नवंबर २००९
 
 
 
   
 
 
 
•अमरकांत को इलाहाबाद में ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित• जितेन्द्र श्रीवास्तव को देवीशंकर अवस्थी सम्मान•दिल्ली में विश्व (पुस्तक मेला ;राजकमल प्रकाशन के स्थापना दिवस पर तीन लखटिया पुरस्कारों की द्घोषणामहुआ माजी के उपन्यास 'मरंग गोड़ नीलकंठ हुआ' को तीसरा राजकमल कृति सम्मानविश्वनाथ त्रिापाठी की पुस्तक 'व्योमकेश दरवेश' को पहला सृजनात्मक गद्य सम्मान अमरेन्दु किशोर की कृति 'बादलों के रंग हवाओं के संग' को चौथा कृति सम्मानस्तंभ लेखक भारत भारद्वाज के खिलापफ वारंटद्ध)
 
 
 
बीच बहस में
'ऊधो कहिबे को सब बातें' : मैत्रोयी पुष्पा

नए रचनाकारों पर इस नयी शताब्दी के शुरुआती वर्षों में न जाने कितनी गोष्ठियाँ, कहानी विशेषांकों और परिवर्तन को रेखांकित करने की होड़ें दिखाई देती हैं, यह निश्चित ही कथाजगत के पुराने दिग्गजों की सकारात्मक सोच और उत्साहवर्(न का नायाब नमूना है। ऐसा कुछ नई कहानी के जमाने में हुआ हो तो हुआ हो, मेरे देखते ;विगत उन्नीस वर्षों मेंद्ध नहीं हुआ। इसे सम्भव करने का श्रेय जिस भी संपादक को जाता है उसी की मूर्ति लेखक के मन में बड़ी हो जाती है। अब यह आरोप लगाना तो बेमानी है कि नये लेखक किसी संपादक के इशारे पर लिख रहे हैं। क्यों न लिखें, वही तो उनकी पीठ थपथपा रहा है और दूसरों से भी पीठ ठुकवा रहा है।

दूसरा आरोप यह कि नये कथाकारों की जमात के कई लेखक किसी समीक्षक विशेष की पसंद को देखकर कहानी लिखते हैं। भई ऐसा भी क्यों नहीं करना चाहिए, अपने काम पर दाद लेना मनुष्य की आदत में शुमार है। ये उनके मुकाबले क्या हैं जो परिपक्व होकर इनाम खिताबों के लिए बच्चों की तरह मचलते हैं और जूरी के लोगों की लकड़ी के आगे बंदर की तरह नाचते हैं। पिफर हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि ये युवा कहे जाने ;भले पचास पार हो गये होंद्ध लेखक पिछली से पिछली पीढ़ी की दरिद्रता भरी लेखकीय जिंदगी को सुनकर चौकन्ने और सतर्क हो गये हैं। अतः जमाने के अनुसार काम करने की वृत्ति आ जाना अपराध तो नहीं। छोटा सा जीवन है यश-धन भी इसी में हासिल करना है। सिनेमा और कला का क्षेत्रा जिस तरह संसारी, व्यवसाई और चतुर व्यवहारिक बु(ि के सहारे अभावों से निजात के लिए अग्रसर है, उसी तरह साहित्य में भी चलन है तो अचम्भा क्यों होता है? मूल्यांकन करने वाले शताब्दी में आँधी की तरह आए बदलावों को नहीं देखना चाहते क्या? पुराने साँचों-खाँचों को तोड़कर नई जमीन ;?द्ध तोड़ना साहित्य में अब वह मुहावरा है जो गाहे बगाहे लागू होता है क्योंकि अब पेड़-पौधों को जमीन में रोपना, उगाना मूर्खता है, गमलों का चलन प्रचलन में है। बोनसाई ही सुन्दर दिखते हैं।

'आज की हिन्दी कहानी की नयी पीढ़ी के लेखकों को देखते हुए मन हो रहा है नई कहानी पर एक बार पिफर से बात करने का'-नामवर सिंह
जरूर बात करें, करते रहें, पर आज आपकी बात रत्नाकर की इस पंक्ति का ही जाप करती रह जाती है-'ऊधो कहिबे को बस बातें रह जाएँगी।' पूछिए नये कथाकारों से कि जिनकी बातें आप कर रहे हैं, उनके कथा-व्यवहार के बारे में वे कितना जानते हैं? बस नई कहानी के नाम पर तीन लेखक, भाषा के बारे में निर्मल वर्मा का नाम आ सकता है। जानने या छानने की जरूरत क्या है, वे अपना कथा-व्यवहार खुद बना रहे हैं। क्या नामवर जी उनके इस आचरण से सहमत नहीं? 'हंस' की वार्षिक गोष्ठी ;२००९द्ध से तो उनकी मौखिक नाराजगी ही झलकती रही थी।

दलित विमर्श और स्त्राी विमर्श : दोनों विमर्श राजेन्द्र यादव की देन बताए जाते हैं और राजेन्द्र यादव साहित्य में खलनायक, पथभ्रष्ट, यौनिकता के सरताज तथा मान्यता प्राप्त स्त्राी बिगाड़ू पुरुष हैं। क्या सचमुच उनको स्त्राी विमर्श का पुरोधा होना चाहिए? या वे स्त्राी की जब बात करते हैं तो नाजायज लगते हैं? हाँ, वे क्यों स्त्राी के धड़ से ऊपर के हिस्से और नीचे के हिस्से की अलग-अलग सामाजिक व्याख्या करते हैं। सचमुच औरत को जिस नैतिकता के तहत भय और आतंक में बांधा गया है, उसकी परतें खोलना अवैध है? निश्चित ही सुनने में नया है, ऐसा नया कि बोलती बन्द हो जाती है ;हम इतने अश्लील कैसे हो सकते हैं की तर्ज परद्ध लेकिन असलियत को समझते तो सभी हैं और इनकार करने की श्रेष्ठता को छोड़ना भी अक्लमंदी नहीं, बस इसलिए स्त्राी-विमर्श का कबाड़ा किया करते हैं।

नामवर जी कहते हैं-पहले स्त्राी विमर्श कहाँ होता था। हाँ, नहीं होता था। होता भी क्यों, स्त्रिायाँ दबी ढकी कहानियाँ लिखकर शाबाशी पाती थीं। 'मैं चुप रहूँगी' की स्थिति और भी ज्यादा सराहनीय थी। आजादी मिलने के बाद भी वर्षों तक दुविधा भरे स्त्राी-लेखन का सिलसिला चलता रहा और प्रकटतः पुरुषों की ताकत का खाता ही बढ़ता रहा। चलिए, कृष्ण सोबती मन्नू भंडारी और उषा प्रियंवदा ने अपने लेखन को 'स्त्राी-विमर्श' कभी नहीं कहा, मगर उससे क्या बनता बिगड़ता है? उनकी रचना बात तो औरत की सामाजिक और आर्थिक दशा की ही करती है और दिशाएँ भी तलाशती है। इस प्रक्रिया को कोई नाम नहीं दिया गया और आज दे दिया गया है, वे मानें या न मानें। 'विचार' के आधार पर रचना खड़ी नहीं होती, वह होती है अनुभव, संवेदना और शब्द शक्ति के आधार पर। विचार निसंदेह अनुभवों से जन्म लेते हैं। प्रखर बौ(किता कथारस का क्षरण करती है। यह तो बौ(किता की सरताज कहलाने वाली विदुषियाँ भी जानती हैं।

राजेन्द्र यादव मैत्रोयी और प्रभा खेतान को छापते हैं :
नामवर जी ने ऐसा कहा है तो मैंने सोचा - क्या सच में? हम दोनों के सिवा 'हंस' में कोई लेखिका अपनी रचना के साथ उपस्थित नहीं हुयी? नाम गिनाने की जरूरत नहीं है, अगली-पिछली, नयी-पुरानी लगभग सभी छपी हैं ;'हंस' के अंक उठाकर देखे जाएँद्ध तीन स्त्राी विशेषांक केवल मैत्रोयी और प्रभा खेतान को लेकर ही निकाले जा सकते हैं क्या?
बड़ी मुश्किल, आप न हमें लेख लिखने की इजाजत देंगे और न हमारे आत्मचरित्रा आपको सुहाते। हाँ, इजाजत देने और आत्मचरित्रा पसंद करने की आपके लिए कोई वजह भी नहीं। यह तो उन स्त्रिायों से ही पूछा जाना चाहिए, जो साहित्य में हैं और साहित्य के बाहर हैं। स्त्रिायों को आत्मकथा लिखने की जरूरत क्यों हुयी? अपने लिए नहीं, अपनी जैसी हजारों लाखों स्त्रिायों के लिए हुयी क्योंकि ऐसी किताबें औरत की जिंदगी में औरत की जिंदगी का शामिलखाता है। साथ ही यह भी कि वह जिन दुखदर्दों और अपनी चाहतों भरे खुशियों के पलों को कहने में हिचकती थी, अब कलम लेकर सामने आयी। ऐसा हौसला किसको पसंद आएगा? उनको तो हरगिज नहीं जिन्होंने औरत की कोख से जन्म लिया है, पत्नी के रूप में औरत से अपनी औलाद पैदा की है और उस औरत की जिंदगी को कभी गौर से देखा तक नहीं कि वह चलती, बोलती, देखती, सुनती भी है?

जब सारी इंद्रियों पर कब्जा है, पहरा है तो यह खुल कैसे रही है?
कमाल है कि जहाँ आत्मकथा को लेकर शरण कुमार लिम्बाले और ओमप्रकाश वाल्मीकि पर ऐतराज नहीं, औरतें आँख का काँटा हैं। उत्पीड़न, बंदिशें, गुलामगीरी, क्या इसकी तस्वीर नहीं देनी चाहिए? स्त्राी के आगे बढ़ने का हौसला, आँखें खोलकर देखते जाने की नयी आदत और बदचलनी के लांछनों को दरकिनार करते जाने की हिम्मत की छवियाँ किसी दूसरी स्त्राी की प्रेरणा-स्रोत बनें, यह बात रास नहीं आती तो यह कैसा साहित्य जगत है? और कैसे हैं साहित्यकार जो 'सभी कहानियों को एक समझकर पढ़ते हैं?' मुश्किल यही है कि 'जाति न पूछो साधु की' रटते रटते जातियों ने संहारक रूप से अपना बलीकरण किया है।

मनुष्यता, इंसानियत जैसे शब्दों की तोतारटंत में मनुष्य रूपी स्त्राी को कभी सती किया तो कभी दहेज दहन के हवाले कर दिया और जब दाँव लगा, नाते रिश्तों को ताक पर रखकर छिपे कोनों और खुले मैदानों, सड़कों, सुनसान रास्तों पर बलात्कार किया। ठीक है यह नीति-अनीति भी कि न जाति पूछो, न स्त्राी-पुरुष का नस्लीय भेद समझो, 'स्त्राी विमर्श' कहकर हँसी में टाल दो, अपनी महातेजस्विनी पफँूक से उड़ा दो। लेकिन जैसा कि लग रहा है, औरत न समीक्षकों को खुश करने के लिए लिखेगी न संपादक के आग्रह पर। उसके अपने निजी अनुभवों से छनकर रचनाएँ आएँगी ;आ रही हैंद्ध, जो नया निर्माण करेंगी। प्रेमचंद को हमने पढ़ा है और उन्हीं के दिए वे सूत्रा भी पकड़े हैं, जो स्त्राी की कथा कहने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करेंगे ;करते हैंद्ध-'पूर्वजों की कीर्ति का भविष्य के निर्माण में भाग होता है और बड़ा भाग होता है, लेकिन हमें तो नये सिरे से दुनिया बनानी है। अपनी किस पुरानी वस्तु पर गौरव करें? वीरता पर? दान पर? तप पर? वीरता क्या थी? अपने ही भाइयों का रक्त बहाना। दान क्या था? एकाधिपत्य का नग्न नृत्य!

युवा न कहो, आज के रचनाकार कहो
हाँ, यही 'आज के रचनाकार' अच्छा संबोधन है। आज के रचनाकार ने जिनको मनोयोग से पढ़ा है, वे रेणु, राजेन्द्र यादव आदि को पढ़ गये, पर ऐवईं। उससे ज्यादा मनोयोग से पढ़ा दूधनाथ सिंह, ज्ञानरंजन, रवीन्द्र कालिया, काशीनाथ सिंह को मगर इनके पास रुकने का मन नहीं बना। ईमानदारी से कह दिया कि सीधी छलांग लगाई उदय प्रकाश, प्रियंवद जैसे कथाकारों पर। उनको पढ़ते हुए भी जो लगा, व्यक्त कर दिया। यहाँ बदलाव का लक्षण यह भी है कि लिहाज आदर सम्मान की बात नहीं आती, अपनी पसंद की बात पर जोर है। आशा करती हूँ कि इनमें से जो समीक्षक निकलें इतने ही बेबाक हों। चंदन पांडे अपनी पीढ़ी की 'अप्रोच' का जिक्र बेहिचक करते हैं, मगर उनका यह कहना कि 'ब्लैक एण्ड व्हाइट' का मिश्रण वे ही जानते हैं, गलत है। द्वन्द्वों-अन्तर्द्वंद्वों का बोलबाला तो नयी कहानी का प्रमुख पक्ष रहा है। पहले भी दिखाई देता है। 'ग्रे एरिया' मनुष्य की प्रकृति को लक्षित करता है।

परिवार की बातें, जमाने के किस्से
नये रचनाकारों पर बात करने के लिए नये आलोचक-समीक्षकों का पैदा होना बहुत जरूरी है। चंदन पांडे, कुणाल सिंह, मनोज कुमार पांडे, शशि भूषण द्विवेदी के साथ स्त्राी रचनाकार अल्पना मिश्र, मनीषा कुलश्रेष्ठ, पांखुरी सिन्हा, शरद सिंह जैसे रचनाकार उस व्यवस्था से कहाँ परिचित हैं जिसकी बात नामवर जी कर रहे हैं। संयुक्त परिवारों को टूटे हुए एक लम्बा अरसा गुजर गया। शिक्षा ने व्यक्ति को आगे बढ़ने के रास्ते दिखाए। योग्यता की सनदें लेकर खुद नामवर जी की पीढ़ी को भी परिवार छोड़ना पड़ा। अपनी पत्नी अपने बच्चे लेकर वही चला आया जो बड़ों के सामने लिहाज में अपने बच्चों को गोद में नहीं उठाता था। यदि संयुक्त परिवार की अनुपस्थिति में कहानी इकहरी लगती है तो उधार के चाचा, ताऊ, भइया कहाँ से जोड़े जाएँ? जोड़े जाएँगे तो नकली लगेंगे। आज तो कम्पटीशन का जमाना है 'दोस्त, दोस्त ना रहा, प्यार प्यार ना रहा' की नैतिकता बकायदा लागू है। जैसा समाज होगा, वैसा ही साहित्य रचा जाएगा, हाँ दिशाएँ भी इसी टूटन के बीच से खोजी जाएँगी और यह भी तय है कि वे निश्चित ही संयुक्त परिवार की ओर नहीं जाएँगी। कामकाजी औरतों ने पारिवारिक बड़ी बूढ़ियों या ननद, जेठानी, देवरानी द्वारा प्राप्त होने वाले सहयोग का रूप मेड्स, आयाओं और क्रैच में खोज लिया है तो जाहिर है इन सेवकों का परिवार में शामिल होना नयी पारिवारिक व्यवस्था का दर्शन है।

इन्हीं के आगे साहित्य की मशाल भी रखी जाएगी। गाँवों में भी संयुक्त परिवार बिखर गये क्योंकि पारिवारिक-बोझ-वाहिनी स्त्राी ने कंधे उचकाना शुरू कर दिया, जिसको मार-मारकर पुरुष अपने पफर्ज के लिए बैल की तरह चलाता था। इसी बदलाव के बरक्स खड़ा है स्त्राी उत्पीड़न और उसका हासिल हत्या आत्महत्या, जिन्हें कभी दहेज की मांग का नाम दिया जाता है तो कभी बदचलनी पर प्रताड़ित करने का नतीजा माना जाता है। एकल पारिवारिक रूप निसंदेह हमारे बड़े बूढ़ों, आदर सम्मान के भूखों को पसंद नहीं आता, जिसके पफलस्वरूप शहरों में कुकुरमुत्तों की तरह वृ(ाश्रम उगने लगे हैं और इस व्यवस्था को कहानी का विषय बाकायदा बनाया जा रहा है। नयी पीढ़ी की पक्षधरता इसमें होनी चाहिए।

माना कि नये रचनाकारों के यहाँ रूपविधान पर ज्यादा जोर है, मुश्किल भी तो यह है कि स्थितियों और द्घटनाओं ने द्घर के भीतर की जगह छोड़ दी, बाहर का रास्ता लिया। गाँव से भागकर शहरों में शरण ली, अब बात नजदीक की नहीं रह गयी, रचनाकार को तथ्य-कथ्य का पीछा करते हुए दूर तक भागना है। आदमी भी भोला और निष्कपट, जो पहले ज्यादा तादाद में था, अब तो ढूंढ़ने पर भी नहीं मिलता। जटिल समाज का जटिल रूप जब भाषा ग्रहण करता है, संप्रेषण में दिक्कत होती है, शब्दों का चुनाव गड़बड़ाता लगता है और महसूस होता है कि लेखक ने कहानी को जटिल बनाया है। साथ ही यह कि यह पात्रा की वाणी नहीं, लेखक की भाषा है, जोकि होती भी है।

इसके अतिरिक्त यह भी समझ लेना चाहिए कि वाम आंदोलनों से जुड़े लेखक हों या एक्टविस्ट उनकी अपनी भाषा, जिसे वे संप्रेषित करना चाहते हैं, वह नहीं होती जो हमारे देश के आम आदमी की हिन्दी ;खड़ी बोलीद्ध होती है। इसलिए ही आतंकवाद, बाजारवाद, उपभोक्ता संस्कृति जैसे शब्द जब रचना में आते हैं, आम पाठक चकरा जाता है। अपने देश के किसान और मजदूरों को आप इस भाषा में अपनी बात नहीं समझा सकते तो किसानों की आत्महत्या पर लिखने का मकसद क्या रह जाएगा? सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है यहाँ इन साधारण लोगों के लिए सरल-सहज शब्दों वाली भाषा का लयात्मक व्यवहार कि जिसमें रमकर वे उत्साह, साहस और कठोर स्थितियों से भिड़ जाने का संकल्प पाएँ। लेखक के लिए सीधी सरल बात कहना जितना जरूरी होता है, अपने मंतव्यों को प्रेषित करना उतना ही कठिन। ऐसा नहीं है तभी तो साहित्य से आम आदमी दूर है जबकि 'ईदगाह' का हामिद हर गाँव और शहर में है। 'बड़े भाई साहब' जहाँ न तहाँ मिल जाते हैं। धनिया भी अपने-अपने लिए भी बोलती मिल जाती है और अपनी बेटियों के लिए भी। बदलाव इसी का नाम है, दिशाएँ ये ही तो नयी हैं कि जो बेबस खामोशियाँ आदमी पर लदी थीं, वे मुखर होने लगीं, उनकी ही अपनी जुबान में अपने लहजे में।

१०४, महागुन मॉपिर्फयस, ई-४, सेक्टर-५०, नोएडा
मो. ९९१०४१२६८०

 
 
 
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