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जैनेपफर सारी रात ममता और देह की चाहत के अंतर्द्वंद्व में उलझी, जागती रही। एक तरपफ केलब, जो उसे अथाह शारीरिक सुख देता है। और उसकी लच्छेदार बातें उसे ८ामीन से आसमान तक ले जाती हैं। उसने जीसस की कसम खाकर जैनेपफर को समझाया था। उसने क्रिस्टी के साथ ऐसा-वैसा कुछ भी नहीं किया। दूसरी तरपफ बेटी... इतना बड़ा झूठ वह नहीं बोल सकती। उसकी आत्मा नहीं मानती। ऊहापोह में उसे वन्दना पर गुस्सा आया। उसे अकेलापन क्यूँ नहीं खलता? उसकी देह क्यों नहीं मांग करती? वह झुँझला गई। |
मॉम, मुझे आप के बुयाए ेंड अच्छे नहीं लगते, आप बुयाए ेंड न बनाया करें।'' डिनर के बाद क्रिस्टी ने बड़े प्यार से जैनेपफर से कहा।
''ेंड बनाना बुरी बात तो नहीं।'' जैनेपफर मे८ा पर से बर्तन उठाते हुए बोली।
''पर सोनल की मम्मी का तो कोई बुयाए ेंड नहीं।'' जैनेपफर के पीछे-पीछे जाती क्रिस्टी बोलती गई।
''तुम्हें क्या पता, कोई होगा।'' जैनेपफर ने रात के खाने के बर्तन डिश वाशर में डालते हुए, अनमने मन से जवाब दिया।
''मॉम, मिसि८ा शंकर का कोई बुयाए ेंड नहीं, सोनल ने बताया है।'' क्रिस्टी ने अपनी बात पर ८ाोर डाला।
''तो मिसि८ा शंकर एबनार्मल होंगी। इस उम्र में साथ तो चाहिए ही। मिसि८ा शंकर और मेरा कोई मुकाबला नहीं।'' जैनेपफर ने डिश वाशर बंद करते हुए उखड़े अंदाज में बात समाप्त की।
''मॉम, मैं मुकाबला नहीं कर रही, पर डैड की जगह कोई और ले...'' जैनेपफर ने क्रिस्टी की बात बीच ही में काट दी...
''क्रिस्टी, बहुत बातें हो गईं, चलो अब चल कर सो जाओ। बेड टाइम।'' जैनेपफर उसे उसके कमरे की ओर ले जाते हुए बोली।
क्रिस्टी को बिस्तर में अच्छी तरह ढाँप कर, उसने उसके गालों को सहलाया और पिफर प्यार से चूमा।
''गुड नाईट, स्वीट हार्ट, रात की प्रार्थना नहीं भूलना।''
''मॉम, स्टोरी।''
''नो, स्वीटी आज नहीं--कल मुझे सुबह जल्दी जाना है। तुम भी सो जाओ। पिफर सुबह तुमसे उठा नहीं जाता।'' कहते हुए नाईट बल्ब जला कर, वह कमरे से बाहर आ गई। वैसे तो क्रिस्टी दस वर्ष की है। अमरीकी परिवारों के बच्चे इस उम्र में कापफी कुछ समझने लगते हैं। खासकर लड़कियाँ जल्दी मेच्यौर हो जाती हैं। क्रिस्टी में अभी भी बालपन का भोलापन और मासूमियत है। उसकी समझ में जैनेपफर की बात नहीं आई। 'एबनार्मल' शब्द उसकी बु(ि में अटक गया।
डैड के जाने के बाद क्रिस्टी हर रात अपनी कल्पना में एक दुनिया बसाती और पिफर उसी की सुखद अनुभूतियों में विचरण करती। उसका डैड उसे कहानी सुनाया करता था और अब वह स्वयं ही हर रो८ा एक कहानी गढ़ती, खुद को सुनाती और सो जाती। पहले उसने डैड से बात की ''डैड, मॉम के पास मुझे कहानी सुनाने के लिए टाइम नहीं। पर जोन अंकल के लिए है। उसके साथ बातें कर रही है। मुझे आवा८ा आ रही है। आपके जाने के बाद मॉम बहुत बदल गई है।''
पिफर क्रिस्टी प्रार्थना करने लगी ''जीसस, मेरी मॉम को एबनार्मल कर दे, मुझे उसके बुयाए ेंड अच्छे नहीं लगते।''
धीरे-धीरे उसकी कल्पना विस्तार लेती हुई, आकार लेने लगी। एक दुनिया बसनी शुरू हो गई--उसी में वह देखती है कि जीसस ने उसकी मॉम को एबनार्मल कर दिया। वह स्कूल से उसे द्घर लाती है। पिफर खाने को पास्ता देती है। क्रिस्टी को वह पास्ता बहुत स्वादिष्ट लगता है। यम्मी, आसम.. वह स्वाद लेती है।
मॉम उसे देख-देख कर खुश होती है ''क्रिस्टी, मेरी प्यारी क्रिस्टी'' कहकर प्यार से उसे बाँहों में ले लेती है। अब वह उसका बैक पैक खोलती है। होम वर्क देखती है।
बड़े स्नेह से उसके गाल पर एक 'किस' देकर कहती है-''माई एंजल, जाओ अब बाहर जाकर खेलो।'' क्रिस्टी खिल उठी।
''सोनल की मम्मी तो रो८ा ऐसा करती है, वह एबनार्मल है। अब उसकी मॉम भी एबनार्मल हो गई है।'' अपने आप से बात करती, कल्पना का आन्नद लेती और प्रसन्न मुद्रा में ही वह गहरी नींद में चली गई।
जैनेपफर की तीखी आवा८ा ने उसे जगाया--''उठ देर हो रही है, जल्दी कर।'' आवा८ा से ही क्रिस्टी भांप गई कि कल पिफर जोन अंकल से मॉम का झगड़ा हुआ है। तभी मॉम चिड़चिड़ी हैं। क्रिस्टी चुपचाप अपने काम करने लग गई। सुबह-सुबह मॉम से डांट खाना, उसे अच्छा नहीं लगता। रात को ही वह नहाई थी। ब्रश कर कपड़े बदलकर, आधे द्घंटे में तैयार होकर, वह नीचे रसोई में आ गई। जैनेपफर ने बेहद खामोशी से उसे लंच बॉक्स पकड़ाया। ऐसे समय में क्रिस्टी भी ८यादा बात नहीं करती। छोटी उम्र में ही कई बातें वह समझने लगी थी। जैनेपफर ने उसे दरवा८ो तक छोड़ा और वह द्घर के आगे आकर खड़ी हो गई। जहाँ से स्कूल बस उसे रो८ा स्कूल ले जाती है।
क्रिस्टी बस में सारे रास्ते सोचती रही--''काश! उसकी मॉम सचमुच वन्दना आंटी की तरह एबनार्मल हो जाए।'' पर स्कूल पहुँच कर सोनल को देखते ही वह सब कुछ भूल गई।
सोनल और क्रिस्टी किंडर गार्डन से सहेलियाँ हैं। दोनों में बहुत समानता है। दोनों का जन्म राले के रैक्स अस्पताल में हुआ था। क्रिस्टी सोनल से एक दिन बड़ी है। दोनों ने अभी दसवें वर्ष में प्रवेश किया ही था, क्रिस्टी के डैडी पीटर की कार एक्सीडेंट में मृत्यु हो गई और सोनल के डैडी के ब्रेन ट्यूमर का पता चला। छह महीने के भीतर ही व्योम इस दुनिया से चला गया। दोनों अपने-अपने डैडी को मिस करतीं तो स्कूल में लंच समय उनकी बातें करतीं--
''सोनल पता है, जब मैं साइकिल चलाती थी। डैडी मेरे साथ-साथ भागते थे। अगर गिर जाती। एकदम से पकड़ लेते। मुझे चोट नहीं लगने देते थे।''
''क्रिस्टी, मेरे डैडी ने झूले के नीचे खूब सारी रेत बिछा दी थी। जब मैं झूले पर बैठती थी। बाँहें पफैलाकर खड़े रहते थे। उन्हें डर लगता था। कहीं मैं झूले से गिर न जाऊँ।''
लंच में क्रिस्टी को सोनल का आलू का पराठा बहुत अच्छा लगता। वह अपना सैंडविच वहीं गारबेज में पफेंक देती और सोनल का पराठा खाती। वन्दना क्रिस्टी के लिए भी एक पराठा लंच बॉक्स में रख देती। जैनेपफर को जब पता चला, उसे अच्छा तो नहीं लगा पर वह सोनल और क्रिस्टी के प्यार, उनकी दोस्ती को स्वीकार कर चुकी थी। गोरी-चिट्टी बेहद खूबसूरत जैनेपफर ने पीटर की मौत के डेढ़ महीने बाद ही डेटिंग शुरू कर दी। क्रिस्टी बौखला गई। वह अपने डैडी की जगह किसी और को नहीं देखना चाहती थी। उसकी पढ़ाई पर असर होने लगा। क्रिस्टी की टीचर मिसि८ा रो८ावेल्ल ने कई बार जैनेपफर को पत्रा लिखा। क्रिस्टी की पढ़ाई के बारे में सूचित किया। जैनेपफर को स्कूल भी बुलाया। उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था कि वह क्या करे? कैसे उसे संभाले? क्रिस्टी पीटर को मिस कर रही थी। उसे जैनेपफर के साथ की ८ारूरत थी। जैनेपफर के पास समय की कमी थी। वह वाल मार्ट में सुपरवाइ८ार थी। पर वेतन द्घंटों के हिसाब से मिलता। गृहस्थी के खर्चे, मकान का किराया, बिजली और पानी का बिल देने के लिए उसे ओवर टाइम करना पड़ता।
जैनेपफर और पीटर का पूरा परिवार राले में रहता है, पर उसकी मदद कोई नहीं करता। पढ़े-लिखे न होने की वजह से छोटी-मोटी नौकरियाँ कर गु८ाारा कर रहे हैं। एक दूसरे का साथ देने के लिए उनके पास न समय है न पैसा। जैनेपफर और पीटर दोनों की माँएं अकेली थीं। उनका बचपन बड़ा ही संद्घर्षमय बीता था। वैसा बचपन वह क्रिस्टी को नहीं देना चाहती थी। क्रिस्टी को स्कूल के बाद डे केयर में जाना ही पड़ता। क्रिस्टी के साथ शाम को द्घर में होते हुए भी, उसे बहुत अकेलापन महसूस होता था। उसे पुरुष साथी की इच्छा होती। वह पीटर को मिस करती। जब भी वह किसी पुरुष मित्रा को द्घर बुलाती, क्रिस्टी को उसके कमरे में भेज देती। क्रिस्टी अकेली हो जाती, या तो वह टी. वी पर सैस्मीं स्ट्रीट देखती या स्कूबी डूबी डू। कई बार वह अपनी दो बार्बी डॉल को सोनल और क्रिस्टी बनाकर अपने आप से बातें करती।
वह उदास रहने लगी। वह अपनी सब बातें सोनल को बताती। सोनल का मन क्रिस्टी के लिए दुःखी हो जाता। वन्दना से सोनल का दुःख देखा ना गया। उसने बहुत सोच-विचार के बाद जैनेपफर से बात की। स्कूल के बाद डे केयर की बजाए, वह सोनल के साथ उसे द्घर लाने लगी। शाम को काम से द्घर आते समय जैनेपफर सोनल के द्घर से उसे ले जाती। वन्दना के स्नेह की बौछारों तले क्रिस्टी की उदासी दूर हो गई और वह ख़ुश रहने लगी।
गेंहुएं रंग की पतली दुबली वन्दना, आई.बी.एम में मैनेजर है और व्योम डायरेक्टर थे। व्योम के देहांत उपरांत कम्पनी ने उसे द्घर से काम करने की इजा८ात दे दी थी। दोनों आई.टी से जुड़े हुए थे। आई.आई.टी कानपुर में ही तो दोनों की दोस्ती हुई थी। दोस्ती कब प्यार में बदल गई, पता ही नहीं चला। दोनों ने एक दूसरे को हृदय की गहराइयों से चाहा था। कई वर्षों की दोस्ती के बाद शादी की थी। व्योम के बाद वन्दना टूट गई। कई दिनों तक वह बहुत रोई, तड़पी, बिलखी, चिल्लाई पर व्योम को वापिस न ला पाई। वह स्वभाव से कर्मठ थी और सोनल का चेहरा देखकर वह पिफर हिम्मत से खड़ी हो गई। वन्दना के माँ-बाप चाहते थे कि वह भारत वापस आ जाए। उन्हें चिंता थी, वह अमेरिका में अकेली सोनल को कैसे पालेगी? वन्दना ने अमेरिका में रहना ही उचित समझा। पिफर व्योम का बड़ा भाई शुभम, भाभी सुमन और माँ-बाबूजी भी तो यहीं राले में रहते हैं। वन्दना को उनका बड़ा सहारा है।
सहारा कितना भी हो, अमरीकी जीवन शैली में रो८ामर्रा का संद्घर्ष तो उसे अकेले ही करना पड़ता। संध्या होते ही उसे कुछ होता। वह बेचैन हो जाती। रात को उसके शरीर में हलचल होती। संवेदनाएँ विचलित करतीं। पुरुष सन्सर्ग की इच्छा उसे कभी महसूस न होती। व्योम उसके रोम-रोम में रम चुका था। उसका ध्यान ही उसे शांत कर देता। प्रेम की चरम परिधि पार कर व्योम उसकी आत्मा में समा चुका था। व्योम से जुड़े एक-एक पल को उसने अपने भीतर संजो कर सहेज लिया था।
ऐसे में उसे कई बार जैनेपफर की बात याद आ जाती।-''मिसि८ा शंकर एबनार्मल है?'' क्रिस्टी उसे बता चुकी थी।
अगले ही पल वह मुस्करा पड़ती-अमरीकी लोग, प्रीत की आन्तरिक समाधि को कहाँ समझ सकते हैं? जहाँ शारीरिक भूख गौण हो जाती है। दैहिक सुख के आगे वे सोच ही नहीं पाते? वह भी अपने ही भीतर समाई प्रेम की पराकाष्ठा और उससे उत्पन्न हुए भावों को कब समझ पाई थीऋ जब तक उसने लियो बुस्कालिया की 'लव' और डॉ. जोसपफ मपर्फी की ''दि पावर ऑपफ़ यौर सब कांश्यस माइंड'' नहीं पढ़ी थी। व्योम उससे अलग कब था? वह व्योम ही तो बन चुकी थी। कभी-कभी वन्दना सोचती, शायद श्याम भी मीरा में ऐसे ही समाए होंगे। आन्तरिक समन्वय प्रेम की ज्योति प्रज्ज्वलित कर देता है। उसकी लौ पूरा बदन प्रेममय कर देती है। पिफर बाहरी सुख की इच्छा नहीं रहती। उसने जैनेपफर को ये पुस्तकें पढ़ानी चाहीं। उसने उन्हें देखकर दूर रख दिया। उसे सिपर्फ एक-दो ही शौक थे। परिवार की शिकायतें और डेटिंग की बातें करना। क्रिस्टी के मिडल स्कूल जाने तक जैनेपफर ने कई पुरुषों से डेटिंग की, जोन, जान, स्टीव, माईकल... क्रिस्टी अब इन सब बातों की आदी हो चुकी थी। जैनेपफर जब किसी बुयाए ेंड को द्घर लाती, क्रिस्टी सोनल के द्घर चली जाती। वह तो वैसे भी ८यादातर वहीं रहती। क्रिस्टी सोनल के साथ भारतीय पिफल्में देखने लगी और शाहरुख़ की पफैन हो गई। बॉलीवुड संगीत उसे बहुत पसंद आने लगा। 'हिन्दू सोसायटी' और सांस्कृतिक संस्था 'हमसब' के कार्यक्रमों में वह सोनल के साथ पिफल्मी गीतों पर नाचने भी लगी। जीवन की भागदौड़ और लड़कियों को एक जगह से दूसरी जगह ले जाने, लाने में वन्दना कई बार थक जाती। काम का बोझ जब बढ़ जाता और वह अपने काम की मीटिंग्स को छोड़कर निकल न पाती तो ऐसे में बाबू जी लड़कियों को स्कूल से द्घर ले आते। उन्हें स्नैक्स खिलाकर पिफर कभी कत्थक, कभी ताइकवांडो, कभी पियानो, कभी बैले सिखाने ले जाते।
वन्दना की आँखें सजल हो जातीं, जब बाबूजी उसके सिर पर हाथ रखकर कहते--''बेटी थक गई आज, चल मैं अपने हाथ से चाय पिलाता हूँ।'' और मसालेदार चाय का एक गर्मागर्म कप उसे पीने को देते। उसके अपने पिताजी ने तो चारों बहनों की ओर कभी देखा भी नहीं था, जब तक उसकी माँ ने बेटा नहीं जना। उसके बाद ही वह मुस्करा पाई थी और उसके साथ ही मुस्कराई थीं, वे चारों बहनें। वह माँ-बाप के पास शायद इसलिए भी नहीं जाना चाहती थी। उसके भी लड़की है। बाबूजी अक्सर मिताली द्वारा गाई, उसकी मनपसंद ग़८ाल-''वक्त ने तन्हा कर डाला तो ग़म न कर...'' लगा देते। वन्दना के चेहरे की उदासी छंट जाती और बाबूजी मुस्करा पड़ते।
अमरीका में समय बीतता नहीं, भागता है। देखते ही देखते लड़कियाँ हाई स्कूल में चली गईं। एक दिन वन्दना जब लड़कियों को स्कूल से लेने गई, कार में बैठते ही क्रिस्टी ने बड़ी उमंग के साथ कहा--''वन्दना आंटी, जय पटेल ने सोनल को डेट के लिए पूछा।''
यह सुनते ही वन्दना के पैर ब्रेक्स पर ८ाोर से पड़े। अगर लड़कियों ने सीट बैल्ट न बाँधी होती, उनके सिर सामने की सीटों पर लगते। वन्दना विचलित हो गई थी। क्या लड़कियाँ इतनी बड़ी हो गई हैं! कुछ ही क्षणों में उसने अपने आप को संभाला-''गर्ल्स, आर यू ओ. के. सॉरी।''
वन्दना अपनी जिज्ञासा रोक नहीं पाई। सहज होकर पूछ ही लिया-- ''पिफर सोनल ने क्या कहा?'' सोनल चुप ही रही।
क्रिस्टी ने चहकते हुए कहा-''आंटी, मना कर दिया। हमें याद है। आप ने कहा था-नो डेटिंग इन हाई स्कूल। एस.ए.टी के स्कोर बढ़िया लेने हैं ताकि आई वी लीग में दाखिला मिल जाए।'' वन्दना ने राहत की साँस ली।
रातभर वन्दना सो नहीं सकी। उसे व्योम की बहुत याद आई। सोनल को उम्र की इस वयः संधि में वह अकेली कैसे संभाल पाएगी? रो पड़ी थी वन्दना।
तभी व्योम की बात कानों में गूंजी--''जब जीवन में कोई विकल्प न रहे, परिस्थितियों को सहर्ष स्वीकार कर लेना चाहिए।''
''कहना बहुत आसान है। तुम तो कह कर चले गए। मेरे लिए कितना मुश्किल है--तुम क्या जानो?'' वन्दना बुदबुदाई और आँसुओं को पोंछने लगी। उसका सिर दर्द से पफटा जा रहा था। एडविल की गोली ली और सोचने लगी--सोनल का सोलहवाँ जन्म दिन आने वाला है। शादी की तरह तैयारी करनी पड़ती है। वैसे तो जेठ जेठानी ने हॉल बुक करवा लिया था। केटरर से भी बात कर ली थी। पर तब भी काम बहुत हो जाता है। अच्छा कल जैनेपफर से बात करूँगी। सजावट के लिए मंजू निगम को कॉल करना है। एडविल ने असर दिखाना शुरू कर दिया। उसकी आँखें भारी होनी शुरू हो गईं। सोचते-सोचते वह नींद की आगोश में चली गई। सुबह वन्दना का मन उदास और चित्त अस्थिर था। पर जन्मदिन की तैयारी ने उसका ध्यान बाँट दिया।
अंत में वह दिन भी आ गया, जिसका सबको इंत८ाार था। जन्मदिन की पार्टी में क्रिस्टी और सोनल ने लहँगा पहना था। जैनेपफर पंजाबी सूट पहनकर, अपने बुयाए ेंड केलब के साथ आई थी। क्रिस्टी दो दिन से सोनल के द्घर पर ही थी। वन्दना और सोनल दोनों ने महसूस किया, क्रिस्टी केलब को देखकर बहुत बेचैन सी हो गई थी। डी. जे के पंजाबी संगीत पर वह पागलों की तरह नाच उठी थी। एक दो बार केलब उसके साथ नाचने आया। वह उससे दूर चली गई। सोनल और क्रिस्टी का किशोर, निश्छल, मासूम यौवन, चेहरे की चमक-दमक कहर ढाह रही थी। दोनों के लिए विशेष दिन था। दोनों सोलह साल की हुई थीं। अमेरिका में सोलहवें जन्मदिन का बहुत महत्व है। इस दिन लड़की किशोरावस्था और युवावस्था की संधि में आ जाती है। सोनल के दादा-दादी और ताऊ-ताई बार-बार बलईयाँ लेकर खुश हो रहे थे। केलब की न८ारें क्रिस्टी के बदन पर थिरक रही थीं। क्रिस्टी उनसे बचने का प्रयास करती कभी सहेलियों और कभी वन्दना के पास जाती। वन्दना उसे न८ारन्दा८ा न कर सकी। वे न८ारें गर्ल ेंड की बेटी पर नहीं, एक उमड़ते यौवन पर उठती महसूस हुईं। वन्दना परेशान हो उठी। जैनेपफर को ढूँढ़ने लगी। वह केलब से बेखबर रैड वाईन का ग्लास पकड़े, सोनल की दूसरी सहेलियों की माँओं के साथ बातें करने में व्यस्त थी। इस दिन की एक और परंपरा है। करीबी सहेलियाँ, दोस्त या परिवार के सदस्य बर्थ डे गर्ल के लिए बोलते हैं। इससे पहले कि वन्दना उसके पास पहुँचती, जैनेपफर हँसती हुई, छोटी सी बनाई गई स्टेज पर आ गई और उसने माइक पकड़ कर बोलना शुरू कर दिया--
''सोनल के साथ-साथ क्रिस्टी को वन्दना ने जो संस्कार और परवरिश दी, उसी की बदौलत वह सोनल की तरह हर क्षेत्रा में अच्छा कर रही है। उसके व्यक्तित्व के निखार और आत्मविश्वास को देखकर, कई बार मुझे रश्क होता है। काश! मुझे भी कोई वन्दना जैसा गाइड और द्घनी छत मिली होती जो मुझे कड़ी धूप, ते८ा बारिश से बचा सकती। मैं तो हाई स्कूल में ही पीटर के प्यार में पड़कर प्रेगनेंट हो गई और शीद्घ्र ही शादी करनी पड़ी। जीवन के संद्घर्ष में ऐसे उलझे कि पढ़ भी नहीं पाए। वन्दना ने क्रिस्टी को वह सब दिया, जो मैं नहीं दे पाई। सबसे बढ़कर शंकर परिवार ने हमें अपना हिस्सा बनाया।'' जैनेपफर का गला भर गया। उससे बोला नहीं गया-''गाड अपना आशीर्वाद तुम दोनों पर सदा बनाए रखे, बस यही प्रार्थना करती हूँ।'' उसने क्रिस्टी और सोनल को गले लगाया और रो पड़ी। हॉल तालियों से गूँज उठा। सबकी आँखें गीली हो गईं। वन्दना की आँखें भी नम हो गईं थीं।
केलब भी दोनों को गले लगाने उठा। पर क्रिस्टी सोनल का हाथ पकड़कर दूर हट गई। बड़े अंदा८ा से उसने झुककर, हाथ जोड़कर, ''नमस्ते'' कहा। यह सब उसने इस ढंग से पेश किया कि लोगों की हँसी निकल गई। केलब खिसियाकर बैठ गया। वन्दना हँस नहीं सकी। क्रिस्टी के एक्ट के बाद, वह क्रिस्टी के चेहरे की कठोरता को भांप गई। क्रिस्टी उस रात द्घर भी नहीं गई। सोनल के यहाँ ही रुक गई। सोनल समझ नहीं पा रही थी, क्रिस्टी को हुआ क्या है?
वन्दना सारी रात असहज रही। उसके भीतर की औरत और अंतर्ज्ञान किसी अनहोनी के द्घटित होने का संकेत दे रहा था। भोर की पहली किरण ने धरती अभी छुई भी नहीं थी। सोनल ने वन्दना को जगाया--
''मम्मी उठिए, क्रिस्टी सारी रात तड़पती रही। उसे बहुत ते८ा बुखार है।''
''पर तुमने मुझे जगाया क्यों नहीं?''
''आप थकी हुई थीं, इसीलिए नहीं जगाया। क्रिस्टी ने भी आपको जगाने से मना कर दिया था।''
वन्दना ने जल्दी से नाइट गाऊन डाला और सोनल के कमरे की ओर तेजी से चल पड़ी। क्रिस्टी को बुखार था। थर्मा मीटर लगाया तो १०१ डिग्री निकला। बुखार से ८यादा वन्दना ने क्रिस्टी के चेहरे पर रोष, आक्रोश और बदन में गुस्सा महसूस किया। वन्दना ने क्रिस्टी का चेहरा अपने नर्म हाथों में लेकर, उसकी आँखों में आँखें डालकर पूछा-''क्रिस्टी, केलब ने तेरे साथ क्या किया?''
इतना सुनते ही क्रिस्टी वन्दना से लिपट कर पफपफक-पफपफक कर रो पड़ी। रोते-रोते उसने पूछा--''आपको कैसे पता?''
''माँ का अंतर्ज्ञान...'' वन्दना ने उसकी पीठ सहलाते हुए कहा।
''मेरी माँ को क्यों नहीं पता चला?'' क्रिस्टी के इस प्रश्न पर वन्दना बोली नहीं।
वन्दना उसके सिर पर हाथ पफेरने लगी। उसके स्नेह ने उसे सहज कर दिया। अन्दर का लावा पिद्घलने लगा।
धीरे-धीरे वह बोली--''आंटी, दो दिन पहले केलब, मॉम को डिनर के लिए पिक करने आया। मॉम बाथरूम में थी। मैं उसे लिविंग रूम में बैठने को कहकर मुड़ने लगी। वह मेरे सामने आकर खड़ा हो गया। उसने मेरे स्तनों को दोनों हाथों से कस कर पकड़ लिया। मेरी चीख निकल गई--अचानक वार था, संभल नहीं पाई। उसने मेरा वक्ष छोड़ कर, मेरे मुँह पर हाथ रख कर जकड़ लिया और बोला--अगर आवा८ा निकाली या किसी को बताया, तो जान से मार दूँगा। तेरी छातियों के उभारों ने पागल किया हुआ है। तुम जैसी कलियों से तो मैं रो८ा खेलता हूँ।''
''तुमने जैनेपफर को नहीं बताया?''
''मैं बहुत गुस्से में थी। और मॉम को बताने का समय भी नहीं था। मैंने अपना सामान उठाया और यहाँ चली आई।''
''ताइकवांडो, किस दिन के लिए सीखा है? तुम दोनों ब्लैक बेल्ट हो।'' वन्दना ने उसका डर निकालते हुए कहा।
''आंटी, इसी बात का तो दुःख है। मैं उसे बेल्ट के नीचे हिट नहीं कर पाई। उम्र भर कलियों की खुशबू से भी डरता।''
क्रिस्टी कुछ क्षणों के लिए चुप हो गई जैसे कुछ कहने से पहले अपने विचारों को समेट रही थी।
वन्दना ने उसे पानी का ग्लास और एक बनि की गोली दी।
थोड़ी देर बाद वह बोली--''आंटी, मुझे डर है। इस बार मॉम मेरी बात का यकीन नहीं करेगी।''
''इस बार, क्या पहले भी कभी ऐसा हुआ है?''
''बचपन में, मॉम के दोस्त मुझे बच्चे की तरह रखते थे। ज्यूँ-ज्यूँ मैं बड़ी होनी शुरू हुई कई बुयाए ेंड्स अच्छे आए और कई मुझमें कुछ ढूँढ़ते रहते। उनकी न८ारों से तंग आकर मैं मॉम को बताती और मॉम उन्हें छोड़ देती। अब बढ़ती उम्र में वह असुरक्षित हो गई है। उसे लगता है, दो साल बाद मैं कॉलेज में पढ़ने चली जाऊँगी। वह अकेली कैसे रहेंगी? तभी केलब जैसे द्घटिया इन्सान के साथ चिपक गई है।''
''तुम बात को टाल रही हो। क्या केलब ने पहले भी कुछ कहा था?'' वन्दना ने उसके चेहरे पर न८ारें टिकाते हुए, दृढ़ता से पूछा।
''उसकी आँखें मेरा बदन उधेड़ती रहती हैं। मैंने जब मॉम को बताना चाहा, माँ ने मेरी बात भी नहीं सुनी। हम दोनों का झगड़ा हो गया। माँ ने बहुत सी अनर्गल बातें कह दीं-मैं माँ से ईर्ष्या करती हूँ, क्योंकि मेरा कोई बुयाए ेंड नहीं है। केलब बड़ा शातिर है। उसने पहले ही मॉम को उकसा दिया, मैं स्वार्थी हूँ। उनकी शादी कभी नहीं होने दूँगी।'' क्रिस्टी बिना रुके ही कहे जा रही थी--''आंटी, दो साल बाद तो मुझे द्घर से चले ही जाना है। सोचती थी, किसी अच्छे आदमी से मॉम शादी कर ले। मैं भी बाप का प्यार ले लूँ। उस प्यार को महसूस कर लूँ। अब तो दो साल काटने भी मुश्किल लगते हैं।'' वन्दना ने देखा, उसकी आँखों में थकान उतर आई थी। उसने उसका माथा दबाते हुए कहा-''क्रिस्टी सो जा, शाम को बात करेंगे।'' और उसने कम्पफर्टर ठीक करके उस पर ओढ़ाया। थोड़ी देर बाद क्रिस्टी गहरी नींद में सो गई। वह भी सोनल के लिए नाश्ता बनाने चली गई।
गोधूली वेला में वन्दना पूजा करके उठी ही थी, तभी जैनेपफर आ गई। वन्दना ने उसे सारी बात बताई। वह कुछ नहीं बोली और क्रिस्टी को लेकर वहाँ से चली गई। दूसरे दिन क्रिस्टी स्कूल नहीं गई और न जैनेपफर काम पर। दोपहर तक दोनों खामोश रहीं। जैनेपफर ने ही बात शुरू की-''क्रिस्टी बात को समझने की कोशिश कर, मैं केलब के बिना नहीं रह सकती। मैं उसे बहुत प्यार करती हूँ। उसने मुझे वह दिया है, जो पीटर नहीं दे सका। कहीं कुछ गलतपफहमी हुई है।''
''गलतपफहमी, यह आप कह रही हैं? अपनी बेटी को... कानूनन मैं १८ साल तक माईनर हूँ। प्रकृति ने मुझे पूर्णता प्रदान कर दी है। मैं बहुत कुछ सोचती हूँ। महसूस करती हूँ।''
''क्रिस्टी, तुम अभी भी बच्ची हो। यह सब तुम्हारे दिमाग़ में वन्दना ने भरा है। वह तुम्हें हिन्दू बनाने पर तुली है।'' क्रिस्टी गुस्से से लाल-पीली हो गई। वन्दना की बात याद आते ही शांत हो गई--''गर्ल्स, गुस्सा विवेक खो देता है। कोई बड़ा पफैसला लेना हो या महत्वपूर्ण बात कहनी हो तो शांत रहना चाहिए।'' क्रिस्टी ने नर्म लहजे में कहा-''ऐसी बातें करके मेरे दिल से अपनी इ८८ात कम न करें। आप भी जानती हैं, यह सही नहीं है। आपको तो यह भी पता नहीं, मुझे माहवारी कब आई थी? मैंने पहली ब्रा कब खरीदी थी? इस सबका ख्याल मिसि८ा शंकर ने रखा। इससे जुड़ी सारी जानकारी मुझे दी। मुझे शिक्षित किया। केलब की भाषा न बोलें, मुझे सब समझ में आता है।'' जैनेपफर ढीली पड़ गई।
क्रिस्टी ने मधुर स्वर में कहना शुरू किया--''माँ, आप जैसी भी हैं, मेरी माँ हैं। माँ-बाप चुने नहीं जाते। हमारे सीमित साधनों और आपकी मजबूरियों को मैं भली भांति समझती हूँ। मैं दो विकल्प आपको देती हूँ। पहला, अगर आपको अभी शादी करनी है, मैं स्कूल के काउंसलर से बात करके, सोशल सर्विसेस की सहायता लेकर, किसी पफोस्टर होम में चली जाती हूँ। केलब के साथ मैं इस द्घर में नहीं रह सकती। मैं उसकी सूरत तक नहीं देखना चाहती। दूसरा, आप शादी के लिए मेरे १८ वर्ष की होने का इंत८ाार करें। जब मैं कॉलेज चली जाऊँगी, आप शादी कर लें। दो साल केलब इस द्घर में या द्घर के आस पास भी नहीं आएगा। अन्यथा मैं भूल जाऊँगी, आप उससे शादी करना चाहती हैं। ९११ डायल करते मुझे देर नहीं लगेगी। पाँच मिनट में पुलिस पहुँच जाएगी। आप उससे उसके द्घर और बाहर मिल सकती हैं। मुझे कोई एतरा८ा नहीं। आपकी ८ारूरत मैं समझती हूँ।'' जैनेपफर क्रिस्टी के दमकते चेहरे और दृढ़ आत्म-विश्वास के आगे झुक गई। क्रिस्टी यह कहकर अपना होम वर्क करने चली गई। जैनेपफर सारी रात ममता और देह की चाहत के अंतर्द्वंद्व में उलझी, जागती रही। एक तरपफ केलब, जो उसे अथाह शारीरिक सुख देता है। और उसकी लच्छेदार बातें उसे ८ामीन से आसमान तक ले जाती हैं। उसने जीसस की कसम खाकर जैनेपफर को समझाया था। उसने क्रिस्टी के साथ ऐसा-वैसा कुछ भी नहीं किया। दूसरी तरपफ बेटी... इतना बड़ा झूठ वह नहीं बोल सकती। उसकी आत्मा नहीं मानती। ऊहापोह में उसे वन्दना पर गुस्सा आया। उसे अकेलापन क्यूँ नहीं खलता? उसकी देह क्यों नहीं मांग करती? वह झुँझला गई।
उसने अपने बेड की मैट्रेस के नीचे दबी किताब कामसूत्रा निकाली। उसके मुखपृष्ठ को बड़े प्यार से सहलाया। बाकी पृष्ठों को उलट-पलट कर देखा। केलब ने बार्न्स एण्ड नोबल से उसे खरीदा था। जैनेपफर के जन्मदिन का उपहार था, वह किताब। जन्मदिन वाली रात पुस्तक में चित्रिात क्रियाओं का आनन्द भोग, उन्होंने चरम सुख पाया था। उन्हीं क्षणों की यादों में वह खो गई। किताब उसने सीने से लगा ली। कुछ देर तक वह सोचों की तरंग में बह गई। उसे अपना बदन भारी सा महसूस होने लगा। आँसुओं से आँखें भर गईं। पफोन की द्घंटी ने उसकी तंद्रा तोड़ी। क्रिस्टी ने पफ़ोन उठा लिया था। उसे वन्दना की बात याद आ गई--''जैनेपफर, एक शरीर ही तो अपना होता है। इसे अनुशासन में रखना ८ारूरी है। यह काम दिमाग़ करता है। ध्यान ही दिमाग़ से सही सन्देश दिलवा सकता है। तुम मेडिटेशन किया करो। भटकना रुक जाएगा और सही दिशा मिलेगी।'' उस दिन जैनेपफर चिढ़ गई थी।
अब भी यह सोचकर झिख गई-''मेडिटेशन, आन माय पफुट। जैसे खाना-पीना शरीर के लिए ८ारूरी है, वैसे ही सैक्स। एक पार्टनर चला जाए, दूसरा अपनी इच्छाएँ क्यों मारे? यह सब भावनाओं को दबाने वाली बातें हैं। वन्दना को उसका दर्शन मुबारक। एबनार्मल तो वह है ही। मैं क्यूँ वैसी बनूँ?''
भीतर का मवाद निकाल कर जैनेपफर थोड़ा हल्का महसूस कर रही थी। कनपटी से जबड़ों तक तनाव था।
क्रिस्टी ने अपने कमरे से सोनल को एस.एम.एस भेजा--''मम्मी को कहना, वह द्घबराएँ न, उसे अपनी लड़ाई लड़नी आती है।''
पर उसे लड़ाई लड़नी नहीं पड़ी। सुबह जब जैनेपफर उठी, उसका चेहरा अथाह बारिश के बाद इन्द्रधनुष सरीखा उजला और निखरा हुआ था। शायद किसी निर्णय पर पहुँच चुकी थी। स्कूल जाते समय जैनेपफर ने क्रिस्टी को बताया, वह आराम से दो साल पढ़ सकती है।
उसकी सब शर्तें उसे मं८ाूर हैं।
स्कूल के बाद क्रिस्टी ने बेबी सिटिंग शुरू कर दी और गर्मी की छुट्टियों में ग्रोसरी स्टोर में नौकरी करने लगी। इनसे कमाया पैसा वह अपनी पढ़ाई के लिए जोड़ने लगी। दो साल कब बीते, पता भी नहीं चला। हाँ, क्रिस्टी वन्दना से मिलती रही। एस.ए.टी परीक्षा, जिसके अंकों से कॉलेज में प्रवेश मिलता है, वन्दना की देख-रेख में दोनों ने उच्च स्तर में पास की। कॉलेज प्रविष्टि के पफार्म भी वन्दना ने ही भरवाए। कापफी ख्याति प्राप्त कॉलेजों से बुलावा आया था। सोनल ने बोस्टन विश्वविद्यालय को स्वीकृति भेजी। वह डॉक्टर बनना चाहती है। आठ साल के सीधे डॉक्टरी प्रोग्राम में उसे प्रवेश मिला। क्रिस्टी ने दो कॉलेजों का चुनाव किया, जिनसे उसे आर्थिक सहायता और छात्रावृत्ति मिलने की आशा थी। अभी उसने स्वीकृति किसी को भी नहीं भेजी थी। उसके पास निश्चय करने के लिए दो सप्ताह का समय था और क्रिस्टी के अठारह वर्ष पूरे होने में तीन दिन का समय।
सुबह-सुबह सोनल ने लगभग चीखते हुए वन्दना को बुलाया। वन्दना रसोई में थी, भागकर ऊपर गई।
सोनल के सामने कम्प्यूटर खुला था और क्रिस्टी की एक बड़ी सी ई-मेल। जिसमें लिखा था--
'वन्दना माँ,
इस संबोधन का अधिकार स्वयं ही ले रही हूँ। बहुत दिनों से आपको इस तरह पुकारना चाहती थी। बुला नहीं पाई। कल रात मैंने द्घर छोड़ दिया, तकरीबन सात बजे। शाम के पाँच बजे, केलब मॉम के साथ शादी करके द्घर आ गया था। आते ही मॉम के तर्क शुरू हो गए। दो साल केलब ने हमारी बात मानी। आज उसकी सुन लो। वह मेरी कसम खाकर तुम्हें बेटी मानता है। इन गर्मियों में साथ रहकर परिवार और बाप का सुख ले लो। पिफर तुम्हें चले ही जाना है। मॉम केलब की चाल में आ चुकी थी। मैंने उसकी आँखों में अपने लिए जिस्मानी भूख की तैरती लकीरें और चेहरे पर विजय के भाव पढ़ लिए थे। मैंने भी अभिनय किया। मुझे उनकी शादी की बहुत खुशी है और एक उत्सव से नए जीवन की शुरुआत करना चाहती हूँ। रात को विशेष खाना बनाना चाहती हूँ। और एक लम्बी-चौड़ी लिस्ट देकर, उन्हें ग्रोसरी लेने भेज दिया। ८ारूरी सामान उठाकर, मैंने द्घर छोड़ दिया। एक पत्रा मॉम के लिए छोड़ आई हूँ। कुछ पैसे मैंने जोड़े थे। वे इस समय काम आएँगे। किस कॉलेज में प्रवेश लूँगी, नहीं जानती। आपको बता दूँगी। मॉम और केलब को कभी नहीं और कुछ नहीं बताऊँगी। मुझे उम्र भर उससे दूर रहना है। आपके पास आ सकती थी। अठारवें जन्मदिन में तीन दिन बाकी हैं। वह कमीना माईनर को बरगलाने का दोष लगाकर, आपको तंग कर सकता है। यशोदा मैया को ऐसे छोडूँगी, कभी सोचा न था। आपके संस्कार और परवरिश ढाल और कवच का काम करेंगे। सोनल को संभालिएगा। वह मेरे इस तरह जाने से बहुत दुःखी होगी। आप मेरे हृदय में मंदिर की द्घंटी सी समाई हुई हैं। आपकी बातों की खनक कानों में गूँजती रहती है। मॉम बहुत खुश हैं। मैं उसके लिए खुश हूँ। अब मैं उन्हें मिलूँगी नहीं। जीवन के लिए जो सोचा है, उस लक्ष्य तक पहुँचना चाहती हूँ। जिस दिन कुछ बन गई, पिफर मिलने आऊँगी... आपसे। टेक केयर।
आपकी मुँहबोली बेटी,
क्रिस्टी।'
सोनल पत्रा पढ़ते-पढ़ते रो पड़ी। इससे पहले कि वन्दना उसे चुप कराती, डोर बेल बज उठी। दोनों हैरान हो गईं। इस समय कौन आया?
वन्दना जल्दी से नीचे गई। दरवा८ाा खोला। पुलिस अपफसर के साथ केलब और जैनेपफर को खड़े पाया। वन्दना बिना कुछ बोले संकेत से उन्हें सोनल के कमरे में ले गई और ई-मेल पढ़वा दी।
ऐसा लगा कि एक टार्नेडो आया और सब कुछ तहस-नहस कर गया। ठगी खड़ी जैनेपफर की आँखों से अश्रुओं की धार बह निकली। बाहर बादलों ने भयंकर गर्जन के साथ कहीं बिजली गिराई थी। ते८ा तूपफान और आँधी क़हर ढाते, बेइंतहा शोर मचाते महसूस हो रहे थे। सबके भीतर एक बवंडर चीख रहा था। बाहर और भीतर एक जैसी आवा८ों सुनाई दे रही थीं।
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