नवंबर २००९
 
 
 
   
 
 
 
• काशीनाथ सिंह का साहित्य अकादमी • अदम गोंडवी और भारत भूषण का निधन • जयपुर में लिटरेचर पफेस्टिवल में सलमान रुशदी •हिन्दी के कवि कुबेर दत्त और नुक्कड़ नाटक के पितामाह गुरुशरण सिंह का निधनर सम्मान।
 
 
 
समय-समाज
राजनीति की कोख में पलती... : पुण्य प्रसून वाजपेयी

शोमा दास की उम्र सिपर्फ २५ साल की है। पत्राकारिता का पहला पाठ ही कुछ ऐसा पढ़ने को मिला कि हत्या करने का आरोप उसके खिलापफ दर्ज हो गया। हत्या करने का आरोप जिस शख्स ने लगाया संयोग से उसी के तेवरों को देखकर और उसी के आंदोलन को कवर करने वाले पत्राकारों को देखकर ही शोमा ने पत्राकारिता में आने की सोची । या यूँ कहें न्यूज चैनल में बतौर रिपोर्टर बनकर कुछ नायाब पत्राकारिता की सोच शोमा ने पाल रखी थी। बंगाल के आंदोलनों को बेहद करीब से देखने-भोगने वाले परिवार की शोमा को जब बंगला न्यूज चैनल में नौकरी मिली तो समूचे द्घर में खुशी थी कि शोमा जो सोचती है वह अब करेगी। बंगला न्यूज चैनल २४ द्घंटा की सबसे जूनियर रिपोर्टर शोमा को नौकरी करते वक्त रिपोर्टिंग का कोई भी मौका मिलता तो वह रात में कहीं कोई सड़क दुर्द्घटना या पिफर किसी आपराधिक खबर को कवर करने भर। जूनियर होने की वजह से रात की ड्यूटी लगती। और रात को खबर कवर करने से ज्यादा खबर के इंतजार में ही वक्त बीतता।

१३ अक्टूबर की रात भी खबर कवर करने के इंतजार में ही शोमा ऑपिफस में बैठी थी। लेकिन अचानक शिफ्रट इंचार्ज ने कहा, ममता बनर्जी को देख आओ। बु(जिीवियों की एक बैठक में ममता पहुँची है। शोमा कैमरा टीम के साथ निकल गयी। कवर करने पहुँची तो उसे गेट पर ही रोक दिया गया। ममता बनर्जी की हर सभा में गीत गाने वाली डोला सेन ने शोमा दास से कहा २४ द्घंटा बु(देव के बाप का चैनल है, इसलिए ममता से वह मिल नहीं सकती। लेकिन शोमा को लगा कोई बाईट मिल जाये तो उसकी पत्राकारिता की भी शुरुआत हो जाए। खासकर बु(जिीवियों की बैठक में अल्ट्रा लेफ्रट विचारधारा के लोगों की मौजूदगी से शोमा का उत्साह और बढ़ा। क्योंकि द्घर में अपनी माँ-पिताजी से अक्सर उसने नक्सलबाड़ी दौर के किस्से सुने थे। उसे ममता में आंदोलन नजर आता। इसलिए शोमा को लगा कि एक बार ममता दीदी सामने आ जाए तो वह इस मुद्दे पर बाईट तो जरूर ले लेगी। लेकिन गेट पर ममता का इंतजार कर रही शोमा दास का खड़ा रहना भी तृणमूल के कार्यकर्ताओं को इतना बुरा लगा कि पहले धकेला पिफर डोला सेन ने ही कहा-'ए तुम्हारा रेप करा देंगे किसी को पता भी नहीं चलेगा।

भागो यहाँ से।' लेकिन शोमा को लगा शायद ममता बनर्जी को यह सब पता नहीं है। इसलिए वह ममता की बाईट के इंतजार में खड़ी रही और ममता जब निकली तो उत्साह में शोमा ने अपनी ऑपिफस की गाड़ी को भी ममता के पीछे चलने को कहा। लेकिन कुछ पफर्लांग बाद ही तृणमूल के कार्यकर्ताओं ने गाड़ी रोकी और शोमा पर ममता की हत्या का आरोप दर्ज कराते हुए पुलिस के हवाले कर दिया। यह सब ममता बनर्जी की जानकारी और केन्द्र में तृणमूल के राज्य मंत्राी मुकुल राय की मौजूदगी में हुआ। शोमा को जब पुलिस ने थाने में बैठा कर पूछताछ में बताया कि ममता बनर्जी का कहना है कि तुम उनकी हत्या करना चाहती थी तो शोमा के पाँव तले जमीन खिसक गयी।
उसने तत्काल अपने ऑपिफस को इसकी जानकारी ही। लेकिन ममता बनर्जी ऐसा कैसे सोच भी सकती है यह उसे अभी भी समझ नहीं आ रहा है। इसका दूसरा अध्याय १४ अक्टूबर को तृणमूल भवन में हुआ। जहाँ आकाश चैनल की कोमलिका ममता बनर्जी की प्रेस कान्ेंस कवर करने पहुँची। कोमलिका मान्यता प्राप्त पत्राकार हैं लेकिन इस सभा में तृणमूल के निशाने पर वह आ गयीं। कोमलिका को तृणमूल भवन के बाहरी बरामदे में ही रोक दिया गया। कहा गया आकाश न्यूज चैनल सीपीएम से जुड़ा है।

इसलिए प्रेस कान्ेंस कवर करने की इजाजत नहीं है। कोमलिका को भी झटका लगा क्योंकि कोमलिका वही पत्राकार हैं, जिसने नंदीग्राम के दौर में समय न्यूज चैनल में रहते हुए हर उस खबर से दुनिया को वाकिपफ कराया था, जिसमें सीपीएम का कैडर नंदीग्राम में नंगा नाच कर रहा था। जब सीपीएम के कैडर ने नंदीग्राम को चारों तरपफ से बंद कर दिया था, ताकि कोई पत्राकार अंदर न द्घुस सके। तब भी कोमलिका और उसकी उस दौर की वरिष्ठ सहयोगी सादिया ने नंदीग्राम में द्घुस कर बलात्कार पीड़ितों से लेकर हर उस परिवार की कहानी को कैमरे में कैद किया जिसके सामने आने के बाद बंगाल के राज्यपाल ने सीपीएम को कटद्घरे में खड़ा कर दिया था। उस दौर में ममता बनर्जी किसी नायक की भूमिका में थी। और कोमलिका-सादिया की रिपोर्टिंग का ही असर था कि सार्वजनिक मंचों से एक तरपफ सीपीएम कहने लगी कि समय न्यूज चैनल जानबूझ कर सीपीएम के खिलापफ काम कर रहा है, तो दूसरी तरपफ ममता दिल्ली आयी तो इंटरव्यू के लिए वक्त मांगने पर बिना हिचक आधे द्घंटे तक लाइव शो में ममता मेरे ही साथ यह कह कर बैठी की आपकी रिपोर्टर बंगाल में अच्छा काम कर रही है। कोमलिका को लेकर ममता बनर्जी की ममता इतनी ज्यादा थी कि उन्होंने कोमलिका को सलवार कमीज तक भेंट की। और साल भर पहले जब कोमलिका ने शादी की तो ममता इस बात पर उनसे रुठीं कि उसने शादी में उसे क्यों नहीं आमंत्रिात किया। लेकिन १४ अक्टूबर को इसी कोमलिका को समझ नहीं आया कि वह पत्राकार है और अपना काम करने के लिए प्रेस कान्ेंस कवर करने पहुँची है तो उसे कोई यह कह कर कैसे रोक सकता है कि वह जिस चैनल में काम करती है वह सीपीएम से प्रभावित है। कोमलिका के पिता आँत्विक द्घटक के साथ पिफल्म बनाने का काम कर चुके हैं और नक्सबाड़ी के उस दौर को ना सिपर्फ बारीकी से महसूस किया है बल्कि झेला भी।

जिसके बाद कांग्रेस का पतन बंगाल में हुआ और सीपीएम सत्ता पर काबिज हुई। नंदीग्राम से लालगढ़ तक के दौरान सीपीएम की कार्यशैली को लेकर शोमा दास और कोमलिका के माता-पिता की पीढ़ी में यह बहस गरमाई कि क्या वाकई ममता सीपीएम का विकल्प बनेगी और अक्सर कोमलिका ने कहा, लोगों को सीपीएम से गुस्सा है। इसका लाभ ममता को मिल रहा है। लेकिन नया सवाल है कि अब ममता से भी गुस्सा है, तो किस तानाशाही को शोमा या कोमलिका पसंद करें। यह संकट बंगाल के सामने भी है और पत्राकारों के सामने भी। क्योंकि अगर दोनों नापंसद है तो वैकल्पिक धारा की लीक तलवार की नोक पर चलने समान है। क्योंकि विकल्प किसी भी तरह का हो सत्ता उसे गैर कानूनी करार देने में देर नहीं लगाती। कहीं कोई माओवादी विचारधारा से प्रभावित माना जा सकता है तो कहीं आतंकवाद निरोधक कानून के दायरे में आ सकता है। सारे रास्ते उसी संसदीय राजनीति की सत्ता की तरपफ जाते हैं जहाँ से गड़बड़ी पैदा हो रही है। इसका असर मीडिया हाउसों या संस्थान मालिकों के मत्थे मढ़कर पत्राकार बचेंगे, यह सोचना भूल होगी। क्योंकि राजनीति अगर आमजन से कटी है तो पत्राकारिता भी कमरे में सिमटी है। और वाकई हर रास्ता राजनीति के मुहाने पर जा कर खत्म हो रहा है, जहाँ से राजनीति उसे अपनी गोद में लेती है। दूसरा पक्ष यह भी है कि राजनीति ने अब पत्राकारिता को अपने कोख में ही बड़ा करना शुरू कर दिया है।

कोख की बात बाद में पहले गोद की बात। राजनीति की गोद का मतलब संपादक के साथ-साथ मालिक बनने की दिशा में कारपोरेट स्टाइल में कदम बढ़ाना है। यानी उस बाजार की मुश्किलात से संपादक को रू-ब-रू होना है जो राजनीतिक सत्ता के इशारे पर चलती है। यानी मीडिया हाउसों का मुनापफा परोक्ष तौर पर उसी राजनीति से जुड़ता है जिस राजनीतिक सत्ता पर मीडिया को बतौर चौथे खम्भे नजर रखनी है। कोई संपादक कितना क्रियेटिव है उससे ज्यादा उस संपादक का महत्व है जो अधिक से अधिक मुनापफा बाजार से बटोर सकता है।

मुनापफा बटोरने में राजनीतिक सत्ता की कितनी चलती है या सत्ता जिसके करीब होती है उसके अनुरूप मुनापफा कैसे हो जाता है यह किसी भी राज्य या केन्द्र में सरकारों के आने-जाने से ठीक पहले बाजार के रुख से समझा जा सकता है। बाजार कितना भी खुला हो और अंबानी से लेकर टाटा-बिरला तक आर्थिक सुधार के बाद जितनी भी खुली अर्थव्यवस्था में व्यवसाय अनुकूल व्यवस्था की बात कहें। लेकिन बड़ा सच अभी भी यही है कि जिसके साथ सत्ता खड़ी है वह सबसे ज्यादा मुनापफा बना सकता है और अपने पैर पफैला सकता है। कमोवेश यही हालत मीडिया की भी की गयी है। लेकिन मीडिया की लकीर दूसरे धंधों से कुछ अलग है। यहाँ प्रोडक्ट उसी आमजन को तय करना होता है जो राजनीतिक सत्ता के उलट-पफेर का माद्दा भी रखता है। इसलिए राजनीतिक सत्ता ने मीडिया हाउसों को अगर मुनापफे से लुभाया है तो संपादकों को पत्राकारिता से आगे राजनीति का पाठ बताने में भी गुरेज नहीं की और उस सच को भी सामने रखा कि मीडिया हाउसों से झटके में बड़ा होने का एकमात्रा मंत्रा यही है कि राजनीति से दोस्ती करते हुए सत्ताधारियों की पफेहरिस्त में शामिल हो जाइए। यह बेहद छोटी परिस्थिति है कि समाचार पत्रा से लेकर न्यूज चैनल तक राजनेताओं के साथ चुनाव में पैकेज डील कर के खबरों को छापते-दिखाते हैं। उससे आगे की पफेहरिस्त में संपादक किसी राजनीतिक दल से चुनाव लड़ने के लिए टिकट अपने या अपनों के लिए मांगता है और बात आगे बढ़ती हो तो राज्यसभा में जाने के लिए पत्राकारिता को सौदेबाजी की भेंट चढ़ा देता है।

असल में सत्ता के पास संपादक को कटद्घरे में खड़ा करने के इतने औजार होते हैं कि संपादक तभी संपादक रह सकता है जब पत्राकारिता को सत्ता से बड़ी सत्ता बना लें। लेकिन न्यूज चैनलों के मद्देनजर गोद से ज्यादा बड़ा सवाल कोख का हो गया है। क्योंकि यहाँ यह सवाल छोटा हो गया है कि ममता बनर्जी को सीपीएम प्रभावित न्यूज चैनल बर्दाश्त नहीं है और सीपीएम का मानना है कि न्यूज चैनलों ने नंदीग्राम से लेकर लालगढ़ तक को जिस तरह उठाया वह उनकी पार्टी के खिलापफ इसलिए गया क्योंकि दिल्ली में कांग्रेस की सत्ता है और राष्ट्रीय न्यूज चैनल कांग्रेस से प्रभावित होते हैं। बड़ा सवाल सरकार ही खड़ा कर रही है। मनमोहन सरकार अब यह कहने से नहीं चूकती कि न्यूज चैनल अब कोई ऐरा-गैरा नत्थू खैरा नहीं निकाल पाएँगे। लाइसेंस बांटने पर नकेल कसी जाएगी। यानी न्यूज चैनलों में राजनीति की दखल का यह एहसास पहली बार कुछ इस तरह सामने आ रहा है। मसलन, पत्राकारों के होने या ना होने का कोई मतलब नहीं है। और राजनीति की सुविधा-असुविधा से लेकर सही पत्राकारिता का समूचा ज्ञान भी राजनीति को ही है। और राजनीतिक सत्ता के आगे पत्राकार या पत्राकारिता पासंग भर भी नहीं है। असल में इससे इन्कार नहीं किया जा सकता कि तकनीकी विस्तार ने मीडिया को जो विस्तार दिया है, उतना विस्तार पत्राकारों का नहीं हुआ है। मीडिया का यही तकनीकी विस्तार ही असल में पत्राकारिता भी है और राजनीति को प्रभावित करने वाला चौथा खम्भा भी कह सकते हैं।

किसी भी राष्ट्रीय न्यूज चैनल को शुरू करने के लिए चालीस से पचास करोड़ से ज्यादा नहीं चाहिए। और पफैलते बाजारवाद में विज्ञापन से कोई भी न्यूज चैनल साल में २०-२५ करोड़ आसानी से कमा सकता है। जाहिर है न्यूज चैनल चलाने के लिए कागज पर हर न्यूज चैनल वाले के लिए न्यूज चैनल का धंधा मुनापफे वाला है। क्योंकि एक साथ छह करोड़ द्घरों में कोई अखबार पहुँच नहीं सकता। किसी राजनेता की सार्वजनिक सभा में लोग जुट नहीं सकते लेकिन कोई बड़ी खबर अगर ब्रेक हो तो इतनी बड़ी तादाद में एक साथ लोग खबरों को देख-सुन सकते हैं। जाहिर है बीते एक दशक के दौर में न्यूज चैनलों ने जो उड़ान भरी उसने उस राजनीतिक सत्ता की जड़ें भी हिलायीं जो बिना सरोकार देश को चलाने में गर्व महसूस करते। लेकिन राजनीतिक सत्ता के सामने न्यूज चैनलों की क्या औकात।

इसलिए न्यूज चैनलों को कोख में ही राजनीति ने बांधने का पफार्मूला अपनाया। चैनलों को दिखाने के लिए केबल नेटवर्क है उस पर राजनीति ने खुद को काबिज कर एक नया पिंजडा बनाया। जिसमें न्यूज चैनलों को कैद कर दिया। किसी भी राष्ट्रीय न्यूज चैनल को केबल से देश भर में जोड़ने के लिए सालाना ३५ से ४० करोड़ रुपये लुटाने की ताकत चैनल के पास होनी चाहिए तभी कोई नया चैनल आ सकता है, क्योंकि हर राज्य में केबल नेटवर्क से तभी कोई चैनल जुड़ सकता है जब वह पफीस चुकता कर दे। सबसे ज्यादा पफीस महाराष्ट्र में ८ करोड़ की है, पिफर गुजरात के लिए ५ करोड़ तक देने ही होंगे। बिहार-उत्तर प्रदेश-झारखंड-उत्तराखण्ड में मिलाकर ३ से ४ करोड़ में सालाना केबल नेटवर्क दिखाता है। मजेदार तथ्य यह है कि केबल नेटवर्क को ही चैनलों की टीआरपी से जोड़ा जाता है और टीआरपी के आधार पर ही चैनलों को विज्ञापन मिलता है। यहीं से ब्रांड और धंधे का खेल शुरू होता है। टीआरपी और विज्ञापन को इस तरह जोड़ा गया है कि जो केबल नेटवर्क में करोड़ों लुटा सकता है वह विज्ञापन के जरिए करोड़ों कमा सकता है।

करोड़ों के वारे न्यारे का यह खेल ही उपभोक्ताओं के लिए एक ऐसा बाजार बनाता है जिसमें किसी भी प्रोडक्ट की कोई भी कीमत देने के लिए एक तबका एक क्लास के तौर पर खड़ा हो जाता है। आप कह सकते हैं कि इस क्लास में राजनेता और सत्ता से सटे संपादकों की भागेदारी बराबर की होती है क्योंकि यह गठजोड़ संसदीय राजनीति तले लोकतंत्रा का गीत गाता भी है और लोकतंत्रा को बाजार के आइने में देखने-दिखाने को मजबूर भी करता है। लेकिन पत्राकारिता को कोख में रखने की राजनीति भी यहीं से शुरू होती है। कोई पत्राकार न्यूज चैनल ला तो सकता है लेकिन उसे केबल नेटवर्क के जरिए दिखाने के लिए पिफर उसी राजनीति के सामने नतमस्तक होना पड़ता है जिस पर नजर रखने के खयाल से न्यूज चैनल का जन्म होता है। कमोवेश हर राज्य में सत्ताधारी राजनीतिक दल के बड़े नेताओं ने ही केबल पर कब्जा कर लिया है। यानी जो राजनीति पहले न्यूज चैनलों के मालिक या संपादकों से गुहार लगाती थी कि उनके खिलापफ की खबरों को ना दिखाया जाए। अब वही राजनीति सीधे कहने से नहीं चूकती आपको जो खबरें दिखानी हो दिखाइएगा लेकिन वह हमारे राज्य में नहीं दिखेगी क्योंकि केबल पर आपका चैनल हम आने ही नहीं देंगे।

यानी केबल नेटवर्क पर सत्ता का कब्जा राजनीति का नया मंत्रा है। इसका शुरुआती प्रयोग अगर छत्तीसगढ़ में अजित जोगी ने किया तो ताजा प्रयोग वाई एस आर रेड्डी के बेटे जगन ने मुख्यमंत्राी की कुर्सी पाने के लिए किया। आंध्र में केबल नेटवर्क पर जगन का ही कब्जा है। छत्तीसगढ़ में अब रमन सिंह का कब्जा है। पंजाब में बादल परिवार का कब्जा है। महाराष्ट्र में एनसीपी-कांग्रेस और शिवसेना के केबल नेटवर्क यु( में राज ठाकरे सेंध लगाना शुरू कर चुका है। तमिलनाडु में करुणानिधि परिवार की ही न्यूज चैनलों को दिखाने ना दिखवाने की तूती बोलती है। गुजरात में मोदी की हरी झंडी के बगैर मुश्िकल है कि कोई चैनल स्मूथली दिखायी दें। बंगाल में वामपंथियों को अभी तक अपने कैडर पर भरोसा था।

लेकिन ममता के तेवरों ने सीपीएम को जिस तरह चुनौती दी है, उसमें केबल पर कब्जे की जगह केबल अब ममता और सीपीएम को लेकर कैडर की तर्ज पर बंट जरूर गया है। और इस दौड़ में डीटीएच कोई मायने नहीं रखता। क्योंकि डीटीएच से न्यूज चैनल द्घरों में दिखायी जरूर देता है मगर विज्ञापन की वह पूंजी नहीं जुगाड़ी जा सकती जो केबल के जरिए टीआरपी से होती हुई न्यूज चैनलों तक पहुँचती है। किसी भी नये चैनल की मुश्किल यही होती है कि वह खुद को केबल और टीआरपी के बीच पिफट कैसे करें। किस राज्य की किस सत्ता और किस राजनेता के जरिए न्यूज चैनल के मुनापफे की अर्थव्यवस्था में हिस्सेदारी करे । जबकि पुराने चैनलों की केबल कनेक्टीविटी और टीआरपी में कभी बड़ा उलटपफेर या परिवर्तन चार हफ्रतों तक भी नहीं टिकता है चाहे कोई न्यूज चैनल कुछ भी दिखाए।

यह यथावत स्थिति हर किसी को बाजारवाद में बंदरबांट के लिए कथित स्पर्धा से जोड़े रखते हुए सभी की महत्ता बरकरार रखती है। लेकिन मुनापफे के धंधे को बरकरार रखने के बाजारवाद में पत्राकार किस खूंटे से बांधा जाए यह सवाल सबसे बड़ा हो गया है। पत्राकार न्यूज चैनल के लिए मुनापफा जुगाड़ने से सीधे जुड़ जाए। पत्राकार राजनीतिक सत्ता के इशारे पर काम करने लगे। पत्राकार लोकसभा के टिकट लेने-दिलवाने से लेकर राज्यसभा तक पहुँचने के जुगाड़ को पत्राकारिता का आखिरी मिशन मान लें या पिफर पत्राकार सत्ता की उस व्यवस्था के आगे द्घुटने टेक दें, जहाँ सत्ता परिवर्तन भी एक तानाशाह से दूसरे तानाशाह की ओर जाते दिखे और पत्राकारिता का मतलब इस सत्ता-परिवर्तन में ही क्रांति की लहर दिखला दे जैसे, ममता की हवा में सीपीएम उड़ने लगी है और बंगाल के पत्राकार सीपीएम छोड़ ममता को बर्दाश्त करना सीख रहे हैं। लेकिन यह सवाल अबूझ है कि पत्राकारिता की कैसे जाए।

;लेखक सामाजिक सरोकारों से जुड़े वरिष्ठ पत्राकार हैं। वर्तमान में 'जी न्यूज' चैनल के राजनीतिक संपादक।द्ध
२०३, पत्राकार परिसर, सेक्टर-५, वसुंधरा, गाजियाबाद, उ.प्र.

 
 
 
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