नवंबर २००९
 
 
 
   
 
 
 
• काशीनाथ सिंह का साहित्य अकादमी • अदम गोंडवी और भारत भूषण का निधन • जयपुर में लिटरेचर पफेस्टिवल में सलमान रुशदी •हिन्दी के कवि कुबेर दत्त और नुक्कड़ नाटक के पितामाह गुरुशरण सिंह का निधनर सम्मान।
 
 
 
संपादकीय
...तो दूजी शक्ति कौन

दि किंगडम ऑपफ हेवेन इज पफॉर दि पूअर' ;स्वर्ग का साम्राज्य गरीबों के लिए हैद्ध। जवाहर लाल नेहरू को यह वाक्य बहुत प्रिय था और वह इसका उपयोग पराधीन राष्ट्र की शोषित जनता को सुना उनमें स्वाधीनता के प्रति एक अजब ही किस्म का जोश और सम्मोहन पैदा करने के लिए करते थे। नेहरू समाजवादी विचारों से प्रभावित रहे। वे बेहद संवेदनशील भी थे। शुरूआती दौर में राम मनोहर लोहिया जवाहर लाल की संवेदनशीलता और समाजवादी सोच के बड़े कायल थे। स्वयं लोहिया विश्व-बंधुत्व का सपना पालने वालों की कतार में सबसे आगे खड़े रहे। लोहिया को लगता था कि स्वतंत्राता के साथ-साथ समाजवाद सहित पश्चिमी विज्ञान की तर्कशक्ति महात्मा गाँधी की संकल्प शक्ति से मिलकर एक ऐसी नई व्यवस्था को जन्म देगी जो पूरे विश्व को बदलने और स्वर्ग पर गरीबों का साम्राज्य स्थापित कराने में सहायक सि( होगी। हालांकि नेहरू के विचारों और उनकी सोच को असंवेदनशील मानने वालों, नेहरू को ही खारिज करने वालों की एक बड़ी पफौज मौजूद है जो लंबे अर्से से गाँधी-नेहरू की सोच और समझ पर प्रश्नचिन्ह लगाने का काम करती आई है।

ना-ना प्रकार के पूर्वाग्रहों से ग्रसित और वैचारिक दुराग्रहों के भार से दबे हुओं की ऐसी सोच से परे भी यदि लोहिया की जन्मशती के वर्ष में थोड़ा मुड़कर देखने का प्रयास किया जाए तो ठगे जाने का एहसास कहीं भीतर से उठता है जो अपने साथ आक्रोश की इतनी ज्वाला लिए होता है कि अहिंसा का बड़े से बड़ा पैरोकार भी उसके आगे टिक नहीं पाता। कुछ ऐसे ही आक्रोशित एहसास के क्षणों में जयप्रकाश नारायण को कहना पड़ा था कि 'अगर कानून लोगों को सामाजिक और आर्थिक न्याय नहीं दिला सकता है, अगर जो बातें कागज पर आ चुकी हैं उन्हें भी लागू नहीं कराया जा सकता तो आपको नहीं लगता कि सभी जगह से हिंसा पफूटने के अलावा और कुछ नहीं हो सकता .....?' जे.पी. ने आगे कहा 'क्या ऐसी स्थिति में सिपर्फ शांति-शांति का मंत्रा पढ़ने से वे राजनीतिक पार्टियाँ ऐसे ही बची रहेंगी जिन्होंने यह कानून बनवाए हैं?'

नेहरू, लोहिया और जयप्रकाश नारायण का जिक्र इसलिए क्योंकि जब देश का प्रधानमंत्राी, गृहमंत्राी और बु(जिीवी एक सी जुबान बोलने लगता है तो इतिहास के पन्नों में दर्ज अतीत को सामने ला यथार्थ से मुकाबिल करने के सिवा कोई रास्ता नहीं रह जाता। प्रधानमंत्राी और गृहमंत्राी पिछले कुछ अर्से से नक्सलवाद के खिलापफ आर या पार की मुद्रा में खड़े नजर आ रहे हैं। हालांकि दोनों ने ही नक्सली हिंसा के खिलापफ सैन्य कार्रवाई की सीधे-सीधे हिमायत नहीं की है लेकिन उनके तेवर ऐसा ही कुछ कहते दिखते हैं। और जो कुछ वह कह नहीं पा रहे हैं उसे हमारा मीडिया कहे दे रहा है।

वरिष्ठ पत्राकार और संपादक आलोक मेहता नक्सलियों को सीधे तौर पर आतंकवादी तो द्घोषित कर देते हैं लेकिन नक्सली बनने की प्रक्रिया से वह कन्नी काट निकलने का प्रयास करते हैं। 'नई दुनिया' के संपादकीय विचार में वह नक्सली आतंक पर सैन्य कार्रवाई की बात करते हैं। वह कहते हैं कि 'धार्मिक कट्टरपंथी तालिबानी हिंसा को भारत का कोई प्रगतिशील उचित नहीं कहता। पिफर 'गलाकाटू' नक्सली हिंसा को क्यों जायज मानता है। किसानों की जमीन हड़पना, लोगों का अपहरण, द्घिनौने न्याय के नाम पर दस अपराधियों की अदालत बना निहत्थे लोगों के नाक-कान, हाथपैर, गला काटने या सामूहिक नरसंहार करने वालों से क्या आतंकवादियों की तरह नहीं निपटना चाहिए?'

आलोक मेहता के इस कथन से असहमति जताना खासा कठिन है। यह सच है कि हमारे देश में प्रगतिशील कहलाए जाने वाले तथाकथित बु(जिीवियों का एक बड़ा वर्ग लोकतांत्रिाक तरीकों से चुनी गई सरकारों के हर कदम की मुखालपफत करना अपना पफर्ज समझता है। यह भी सही है कि रक्षा सेनाओं की कुर्बानी, पुलिस कर्मियों की मौत पर यह वर्ग आँसू बहाना उचित नहीं समझताऋ लेकिन हर पुलिस मुठभेड़ की विश्वसनीयता पर शक करना इसकी पहली प्राथमिकता है। लेकिन जब आलोक मेहता यह दलील देते हैं कि नक्सलियों के डर के चलते सरकार पिछड़े-दुर्गम इलाकों को विकसित नहीं कर पा रही है अथवा वहाँ डॉक्टर, नर्स, इंजीनियर, पटवारी की व्यवस्था नहीं हो पा रही है। तो डर लगता है, शक भी होता है कि लोकतंत्रा के आधार स्तंभ ही यदि यूं सच्चाई से मुँह मोड़ लेंगे और आपसी सहमति भी बना लेंगे तो क्या होगा 'लोक' का और कब तक जिंदा रह पाएगा ऐसा तंत्रा। यही डर अतीत में झांकने को मजबूर भी करता है कि शायद वहीं से कुछ मार्ग तलाशने में मदद मिले।

यह सही है कि नक्सलवाद के पनपने और अपनी जड़ें मजबूत करने के पीछे सबसे बड़ा कारण विकास की कमी होना रहा। लेकिन यह कहना कि नक्सलियों ने विकास को अवरू( किया या पिफर नक्सलियों के चलते विकास की गति बाधित हुई है बिलकुल गलत एवं भ्रामक है। नक्सलवाद की शुरूआत और उसका विस्तार आजाद भारत के भाग्य विधाताओं की गलत नीतियों के चलते हुआ। मानव विकास को बहुत सुनियोजित तरीके से हाशिए पर डाल दिया गया और भौतिक विकास की अवधारणा को पूरे वेग से आगे बढ़ाया गया। प्रगति का मापदण्ड सकल द्घरेलू उत्पाद से जोड़ विकास का ऐसा मॉडल तैयार किया गया जिसने मात्रा ६२ साल की यात्राा के दौरान 'दि किंगडम आपफ हेवन इज पफार दि पूअर' के जवाहरी सपने को ध्वस्त करने का काम किया। नतीजा नक्सलवाद के रूप में सामने है। भ्रष्टाचार के शिष्टाचार में बदलने के रूप में सामने है। शिक्षा-व्यवस्था में सुधार का नतीजा कुछ प्रतिशत भारतीयों के बच्चों को उपलब्ध शिक्षा के उच्चतम्‌ स्तर और बाकी बचे अस्सी प्रतिशत के बच्चों के लिए टाट-पट्टी के चरवाहा विद्यालयों के रूप में सामने है।

समाजवादी भारत के निर्माण की जो बात स्वतंत्राता संग्राम के दौरान कही गयी और आजादी के बाद जिसे मूर्त रूप देना था, वह समाजवादी भारत भूमण्डलीकरण की तेज आँधी के समक्ष कहीं बह गया है। समतामूलक समाज का नारा, नारा ही रह गया। इसलिए नक्सली पैदा हुआ और उसने अपनी जमीन मजबूत की है। सपनों को दिखाया आपने, उनका हरण किया आपने और अब आप ही विकास की धारा अवरू( होने का इल्जाम भी लगा रहे हैं। ऐसी सोच से नक्सली कमजोर नहीं होगा। आपकी सोच उसकी सोच को मजबूती देने का काम कर रही है। हालांकि यह सच है कि नक्सलवादी आंदोलन भी विचलन का शिकार हो चला है और बंदूक की संस्कृति के सहारे वह जिस अन्याय को, कुशासन को दूर करने की बात कर रहे हैं उसमें वह शायद ही कभी सपफल हो पाएँगे। यदि ऐसा संभव होता तो उन्हें अपनी जमीन छोड़ आंध्रप्रदेश से ना भागना पड़ता।

नक्सलवाद को बढ़ावा मिलने के पीछे एक बड़ा कारण भारतीय परिदृश्य से टे्रेड यूनियन मूवमेंट का सपफाया और सरकारी उपक्रमों का निजीकरण रहा, जिसने यूनियन के जरिए अपनी बातें रखने और अपने आक्रोश को अभिव्यक्त करने का एक सशक्त माध्यम भी मजदूर से छीन लिया। प्रश्न यह उठता है कि इसका हल क्या है और यदि हिंसा के जरिए अपने प्रश्नों का हल तलाशने वालों को सपफलता मिल भी जाती है तो क्या मानव मात्रा की आजादी के नाम पर चल रहे हिंसक संद्घर्षों का दौर थम जाएगा? उत्तर दे पाना या तलाश पाना कठिन, बेहद कठिन है। शायद लोहिया के विचार इस पर कुछ रौशनी डाल सकें। उन्होंने कहा था 'क्रांति ऐसी हो कि जिसमें हथियारों का इस्तेमाल ना करना पड़े।

जो पहली बार हमें ऐसा विश्व दे जिसका हर भाग शक्ति में समान हो और जहाँ साधारण आदमी अपनी शक्ति और सत्ता का इस्तेमाल कर सके। जो क्रांतियाँ हथियारों के बल पर की गई हैं, वे लगभग हमेशा ही एक अत्याचारी की जगह दूसरे अत्याचारी को स्थापित करने में ही सपफल हुई हैं। एक चंडाल चौकड़ी बनती है, वह हथियारों के जखीरे पर कब्जा कर लेती है और चाहे यह क्रांति स्वतंत्राता और समानता के आदर्श को लेकर शुरू हुई हो, इसका अंत सत्ता की शक्ति के उपयोग में होता है।'
तो मार्ग कहाँ से मिलेगा, कौन भगीरथ पैदा होगा और कब? सौ करोड़ हिन्दुस्तानियों के उ(ार के लिए कब दोबारा गंगा पफूटेगी। भवानी प्रसाद मिश्र की कविताओं पर विजय बहादुर सिंह कहते हैं कि मिट्टी की गंध, लोक की आस्था और संस्कृति का स्वप्न बनकर पफैला हुआ भवानी बाबू का काव्य बोध, हमारी चिकनी-चुपड़ी, बिकाऊ सभ्यता के लिए आज सबसे बड़ी चुनौती है। यही शक्ति ईर्ष्या, द्वेष, दंभ और प्रतिशोध की धधकती लपटों के बीच द्घिरे और पफंसे आधुनिक विश्व को खींचकर बाहर ला सकती है, और आग बुझा सकती है-

धधक रही है आग भूमि-भर/और प्रेम में शक्ति नहीं वह अगर/तो दूजी शक्ति कौन है/जो इस पर झुक जाय शक्ति से/और बुझाए।/अन्य कौन है ज्वालाओं में जो/निर्भय होकर जा पहुँचे/द्घिरे हुओं को बाहर खींचे/लपटें पहने/जीवन गाए।
यही यक्ष प्रश्न है कि दूजी शक्ति कौन है जो इस द्घनद्घोर तम से बाहर निकलने का मार्ग प्रशस्त कर सके। शायद प्रेम और अहिंसा। शायद नहीं। जो भी है, जो भी होगी, जो मार्ग निकलेगा वह इतना तय है बंदूक की नाल से नहीं प्रशस्त होगा।

 
 
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