखते हैं-''श्रेष्ठता की कसौटी लेखक के मन में एक जैसी नहीं रहती... एक उत्कृष्ट कही जाने वाली रचना समय की धूल में मलिन पड़ जाती है। लेखक अपनी रचनाओं का विश्वसनीय पक्ष नहीं होता। कभी-कभी तो उसे अपनी रचना पर शर्म महसूस होती है और कभी उसे इतना गर्व महसूस होता है कि पाठकों को उसके लिए शर्म महसूस होती है। अतः उसकी परख का काम किसी आलोचक, निर्दयी संपादक या विवेकशील पाठक पर छोड़ देना चाहिए।''
पिफर अकेले चन्दन पाण्डेय कैसे समस्त कहानीकारों की तरपफ से जवाब दे सकते हैं? हर कहानीकार की अपनी शैली अपनी अंतर्दृष्टि, अनुभूति और अभिव्यक्ति की क्षमता भिन्न होती है।
बार-बार चन्दन पाण्डेय से पूछा गया है कि ''आपकी कहानियों में क्या नया कथ्य और शिल्प है?'' कथ्य ही महत्वपूर्ण है शिल्प तो कथ्य के आवेग में स्वयं प्रकट हो जाता है। लौं जाइनस ने भी विचार या भाव के औदात्य पर बल दिया है। टॉलस्टाय ने भी लेखक ने क्या कहा और कितने प्रेम के साथ इसी को महत्वपूर्ण माना है। शिल्प तो स्वतः ही उपस्थित हो जाएगा।
टॉलस्टाय का यह कथन भी पूर्णतः सत्य प्रतीत होता है कि ''अपने समकालीन आलोचकों से एक लेखक कुछ नहीं सीख सकता क्योंकि उनकी रुचि शिल्प में अधिक होती है। हमें आम लोगों के लिए लिखना चाहिए।'' नामवर जी तो पूरी चर्चा के दौरान चन्दन पाण्डेय की क्लास लेते न८ार आए। मानो वे उसे नये सिरे से कहानी लिखना शुरू करवा रहे हैं। पूरी बहस में केवल एक दो बातें विशेष रूप से प्रभावित कर सकीं। एक तो यह कि कहानी पर विचारधाराएँ प्रभावी हो रही हैं। दूसरा, ट्रेंड को देख समझ कर लिखा जा रहा है। यह दोनों ही तथ्य सच्ची कला के लिए द्घातक हैं। सच्ची कला हृदय में उपजती है, दिमागों में नहीं।
१ द १२ अरावली विहार, काला कुंआ अलवर
राजस्थान |