नवंबर २००९
 
 
 
   
 
 
 
• काशीनाथ सिंह का साहित्य अकादमी • अदम गोंडवी और भारत भूषण का निधन • जयपुर में लिटरेचर पफेस्टिवल में सलमान रुशदी •हिन्दी के कवि कुबेर दत्त और नुक्कड़ नाटक के पितामाह गुरुशरण सिंह का निधनर सम्मान।
 
 
 
तीसरा नेत्र
चिंतनयोगी पत्राकार : रवीन्द्र त्रिापाठी

तीन तरह के पत्राकार होते हैं। एक तो सिपर्फ पत्राकार होते हैं और जिनको आमतौर पर पत्राकार माना ही नहीं जाता है। हालाँकि अखबारों और चैनलों में सबसे ज्यादा खटने वाले यही पत्राकार होते हैं। दूसरे किस्म के पत्राकारों को चालू पत्राकार कहते हैं। आमतौर पर समाज और सरकार की निगाह में इनको ही पत्राकार कहा जाता है। ये चालू पत्राकार सबसे ज्यादा अपना काम करते हैं, पिफर या तो मैनेजमेंट का काम करते हैं या किसी नेता या कॉरपोरेट हाऊस का काम करते हैं और पिफर आखिर में समय मिला तो जिस अखबार, पत्रिाका और चैनल में नौकरी करते हैं उसका काम करते हैं।

तीसरे किस्म के पत्राकार चिंतनयोगी होते हैं। हालाँकि चिंतनयोगी पत्राकार भी चालू होते हैं लेकिन वे कुछ ज्यादा चालू होते हैं। वे इतने चालू होते हैं कि चालू होने की छवि नहीं बनने देते। वे हमेशा 'पोलिटिकली करेक्ट' भाषा बोलने में माहिर होते हैं। चिंतनयोगी पत्राकार की दूसरी खूबी ये होती है कि वे जहाँ नौकरी करते हैं वहाँ काम नहीं करते। वे सिपर्फ चिंतन करते हैं। उनके चिंतन का दायरा ये होता है कि आजकल पत्राकारिता का कितना पतन हो गया, किस रफ्रतार से पतन हो रहा है और आगे चलकर किस तरह पतन होगा। दूसरे शब्दों में कहें तो असली पत्राकार पत्राकारिता करते हैं, चालू किस्म के पत्राकार पीत पत्राकारिता करते हैं चिंतनयोगी पत्राकार पतन की पत्राकारिता करते हैं। वैसे चिंतनयोगी पत्राकार अपने को पत्राकार नहीं मानते, बल्कि सजग, संवेदनशील व्यक्ति और सामाजिक रूप से प्रतिब( कार्यकर्ता मानते हैं। चालू पत्राकार को हेय दृष्टि से देखा जाता है और चिंतनयोगी पत्राकार को सम्मान दिया जाता है। चिंतनयोगी पत्राकार अपने आपको चिंतक के रूप में प्रचारित करता है, बु(जिीवी के रूप में स्थापित करता है और प्रतिष्ठान विरोधी होने का दावा करता है। वो सत्ता का लाभ उठाता है लेकिन सत्ता को गाली देता है।

चिंतनयोगी पत्राकार डेस्क पर काम करना अपनी हेठी समझता है। वह रिपोर्टिंग को द्घृणा की नजर से देखता है। वह जिस संस्थान में काम करता है वहाँ के माहौल को गैरपत्राकारीय मानता है। वह कभी संतुष्ट नहीं होता और हमेशा असंतुष्ट होता है। वह सरकार से असंतुष्ट रहता है, व्यवस्था से असंतुष्ट रहता है, नेताओं से अंतुष्ट रहता है, बु(जिीवियों से असंतुष्ट रहता है लेकिन मुख्य रूप से मिलने वाले वेतन से असंतुष्ट रहता हे। उसका तर्क हमेशा ये होता है कि उसकी प्रतिभा के मुताबिक उसे वेतन नहीं मिल रहा है। लेकिन वह सिपर्फ अपनी प्रतिभा का पक्षधर होता है। बाकी लोगों की प्रतिभा के बारे में उसके कुछ प्रश्न होते हैं। जैसे ये कि प्रतिभा का सामाजिक आधार क्या है, क्या प्रतिभा की बात सामाजिक न्याय के खिलापफ है आदि आदि।

मगर चिंतनयोगी पत्राकार निकम्मा नहीं होता। वह भी काम करता है। जैसे वह या तो लेख लिखता है या पत्राकारिता पर सेमिनार करता है या ऐसे सेमिनारों में भाषण देता है। ऐसे ही चिंतनयोगी पत्राकारों को मीडिया विशेषज्ञ का खिताब मिलता है। उसके पास मीडिया में काम करने का सबसे कम अनुभव होता है लेकिन मीडिया में क्या गलत है और क्या सही ये पफैसला करने का अपना एकाधिकार समझता है। चिंतनयोगी पत्राकार खुद को जाति और धर्म के परे मानता है लेकिन दूसरों को जातिवादी और कट्टरपंथी साबित करने की कोशिश करता है। कभी प्रत्यक्ष तो कभी अप्रत्यक्ष तरीके से वह दूसरे को जातिवादी, पाखंडी, सांप्रदायिक और वैचारिक रूप से पिछड़ा मानता है।

चिंतनयोगी पत्राकारों की भी कई किस्में होती हैं। कुछ चिंतनयोगी पत्राकार पत्राकार से चिंतनयोगी पत्राकार बनते हैं। कुछ चिंतनयोगी पहले बनते हैं और पत्राकार बाद में। पर चाहे वो किसी भी तरह का चिंतनयोगी पत्राकार क्यों न हो उसमें दो बातें समान रूप से पायी जाती हैं, एक तो ये कि लगातार कैसे चिंतित रहा जाए और दूसरे ये कि दूसरों के बारे में कैसे ये प्रचारित किया जाए कि उसके सामाजिक सरोकार खत्म हो चुके हैं। चिंतनयोगी पत्राकार भविष्य में भांप लेता है और अपने कैरियर को पत्राकारिता के दायरे से बाहर ले जाता है। वह समय रहते किसी नेता से संपर्क बना लेता है और किसी संस्थान का निदेशक या कोई और पद पा लेता है। पिफर वो मीडिया के पतन पर और जोर से बोलना-लिखना शुरू कर देता है।

ऐसे ही चिंतनयोगी पत्राकारों ने एक दिन पत्राकारिता पर चिंता करने के लिए वह सम्मेलन बुलाया। इसमें टेलीविजन और प्रिंट मीडिया-दोनों के पत्राकार भाग ले रहे थे। इसमें बाकी के पत्राकारों को बतौर श्रोता के रूप में बुलाया गया और चिंतनयोगी पत्राकारों को बतौर वक्ता के रूप में।
सम्मेलन धीरे-धीरे विलाप समारोह में बदल गया। वैसे सम्मेलन 'पत्राकारिता और समाज' विषय पर आधारित था लेकिन जैसा कि आजकल अक्सर होने लगा है-मीडिया से संबंधित िकसी भी विषय पर सम्मेलन टेलीविजन पत्राकारिता के निंदा अभियान में बदल जाता है-वैसा ही इस सम्मेलन में भी हुआ। तमाम चिंतनयोगी पत्राकार बड़े ही जोर शोर से टेलीविजन पर टूट पड़े। यहाँ टूट पड़ने का मतलब शारीरिक रूप से टूट पड़ना नहीं बल्कि कोसना है। सो चिंतनयोगी पत्राकारों ने टेलीविजन की पत्राकारिता को जमकर कोसना शुरू किया और वे तब तक कोसते रहे जब तक वे हाँपफने न लगे।

नाम के लिए ये सम्मेलन एक ऐसे पत्राकार की याद में था जो एक जमाने में प्रिंट मीडिया का बड़ा धासूं पत्राकार था और दो साप्ताहिकों का संपादक भी रहा। ये वो संपादक था जो जिसने अपनी पत्राकारिता के शुरूआती दौर में एक ऐसे मापिफया डॉन के दूसरे चेहरे के बारे में रिपोर्टिंग की थी जो एक पार्टी के टिकट पर लोकसभा का चुनाव जीत गया था। ये मापिफया-नेता मापिफयागिरि करने के अलावा मंदिर बनवाने के लिए आर्थिक मदद भी करता था। यही उसका दूसरा चेहरा था जिसके बारे में संपादक-पत्राकार ने जमकर लिखा था और उसकी तारीपफ की थी और तारीपफ करते-करते ये सवाल उठाया था कि जिस आदमी में भगवान के प्रति इतनी भक्ति है क्या उसे डॉन कहा जाना चाहिए? उस जमाने में इस खबर की कापफी चर्चा हुई थी और कइयों ने पूछा था कि क्या यही पत्राकारिता है? उस वक्त इस रिपोर्टिंग को पत्राकारिता के पतन का नमूना माना गया था। लेकिन उस संपादक पत्राकार की दूसरी खूबी ये भी थी कि वो भी चिंतन में लगा रहता था। अपने को चिंतक साबित करने के लिए उसने दाढ़ी बढ़ाई। वो कई मापिफया सरगनों के साथ रहा लेकिन व्यवस्था को गाली देता रहा। यानी दोनों चेहरों को वो सपफलता के साथ अपने गर्दन पर लगाए रहा।

लेकिन सम्मेलन में इस पत्राकार-संपादक के इस दूसरे चेहरे की किसी ने चर्चा नहीं की। जो चिंतनयोगी पत्राकार बोले उन्होंने दूसरे चेहरे के बारे में रिपोर्टिंग करने वाले इस दिवंगत पत्राकार को जुझारू पत्राकारिता का प्रतीक बनाया और कहा कि काश, आज टेलीविजन में भी ऐसे पत्राकार होते?
सेमिनार में 'क' नाम के चिंतनयोगी पत्राकार ने कहा कि आज की टेलीविजन पत्राकारिता इसलिए जनता से कट गई है कि उसके पत्राकार लाखों में वेतन ले रहे हैं, इसलिए उनको हकीकत का पता नहीं होता। उसने हवा में अपने हाथ लहराते हुए पूछा कि क्या यही दिन देखने के लिए महावीर प्रसाद द्विवेदी, विष्णु राव पराड़कर और गणेश शंकर विद्यार्थी ने अपनी संपूर्ण जिंदगी पत्राकारिता में लगा दी और अगर ये लोग आज जीवित होते तो आज के टेलीविजन चैनलों को देखकर क्या सोचते?

वैसे 'क' के बारे में पत्राकार-बिरादरी में अक्सर ये सवाल उठता था कि उसका वेतन सिपर्फ तीस हजार रुपए है और इतने कम पैसे में अपने मकान की दस हजार माहवारी और कार की सात हजार माहवारी किश्त कैसे अदा करता है। बिरादरी में यही अनुमान था कि वो एक केंद्रीय मंत्राी से उसके प्रचार के एवज में हर महीने मोटी राशि लेता है। लेकिन इसको प्रमाणित करना मुश्किल था क्योंकि किसी ने इस लेन-देन को देखा नहीं था। पत्राकार बिरादरी में इस बात का भी किसी के पास जवाब नहीं था कि आखिर 'क' हर महीने उस नेता-मंत्राी का इंटरव्यू क्यों छापता है। लेकिन 'क' का भाषण जारी था और उसके मुँह से पफेन निकलने लगे थे।

बीस साल पहले भूतपूर्व हो चुके से एक अखबार से जुड़े 'वरिष्ठ' पूर्व पत्राकार और चिंतनयोगी 'ख' ने कहा कि आज का टेलीविजन समाज से कट गया है और उसमें क्रिकेट, मनोरंजन और अपराध की कहानियों का बोलबाला रहता है। बोलते बोलते 'ख' का गला भर आया और लगा कि अब वो रो देगा। पिफर उसी भरे गले से उसने कहा कि आजकल हर चैनल पर कैटरीना कैपफ, करीना कपूर और ऐश्वर्या राय मंत्रिायों और सांसदों से ज्यादा दिखती हैं क्या यही पत्राकारिता है। रोते-रोते अचानक ही उसका चेहरा गुस्से से लाल हो गया और उसने कहा कि अब समय आ गया है जब हम सारे टीवी चैनलों को खत्म कर दें और सिपर्फ अखबार पढ़ें। चिंतनयोगी पत्राकारों ने इस बात पर तालियाँ बजाईं।

इसके बाद बारी आई कि एक टीवी पत्राकार 'ग' की जो पिछले कई वर्षों से टीवी चैनलों में रहते हुए भी अपने लेखों में उनकी धज्जी बिखरने के काम में लगा हुआ था। वह वर्षों से टेलीविजन को सुधारने में लगा था लेकिन उसे इस बात का दुख था कि उसकी कोशिशें बेकार हुईं और वो अपने सिवा किसी और को सुधार नहीं सका। वह भी अपने को चिंतनयोगी कहता था। उसने कहा कि आज की टीवी पत्राकारिता पीत पत्राकारिता ही नहीं बल्कि प्रेत पत्राकारिता हो गई है और जो टीवी चैनलों पर सिपर्फ भूत-प्रेत दिख रहे हैं। दर्शकों में बैठे एक शख्स ने उसे बीच में टोका कि आप उसे सुधारने के लिए क्या कर रहे हैं तो 'ग' को गुस्सा आ गया। उसने कहा कि हालात इतने खराब हो चुके हैं कि समझ में नहीं आता कि मैं क्या करूँ इसलिए पिफलहाल मैं सिपर्फ बहता जा रहा हूँ और तब तक बहता जाऊँगा जब तक कोई किनारा नहीं मिल जाता।

 

;साहित्य, रंगमंच और पिफल्मों पर नियमित लेखन। कहानी और व्यंग्य लेखन भी। पिछले २५ सालों से हिन्दी पत्राकारिता। आजकल स्टार न्यूज से संब(।द्ध
ई-१०२, जनसत्ता अपार्टमेंट, सेक्टर-९, वसुंध्रा, गाजियाबाद, उ.प्र.
मो. ०९८७३१९६३४३

 
 
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